त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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यथा हि दीपो विषयान्प्रकाशयति सर्वतः ।
स्वयं प्रकाश्यतां नैति कचिद्दीपस्य कस्यचित् ॥ ८५ ॥
प्रकाशते स्वयं चैवानपेक्ष्यान्यं प्रकाशकम् ।
एवं सूर्योदये सर्वे प्रकाशकतया स्थिताः ॥ ८६ ॥
एवं च किं दीपमुखा अप्रकाश्यत्वहेतुतः ।
न सन्ति न प्रकाशन्ते इति वक्तुं हि युज्यते ॥ ८७ ॥
एवं प्रकाश्यभूतेषु सत्सु दीपमुखेषु वै ।
अत्यन्तमप्रकाश्यं यच्चित्त्वं तत्कुतो वद ॥ ८८ ॥
असंवेद्यं प्रकाशेत चेत्यत्र विचिकित्सितम् ।
तस्मात्त्वमन्तर्मुखया दृष्ट्या सम्यग्विचारय ॥ ८९ ॥
चिच्छक्तिरेषा परमा त्रिपुरा सर्वसंश्रया ।
सर्वावभासिनी कुत्र कदा वा न प्रकाशते ॥ ९० ॥
यदा सा न प्रकाशेत प्रकाशेत तदा नु किम् ।
अप्रकाशेनापि सैव चितिशक्तिः प्रकाशते ॥ ९१ ॥
जिस प्रकार दीपक सब ओर विषयोंको प्रकाशित करता है किन्तु
स्वयं कभी किसी अन्य दीपकका प्रकाश्य नहीं होता वह किसी अन्य
प्रकाशककी अपेक्षा न रखकर स्वयं ही प्रकाशित होता है, इसी प्रकार
सूर्यादि अन्य सब भी प्रकाशक रूपसे ही स्थित हैं ॥ ८५-८६ ॥
ऐसी अवस्थामें अप्रकाश्य होनेके कारण क्या यह कहना ठीक है
कि ये दीपक आदि हैं ही नहीं अथवा प्रकाशित ही नहीं होते ॥ ८७ ॥
इस प्रकार जब प्रकाशित होनेवाले दीपक आदिके विषयमें ऐसी
बात है, तब जो अत्यन्त अप्रकाश्य [ अर्थात् जो कभी किसीका भी
विषय नहीं होता ] उस चेतन तत्त्वके विषयमें यदि यह कहा जाता है
कि 'वह अज्ञेय है और प्रकाशितभी होता है' तो इसमें सन्देह क्यों होता
है ? अतः तुम अन्तर्मुख दृष्टिसे खूब विचार करो ॥ ८८-८९ ॥
यह सर्वोत्कृष्टा चित्-शक्ति ही सबकी आश्रयभूता त्रिपुरा देवी है ।
वही सबको प्रकाशित करनेवाली है । अतः वह कब और कहाँ प्रकाशित
नहीं होती ? ॥ ९० ॥
जब वह प्रकाशित नहीं होगी तब और ही क्या प्रकाशित होगा ।