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त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

२१४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे

वारुणं यज्ञमासाद्य मुमुदुः पूजिता भृशम् ॥ ४६ ॥
मज्जितं पितरं श्रुत्वा कहोलं तत्सुतस्ततः ।
अष्टावक्रः समागत्य ज्ञानवैतण्ड्यजल्पकः ॥ ४७ ॥
विजित्य वारुणिं सिन्धावादिदेश निमज्जने ।
अथ प्रकाशमापन्नो वारुणिर्द्विजमुख्यान् ॥ ४८ ॥
समानयत्स्वलोकस्थानष्टावक्रेण निर्जितः ।
अथागतेषु विप्रेषु कहोलतनयो भृशम् ॥ ४९ ॥
विप्रान् विमोचितान् सर्वानत्यवर्त्त दर्पतः ।
अष्टावक्रेण विमता विप्राः खेदमुपागताः ॥ ५० ॥
तत्काल आगतां कांचित्तापसीं शरणं ययुः ।
तान्समाश्वास्य विप्रान् सा काषायाम्बरवासिनी ॥ ५१ ॥
जटिला नित्यतरुणी मनोहरवपुर्धरा ।
सभामुपैत्य प्रोवाच नृपेणाभिसुपूजिता ॥ ५२ ॥

वरुणकी यज्ञशालामें पहुँचनेपर खूब सत्कार पाकर वे बड़े प्रसन्न
होते थे ॥ ४६ ॥
कहोलका पुत्र अष्टावक्र वितण्डा और जल्पमें बड़ा प्रवीण था। जब
उसने अपने पिताको समुद्र में डुबाया सुना तो वहाँ आकर वरुणपुत्रको
परास्त किया और उसे समुद्रमें डुबानेका आदेश दिया ॥ ४७-४८ पू० ॥
अष्टावक्रसे परास्त होनेपर वरुणपुत्रने अपनेको प्रकट कर दिया और
अपने लोकसे सभी द्विजश्रेष्ठोंको ले आया ॥ ४८ उ०-४९ पू० ॥
सब ब्राह्मणोंके आनेपर कहोलपुत्रको बड़ा अभिमान हुआ और
वह वरुणके यहाँसे छुड़ाये हुए ब्राह्मणोंसे अपना बड़प्पन प्रकट करने
लगा। इस प्रकार अष्टावक्रसे अपमानित होनेपर ब्राह्मणोंको बड़ा
खेद हुआ ॥ ४९ उ०-५० ॥
उसी समय वहाँ एक तपस्विनी आयी। वह काषाय वस्त्र धारण,
किये थी, उसके सिरपर जटाएँ थीं, योगाभ्यासके कारण नित्य तरुणा-
वस्थामें रहती थी और अत्यन्त मनोहर शरीरवाली थी। राजाने उसका
खूब सत्कार किया। वे सब उसकी शरणमें गये। उनको सान्त्वना दे
उसने सभामें आकर कहा-॥ ५१-५२ ॥

पञ्चदशोऽध्यायः । २१५
कहोलसुत वत्स त्वमत्यन्तं बुद्धिमानसि ।
त्वया विमोचिता विप्रा वादे निर्जित्य वारुणिम् ॥ ५३ ॥
अहं पृच्छामि किञ्चित्त्वां वद हित्वा सुकैतवम् ।
यत्पदं विदितं सर्वामृतत्वप्रतिपादकम् ॥ ५४ ॥
यत्पदे विदिते सर्वसन्देहः प्रलयं व्रजेत् ।
अविज्ञातं न किञ्चित्स्यादाशास्यं वा न किञ्चन ॥ ५५ ॥
अवेद्यं विदितं तच्चेद्वद मामुप सत्वरम् ।
तापस्यैवं समापृष्टः कहोलतनयोऽब्रवीत् ॥ ५६ ॥
विदितं तत्पदं भूयो वच्मि तापसि संशृणु ।
न मे ह्यविदितं लोके ह्यस्ति किञ्चित्कियच्चिदम् ॥ ५७ ॥
मया शास्त्राणि सर्वाणि भूयः संलुलिठतानि वै ।
यत्त्वं पृच्छसि तद्वक्ष्ये शृणु तापसि तत्त्वतः ॥ ५८ ॥
तद्धि सर्वजगद्धेतुरादिमध्यान्तवर्जितम् ।
देशकालानवच्छिन्नं शुद्धाखण्डचिदात्मकम् ॥ ५९ ॥
“कहोलपुत्र ! बेटा ! तुम बड़े बुद्धिमान् हो । तुमने वरुणपुत्रको
विवादमें जीतकर सभी ब्राह्मणोंको छुड़ा दिया ॥ ५३ ॥
मैं तुमसे कुछ पूछती हूँ । तुम कपट त्यागकर बताओ । जो पद
जान लिये जानेपर सब प्रकार की अमरता प्रदान करनेवाला है, जिस
पदको जान लेनेपर सारे सन्देह निवृत्त हो जाते हैं, कुछ भी जानना
शेष नहीं रहता और न कोई चाहने-योग्य वस्तु ही रहती है, ऐसा जो
अवेद्य पद है वह यदि तुम्हें विदित है तो शीघ्र ही मेरे सामने कहो ।”
तपस्विनीके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर कहोलपुत्रने कहा-॥५४-५६॥
“उस पदको मैं अच्छी तरह जानता हूँ और तपस्विनीजी ! सुनो,
तुम्हें बताता हूँ । संसारमें ऐसी कोई बात नहीं है जो मैं नहीं जानता ।
तुम्हारे इस प्रश्नमें तो है ही क्या ? ॥ ५७ ॥
मैंने सारे ही शास्त्रोंका अनेकों बार आलोडन किया है । तुम
जो कुछ पूछती हो अभी ठीक-ठीक बताये देता हूँ । तपस्विनीजी !
सुनिये ॥ ५८ ॥
तुम्हारा पूछा पद ही सम्पूर्ण जगत्का मूल कारण है । उसका न

२१६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
यदुपाश्रित्य वै सर्वं जगदेतद्विराजते ।
आदर्शानगरप्रख्यं तदेतत्परमं पदम् ॥ ६० ॥
प्राप्नोति तद्विदित्वैव निश्चलामृतसंस्थितिम् ।
आदर्शे विदिते यद्वत् सन्देहः क्वचिद्भवेत् ॥ ६१ ॥
प्रतिबिम्बेष्वनन्तेषु न स्यादविदितं तथा ।
नाशास्यं वा भवेत्किञ्चिदेवं प्रविदिते परे ॥ ६२ ॥
तच्चाप्यवेद्यमन्यस्य वेदकादेरभावतः
एवं तापसि तत्तत्त्वं शास्त्रदृष्ट्या विभावितम् ॥ ६३ ॥
इत्यष्टावक्रवचनं श्रुत्वा सा पुनरब्रवीत् ।
मुनिदारक सूक्तं ते यथावत्सर्वसम्मतम् ॥ ६४ ॥
यदुक्तं वेदकाभावादवेद्यं तदिति त्वया ।
प्राप्नोति तद्विदित्वैव चामृतं पदमव्ययम् ॥ ६५ ॥
आदि है, न मध्य है और न अन्त है। वह देश और कालसे सीमित
नहीं है तथा शुद्ध, अखण्ड और चिन्मय है ॥ ५६ ॥
दर्पणमें प्रतिबिम्बित नगरके समान जिसका आश्रय लेकर यह सारा
जगत् विद्यमान है वही तुम्हारा पूछा हुआ परम पद है ॥ ६० ॥
जिस प्रकार दर्पणको जान लेनेपर उसमें प्रतिबिम्बित किसी भी
वस्तुकी स्थितिके विषयमें कोई सन्देह नहीं रहता उसी प्रकार उस
पदको जान लेनेपर ही साधक अविचल अमरपद प्राप्त कर लेता है ॥६१॥
तथा जैसे [दर्पणका ज्ञान होनेपर] उसके अनन्त प्रतिबिम्बोंमें
से कोई भी अज्ञात नहीं रहता उसी प्रकार उस परमपदको जान लेनेपर
किसी वस्तुकी आशा (चाह) नहीं रहती ॥ ६२ ॥
अवश्य ही वह किसी अन्यके द्वारा नहीं जाना जा सकता, क्योंकि
उसका कोई अन्य ज्ञाता है ही नहीं। तपस्विनीजी ! शास्त्र-दृष्टिसे
उस तत्त्वके विषय में ऐसा निर्णय किया गया है” ॥ ६३ ॥
अष्टावक्रका ऐसा कथन सुनकर वह फिर बोली, “मुनिपुत्र ! तुम्हारा
कथन बड़ा सुन्दर है। तथा वह यथार्थ और सर्वसम्मत भी है ॥ ६४ ॥
किन्तु तुमने जो कहा कि उसका कोई अन्य ज्ञाता न होनेके
कारण वह पद अवेद्य है और [साथ ही यह भी कहा कि] उसे जान

पञ्चदशोऽध्यायः। २१७
इति पूर्वोत्तरवचो मन्यसे सङ्गतं कथम्।
अवेद्यं चेन्न जानामि नास्तीति च निरूपय ॥ ६६ ॥
अस्ति जानासि यदि तदवेद्यमिति मा वद।
अथैतत्तु त्वया विप्र शास्त्रदृष्ट्या विभावितम् ॥ ६७ ॥
न तत्स्वयं विजानासि तस्मात्तच्चापरोक्षकम्।
दृष्ट्वा प्रत्यक्षतः सर्वं प्रतिबिम्बं यथास्थितम् ॥ ६८ ॥
आदर्शं न विजानासि प्रत्यक्षेणेति तत्कथम्।
एवं वदन् सभामध्ये जनकस्यास्य वै पुरः ॥ ६९ ॥
परिभूतं स्वमात्मानं मन्यसे नो कथं वद।
एवमुक्तस्तया तत्र नैव प्रोवाच किञ्चन ॥ ७० ॥
विमना इव सञ्जातो लज्जितोऽभवदञ्जसा।
अवाङ्मुखः क्षणं स्थित्वा विचार्यान्तस्तयेरितम् ॥ ७१ ॥
तत्प्रश्नोत्तरमप्राप्य तां प्राह द्विजसत्तमः।
लेनेपर ही साधक अविनाशी अमरपद प्राप्त कर लेता है—सो, इन पहले
और पिछले दोनों वाक्योंकी परस्पर संगति कैसे लगेगी ? ॥६५-६६ पू०॥
यदि वह अवेद्य है तो कहो कि मैं उसे नहीं जानता अथवा
वह पद है ही नहीं। और यदि वह है तथा तुम उसे जानते हो तो ऐसा
मत कहो कि वह अवेद्य है ॥ ६६ उ०-६७ पू० ॥
इसके सिवा ब्राह्मणदेवता ! तुमने तो यह बात शास्त्रदृष्टिसे कल्पना
कर ली है। स्वयं अनुभव करके तो जानी नहीं। इसलिये उसका तुम्हें
अपरोक्ष ज्ञान तो है नहीं ॥ ६७ उ०-६८ पू० ॥
जब तुम सारे प्रतिबिम्बको ज्योंका त्यों प्रत्यक्ष देखते हो तो [ उसके
आश्रयभूत ] दर्पणको प्रत्यक्ष क्यों नहीं जानते ? ॥ ६८ उ०-६९ पू० ॥
इस सभामें राजा जनकके सामने ऐसी बात कहने हुए
भी, भला बताओ तो, तुम अपनेको परास्त हुआ क्यों नहीं
मानते ?" ॥ ६९ उ०-७० पू० ॥
तपस्विनीके ऐसा कहनेपर अष्टावक्र कुछ भी न बोल सका। वह उदास-
सा हो गया और स्वभावसे ही लज्जित भी हुआ ॥ ७० उ०-७१ पू० ॥
कुछ देर नीचा मुख किये बैठा रहा और उस तपस्विनीके कथन-

२१८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
तापस्यहं न जानामि त्वत्प्रश्नस्योत्तरं वचः ॥ ७२ ॥
शिष्योऽहं ते वदेतन्मे कथमेतन्निरूपितम् ।
नाहं वदाम्यनृतकं तपोहरमनर्थकम् ॥ ७३ ॥
इत्यापृष्टा तापसी सा प्रसन्ना तस्य सत्यतः ।
अष्टावक्रं प्रत्युवाच शृण्वतां च सभासदाम् ॥ ७४ ॥
वत्सैतदविदित्त्वैव बहवो मोहमागताः ।
शुष्कतर्कैरविज्ञेयं सर्वत्रैव सुगोपितम् ॥ ७५ ॥
एतावत्सु सभासत्सु न विजानाति कश्चन ।
राजाऽयं वेत्त्यहं वापि वेद्मि नान्यस्तु कश्चन ॥ ७६ ॥
सर्वत्र हि विवादेषु नैतत्प्रश्नोत्तरं क्वचित् ।
प्रायो विदुर्हि विद्वांसस्तर्कमात्रसमाश्रयाः ॥ ७७ ॥
नैतत्तर्केण सुज्ञेयमपि सूक्ष्मधिया क्वचित् ।
पर ऊहापोह करनेपर भी जब उसके प्रश्नका उत्तर न सूझा तो वह
द्विजश्रेष्ठ बोला—॥ ७१ उ०-७२ पू० ॥
तपस्विनीजी ! मैं आपके प्रश्न का उत्तर नहीं जानता। मैं आपका
शिष्य हूँ, अब आप ही बताइये कि शास्त्रमें ऐसा विरोधी निरूपण
क्यों मिलता है ? मैं तपस्याको क्षीण करनेवाला अनर्थकारी असत्य-
भाषण नहीं करता हूँ ॥ ७२ उ०-७३ ॥
इस प्रकार पूछे जानेपर तपस्विनी उसके सत्य-भाषणसे प्रसन्न हो
गयी तथा सब सभासदोंके सुनते हुए अष्टावक्रसे कहने लगी ॥ ७४ ॥
“वत्स ! इस रहस्यको न जाननेके कारण ही बहुत लोग मोहमें
पड़ जाते हैं ! यह बात कोरे तर्कसे समझमें आनेवाली नहीं है और
सभी शास्त्रोंमें बहुत गुप्त है ॥ ७५ ॥
यहाँ जितने सभासद् हैं उनमेंसे भी कोई नहीं जानता। या तो
यह राजा जानता है या मैं जानती हूँ, और कोई नहीं ॥ ७६ ॥
सब जगह वाद-विवादोंमें भी इस प्रकारका प्रश्नोत्तर कहीं नहीं
होता । विद्वान् लोग भी प्रायः तर्कमात्रका आश्रय लेकर ही इसे
जानते हैं ॥ ७७ ॥
किन्तु सद्गुरुकी सेवा और इष्टदेवकी कृपा आदिके बिना केवल

पञ्चदशोऽध्यायः। २१६
विना सद्गुरुसेवायां देवतानुग्रहादिना ॥ ७८ ॥
मुनिपुत्राभिधास्यामि शृण्वेतत्सूक्ष्मया धिया ।
नेदं श्रुत्वापि विज्ञेयं ताटस्थ्यप्राणया धिया ॥ ७९ ॥
यावदेतद्धि विज्ञानमनुदाहृतमात्मनि ।
तावत्सहस्रशः प्रोक्तं श्रुतं चापि निरर्थकम् ॥ ८० ॥
यथा कश्चित्स्वकण्ठस्थं मुक्ताहारं प्रमादतः ।
अविज्ञाय हृतं चौरैर्मन्यते मूढभावतः ॥ ८१ ॥
प्रबोधितोपि स पुनः कण्ठेऽस्तीति हि केनचित् ।
स्वात्मानमनुदाहृत्य यावत्कण्ठं न पश्यति ॥ ८२ ॥
तावन्नाप्नोति कण्ठस्थं हारं सूक्ष्मविमर्श्यपि ।
एवं मुनिसुतात्मानं स्वस्वभावं निशम्य च ॥ ८३ ॥
भूयोऽतिनिपुणोऽप्यन्तरात्मानमनुदाहरेत् ।
यावत्तावद्बहिः कुत्र कथं तद्विदितं भवेत् ॥ ८४ ॥
तर्कद्वारा सूक्ष्म बुद्धिसे इसे कभी कोई नहीं जान सकता ॥ ७८ ॥
मुनिपुत्र ! मैं तुम्हें समझाती हूं, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो ।
तटस्थ प्राण (असमाहित चित्त) रहनेपर तो इसे सुनकर भी कोई
जान नहीं सकता ॥ ७९ ॥
जबतक यह विज्ञान अपने अन्तःकरणमें अनुभूत नहीं होता तब-
तक हजारों वार सुनाना या सुनना भी व्यर्थ ही होता है ॥ ८० ॥
जिस प्रकार कोई पुरुष अपने गलेमें पड़े मोतियोंके हारको भ्रमवश
न जानकर अज्ञानवश समझता है कि उसे चोरों ने चुरा लिया ॥ ८१ ॥
उसे कोई ऐसा समझाते भी कि वह तेरे गले में है तो भी जबतक
अपने शरीरके अभिमुख होकर वह अपने कण्ठको नहीं देखता तबतक,
बड़ा सूक्ष्म विचार करनेवाला होनेपर भी, उसे वह कण्ठस्थ हार नहीं
मिलता, इसी प्रकार हे मुनिपुत्र ! अपने आत्मा और आत्माके स्वभावके
विषयमें बार-बार सुनकर भी जबतक समाहितचित्त होकर आत्माके
अभिमुख नहीं होता तबतक अत्यन्त निपुण पुरुष भी उसे बाहर कहाँ
और कैसे जान सकता है ? ॥ ८२-८४ ॥
१. अर्थात् 'मैं ऐसा हूँ या नहीं' ऐसा निर्णय करनेके लिये अन्तःकरण समाहित
होकर अपने स्वरूपके अभिमुख नहीं होता ।

२२० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
यथा हि दीपो विषयान्प्रकाशयति सर्वतः ।
स्वयं प्रकाश्यतां नैति कचिद्दीपस्य कस्यचित् ॥ ८५ ॥
प्रकाशते स्वयं चैवानपेक्ष्यान्यं प्रकाशकम् ।
एवं सूर्योदये सर्वे प्रकाशकतया स्थिताः ॥ ८६ ॥
एवं च किं दीपमुखा अप्रकाश्यत्वहेतुतः ।
न सन्ति न प्रकाशन्ते इति वक्तुं हि युज्यते ॥ ८७ ॥
एवं प्रकाश्यभूतेषु सत्सु दीपमुखेषु वै ।
अत्यन्तमप्रकाश्यं यच्चित्त्वं तत्कुतो वद ॥ ८८ ॥
असंवेद्यं प्रकाशेत चेत्यत्र विचिकित्सितम् ।
तस्मात्त्वमन्तर्मुखया दृष्ट्या सम्यग्विचारय ॥ ८९ ॥
चिच्छक्तिरेषा परमा त्रिपुरा सर्वसंश्रया ।
सर्वावभासिनी कुत्र कदा वा न प्रकाशते ॥ ९० ॥
यदा सा न प्रकाशेत प्रकाशेत तदा नु किम् ।
अप्रकाशेनापि सैव चितिशक्तिः प्रकाशते ॥ ९१ ॥
जिस प्रकार दीपक सब ओर विषयोंको प्रकाशित करता है किन्तु
स्वयं कभी किसी अन्य दीपकका प्रकाश्य नहीं होता वह किसी अन्य
प्रकाशककी अपेक्षा न रखकर स्वयं ही प्रकाशित होता है, इसी प्रकार
सूर्यादि अन्य सब भी प्रकाशक रूपसे ही स्थित हैं ॥ ८५-८६ ॥
ऐसी अवस्थामें अप्रकाश्य होनेके कारण क्या यह कहना ठीक है
कि ये दीपक आदि हैं ही नहीं अथवा प्रकाशित ही नहीं होते ॥ ८७ ॥
इस प्रकार जब प्रकाशित होनेवाले दीपक आदिके विषयमें ऐसी
बात है, तब जो अत्यन्त अप्रकाश्य [ अर्थात् जो कभी किसीका भी
विषय नहीं होता ] उस चेतन तत्त्वके विषयमें यदि यह कहा जाता है
कि 'वह अज्ञेय है और प्रकाशितभी होता है' तो इसमें सन्देह क्यों होता
है ? अतः तुम अन्तर्मुख दृष्टिसे खूब विचार करो ॥ ८८-८९ ॥
यह सर्वोत्कृष्टा चित्-शक्ति ही सबकी आश्रयभूता त्रिपुरा देवी है ।
वही सबको प्रकाशित करनेवाली है । अतः वह कब और कहाँ प्रकाशित
नहीं होती ? ॥ ९० ॥
जब वह प्रकाशित नहीं होगी तब और ही क्या प्रकाशित होगा ।

पञ्चदशोऽध्यायः । २२१
अप्रकाशो यथा भाति सा न भायात्कथं वद ।
भाति चेत्सा कथं भाति विमृशैतत्सुसूक्ष्मतः ॥ ९२ ॥
अत्र सर्वे न पश्यन्ति कुशला अपि पण्डिताः ।
अनन्तर्दृष्टयस्तेन मोहिताः संसरन्ति च ॥ ९३ ॥
यावद् दृष्टिः प्रवृत्तिं तु न परित्यज्य तिष्ठति ।
तावदन्तर्दृष्टितापि न स्यादेव कथञ्चन ॥ ९४ ॥
यावन्नान्तर्दृष्टिमेति तावत्तां न प्रपश्यति ।
अन्तर्दृष्टिर्निरीहा स्यात् सेहायाः सा कथं भवेत् ॥ ९५ ॥
परिहृत्य तु तां सम्यक् स्वभावमुपसंश्रय ।
क्षणं स्वभावमाश्रित्य निर्विमर्शस्ततः परम् ॥ ९६ ॥
विमृश्य स्मरणद्वारा ततो वेत्सि समस्तकम् ।
असंवेद्यं सुवेद्यं च तदेवं तत्त्वमुच्यते ॥ ९७ ॥
विदित्वैवमवेद्यं च प्राप्नुयादमृतां स्थितिम् ।
अप्रकाशरूपसे भी तो वह चितिशक्ति ही प्रकाशित होती है ॥ ९१ ॥
भला, जिससे अप्रकाशका भी भान होता है वह स्वयं क्यों
भासित नहीं होगी ? और यदि भासती है तो किस प्रकार भासती
है—इसपर सूक्ष्म दृष्टिसे विचार करो ॥ ९२ ॥
अन्तर्दृष्टि हुए बिना इस रहस्यको बड़े निपुण विद्वान् भी नहीं
समझ पाते । इसीसे वे मोहग्रस्त रहकर संसार-चक्रमें पड़े रहते हैं ॥९३॥
जबतक दृष्टि बाह्य प्रवृत्तिको त्यागकर स्थिर नहीं होती तबतक
किसी प्रकार अन्तर्दृष्टिता भी प्राप्त नहीं हो सकती ॥ ९४ ॥
और जबतक अन्तर्दृष्टि नहीं होती तबतक उसका साक्षात्कार नहीं
होता । अन्तर्दृष्टि तो निःसंकल्पता है अतः संकल्पोंके रहते हुए वह कैसे
हो सकती है ॥ ९५ ॥
अतः तुम संकल्पोंको अच्छी तरह त्यागकर अपने स्वरूपका आश्रय
लो और एक क्षण स्वरूपमें स्थित रहकर फिर निश्चिन्त हो जाओ ॥९६॥
फिर उस अवस्थाके स्मरण द्वारा तुम यह सब कुछ जान जाओगे कि
वह तत्त्व अज्ञेय है और सुज्ञेय भी है—ऐसा क्यों कहा जाता है ॥९७॥
इस प्रकार उस अविज्ञेय तत्त्वको जानकर तुम अमृत-स्थिति

२२२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
एतत्तेऽभिहितं सर्वं मुनिपुत्र नमोऽस्तु ते ॥ ९८ ॥
व्रजाम्यहं त्वयः चैतन्न विज्ञातं सकृच्छ्रुतेः ।
बोधयिष्यति त्यामेष राजा बुद्धिमतां वरः ॥ ९९ ॥
पृच्छ भूयः संशयं ते सर्वं छेत्स्यति वै नृपः ।
इत्युक्त्वा पूजिता राज्ञा प्रणता च सभासदैः ॥ १०० ॥
वातनुन्नाभ्रलेखेव क्षणादन्तर्द्धिमाययौ ।
एतत्तेऽभिहितं राम वेदनप्रक्रियात्मनः ॥ १०१ ॥
इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अष्टावकीये
पञ्चदशोऽध्यायः ।
प्राप्त कर लोगे। यह मैंने तुमसे सारा रहस्य कह दिया। मुनिपुत्र !
तुम्हें नमस्कार है ॥ ९८ ॥
अब मैं जाती हूँ। एक बार सुन लेनेसे ही तुम इसे जान नहीं
सकोगे। ये बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाराज जनक तुम्हें इसका बोध
करायेंगे। तुम इनसे पुनः प्रश्न करना। महाराज तुम्हारे सब संशयोंका
छेदन कर देंगे” ॥ ९९-१०० पू० ॥
ऐसा कहकर वह उठी। राजाने उसका पूजन किया तथा अन्य
सभासदोंने प्रणाम। फिर वह वायुसे विचलित हुई मेघमालाके समान
एक क्षणमें ही अन्तर्धान हो गयी। परशुराम ! मैंने तुम्हें यह आत्माका
ज्ञान होनेकी प्रक्रिया सुना दी ॥ १०० उ०-१०१ ॥
पञ्चदश अध्याय समाप्त।

षोडशोऽध्यायः
श्रुत्वैतद्भार्गवो रामः प्राप्य विस्मयमान्तरे ।
भूयः पप्रच्छाऽत्रिसूनुमवितृप्तः कथाश्रुतेः ॥ १ ॥
भगवन्नद्भुतं ह्येतच्छ्रुतं वृत्तं पुरातनम् ।
भूयः पप्रच्छ राजानमष्टावक्रो महामुनिः ॥ २ ॥
यद्राजा प्रत्युवाचैनं तच्च मे वद सर्वशः ।
अहोऽद्भुतं समाख्यानं न क्वचिच्च मया श्रुतम् ॥ ३ ॥
विज्ञानवृत्तसर्वस्वं दयया वद मे गुरो !
इत्येवमनुयुक्तोऽथ दत्तात्रेयो महामुनिः ॥ ४ ॥
भार्गवाय समाचख्यौ कथां परमपावनीम् ।
शृणु भार्गव यत् प्रोक्तं जनकेन महात्मना ॥ ५ ॥
निर्गतायां तु तापस्यामष्टावक्रो मुनेः सुतः ।
षोडश अध्याय ॥ १६ ॥
जनक और अष्टावक्रका संवाद
भृगुनन्दन परशुरामजीको यह सब सुन मन ही मन बड़ा आश्चर्य
हुआ। कथाश्रवणसे अभी उनकी तृप्ति नहीं हुई थी; अतः उन्होंने
अत्रिनन्दन भगवान् दत्तसे पुनः प्रश्न किया ॥ १ ॥
"भगवन् ! यह तो बड़ा ही अद्भुत पुरातन इतिहास सुना। अब
आप दयापूर्वक सांगोपांग वह प्रसंग सुनाइये कि महामुनि अष्टा-
वक्रने राजासे फिर क्या प्रश्न किया और राजाने उनसे क्या कहा।
अहो ! यह आख्यान तो बड़ा ही विचित्र है, ऐसा तो मैंने कहीं
नहीं सुना ॥ २-३ ॥
गुरुदेव ! यह प्रसंग विज्ञानवार्ताका सारभूत है। दया करके मुझे
यह सुनाइये।" इस प्रकार प्रश्न किये जानेपर महामुनि दत्तात्रेयने
परशुरामको परम पवित्र कथा सुनाना आरम्भ किया— "भृगुनन्दन !
महात्मा जनकने जो कुछ सुनाया वह सुनो ॥ ४-५ ॥
तपस्विनीके चले जानेपर मुनिपुत्र अष्टावक्र अनेकों ब्राह्मणोंको

२२४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
संवृतो बहुभिर्विप्रैः समेत्य नृपपुङ्गवम् ॥ ६ ॥
पप्रच्छ यत्तु तापस्या सङ्क्षिप्तोक्तं महार्थकम् ।
तदुच्यमानन्तु मया सम्यक् शृणु समाहितः ॥ ७ ॥
राजन् विदेहाधिपते तापस्योक्तं तु यत्तया ।
तदहं नाऽविदं सम्यक् सङ्क्षेपोक्तत्वहेतुतः ॥ ८ ॥
कथं विद्यामवेद्यं तत् समाचक्ष्व दयानिधे ।
एवं जनक आपृष्टः प्राह तं विस्मयन्निव ॥ ९ ॥
मुनिपुत्र शृणु वचो मया यत् प्रोच्यतेऽधुना ।
नाऽवेद्यं सर्वथा तद्धि वेद्यञ्चापि न सर्वथा ॥ १० ॥
अवेद्यं चेत् सर्वथैव तद् गुरुः किं वदेद्वद ।
गुरुरावेदयेत्तत्त्वमत आदौ गुरुं श्रयेत् ॥ ११ ॥
एतद्वेदनमत्यन्तं सुलभं दुःशकं च हि ।
यः परावृत्तदृष्टिः स्यात्तस्य तत् सुलभं भवेत् ॥ १२ ॥
साथ ले नृपश्रेष्ठ जनकके पास आये और तपस्विनीने जो परम पुरुषार्थ
सम्बन्धी प्रसंग संक्षेपसे कहा था उसीके विषयमें प्रश्न किया।
वही बात मैं तुम्हें सुनाता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सावधानीसे
श्रवण करो ॥ ६-७ ॥
[परशुरामने पूछा—] “विदेहराज महाराज जनक ! उस तपस्वि-
नीने जो कुछ कहा था वह बहुत संक्षिप्त होनेके कारण मैं उसे अच्छी
तरह समझ नहीं सका। दयानिधे ! यह बात समझाकर कहिये कि मैं
उस अज्ञेय तत्त्वको कैसे जान सकता हूँ ?” इस प्रकार पूछे जानेपर
जनकने कुछ विस्मित होकर कहा—॥ ८-९ ॥
“मुनिपुत्र ! अब मैं जो बात कहता हूँ सुनो। वह पद न तो सर्वथा
अज्ञेय है और न सभी प्रकार ज्ञेय ही है ॥ १० ॥
यदि वह सर्वथा अज्ञेय ही होता तो बताओ गुरुदेव क्या बतलाते।
उस तत्त्व का ज्ञान तो गुरुदेव ही कराते हैं, इसलिये सबसे पहले
उनकी शरणमें जाना चाहिये ॥ ११ ॥
उस पदको जानना अत्यन्त सरल भी है और कठिन भी। जिसकी
दृष्टि लौट गयी है [अर्थात् बाह्य विषयोंसे विमुख होकर अन्तर्मुख हो

यः पराग्दृष्टिरेवास्ते तस्य तच्चातिदुर्लभम् ।
अनिरूप्यं केवलं तदवेद्यमपि सर्वथा ॥ १३ ॥
कथञ्चिदन्यरूपेण निरूप्यं वेद्यमप्युत ।
यद्यद् दृश्यं पश्यसीह तेन तद्वेद्यमुच्यते ॥ १४ ॥
यत्तेऽवभासते किञ्चित् तद्विभावय सद्‌धिया ।
भानशक्तिर्भास्यहीना सर्वभानसमाश्रया ॥ १५ ॥
सैव तत्तत्त्वमित्येव विजानीहि मुनेः सुत ।
वेद्यमेव न वित्तिः स्यात् स्वतो यन्न प्रकाशते ॥ १६ ॥
वित्तिरन्या यया वेद्यं वेद्यते न स्वतः क्वचित् ।
वेद्यं विभिन्नरूपं वै वित्त्यैव वेद्यते खलु ॥ १७ ॥
तत्तद्रूपविभेदेन वित्तिर्नो भिद्यते क्वचित् ।
गयी है] उसके लिये वह सरल है। और जो बहिर्मुख दृष्टिवाला ही
है उसके लिये उसका ज्ञान अत्यन्त कठिन है ॥ १२-१३ पू० ॥
वास्तवमें तो वह पद एकदम अनिर्वचनीय और सर्वथा अज्ञेय भी
है। तथापि किसी प्रकार अन्य रूपसे उसका निरूपण भी किया जाता
है और उसे जान भी सकते हैं ॥ १३ उ०-१४ पू० ॥
तुम यहाँ जो-जो दृश्य देखते हो उस घट-पटादि दृश्यमें ज्ञान
सामान्यरूपसे वह तत्त्व ही ज्ञेय कहा जाता है।१ तुम्हें जो कुछ भासता
है उसपर शुद्ध बुद्धिसे विचार करो। जो भास्यपदार्थसे रहित भान-
शक्ति है वही तो सम्पूर्ण भानकी आश्रय है ॥ १४ उ०-१५ ॥
मुनिपुत्र ! वही वह परतत्त्व है—ऐसा तुम जानो। जो ज्ञेय पदार्थ है
वही ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि वह स्वयं प्रकाशित नहीं होता ॥ १६॥
ज्ञान, जिससे कि ज्ञेय जाना जाता है ज्ञेयसे भिन्न है। ज्ञेय
स्वतः कभी नहीं जाना जाता। वह भिन्न-भिन्न रूपोंवाला होता है
और निश्चय ज्ञानके द्वारा ही जाना जाता है ॥ १७ ॥
ज्ञेय पदार्थोंके रूपभेदोंसे ज्ञानमें कभी भेद नहीं होता।
१. दृश्यरूपसे जो घट-पट आदिके ज्ञान होते हैं उन घटज्ञान-पटज्ञान आदिमें
घट-पटादि तो ज्ञेय हैं और उन सबमें अनुस्यूत जो ज्ञानसामान्य है वह वास्तवमें
परतत्त्व ही है। इसीका श्रुतिने 'प्रतिबोधविदितं मतम्' कहकर निरूपण
किया है।

२२६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
भेदो हि वेद्यधर्मः स्यान्न वित्तिं संस्पृशेत् क्वचित् ॥ १८ ॥
यत आकारभेदो हि वेद्यपक्षे विभासते ।
पश्य वेद्यं पृथक्कृत्यं बुद्ध्याकारविवर्जितम् ॥ १९ ॥
बिम्बानुकृतिरादर्शो यद्वत्तद्वदियं चितिः ।
दृश्याकारधृतेर्नानारूपतां प्रतिपद्यते ॥ २० ॥
एवं वित्तिरियं वेद्या वेद्यव्यावृत्तरूपतः ।
न तु स्वभावतो वेद्या सा वित्तिर्विश्वसंश्रया ॥ २१ ॥
यत एतद्वेदितुः स्याद्रूपं तस्मान्न वेद्यते ।
विमृशाऽष्टावक्र रूपं निजमेवंविधं स्फुटम् ॥ २२ ॥
न त्वं शरीरं प्राणो वा मनो वाऽप्यस्थिरत्वतः ।
शरीरं धातुनिकरं तत्ते रूपं कथं भवेत् ॥ २३ ॥
तच्चाऽन्यविषयाभासे त्वहंधियमतित्रजेत् ।
भेद तो ज्ञेय-पदार्थोंका ही धर्म है, वह ज्ञानको कभी स्पर्श नहीं
करता ॥ १८ ॥
क्योंकि आकारका भेद ज्ञेयपदार्थोंमें ही भासता है। अतः तुम
ज्ञेयवर्गको अलग करके शुद्ध बुद्धिके द्वारा आकारशून्य ज्ञानका साक्षा-
त्कार कर लो ॥ १९ ॥
जिस प्रकार दर्पण बिम्बके आकारको [ प्रतिबिम्बरूपसे ] स्वीकार
कर लेता है, उसी प्रकार यह शुद्ध चेतन दृश्यके आकारोंको स्वीकार
करके अनेक रूपताको प्राप्त हो जाता है ॥ २० ॥
इस प्रकार ज्ञेयपदार्थोंके निषेधपूर्वक इस चेतनतत्त्वको जाना जा
सकता है। सम्पूर्ण जगत्का आधारभूत वह चेतन स्वभावसे ज्ञेय
नहीं है ॥ २१ ॥
क्योंकि यह चेतन ज्ञाताका स्वरूप है इसलिये यह ज्ञानका
विषय नहीं होता। अष्टावक्र ! तुम अपने ऐसे स्वरूपका स्पष्टतया
विचार करो ॥ २२ ॥
तुम न शरीर हो, न प्राण हो और न मन ही हो, क्योंकि ये सब
अस्थिर हैं। शरीर तो वात-पित्त आदि धातुओंका समूह है। वह
तुम्हारा स्वरूप कैसे हो सकता है ? ॥ २३ ॥
इसके सिवा जब अन्य विषयोंका भास होता है तब देहमें अहं-

षोडशोऽध्यायः । :२९७
एवं प्राणो मनोऽपि स्यादहंबुद्धिव्यतिक्रमात् ॥ २४ ॥
अहंबुद्धिं न व्यतीत्य तिष्ठत्येषा परा चितिः ।
तस्माच्चितिः सर्ववेत्री त्वमष्टावक्र तत्त्वतः ॥ २५ ॥
पश्य प्रत्यावृत्तचक्षुः स्वात्मानं केवलं चितिम् ।
आदेशकाल एव स्वं पश्यन्त्युत्तमबुद्धयः ॥ २६ ॥
बुद्धि नहीं रहती । इसी प्रकार अहंबुद्धिसे शून्य होनेके कारण प्राण
और मन भी आत्मा नहीं हैं ॥ २४ ॥
यह परा चिति किसी भी समय अहंबुद्धिको त्यागकर नहीं रहती ।२
इसलिये यह सभीको जाननेवाली है । अष्टावक्र ! तुम दृष्टिको अन्तर्मुख
करके तत्त्वतः अपनेको शुद्ध चितिरूप ही देखो । जो उत्तम बुद्धिवाले
जिज्ञासु होते हैं वे तो उपदेशके समय ही अपने स्वरूपको लख लेते
हैं ॥ २५-२६ ॥
१. आत्मा सर्वदा अहं (मैं) रूपसे स्फुरित होता है। शरीरादिके साथ ऐसी
बात नहीं है। जब घटादि अन्य पदार्थ भासते हैं तो शरीरादि अहंरूपसे स्फुरित
नहीं होते। यदि उस समय भी वे अहंरूपसे भासते तो उनके ज्ञानकालमें हमें
ऐसा ज्ञान भी होता कि मैं गोरा-काला या लंबा हूँ। परन्तु ठीक उस समय ऐसा
कोई स्फुरण नहीं होता। इसे और स्पष्ट समझनेके लिये यह देखना चाहिये कि
जैसे रूपकी प्रतीतिके समय नेत्रोंका और शब्दकी प्रतीतिके समय कानोंका अनु-
सन्धान नहीं होता इसी प्रकार घटादिका भान होते समय देहादिका अनुसन्धान
नहीं होता ।
अथवा इसका ऐसा अर्थ भी हो सकता है कि जब इन देहादिका अन्य अर्थात्
दृश्यरूपसे भास होता है तब ये 'मैं' रूपसे नहीं भासते अपि तु 'मेरे' रूपसे भासते
हैं । अतः अहंबुद्धिसे रहित होनेके कारण ये आत्मा नहीं हैं ।
२. यहाँ यह शंका हो सकती है कि सुषुप्ति और समाधिके समय तो चेतनमें अहंबुद्धि
नहीं देखी जाती । इसका उत्तर यह है कि अहंबुद्धि सविकल्प और निर्विकल्प रूपसे
दो प्रकारकी है । जाग्रत् और स्वप्नमें भेदका भान होनेके कारण वह सविकल्प रहती
है तथा सुषुप्ति और समाधिके समय भेदका भान न होनेसे निर्विकल्प । यदि उस
समय भी सविकल्प अहंस्फूर्ति होती तो त्रिपुटीका लय नहीं हो सकता था । शास्त्रों
में उसे 'पूर्णाहंता' कहा है । यदि उन अवस्थाओंमें अहन्ताका सर्वथा अभाव हो
जाता तो 'मैं सुखसे सोया' 'मैं समाधिस्थ रहा' इस प्रकार अहन्ताके उल्लेखपूर्वक
स्मृति नहीं हो सकती थी । अतः उन अवस्थाओंमें भी अहन्ता रहती ही है ।

२२८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
चक्षुर्नैतद्गोलकं ते मनश्चक्षुरुदाहृतम् ।
येन पश्यसि स्वप्नेषु तच्चक्षुर्मुख्यमुच्यते ॥ २७ ॥
तस्य प्रत्यावृत्तिरपि प्रोच्यते शृणु भूसुर ।
अप्रत्यावृत्तचक्षुर्वै नैव पश्यति किञ्चन ॥ २८ ॥
दिदृक्षुश्चक्षुषा किञ्चित्तदन्येभ्यो ह्यशेषतः ।
प्रत्यावृत्त्य दृढं तस्मिन्नेव संयोजयेद्यदि ॥ २९ ॥
तदा तद्भासते स्पष्टं नान्यदा तु कदाचन ।
अन्यदा तु पुरोवृत्ति न स्पष्टं भासते क्वचित् ॥ ३० ॥
आभातकल्पमेव स्यादप्रत्यावृत्तचक्षुषा ।
एवं श्रोत्रत्वगादीनां भूदेवाऽवेहि संस्थितिम् ॥ ३१ ॥
मनसाऽप्येवमेव स्यात् सुखदुःखाऽवभासनम् ।
अप्रत्यावृत्तमनसा किंस्विद्वेदितुमर्हति ॥ ३२ ॥
यहाँ 'दृष्टि' इन नेत्रगोलकोंको नहीं अपितु मानस-नेत्रोंके लिये
कहा गया है। जिसके द्वारा जीव स्वप्नोंमें देखता है वही नेत्र मुख्य
कहा जाता है ॥ २७ ॥
उस मानस-नेत्रको उलटना अर्थात् अन्तर्मुख करना क्या है—यह
भी बतलाया जाता है; क्योंकि उसे अन्तर्मुख किये बिना कोई कुछ
भी नहीं देख सकता ॥ २८ ॥
जो पुरुष नेत्रद्वारा कुछ देखना चाहता है वह दृष्टिको अन्य सब
ओरसे हटाकर यदि उस दर्शनीय वस्तुमें लगा देता है तो वह उसे
स्पष्टतया भासने लगती है, अन्यथा नहीं। ऐसा न होनेपर तो कभी-
कभी सामने रखी वस्तु भी स्पष्टतया नहीं भासती ॥ २९-३० ॥
जो नेत्र सब ओरसे हटाये हुए नहीं होते उनसे तो वस्तु न देखी
हुई-सी ही रहती है। विप्रदेव ! ऐसी ही बात श्रोत्र-त्वक् आदि अन्य
इन्द्रियोंके विषयमें भी जाननी चाहिये ॥ ३१ ॥
मनके द्वारा सुख-दुःखके भानमें भी ऐसा ही निश्चय है। जो
मन अन्य विषयोंकी ओरसे हटा हुआ नहीं है उससे पुरुष क्या जान
सकता है ? ॥ ३२ ॥

षोडशोऽध्यायः । २२६
तस्मात्तदेकपरता प्रत्यावृत्तिश्च चक्षुषः ।
प्रत्यावृत्तं मनः शुद्धं निजरूपावभासकम् ॥ ३३ ॥
अत्र ते सम्प्रवक्ष्यामि शृणु तन्नियताऽन्तरः ।
अगोचरश्चेदात्माऽसौ मनसा गोचरोऽपि च ॥ ३४ ॥
अत्र मुह्यन्ति बहवः श्रुत्यागमविवेचकाः ।
मनोगोचरता बाह्ये द्विप्रकारेण संस्थिता ॥ ३५ ॥
आद्याऽन्येभ्यः परावृत्तिः परा तत्परता भवेत् ।
अन्येभ्यस्तु परावृत्तिमात्रेऽपि मनसः सति ॥ ३६ ॥
न किञ्चिद्भासयेद्वस्तु तटस्थाऽवसरेषु तत् ।
तस्मात्तत्परताऽप्यत्र व्यापारो मानसः परः ॥ ३७ ॥
एवं व्यावृत्तभावानां व्यापारद्वयभासनम् ।
अन्यावृत्ता चितिर्यस्मात्तस्मान्मात्रं तथा भवेत् ॥ ३८ ॥
अन्येभ्यस्तु परावृत्तिमात्रेणैवाऽवभासयेत् ।
यथा पुरःस्थितादर्शे किञ्चिद्दर्शनहेतवे ॥ ३९ ॥
अतः एकमात्र अपने लक्ष्यपर दृष्टि रखना ही नेत्रकी अन्तर्मुखता
है। अन्तर्मुख शुद्ध चित्त ही अपने वास्तविक स्वरूपका साक्षात्कार
करानेवाला है ॥ ३३ ॥
अब मैं तुमसे जो बात कहता हूँ वह संयतचित्त होकर सुनो।
यह आत्मा मनका अविषय भी है और उसका विषय भी ॥ ३४ ॥
अनेकों वेद-शास्त्रोंकी आलोचना करनेवाले भी इस विषयमें मोह-
ग्रस्त ही रहते हैं। बाह्य पदार्थोंमें मनकी विषयता दो प्रकारसे है ॥ ३५॥
प्रथम तो अन्य विषयोंसे मनको मोड़ना और दूसरे उसे अपने
लक्ष्यमें जोड़ देना। मनके अन्य पदार्थोंसे केवल हट जानेपर भी
तटस्थ अवस्थाओंमें कोई वस्तु नहीं भासती। अतः इसके लिये मनका
अपने विषयमें जुड़ना-यह दूसरा व्यापार भी आवश्यक है ॥ ३६-३७ ॥
इस प्रकार जो परिच्छिन्न पदार्थ हैं उनका भान तो उक्त दोनों
व्यापारोंसे होता है। किन्तु चिति तो अपरिच्छिन्ना है, इसलिये इसके
अनुभवके लिये ऐसा नियम नहीं है ॥ ३८ ॥
यह तो अन्य पदार्थोंसे चित्तके हट जानेपर ही भासित हो जाती
है। जिस प्रकार सामने रखे दर्पणमें यदि कोई पदार्थ देखना हो तो

२३० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
अन्येभ्यस्तु परावृत्तिराभिमुख्यञ्च तस्य वै ।
अपेक्ष्यते दर्पणस्य प्रतिबिम्बदिदृक्षुणा ॥ ४० ॥
गगनं दर्पणे द्रष्टुं यदा समभिवाञ्छति ।
तदाऽन्येभ्यः परावृत्तिमात्रेण हि कृतार्थता ॥ ४१ ॥
गगनं सर्वतो व्याप्तं दर्पणे सर्वदा स्थितम् ।
अन्यावृत्तं किन्तु चाऽन्यैरभिच्छन्नं न भासते ॥ ४२ ॥
सर्वाश्रयं सर्वगतमपि तैश्छादितं यतः ।
अतस्तेभ्यः परावृत्तिमात्रेणैव विभासते ॥ ४३ ॥
एवं चितिः सर्वगता सर्वाश्रयतया स्थिता ।
सर्वकाले समापूर्णा मनसि व्योमवद् द्विज ॥ ४४ ॥
तस्मादन्यपरावृत्तिमात्रं मनस इष्यते ।
पश्य विप्र चितिः कुत्र कदा नास्त्यवभासिनी ॥ ४५ ॥
उसका प्रतिबिम्ब देखनेकी इच्छावाले पुरुषको अन्य पदार्थोंसे दर्पणको
हटाने और उस पदार्थके सामने लानेकी आवश्यकता होगी ॥ ३६-४०॥
पर यदि दर्पणमें आकाशको देखनेकी ही इच्छा हो तो अन्य
पदार्थोंसे दर्पणको हटा लेनेसे ही अपना काम बन जायगा ॥ ४१ ॥
क्योंकि सर्वत्र व्याप्त आकाश दर्पणमें भी सर्वदा विद्यमान है।
किन्तु दूसरे पदार्थोंसे बिना हटाये उनसे आच्छादित रहनेके कारण वह
भासता नहीं है ॥ ४२ ॥
वह सबका आश्रय और सर्वगत होनेपर भी क्योंकि उन पदार्थोंसे
'ढका रहता है, इस लिये उनकी ओरसे हटा लेने मात्रसे ही भासने
लगता है ॥ ४३ ॥
इसी प्रकार चिति भी सर्वव्यापिका है और सबकी आश्रयरूपसे
स्थित है । ब्रह्मन् ! वह आकाशके समान सभी समय मनमें भर-
पूर है ॥ ४४ ॥
इसलिये अपने साक्षात्कारके लिये उसे केवल मनको अन्य पदार्थोंसे
मोड़ लेनेकी ही अपेक्षा है । विप्रवर ! विचार तो करो कि सर्वप्रकाशिनी
चिति कब और कहाँ नहीं है ॥ ४५ ॥

षोडशोऽध्यायः। २३१
यदा यत्र च सा नास्ति न यदा नापि यत्र च ।
तस्माच्चिदात्मावभासे मनसोऽन्यपरावृत्तिः ॥ ४६ ॥
केवलाऽपेक्षिता नैवाभिमुख्यं नूतनं क्वचित् ।
आभिमुख्याभावहेतोरेवाऽवेद्यत्वमिष्यते ॥ ४७ ॥
अतएव शुद्धमनोवेद्यं तत्तत्त्वमुच्यते ।
अन्येभ्यस्तु परावृत्तिरेव शुद्धिर्हि मानसी ॥ ४८ ॥
एतदेव परं तत्त्वज्ञाने साधनमुच्यते ।
यावन्न हि मनः शुद्धं तावज्ज्ञानं कथं भवेत् ॥ ४९ ॥
शुद्धे मनसि वै ज्ञानं कथं वा न भवेद् ध्रुवम् ।
उपक्षीर्णं सर्वमत्र साधनं तस्य शोधने ॥ ५० ॥
कर्म वोपासनं वाऽपि वैराग्यादिकमेव वा ।
मनसः शोधने एव विनियुक्तं न चाऽन्यथा ॥ ५१ ॥
तस्माच्छुद्धेन मनसा भासते तत् परं वपुः ।
इति राज्ञेरितं श्रुत्वा त्वष्टावक्रः पुनर्जगौ ॥ ५२ ॥
वह जब और जहाँ नहीं है तब वे 'जब' और 'जहाँ' भी सिद्ध
नहीं हो सकते । अतः चेतन आत्माका भान होनेके लिये केवल अन्य
( अनात्म ) पदार्थोंके निषेधकी ही अपेक्षा है, किसी नवीन वस्तुको
सामने लानेकी नहीं ॥ ४६-४७ पू० ॥
किसी वस्तुकी अभिमुखता न होनेके कारण ही उस परमतत्त्वको
अज्ञेय कहा जाता है । इसीसे वह तत्त्व शुद्धचित्तद्वारा ज्ञेय कहा
गया है । मनका अन्य वस्तुओंसे विमुख हो जाना ही मनकी शुद्धि
है और यही तत्त्वज्ञानकी सबसे प्रधान साधन कही गयी
है ॥ ४७ उ०-४९ पू० ॥
जबतक मन शुद्ध न हो तबतक ज्ञान कैसे हो सकता है । और
यदि मन शुद्ध है तो निश्चय ज्ञान क्यों नहीं होगा ? इस मनकी
शुद्धिमें ही अन्य सम्पूर्ण साधनोंकी समाप्ति हो जाती है ॥ ४९ उ०-५० ॥
कर्म, उपासना तथा वैराग्य आदिका भी उपयोग मनको शुद्ध
करनेमें ही है, किसी अन्य प्रयोजनमें नहीं ॥ ५१ ॥
अतः वह परमात्मा शुद्ध चित्तसे ही भासता है।" राजाका यह
प्रवचन सुनकर अष्टावक्रने पुनः प्रश्न किया—॥ ५२ ॥

१३२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
राजंस्त्वयोक्तमन्येभ्यः परावृत्तिर्हि मानसी ।
केवला चेत् सा परा चिन्मनसा प्रतिभासते ॥ ५३ ॥
तत् सुषुप्तौ विभासेत परावृत्तं मनस्तदा ।
तत्र किं साधनैरन्यैः सुप्तिमात्रात् कृतार्थता ॥ ५४ ॥
इति पर्यनुयुक्तोऽथ विप्रेणोवाच भूपतिः ।
समाहितः शृणु ब्रह्मन् समाधानं वदामि ते ॥ ५५ ॥
सत्यं सुषुप्तौ मनसः परावृत्तिस्तु सर्वथा ।
लीनं मनस्त्वथाप्यस्य कथं तामवभासयेत् ॥ ५६ ॥
कज्जलेन समालिप्ते दर्पणे गगनं न हि ।
अन्येभ्यस्तु परावृत्तिमात्रेण भासते क्वचित् ॥ ५७ ॥
“राजन् ! आपने कहा कि यदि मनकी अन्य पदार्थोंसे केवल
विमुखता हो जाय तो उस शुद्ध मनसे परम चेतनका भान हो
जाता है ॥ ५३ ॥
तब तो सुषुप्तिमें उसका भान होना चाहिये, क्योंकि उस अवस्थामें
मन विषयोंसे विमुख रहता ही है। फिर अन्य साधनोंकी क्या अपेक्षा
है; काम तो सुषुप्तिमात्रसे ही बन जायगा” ॥ ५४ ॥
अष्टावक्र मुनिके इस प्रकार शंका करनेपर राजा जनक बोले,
“ब्रह्मन् ! मैं आपकी शंकाका समाधान करता हूँ, आप एकाग्रचित्त
होकर सुनें ॥ ५५ ॥
यह तो ठीक है कि सुषुप्तिमें मनकी विषयोंसे पूर्ण विमुखता हो
जाती है, किन्तु उस समय उसकी मनःस्वरूपता¹ भी तो लीन हो
जाती है, फिर वह उसे किस प्रकार भासित करेगा ॥ ५६ ॥
यदि दर्पणपर काजल पोत दिया जाय तो अन्य प्रतिबिम्बोंकी निवृत्ति
हो जानेपर भी उससे आकाशका भान कभी नहीं हो सकता ॥ ५७ ॥
१. मन पाँचों भूतोंके सात्त्विक अंशका परिणाम है। इसीलिये उससे विषयोंका
ज्ञान होता है, क्योंकि ज्ञान सत्त्वगुणका ही धर्म है। सुषुप्तिमें तमोगुणके द्वारा यह
सात्त्विक अंश ढक जाता है। अतः जिस प्रकार अन्धकारसे आच्छादित दर्पणमें कोई
प्रतिबिम्ब नहीं भासता उसी प्रकार सुषुप्तिमें तमोगुणसे आच्छादित मनमें न तो
विषय ही भासते हैं और न शुद्ध चेतन ही।

षोडशोऽध्यायः। २३३
एवं विलिप्ते मनसि निद्रयाऽन्यपरावृतेः।
अयोग्यत्वादेव मनो भासयेन्न चितिं क्वचित् ॥ ५८ ॥
अन्यथा लोष्टकुड्यादेरपि भायात् कुतो न सा।
तस्माद्योग्येन मनसा शुद्धेन भासते हि सा ॥ ५९ ॥
अतः सद्योजातशिशोर्भासते न हि किञ्चन।
अथाऽपि शृणु वक्ष्यामि मषीलिप्ते हि दर्पणे ॥ ६० ॥
अलक्षितं चाऽपि मषीप्रतिबिम्बनमस्ति वै।
संश्लेषान्न विलक्षेत स्वभावस्याऽनपोहनात् ॥ ६१ ॥
तथा मनः सुषुप्तिस्थं संश्लिष्टं निद्रयैव हि।
अतोऽन्येभ्यः परावृत्तेरभावाद्भासयेन्न ताम् ॥ ६२ ॥
अतो निद्रास्मृतिरपि व्युत्थितस्य हि सम्भवेत् ।
मूढताऽपि च या तस्यां दशायामनुभूयते ॥ ६३ ॥
इसी प्रकार मनपर निद्राका लेप चढ़ जानेपर अन्य विषयोंसे
विमुखता हो जानेपर भी, प्रकाशनकी योग्यता न रहनेके कारण वह
चितिको कभी भासित नहीं कर सकता ॥ ५८ ॥
यदि ऐसा न होता तो ढेले और भीत आदिको भी चितिका भान
क्यों नहीं हो जाता ? अतः योग्य और शुद्ध मनके द्वारा ही उसका
भान होता है ॥ ५९ ॥
इसीसे तत्काल उत्पन्न हुए शिशुको भी कुछ नहीं भासता । तथापि
एक बात कहता हूं, सुनो, काजल पुते हुए दर्पणमें भी काजलका प्रति-
बिम्ब तो रहता ही है, भले ही वह दिखायी न दे, क्योंकि जो जिसका
स्वभाव होता है उसकी निवृत्ति नहीं हो सकती । हाँ, काजलके संसर्गके
कारण वह दीख नहीं पड़ता ॥ ६०-६१ ॥
इसी प्रकार सुषुप्तावस्थामें मन निद्रासे ही संश्लिष्ट रहता है।
[ इसलिये अलक्षितरूपसे उसमें निद्राका प्रतिबिम्ब तो पड़ता ही है । ]
अतः निद्रारूप अन्य विषयसे विमुखता न होनेके कारण वह उस
चितिको भासित नहीं कर सकता ॥ ६२ ॥
इसीसे जगे हुए व्यक्तिको निद्राकी स्मृति होती है। तथा उस
अवस्थामें जिसका अनुभव होता है उस मूढ़ता (अज्ञान) का भी
स्मरण होता है ॥ ६३ ॥