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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 232

२१८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
तापस्यहं न जानामि त्वत्प्रश्नस्योत्तरं वचः ॥ ७२ ॥
शिष्योऽहं ते वदेतन्मे कथमेतन्निरूपितम् ।
नाहं वदाम्यनृतकं तपोहरमनर्थकम् ॥ ७३ ॥
इत्यापृष्टा तापसी सा प्रसन्ना तस्य सत्यतः ।
अष्टावक्रं प्रत्युवाच शृण्वतां च सभासदाम् ॥ ७४ ॥
वत्सैतदविदित्त्वैव बहवो मोहमागताः ।
शुष्कतर्कैरविज्ञेयं सर्वत्रैव सुगोपितम् ॥ ७५ ॥
एतावत्सु सभासत्सु न विजानाति कश्चन ।
राजाऽयं वेत्त्यहं वापि वेद्मि नान्यस्तु कश्चन ॥ ७६ ॥
सर्वत्र हि विवादेषु नैतत्प्रश्नोत्तरं क्वचित् ।
प्रायो विदुर्हि विद्वांसस्तर्कमात्रसमाश्रयाः ॥ ७७ ॥
नैतत्तर्केण सुज्ञेयमपि सूक्ष्मधिया क्वचित् ।
पर ऊहापोह करनेपर भी जब उसके प्रश्नका उत्तर न सूझा तो वह
द्विजश्रेष्ठ बोला—॥ ७१ उ०-७२ पू० ॥
तपस्विनीजी ! मैं आपके प्रश्न का उत्तर नहीं जानता। मैं आपका
शिष्य हूँ, अब आप ही बताइये कि शास्त्रमें ऐसा विरोधी निरूपण
क्यों मिलता है ? मैं तपस्याको क्षीण करनेवाला अनर्थकारी असत्य-
भाषण नहीं करता हूँ ॥ ७२ उ०-७३ ॥
इस प्रकार पूछे जानेपर तपस्विनी उसके सत्य-भाषणसे प्रसन्न हो
गयी तथा सब सभासदोंके सुनते हुए अष्टावक्रसे कहने लगी ॥ ७४ ॥
“वत्स ! इस रहस्यको न जाननेके कारण ही बहुत लोग मोहमें
पड़ जाते हैं ! यह बात कोरे तर्कसे समझमें आनेवाली नहीं है और
सभी शास्त्रोंमें बहुत गुप्त है ॥ ७५ ॥
यहाँ जितने सभासद् हैं उनमेंसे भी कोई नहीं जानता। या तो
यह राजा जानता है या मैं जानती हूँ, और कोई नहीं ॥ ७६ ॥
सब जगह वाद-विवादोंमें भी इस प्रकारका प्रश्नोत्तर कहीं नहीं
होता । विद्वान् लोग भी प्रायः तर्कमात्रका आश्रय लेकर ही इसे
जानते हैं ॥ ७७ ॥
किन्तु सद्गुरुकी सेवा और इष्टदेवकी कृपा आदिके बिना केवल