तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)
पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा
स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)
तेनाली राम ने कहना शुरू किया, “महाराज! मैं तो शाम ढलते ही यहाँ पहुँच गया था।
मैंने ये परिधान नहीं पहने थे। साधारण कपड़ों में देखकर मुझे प्रहरियों ने द्वार पर ही रोक
लिया। मैं उन्हें समझाता रहा कि मैं पंडित हूँ, मैं काव्यशास्त्री हूँ, मैं यहाँ का आदरणीय
आमंत्रित अतिथि हूँ मगर उन्होंने मेरी एक न सुनी। शोर सुनकर आप स्वयं वहाँ आए
मगर मेरी पुकार सुनने की आवश्यकता आपने नहीं समझी और मुझे भोजन देकर द्वार से
ही भगा देने का निर्देश देकर लौट आए...।”
महाराज को सन्ध्या की घटना की स्मृति हो आई।
तेनाली राम ने अपनी बात जारी रखी, “...और महाराज, मुझे यहाँ आना ही था इसलिए
मैं अपने घर गया और ये वस्त्रा धारण किए, फिर मैं यहाँ आया।”
महाराज कृष्णदेव राय अचरज में डूबे तेनाली राम की बातें सुन रहे थे। तभी एक
सभासद ने कहा, “तेनाली राम! आप जैसे बुद्धिमान व्यक्ति से ऐसी आशा नहीं की जा
सकती कि वह ऐसी भूल करेगा। आप राजभवन में आमंत्रित थे। राजभवन की अपनी एक
मर्यादा है। राजभवन में यदि आप फकीरों जैसे वस्त्र में आएँगे तब भला कौन प्रहरी आपको
राजा का अतिथि स्वीकार करेगा? आपके साथ जो कुछ भी हुआ, उसके लिए दोषी आप
हैं।”
तेनाली राम ने मुस्कुराते हुए कहा, “जी हाँ, आप ठीक कह रहे हैं। परिवेश और
परिस्थिति का ध्यान रखते हुए परिधान का उपयोग अवश्य करना चाहिए। यही तो मैंने
राजसभा में कुछ दिन पहले कहा था-स्मरण करें महाराज!“ तेनाली राम ने महाराज से
सीधा संवाद किया। ”आपको अवश्य स्मरण होगा कि तब परिधान के स्थान पर व्यक्ति के
आन्तरिक गुणों को महत्त्वपूर्ण बताते हुए मुझे अपने विचारों में संशोधन के लिए प्रेरित
किया गया था...।”
महाराज ने तेनाली राम को गले से लगाते हुए कहा, “तुम ठीक कह रहे थे, तेनाली
राम...उस दिन भी!”
स्वर्ण-पिंडों की पहेली
“पृथ्वी का कण-कण हर क्षण एक नई रचना करने में निमग्न है। वायु सतत सन-सन-सन
कर सृष्टि में मस्ती का संचार करती रहती है। सूर्य उदित होकर संसार को उजास से भरता
है और गतिशील होने के लिए ऊष्मा प्रदान करता है। नदियाँ कल-कल, छल-छल के निनाद
के साथ बहती हुई जिधर से निकलती हैं उधर धरती में बीज अंकुरित करने की शक्ति
भरती जाती हैं। ..इनमें से कोई अपने कार्य का न तो मूल्य माँगता है और न कभी किसी से
किसी तरह की बाधा या अड़चनें आने की बात कहकर थोड़ा विश्राम करने की इच्छा व्यक्त
करता है। कार्यों की निरन्तरता ही जीवन की सफलता की कुंजी है।”
महाराज कृष्णदेव राय अपने सभासदों के साथ बैठे हुए थे। दरबार लगा हुआ था। तेनाली
राम अपने आसन के पास खड़ा होकर बोल रहा था। उसकी बातें समाप्त होते ही कृष्णदेव
राय ने अपने आसन से उठकर तालियाँ बजाईं और तेनाली राम को गले से लगा लिया।
उस समय दरबार में ‘जीवन में सफल होने के उपाय’ विषय पर सम्भाषण हो रहा था।
कई दरबारी आए और बोले। बड़ी-बड़ी शास्त्रीय बातें होती रहीं। अन्तिम वक्ता के रूप में
तेनाली राम ने बहुत कम शब्दों में अपनी बातें दरबार में रखीं और महाराज ने उसे विजेता
घोषित कर दिया।
विजयनगर के दरबार में इससे पहले भी ऐसे कई अवसर आ चुके थे जब तेनाली राम की
बुद्धि की सराहना महाराज ने मुक्त कंठ से की थी। दरबारियों में तेनाली राम की मेधा की
चर्चा होने लगी थी मगर कुछ सभासदों का विचार था कि तेनाली राम में कोई पांडित्य
नहीं है बल्कि वह एक सामान्य-सा इनसान है इसलिए वे उसकी प्रशंसा करने के स्थान पर
अवसर विशेष पर आलोचना करने लगते थे। मीन-मेख निकालते हुए तेनाली राम की
विशेषताओं को स्वीकार करने के स्थान पर उसमें दोष निकालते। स्थिति ऐसी बनती जा
रही थी कि विजयनगर के महाराज की सभा में तेनाली राम से ईर्ष्या करनेवाले सभासदों
का एक वर्ग तैयार होता जा रहा था जिसका एकमात्र काम यह था कि जब भी अवसर
मिले, महाराज के सामने तेनाली राम की शिकायत की जाए।
अपने विरुद्ध ईर्ष्यावश हो रहे इस तरह के कार्यों का ज्ञान तेनाली राम को था किन्तु वह
इसे सहज मानवीय प्रवृत्ति के रूप में लेता था तथा किसी भी सभासद के विरोधी आचरण
पर उत्तेजित नहीं होता था।
एक बार विजयनगर के महामंत्री के घर पर पौत्रा जन्मने के अवसर पर एक भोज का
आयोजन हुआ। वर्षों की प्रतीक्षा और मन्नतों के बाद अपने पौत्र के जन्म से महामंत्री की
खुशियों का ठिकाना नहीं था। उन्होंने भोज का इतना भव्य आयोजन किया था कि उसकी
तुलना विजयनगर में हुए किसी भी अन्य भोज से नहीं की जा सकती। रसोई तैयार करने के
लिए विभिन्न पड़ोसी राज्यों से विशिष्ट रसोइए बुलाए गए थे। उनके बनाए व्यंजनों की
सुगन्ध से महामंत्री के आवास से दूर-दूर तक का वातावरण महमहा उठा। इस भोज में
महामंत्री ने महाराज कृष्णदेव राय और विजयनगर के सभी सभासदों को भी आमंत्रित
किया था।
भोजन करने के बाद महाराज ने महामंत्री से पौत्र का मुँह दिखाने को कहा। महाराज के
साथ सभी सभासद नवजात शिशु को देखने के लिए महल के अन्तःकक्ष में गए।
बच्चा एक सुन्दर से खटोले पर रखा गया था। छः दिनों की वय का शिशु प्रायः सोया
रहता है। महाराज जब शिशु के पालने के पास गए तब उन्होंने महामंत्री से कहा,
“महामंत्री जी! इस बात का ध्यान रखा जाए कि बालक की नींद में कोई व्यवधान न पड़े।
नवजात शिशु जितनी चैन की नींद सोएगा, उसका शारीरिक एवं मानसिक विकास उतने
ही अच्छे ढंग से होगा।”
पास खड़े एक अन्य सभासद ने महाराज की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, “जी हाँ,
महामंत्री जी! ऐसे भी शिशु की नींद में दो ही कारणों से व्यवधान उत्पन्न होता है-पहला
यह कि शिशु को भूख लगती है और दूसरा यह कि वह बिस्तर गीला करता है। यदि आपकी
बहू सतर्क रहे, शिशु को समय पर दूध पिलाती रहे और बिस्तर गीला होते ही उसके
अधोवस्त्रा बदल दे तो शिशु की नींद में कोई अड़चन नहीं आएगी।”
महामंत्री इन लोगों की बातें मुस्कुराते हुए सुनते रहे।
इसी बीच वहाँ तेनाली राम पहुँचा और पालने पर झुककर बच्चे को देखने लगा। पालने
में सोया शिशु कुनमुनाया फिर जगकर अपने हाथ-पैर उछालने लगा। उसे देखकर तेनाली
राम ने महामंत्री से कहा, “यह बालक तेजस्वी है और आगे चलकर यह अपनी तेजस्विता
से नए कीर्तिमान स्थापित करेगा। इसकी कीर्ति की गूँज दूर-दूर तक फैलेगी।”
महामंत्री ने एक मुग्ध -दृष्टि उस शिशु पर डाली और फिर महाराज एवं सभासदों को विदा
करने के लिए उनके साथ द्वार तक आए।
महाराज और सभासद जब राजभवन की ओर चलने को उद्यत हुए तभी एक सभासद ने
व्यंग्यात्मक स्वर में महाराज से कहा, “देखा महाराज, तेनाली राम किस तरह महामंत्री
को प्रभावित कर रहा था! आप ही सोचिए महाराज कि भला एक नवजात को देखकर यह
कैसे कहा जा सकता है कि वह भविष्य में क्या करेगा? तेनाली राम ने तो महामंत्री जी के
पौत्रा को ऐसा तेजस्वी बता दिया जिसकी कीर्ति की गूँज दूर-दूर तक सुनी जाएगी!”
महाराज के कान खड़े हो गए इस सभासद की बात सुनकर। महाराज भी सोचने लगे कि
जरूर तेनाली राम ने महामंत्री को खुश करने के लिए यह बात कही है...तो क्या तेनाली
राम महामंत्री के साथ साँठ-गाँठ कर किसी कारनामे को अंजाम देने के चक्कर में है? क्या
तेनाली राम कुछ ऐसा कर सकता है जिससे विजयनगर की सत्ता पर आँच आए...?
महाराज के मन में तरह-तरह की आशंकाएँ पैदा होने लगीं। जरा सी बात पर महाराज के
मन में उत्पन्न हुई इस आशंका ने महाराज को बेचैन कर दिया। ठीक ही कहा गया है कि
सत्ता का स्वभाव सन्देह करना भी है। महाराज ने मन-ही-मन तय कर लिया कि जब तक वे
तेनाली राम की आन्तरिक भावनाओं को समझ नहीं लेते तब तक चैन से नहीं बैठेंगे और न
ही तेनाली राम पर विश्वास ही करेंगे। प्रकट रूप से महाराज ने अपना व्यवहार पूर्ववत्
रखा।
इस घटना के कुछ दिन व्यतीत हो जाने के बाद एक सन्ध्या महाराज कृष्णदेव राय अपनी
फुलवारी में तेनाली राम के साथ टहल रहे थे। टहलते-टहलते महाराज ने अचानक तेनाली
राम से पूछा, “तेनाली राम! उस दिन तुमने किस आधार पर महामंत्री से कहा कि उनका
पौत्रा बहुत तेजस्वी होगा?”
तेनाली राम ने हँसकर कहा, “अरे वो बात!...बस, ऐसे ही महाराज! मेरी -ष्टि बालक के
गतिशील पैरों पर पड़ी। उसके पैरों की सशक्त लययुक्त गतिशीलता से मुझे लड़के की सुगढ़
मानसिक संरचना का अनुमान हुआ और बरबस ही वह बात मेरे मँुह से निकल गई।“
महाराज मौन हो गए लेकिन उनका हृदय अभी भी आशंकित था। थोड़ी देर के बाद
उन्होंने तेनाली राम को विदा किया और स्वयं महल में चले गए।
इस घटना के भी कई दिन गुजर गए। तेनाली राम के मन में कोई बात थी ही नहीं। वह
अपनी सहज, स्वाभाविक शैली में सभा में आता। सभा की कार्रवाई में भाग लेता और लौट
जाता।
एक दिन महाराज कृष्णदेव राय की सभा में एक व्यक्ति आया और महाराज के सामने
एक बक्सा रखकर बोला, “महाराज! मैं चन्द्रावती नगर का एक व्यापारी हूँ। मेरा नाम
सोमदत्त है। मुझे व्यापार में घाटा लगा है। मेरा सारा धन समाप्त हो चुका है। बस, मेरे पास
स्वर्ण-निर्मित दो गोले शेष हैं।” इतना कहकर उस व्यापारी ने वह बक्सा खोल दिया।
सभासदों की आँखें यह देखकर विस्मय से फैल गईं कि बक्से में गेंद की आकृति के दो
स्वर्ण-पिंड रखे हुए हैं।
उस व्यापारी ने अपनी बात जारी रखी, “महाराज! इन दो स्वर्ण-पिंडों में से एक स्वर्ण-
पिंड ठोस है और दूसरा खोखला है। आपके दरबार में मैं इन स्वर्णपिंडों को एक स्थान पर
लटका दूँगा, जहाँ इसे आपके सभी सभासद देख सकें। यदि आपके दरबार का कोई
सभासद बिना इन पिंडों के निकट आए, बिना इन पिंडों को छुए, यह बता देगा कि इनमें से
कौन-सा पिंड ठोस है अथवा कौन-सा पिंड खोखला है तो मैं उसे ये दोनों पिंड मुफ्त में देकर
चला जाऊँगा और यदि यहाँ उपस्थित कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकेगा तब आपको
मुझे इन दोनों स्वर्ण-पिंडों के वजन के बराबर स्वर्ण दान करना होगा।”
महाराज ने इस विचित्र प्रस्ताव को सुनने के बाद सभासदों की ओर उनका मन्तव्य जानने
के उद्देश्य से देखा।
तभी एक सभासद ने अपने आसन से उठकर कहा, “महाराज! व्यापारी सोमदत्त का
प्रस्ताव स्वीकार कर लेने में कोई बुराई नहीं है। आपको स्मरण होगा कि हमारे बीच ऐसे
विद्वान भी हैं जो एक शिशु को देखकर अभी से उसकी कीर्ति पताका विश्व में लहराने का
दावा कर सकते हैं...यह तो साधारण से स्वर्ण-पिंडों की पहेली है। इसे भी यहाँ आसानी से
हल करने की योग्यता उनमें अवश्य होगी।”
यह वही सभासद था जिसने तेनाली राम के विरुद्ध महाराज के मन में आशंका के बीज
बोए थे।
सभाकक्ष में बैठा तेनाली राम उस सभासद की बात सुनकर चैकन्ना हो गया। वह समझ
गया कि महाराज ने कुछ दिन पूर्व उससे महामंत्री के पौत्र के प्रति की गई भविष्यवाणी के
बारे में क्यों पूछा था। जरूर इसी ने महाराज के कान भरे थे और आज भी यह महाराज को
मेरे विरुद्ध भड़का रहा है। तेनाली राम ने तत्क्षण ही अपने मन में संकल्प ले लिया कि चाहे
जो हो, वह इस चुनौती को स्वीकार करेगा।
महाराज को भी तेनाली राम की बातें याद हो आईं। उन्होंने इसे प्रकट नहीं होने दिया
और व्यापारी से कहा, “व्यापारी सोमदत्त, आप आज हमारी अतिथिशाला में विश्राम करें।
कल जब सभा लगेगी तब आपके प्रस्ताव पर विचार किया जाएगा।”
व्यापारी को महाराज ने अतिथिशाला में भेज दिया। सभा विसर्जित होने के बाद
महाराज ने तेनाली राम को बुलाकर कहा, “तेनाली राम! तुम्हें अब इस व्यापारी की शर्त
के अनुसार उसकी पहेली को हल करना होगा। ऐसा नहीं होने पर राज्य की बड़ी बदनामी
होगी। इसलिए आज रात भर सोच-विचार लो। कल सभा की कार्रवाई शुरू होते ही तुम्हें
स्वर्ण-पिंडों की पहेली हल करनी होगी।”
“जैसी आज्ञा महाराज!” तेनाली राम ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और अपने घर लौट
आया। उसे स्वर्ण-पिंडों को लेकर कोई तनाव नहीं था।
दूसरी ओर सभा में तेनाली राम से ईर्ष्या रखनेवाले सभासदों में इस बात की खूब चर्चा
हो रही थी कि तेनाली राम आज फँस ही गया। स्वर्ण-पिंडों की पहेली हल करने के लिए
अब यह तय है कि महाराज उससे ही कहेंगे। यह पहेली हल होनेवाली होती तो वह
व्यापारी इतना सोना दाँव पर नहीं लगाता! अब आएगा आनन्द! तेनाली राम की विद्वत्ता
की कलई इस बार खुलनी तय है। बड़ा ज्ञानी बना फिरता है...।'
दूसरे दिन नियत समय पर विजयनगर के राजप्रासाद में सभासद एकत्रित हुए। व्यापारी
सोमदत्त भी आया। महाराज भी पधारे। तेनाली राम का कहीं पता न था। महाराज मन-
ही-मन बेचैन हो उठे। आशंकित और संशययुक्त मन से महाराज विचार कर रहे थे कि कहीं
पहेली हल न होने के भय से तेनाली राम आया ही नहीं तो वे क्या करेंगे? अभी ऊहापोह के
बादल छँटे नहीं थे। सभासदों में भी बेचैनी थी।
व्यापारी सोमदत्त ने महाराज से पूछा, “महाराज! ‘स्वर्ण-पिंडों की समस्या का हल?’
महाराज ने उत्तर दिया, “तनिक प्रतीक्षा करो।”
व्यापारी अपने आसन पर बैठ गया। सभाकक्ष में फुसफुसाहटें तेज हो गईं। महाराज
असमंजस में थे और सिंहासन पर बैठे बार-बार पहलू बदल रहे थे कि अचानक उनकी दृष्टि
सभा में प्रवेश कर रहे तेनाली राम पर पड़ गई और उन्होंने राहत की साँस ली।
जब तेनाली राम अपनी जगह पर बैठ गया तो महाराज ने व्यापारी सोमदत्त से कहा,
“सोमदत्त! अब तुम अपनी समस्या सभासदों के बीच रखो।”
सोमदत्त ने पुनः दोनांे स्वर्ण-पिंडों के बारे में अपनी बातें सभा में दोहरा दीं।
महाराज ने सभा में घोषणा की, “इस समस्या के समाधान के लिए यदि कोई सभासद
स्वयं आगे आना चाहता हो तो आए अन्यथा इस समस्या का समाधान तेजस्वी तेनाली
राम करेंगे।” महाराज ने तेनाली राम के नाम के साथ ‘तेजस्वी’ विशेषण जान-बूझकर
जोड़ा था।
एक भी सभासद समस्या के समाधान के लिए नहीं आया तब महाराज ने तेनाली राम से
कहा, “तेनाली राम! आगे आओ और व्यापारी सोमदत्त द्वारा बताई गई समस्या को हल
करो!”
“महाराज! व्यापारी सोमदत्त से कहें कि वे स्वर्ण-पिंडों को अपनी इच्छा के अनुसार जहाँ
चाहें लटका दें। मैं उनकी समस्या का समाधान करने के लिए प्रस्तुत हूँ।।”
महाराज ने सोमदत्त को स्वर्ण-पिंडों को कहीं लटकाने का निर्देश दिया।
व्यापारी सोमदत्त ने उन स्वर्ण-पिंडों को महाराज और सभासदों के आसनों के मध्य के
खुले स्थान में, दीवार पर दो कीलें ठोककर अलगनी जैसी संरचना एक रस्सी के सहारे
तैयार कर ली तथा उस अलगनी में उसने दोनों स्वर्ण-पिंडों (जिनके सिरों पर सोने का ही
चेन लगा था) को लटका दिया और तेनाली राम की ओर देखकर कहा, “अब आपकी बारी
है, तेनाली राम जी।”
तेनाली राम ने अपने आसन से बिना हिले-डुले कहा, “महाराज! एक बार फिर सभासदों
और व्यापारी से पूछ लें कि कोई भी सभासद चाहे तो व्यापारी के प्रश्न का उत्तर दे दे।
व्यापारी चाहे तो अपना प्रस्ताव वापस ले ले। मैं सबको पुनर्विचार का एक अवसर देना
चाहता हूँ।”
तेनाली राम की बातें सुनकर सभासदों को लगा कि तेनाली राम स्वर्ण-पिंडों की पहेली
हल करने में असमर्थ है और वह किसी तरह अपना पिंड छुड़ाना चाहता है। सभा में
फुसफुसाहटें उभरीं और शान्त हो गईं।
व्यापारी ने घोषणा की, “वह अपने प्रस्ताव की वापसी नहीं चाहता है।”
अन्ततः तेनाली राम ने अपने आसन पर बैठे-बैठे ही ऊँचे स्वरों में कहा, “महाराज!
आपकी बाईं भुजा की ओर टँगा स्वर्ण-पिंड ठोस है और दाईं भुजा की ओर टँगा स्वर्ण-पिंड
खोखला है।”
तेनाली राम का स्वर इतना तेज था कि उसे सभी सभासदों ने सुना।
व्यापारी सोमदत्त के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। फिर भी उसने तेनाली राम से कहा,
”यह दाएँ-बाएँ कहने से समस्या का सही हल नहीं हो सकता। आप ठोस पिंड के पास
पहुँचकर बताएँ कि यह ठोस है।”
तेनाली राम तत्परता से अपने आसन से उठा और महाराज के बाईं तरफ के पिंड के पास
पहुँचकर कहा, “महाराज! यह स्वर्ण-पिंड ठोस है।”
“क्यों, व्यापारी सोमदत्त। तेनाली राम का हल सही है?” महाराज कृष्णदेव राय ने पूछा।
“जी हाँ, महाराज!” ऐसा कहकर व्यापारी ने दोनों स्वर्ण-पिंड उतारे और उसे मंजूषा में
रखकर महाराज को सौंप दिया, “महाराज! अब इन स्वर्ण-पिंडों पर मेरा कोई अधिकार
नहीं है।”
महाराज ने स्वर्ण-पिंडों वाली मंजूषा थामते हुए कहा, “हाँ, अब इन स्वर्ण-पिंडों पर
तेनाली राम का अधिकार है।”
व्यापारी सोमदत्त भारी कदमों से महाराज की सभा से चला गया और महाराज ने
तेनाली राम को स्वर्ण-पिंडों वाली मंजूषा सौंपते हुए कहा, “यह तुम्हारी मेधा का पुरस्कार
है। इसका उपयोग अपनी और स्वजन-परिजनों की भलाई के लिए करना।”
सभा विसर्जित होने के पश्चात् महाराज कृष्णदेव राय ने तेनाली राम से पूछा, “तेनाली
राम! तुमने पिंडों का रहस्य कैसे सुलझा लिया? दोनों पिंड बिलकुल एक जैसे थे, फिर उन्हें
छुए बिना तुमने कैसे जान लिया कि इनमें से ठोस कौन है और कौन-सा पिंड खोखला है?”
तेनाली राम ने हँसते हुए कहा, “इसमें कोई रहस्य सुलझाने जैसी बात नहीं है महाराज!
खोखला पिंड हल्का होता है और ठोस पिंड भारी। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति हर वस्तु
को अपनी ओर खींचती है। अलगनी पर चेन से लटकाए गए दोनों पिंडों को मैंने गम्भीरता
से देखा। ठोस पिंड को लटकानेवाले चेन में तनाव अधिक था तथा रस्सी के उस भाग में
खिंचाव भी अधिक था जिस भाग में ठोस स्वर्ण-पिंड लटकाया गया था। इस खिंचाव के
कारण ठोस पिंड थोड़ा नीचे आ गया था। खोखला पिंड थोड़ा ऊपर था और उसे
लटकानेवाली जंजीर में वैसा तनाव भी नहीं था जैसा कि ठोस पिंड लटकानेवाली जंजीर में
था।”
उस दिन महाराज ने फिर तेनाली राम को अपने आलिंगन में ले लिया और बोले,
“तेनाली राम! तुम सचमुच बुद्धिमान हो।”
मित्र की पहचान
महाराज कृष्णदेव राय आमोद प्रिय व्यक्ति थे। उल्लास के सामान्य अवसरों पर भी
महाराज उत्सव मनाते थे। उनके इस स्वभाव के कारण विजयनगरवासी प्रसन्न रहा करते
थे। कहा भी गया है- जैसा राजा, वैसी प्रजा।
एक बार, नव वर्ष के शुभागमन पर महाराज कृष्णदेव राय ने अपने मित्रों को बुलावा
भेजा। महाराज की इच्छा थी कि इस बार नववर्ष समारोहपूर्वक मनाया जाए। समारोह में
उन्होंने पड़ोसी राज्यों के नरेशों को भी आमंत्रण भेजा। नववर्ष के अवसर पर होनेवाले
समारोह में राज्य भर के कलाकारों को अपनी कला के प्रदर्शन का अवसर देने का निश्चय
कर महाराज ने वैसी व्यवस्था भी करवा ली।
समारोह के लिए अतिथियों का आना प्रारम्भ हो गया। पड़ोसी राज्यों के दो नरेश
समारोह के दो दिन पहले ही पहुँच चुके थे। महाराज ने इन दोनों नरेशों को अतिथिशाला
में नहीं ठहराया बल्कि उन दोनों नरेशों के लिए राजमहल के ही दो कक्षों को सजाया गया
था। दोनों नरेश उन्हीं कक्षों में ठहरे थे। इनमें से एक नरेश का नाम था-प्रसेनजित तथा
दूसरे का नाम था- वज्रबाहु! महाराज कृष्णदेव राय का बचपन इन दोनों के साथ व्यतीत
हुआ था। गुरुकुल के दिनों में महाराज कृष्णदेव राय के साथ ही इन दोनों ने शिक्षा ग्रहण
की थी। एक ही गुरुकुल, एक ही गुरु।
अतिथि-प्रेमी होने के कारण महाराज कृष्णदेव राय ऐसे भी अपने महल में आनेवालों का
खूब सत्कार किया करते थे। अब जब उनके दो बाल-सखा पधारे हों तो उनके स्वागत-
सत्कार में कोई कमी कैसे रह सकती थी! महाराज लगातार अपने इन दोनों अतिथियों के
पास ही बने रहते। कभी मित्रों के साथ चैसर खेलते तो कभी घुड़सवारी के लिए निकल
जाते।
दो दिन ऐसे ही बीत गए। नववर्ष समारोह का दिन आ गया। पिछले दो दिनों तक अपने
मित्रों की आवभगत में लगे रहने के कारण महाराज को इस बात का कोई ज्ञान नहीं था कि
मुख्य समारोह की क्या तैयारियाँ हुई हैं और क्या बाकी हैं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था
कि महाराज मुख्य आयोजन के सन्दर्भ में स्वयं कोई रुचि न दिखाएँ।
महाराज के विशिष्ट सभासद भी महाराज के इस आचरण से अचम्भित थे। जिस दिन
नववर्ष का मुख्य समारोह आयोजित होनेवाला था, उस दिन प्रातःकाल में महाराज के
मुख्य सभासदों और विश्वसनीय माने जानेवाले लोगों ने मिलकर तय किया कि आज वे
लोग महाराज से मिलने महल में जाएँगे तथा महाराज से आग्रह करेंगे कि वे समारोह की
तैयारियाँ देख लें।
सुबह महाराज अभी बिस्तर से उठे ही थे कि उन्हें प्रहरी ने सूचना दी कि महाराज से
मिलने के लिए सभासदों का विशिष्ट मंडल आया हुआ है। महाराज ने प्रहरी को निर्देश
दिया कि वह उन लोगों को बाहरी कक्ष में बैठाए और प्रतीक्षा करने के लिए कहे।
थोड़ी ही देर के बाद महाराज कृष्णदेव राय अपने कपड़े बदलकर वहाँ पहुँच गए जहाँ
उनकी प्रतीक्षा में सभासद बैठे हुए थे। इन सभासदों में तेनाली राम भी था।
महाराज को सभी सभासदों ने समारोह की तैयारियों के विषय में जानकारियाँ दीं और
उन्हें समारोह स्थल पर चलने को कहा।
अभी महाराज अपने सभासदों की बातों का कोई उत्तर भी नहीं दे पाए थे कि महाराज के
भवन में आतिथ्य प्राप्त कर रहे उनके मित्र प्रसेनजित ने कक्ष में प्रवेश किया।
एक ऐसे कक्ष में जहाँ कोई राजा अपने विशिष्ट सभासदों के साथ विचार-विमर्श या
मंत्राण कर रहा हो वहाँ इस प्रकार बिना सूचना दिए प्रवेश कर जाना अशिष्टता समझी
जाती थी। सभासद चैंक पड़े और प्रश्नसूचक दृष्टि से प्रसेनजित की ओर देखने लगे।
महाराज ने भाँप लिया कि कक्ष में इस तरह प्रसेनजित का आना सभासदों को पसन्द नहीं
आया। इसे उनके राज्य में, स्वयं उनके महल में अशिष्टता माना जाता है। लेकिन प्रसेनजित
को वे कुछ कह भी नहीं सकते थे। बात बिगड़े नहीं इसलिए उन्होंने मुखर होते हुए कहा,
“आओ भाई प्रसेनजित, अपना आसन सँभालो। ये लोग मेरे विशिष्ट सलाहकार हैं और आज
नववर्ष समारोह के कार्यक्रम तय करने पधारे हैं।“ थोड़ी देर चुप रहने के बाद महाराज ने
अपने सभासदों से कहा, “और ये हैं-प्रसेनजित! कलिंग के महाराजा। मेरे गुरु-भाई और
बाल-सखा।”
तेनाली राम ने देखा कि प्रसेनजित की चाल में एक दर्प है। महाराज द्वारा परिचय दिए
जाने पर जब सभासदों ने उसका अभिवादन किया तो प्रसेनजित ने अपनी गर्दन अकड़ा ली
और उसे हल्का-सा हिलाकर अभिवादन स्वीकार किया। तेनाली राम ने उसकी मुद्रा
देखकर मन-ही-मन कहा-अरे! यह तो बड़ा दम्भी है।
प्रसेनजित ने सभासदों की उपेक्षा करते हुए महाराज कृष्णदेव राय से पूछा, “अरे
कृष्णदेव! यह सुबह-सुबह दरबार लगाकर क्यों बैठ गए? समारोह की तैयारी देखना कब से
राजाओं का कार्य हो गया? क्या तुम्हारे राज्य में ऐसे योग्यजनों का अभाव है जो समारोह
की तैयारी कर सकें?”
महाराज कृष्णदेव राय ने झेंपते हुए अपने सभासदों से कहा, “आप लोग सक्षम हैं। जो भी
आवश्यक लगे, कर लें। हम लोग समारोह देखने के लिए पहुँचेंगे।”
महाराज की झेंप को तेनाली राम ने भाँप लिया। वह समझ गया कि सभासदों के समक्ष
प्रसेनजित का यह व्यवहार महाराज को भी अनुकूल नहीं लगा। मन-ही-मन तेनाली राम ने
प्रसेनजित के आचरण की समीक्षा की और इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि यह व्यक्ति भले ही
राजा हो मगर है अशिष्ट। इसे सामान्य लोक-व्यवहार की भी समझ नहीं है।
अन्ततः महाराज के बिना ही सभी सभासद उठकर समारोह-स्थल की ओर प्रस्थान कर
गए। जिस समय वे लोग कक्ष से बाहर जा रहे थे उसी समय प्रसेनजित ने सभासदों को
सम्बोधित करते हुए कहा, “कुछ कार्य तुम लोग स्वयं कर लिया करो। आयोजन की
व्यवस्था करना या उसका निरीक्षण करना राजाओं का कार्य नहीं होता।”
प्रसेनजित द्वारा आदेशात्मक स्वर में कही गई यह बात किसी भी सभासद को पसन्द नहीं
आई। वर्षों से वे महाराज कृष्णदेव राय की सेवा में हैं। कभी भी महाराज ने उनसे इस शैली
में बातें नहीं कीं। वे सभी मन-ही-मन प्रसेनजित को कोसते हुए कक्ष से बाहर हो गए।
नववर्ष का रंगारंग कार्यक्रम शुरू हो चुका था। एक के बाद एक मंच पर कलाकार आते,
अपनी कला का प्रदर्शन करते और लौट जाते। पहले बाल कलाकारों को कला प्रदर्शन का
अवसर दिया गया, फिर पुरुष कलाकारों को और अन्त में महिला कलाकारों को। महिला
कलाकारों में एक से बढ़कर एक नृत्यांगनाएँ मंच पर आती रहीं। नृत्य प्रस्तुत कर जाती
रहीं।
तेनाली राम ने देखा कि दर्शकों की अगली पाँत में महाराज के साथ बैठा प्रसेनजित
महिला कलाकारों की ओर बहुत ही लोलुप -ष्टि से देख रहा है। उसकी -ष्टि में छिपे अश्लील
भाव को पहचानकर मन-ही-मन तेनाली राम क्षुब्ध हो उठा कि महाराज ऐसे व्यक्ति को
अपना बाल-सखा कहते नहीं अघाते मगर तेनाली राम अपने स्थान पर बने रहने के लिए
बाध्य था। इस अशिष्ट व्यक्ति को दंडित करने का अधिकार तो उसे कतई नहीं था। मगर
प्रसेनजित के प्रति उसके मन में वितृष्णा का भाव अवश्य गहरा गया था।
मध्य रात्रि तक समारोह चलता रहा। समारोह के समापन के बाद महाराज अपने मित्रों
के साथ भवन में चले गए।
सभासदों को घोर विस्मय हुआ कि महाराज ने अन्य अतिथियों से यह भी नहीं पूछा कि
उन्हें समारोह में आनन्द आया या नहीं। ‘शुभ रात्रि’ कहने की औपचारिकता भी उन्होंने
नहीं निभाई। तेनाली राम को महाराज के व्यवहार में आया यह परिवर्तन पसन्द नहीं
आया। महाराज कृष्णदेव के दरबार में उसकी हैसियत मात्र एक विदूषक की थी। वह संशय
में था कि महाराज को उनके आचरण में उत्पन्न हो रहे दोष के प्रति कैसे सचेत करे।
नववर्ष का समारोह सम्पन्न हो चुका था। अतिथि वापस लौट चुके थे। किन्तु महाराज
राजकाज की सामान्य दिनचर्या में भाग नहीं ले रहे थे। कुछ आवश्यक होता तो सम्बन्धित
कर्मचारी को राजभवन में बुलाकर ही निर्देश दे देते और फिर अपने दोनों मित्रों के साथ या
तो चौसर खेलने में व्यस्त हो जाते या शिकार करने निकल जाते।
एक दिन उन्होंने किसी कार्यवश तेनाली राम को राजभवन में बुलवाया। जो निर्देश देना
था, दिए। जो बातें करनी थीं, कीं। अवसर देखकर तेनाली राम ने महाराज से कहा,
“महाराज, बादल यदि बरसना बन्द कर दे तो धरती उर्वर नहीं रहती। हवा यदि बहना
बन्द कर दे, सूर्य यदि चमकना बन्द कर दे तब प्रकृति का विनाश अवश्यम्भावी है। हवा,
बादल, सूरज जिस तरह अपने कर्तव्य में सतत निमग्न रहते हैं उसी तरह प्रजापालक राजा
को भी अपने कर्तव्य में लगा रहना चाहिए!”
महाराज कृष्णदेव राय चौंके। उन्होंने तेनाली राम की ओर प्रश्नसूचक -ष्टि से देखा। किसी
राजा के इस तरह देखने का अर्थ होता है- अवश्यम्भावी दंड! मगर तेनाली राम के चेहरे
पर रंचमात्रा भी भय नहीं था।
महाराज ने कुपित स्वर में पूछा, “तुम्हारे कहने का आशय क्या है, तेनाली राम?”
"महाराज! आप अन्नदाता हैं। मेरी विनती है कि आप मेरे और विजयनगरवासियों के
अन्नदाता बने रहें।“
महाराज कृष्णदेव राय की तनी भृकुटियों का तनाव तेनाली राम का उत्तर सुनकर थोड़ा
कम हुआ किन्तु तेनाली राम के कथन के निहितार्थ को समझते हुए वे उद्वेलित हो गए थे।
उन्होंने आवेश-भरे स्वर में पूछा, “तुम्हें क्या लगता है, मैं अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं
कर रहा? राजकाज में व्यस्त रहना मात्र ही मेरी दिनचर्या होनी चाहिए? मेरे दो अभिन्न
मित्र वर्षों बाद मिले हैं...मेरा उनके प्रति भी तो कुछ कर्तव्य है!”
तेनाली राम ने उनकी ओर विस्मय-भरी दृष्टि से देखा और अनायास उसके मँुह से
निकला, “अभिन्न मित्र ?”
“क्यों, तुम्हें कोई सन्देह है?” महाराज ने पूछा।
तेनाली राम मौन उनकी ओर देखता रहा।
“बोलो तेनाली राम, बोलते क्यों नहीं? बताओ कि ये दोनों मेरे मित्रा हैं या नहीं? फिर
इनके प्रति मेरा कोई दायित्व है या नहीं?“
“मित्र?” तेनाली राम ने महाराज की ओर फिर से प्रश्नात्मक दृष्टि डाली।
तेनाली राम की प्रश्नात्मक -ष्टि से महाराज विचलित हो गए और संशययुक्त वाणी में
तेनाली राम से पूछने लगे, “बताओ तेनाली राम! क्या ये दोनों मेरे मित्र नहीं हैं? क्या तुम्हें
इनकी मित्रता पर सन्देह है? क्या बात है, बिना डर के बोलो। तुम्हारे मन में इनके प्रति
क्या धारणा है?”
महाराज के स्वर में जिज्ञासा थी। महाराज के बदले स्वर को सुनकर तेनाली राम के मन
में विचार उत्पन्न हुआ कि सत्ता कितने आडम्बर से अपना दर्पपूर्ण चेहरा बनाए रखती है
किन्तु सच का एक झोंका उसे जड़ से हिला देता है। यही महाराज कृष्णदेव राय अभी दो
क्षण पहले अपनी मित्रता की बखान करते हुए अपने मित्रों के प्रति अपने कर्तव्य का उल्लेख
कर रहे थे और अब वही महाराज कृष्णदेव राय संशययुक्त मन से पूछ रहे हैं, ‘क्या वे मित्रा
नहीं हैं?’ तेनाली राम ने स्थिति अनुकूल पाते हुए उसका लाभ उठाया और बोला,
“महाराज! मित्र-अमित्र की पहचान मैंने नहीं की है किन्तु यदि आप चाहें तो वह भी कर
सकता हूँ।”
“हाँ, तेनाली राम! मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे बताओ कि इन दोनों में से मेरा सच्चा मित्र
कौन है?” महाराज ने कहा। “तो ठीक है महाराज!” तेनाली राम ने विश्वास-भरी दृष्टि से
महाराज की आँखों में झाँकते हुए कहा, “आज रात्रि विश्राम मैं राजभवन में कर सकूँ,
ऐसी व्यवस्था करा दें। मेरे ठहरने का प्रबन्ध अपने इन दोनों मित्रों के कक्ष के आसपास करा
दें।”
महाराज मान गए।
शाम को तेनाली राम आया तो उसे महाराज के मित्र प्रसेनजित और वज्रबाहु के कक्षों के
सामने के एक कक्ष में ठहरा दिया गया। तेनाली राम के राजभवन में ठहरने की सूचना
गोपनीय रखी गई।
महाराज कृष्णदेव राय स्वयं एक बार तेनाली राम के कक्ष में आए। उन्होंने तेनाली राम
से कहा, “कुछ चाहिए तो बताओ।”
“नहीं महाराज, मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस, आप इतना करें कि अपने मित्रों के कक्ष में
ही रात्रि का भोजन भेजें। भोजन में ऐसे पकवान हों जिनमें अच्छी सुगन्ध हो। सुस्वादु
पकवानों से भरे थाल जब आप अपने मित्रों के कक्ष में भिजवा दें तब तुरन्त यह समाचार
फैला दें कि आपका स्वास्थ्य अचानक बहुत खराब हो गया है। बाकी बातें हम लोग बाद में
करेंगे।” तेनाली राम ने कहा।
“लेकिन इससे होगा क्या?” महाराज ने पूछा।
“यही तो देखना है महाराज!” तेनाली राम ने कहा।
“तुम्हारी बातें मुझे समझ में नहीं आ रही हैं तेनाली राम!” महाराज ने जिज्ञासा-भरे
स्वरों में कहा।
“सुबह तक प्रतीक्षा करें महाराज!” तेनाली राम ने महाराज को यह कहते हुए आश्वस्त
किया।
रात्रि के भोजन का समय था। राजभवन में अतिथि के रूप में रह रहे प्रसेनजित और
वज्रबाहु के कक्ष में भोजन लाकर रखा गया था। भोजन से भूख जगानेवाली सुगन्ध उठ रही
थी जिससे आसपास का वातावरण महमहा उठा था। प्रसेनजित और वज्रबाहु अभी भोजन
करने के लिए उद्यत हुए ही थे कि दो प्रहरी दौड़ते हुए आए और बोले, “महाराज का
स्वास्थ्य बहुत खराब है। राजवैद्य उनकी शुश्रूषा में लगे हैं मगर उनकी स्थिति खराब
होती ही जा रही है।”
यह सूचना देकर दोनों प्रहरी लौट गए। वज्रबाहु तत्काल भोजन की थाल से उठ गए और
अपना हाथ अंगवस्त्राम् से पोंछते हुए महाराज के कक्ष की ओर दौड़ पड़े, जबकि प्रसेनजित
ने जी-भर के भोजन किया और थोड़ी देर लेटने के बाद वह महाराज के कक्ष की ओर गया।
तेनाली राम ने दोनों के जाने के बाद उनके कक्षों में जाकर भोजन की थाल में भोजन की
स्थिति देखी। प्रसेनजित की थाल रिक्त हो चुकी थी जबकि वज्रबाहु की थाल में भोजन ज्यों
का त्यों था। एक निवाला तैयार था, जैसे उसे हाथ में उठाकर फिर से थाल में रख दिया
गया हो!
सुबह तक राजवैद्य भवन में रहे। सूर्योदय से पहले ही महाराज स्वस्थ हो गए।
तेनाली राम महाराज के कक्ष में उन्हें देखने के बहाने पहुँचा।
उसे देखकर महाराज ने पूछा, “क्यों तेनाली राम! आज मेरे प्रश्न का उत्तर तो दे दोगे?”
“आज नहीं, अभी महाराज!” तेनाली राम ने मुस्कुराते हुए कहा।
“हाँ, बताओ तेनाली राम, मेरा मित्र इन दोनों में से कौन है? या दोनों ही हैं? या दोनों में
से कोई नहीं, संशयमुक्त होकर बताओ।” महाराज ने पुनः तेनाली राम से पूछा।
तेनाली राम ने महाराज की ओर देखते हुए कहा, “महाराज! आपका सच्चा मित्रा
वज्रबाहु है, प्रसेनजित नहीं।“ फिर तेनाली राम ने महाराज के अस्वस्थ होने के बाद की
घटना बता दी कि मित्रा का स्वास्थ्य खराब होने की सूचना से उद्वेलित होकर किस तरह
वज्रबाहु भोजन छोड़कर महाराज के शयन कक्ष की ओर दौड़ पड़ा और प्रसेनजित ने किस
तरह भोजन करने के बाद विश्राम किया और तब अपने कक्ष से निकला।
तेनाली राम से पूरा वृत्तान्त जानने के बाद महाराज ने उसे अपने गले से लगा लिया और
कहा, “भविष्य में भी तुम मेरे आचरण पर दृष्टि रखना। यदि कभी मैं कर्तव्यविमुख होता
दिखूँ तो इस बात की ओर मेरा ध्यान आकृष्ट करने के लिए जो भी उचित जान पड़े,
करना।”
उस दिन से ही महाराज कृष्णदेव राय पहले की भाँति दरबार में जाने लगे। महाराज को
सक्रिय और सजग देखकर सभासदों में भी उत्साह पैदा हो गया और विजयनगर में पैदा हुई
उदासीनता समाप्त हो गई।
निन्यानबे का चक्कर
एक दिन महाराज कृष्णदेव राय अपने दरबार में बैठे लोगोां० की फरियाद सुन रहे थे।
उनके पास उस दिन एक विचित्र समस्या लेकर एक फरियादी आया।
फरियादी ने अपनी समस्या महाराज के सामने इस प्रकार रखी, “महाराज! मैं एक गरीब
आदमी हूँ। मेरे पास एक मकान है जिसमें दो कमरे हैं। एक कमरे में मैं रहता हूँ तथा
दूसरे कमरे में एक किराएदार। मेरा किराएदार एक मोची है जो दिन-भर बाजार में लोगों
के जूतों की मरम्मत करता है और रात को घर आकर घंटों पूजा करता है।”
महाराज चकराए, ”अरे, यह तो अच्छी बात है। तब तो मोची भला आदमी है। ऐसे
आदमी से तुम्हें क्या परेशानी है?“
”हाँ, महाराज, वह भला आदमी है। मुझे समय पर किराया अदा करता है। किसी बात की
कभी झिक-झिक, खिच-खिच उसने मेरे साथ नहीं की है। रोज सुबह जगकर स्नान-ध्यान
करने के बाद ही वह अपने काम के लिए निकलता है।“ फरियादी ने कहा।
”तो फिर परेशानी क्या है?“ महाराज ने पूछा।
“महाराज! शाम को जब मोची पूजा करता है तब वह हाथ में ढोलक लेकर उसे पीटते
हुए जोर-जोर से भजन गाता है। उसके भजन गाने से भी मुझे कोई शिकायत नहीं है।
शिकायत है उसकी ढोल से, जिसकी धमक से मैं घंटों परेशान रहता हूँ और सो नहीं
पाता।” फरियादी ने कहा।
महाराज को फरियादी की वास्तविक परेशानी का अनुमान लग गया। थोड़ी देर मौन
रहने के बाद उन्होंने तेनाली राम से पूछा, “क्यों तेनाली राम! इस फरियादी का दुख-दर्द
दूर करने का तो एकमात्र उपाय यही है कि इसका कमरा खाली करा दिया जाए।”
“नहीं महाराज!“ तेनाली राम ने कहा, ”इस तरह के समाधान से तो मोची ही नहीं,
फरियादी भी परेशान हो उठेगा।”
“वह कैसे?” महाराज ने पूछा।
”महाराज! फरियादी ने साफ-साफ कहा है कि वह गरीब आदमी है। दो कमरों के मकान
का एक कमरा किराए पर देने से यह बात साफ हो जाती है कि उसे पैसों की जरूरत है
तभी वह एक कमरा किराए पर देने के लिए विवश हुआ है।”
“हाँ! तुम ठीक कह रहे हो। फिर क्या समाधान है?” महाराज ने पूछा।
“महाराज! यदि यह फरियादी निन्यानबे रुपए खर्च करने के लिए तैयार हो जाए तो मैं
उसे समस्या से मुक्त करा दूँगा।” तेनाली राम ने कहा।
महाराज ने पूछा, “फरियादी! क्या तुम निन्यानबे रुपए खर्च करने की स्थिति में हो?”
“यदि समस्या से मुक्ति मिल जाए तो मैं निन्यानबे क्या, सौ रुपए भी खर्च कर सकता
हूँ।” फरियादी ने कहा।
“नहीं, केवल निन्यानबे रुपए।” इस बार यह बात तेनाली राम ने कही।
“जी हाँ, श्रीमान! मैं निन्यानबे रुपए खर्च कर सकता हूँ।” फरियादी ने कहा।
”तो ठीक है, जाओ और निन्यानबे रुपए गिनकर एक मखमल की थैली में डाल दो। और
जिस समय मोची कमरे में नहीं हो, उस समय उसके कमरे में वह थैली डाल दो। ऐसा करने
के एक सप्ताह बाद आकर महाराज को उसके भजन का हाल बताना। अब जाओ, और
जाकर वही करो जो मैंने तुम्हें बताया है।” तेनाली राम ने कहा।
फरियादी महाराज के दरबार से बहुत आशंकित मन से लौटा। उसे विश्वास नहीं हो रहा
था कि यह उसकी समस्या का कोई समाधान है। वह मन-ही-मन सोचता जा रहा था,
‘आज के जमाने में गरीबों की कौन सुनता है कि राजा-महाराजा सुनेंगे! खैर, चलो! यहाँ
आए तो निन्यानबे के चक्कर में पड़े। न आते तो अच्छा था।”
अपने घर पहुँचकर फरियादी ने मखमल की थैली में निन्यानबे रुपए गिनकर डाले और
मोची के कमरे में फेंक आया। उसे इसका कोई परिणाम मिलने की आशा नहीं थी।
दूसरी तरफ महाराज भी तेनाली राम की सलाह से सहमत नहीं थे। उन्होंने तेनाली राम
से पूछा, “तेनाली राम! तुमने उस फरियादी को निन्यानबे रुपए की थैली मोची के कमरे में
फेंकने की सलाह तो दे दी लेकिन इससे क्या होगा, मुझे बताओ।”
“महाराज! इससे मोची निन्यानबे के चक्कर में पड़ जाएगा।” तेनाली राम ने हँसते हुए
कहा।
“निन्यानबे के चक्कर में?” महाराज ने चैंककर फिर पूछा।
“यह निन्यानबे का चक्कर क्या है? मुझे खुलकर बताओ। साफ-साफ।”
“महाराज, यह मोची किसी के पास काम नहीं करता। यह अपनी दुकान लगाता है।
मतलब यह हुआ कि इस मोची में भी पैसेवाला बनने की लालसा है। अब जब उसे मखमल
की थैली में निन्यानबे रुपए मिलेंगे तब वह उन्हें खर्च करने की कतई नहीं सोचेगा। वह
सबसे पहले उस थैली में अपने एक रुपए मिलाकर उन्हें सौ रुपए में बदलेगा। इसके बाद
वह इन सौ रुपयों को दो सौ रुपयों में, दो सौ रुपयों को पाँच सौ रुपयों में, पाँच सौ रुपयों
को हजार रुपयों में बदलने के लिए लालायित हो उठेगा। महाराज! अब मोची को
निन्यानबे के चक्कर से मुक्ति नहीं मिलनेवाली।” तेनाली राम ने विश्वासपूर्वक कहा।
“मगर तुम्हारी बात मान भी ले तो फरियादी की समस्या का हल कहाँ हुआ? तुमने तो
मोची को निन्यानबे के चक्कर में डालने का इन्तजाम भर किया है।” महाराज की संशययुक्त
वाणी फूटी।
“बस, सात दिन तक धैर्य रखें महाराज!” तेनाली राम ने महाराज से अनुनयपूर्वक कहा।
महाराज मौन हो गए। लेकिन उनके मन में तेनाली राम की इस विचित्र सलाह का
परिणाम जानने की उत्सुकता बनी रही।
ठीक सातवें दिन वह फरियादी दरबार में उपस्थित हुआ। उसके चेहरे पर प्रसन्नता के
भाव थे। जैसे ही उसे अवसर मिला, वह महाराज के सामने आया और मुस्कुराते हुए अपने
दोनों हाथ जोड़ लिये।
महाराज ने फरियादी से पूछा, “क्या हाल है फरियादी? तुम्हारी समस्या बनी हुई है
या...।”
फरियादी ने तत्परता से उत्तर दिया, “महाराज! अब कोई समस्या नहीं है।”
“अरे! यह चमत्कार कैसे हुआ?” महाराज ने विस्मय से पूछा।
“महाराज! जिस दिन मैंने मोची के कमरे में थैली फेंकी, उस रात मोची ने थोड़ी देर तक
भजन गाया। उसके दूसरे दिन भी थोड़ी देर तक भजन गाया। लेकिन उसके बाद से वह
रोज रात को जूते गाँठने के काम में लगा रहता है। बाजार से लौटने के बाद भगवान के
सामने दीप जलाकर प्रणाम करता है और अपने काम में लग जाता है।...महाराज, मुझे अब
उससे कोई शिकायत नहीं है। मैं रोज रात को चैन की नींद सोता हूँ।”
महाराज ने देखा, तेनाली राम मन्द-मन्द मुस्कुरा रहा था।
फलियों की शिक्षा
एक बार विजयनगर के सम्राट महाराज कृष्णदेव राय की इच्छा हुई कि वे अपने राज्य का
भ्रमण करें और अपनी प्रजा के दुख-सुख को स्वयं अपनी आँखों से देखें ताकि उन्हें अपने
राज्य के विकास की योजना बनाते समय उन जरूरी बातों का ध्यान रह सके जिनका
अभाव अभी उनकी प्रजा अनुभव कर रही है। उन्होंने अपनी इच्छा तेनाली राम को बताई।
तेनाली राम ने महाराज की बातें ध्यानपूर्वक सुनीं। उसे महाराज की बातें अच्छी लगीं।
उसने महाराज से कहा, “महाराज! बहुत उत्तम विचार है। जितनी जल्दी हो सके, राज्य-
भ्रमण का कार्यक्रम बना लें।”
“ठीक है। कार्यक्रम बन जाएगा। मगर मेरी इच्छा है कि राज्य-भ्रमण के दौरान तुम मेरे
साथ रहो।” महाराज ने कहा।
तेनाली राम ने तत्काल उत्तर दिया, “आपकी इच्छा मेरे लिए सर्वोपरि है महाराज! आप
आदेश करें-मैं आपको हर क्षण उपलब्ध मिलूँगा।”
जल्दी ही महाराज के राज्य-भ्रमण का कार्यक्रम बन गया। महाराज ने अपने साथ कुछ
चुनिन्दे एवं विशेष रूप से प्रशिक्षित सिपाहियों का दस्ता रखा और तेनाली राम के साथ
घोड़े पर सवार होकर राज्य-भ्रमण के लिए निकल पड़े।
पहले दिन ही संयोग ऐसा रहा कि राह में कोई बाजार नहीं मिला। घोड़े थक कर चूर थे।
महाराज भी थकान का अनुभव कर रहे थे। उन्होंने तेनाली राम से कहा, “मुझे लगता है
कि अब शाम ढलने को है। हमें यहीं कहीं अच्छी जगह देखकर पड़ाव डालना होगा। भूख
और प्यास से सभी बेहाल हैं। भोजन की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी।”
तेनाली राम ने महाराज से कहा, “महाराज! मुझे लग रहा है कि दाईं तरफ नजदीक में
ही कोई नदी हमें मिल सकती है...आप भी अनुभव कर सकते हैं कि दाईं तरफ से जो हवा
आ रही है, उसमें शीतलता है। यह शीतलता नमी के कारण ही हो सकती है।”
महाराज ने तेनाली राम की बातें सुनकर दाईं तरफ अपने घोड़े को घुमाया और थोड़ी दूर
तक मन्थर गति से उसे दौड़ाया। इसके बाद उन्हें भी लगा कि तेनाली राम के अनुमान में
सत्यता है और उन्होंने साथ चल रहे दस्ते को उसी दिशा में चलने का संकेत कर दिया।
थोड़ी देर में ही वे लोग नदी के किनारे पहुँच गए।
महाराज के निर्देश पर नदी किनारे तम्बू गाड़े गए। घोड़ों को ले जाकर सिपाहियों ने नदी
में पानी पिलाया।
महाराज अपने तम्बू में विश्राम की मुद्रा में लेट गए और तेनाली राम से कहा, “तेनाली
राम! अब भोजन का भी प्रबन्ध हो जाना चाहिए।“ ऐसा कहते समय वे अपने आस-पास
नजर दौड़ाते रहे। थोड़ी दूरी पर उन्हें एक खेत दिखा जिसमें मटर की फलियाँ ही फलियाँ
दूर तक दिखाई दे रही थीं। महाराज ने तेनाली राम से कहा, “क्यों न आज हम लोग इन्हीं
फलियों का आहार करें?”
“विचार तो अच्छा है महाराज!” तेनाली राम ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया।
महाराज ने कुछ सिपाहियों को बुलवाया और उनसे कहा, “आज फलियों का आहार तुम
लोगों को कैसा लगेगा?”
“महाराज! इस बियाबान में जो कुछ भी मिल जाए, वही उत्तम आहार है।“ एक
सिपाही ने हिम्मत करके कहा।
“तो जाओ सामने, खेत में फलियाँ तैयार हैं, तोड़कर कुछ हम दोनों के लिए लाओ और
तुम लोग भी खाओ। घोड़े तो मैदान में घास चर ही रहे होंगे।“
“जैसी आज्ञा महाराज!” कहकर सिपाही मुड़ने ही जा रहा था कि तेनाली राम ने
हस्तक्षेप किया, ”ठहरो!“ फिर महाराज की ओर देखते हुए बोला, “महाराज! मैं तो इस
तरह फलियाँ ग्रहण नहीं करूँगा। आप इस राज्य के राजा अवश्य हैं किन्तु इस खेत के
मालिक नहीं हैं। इस खेत का मालिक तो वही किसान होगा जिसने इस खेत में फलियाँ
उगाई हैं। इसे अपने पसीने से सींचा है। बिना उसकी आज्ञा के इस खेत की एक फली भी
तोड़ना अपराध है। और यह केवल अपराध ही नहीं है अपितु राजधर्म के विरुद्ध चरण है
जो कि एक राजा को शोभा नहीं देता।”
महाराज को तेनाली राम की बात उचित लगी। उन्होंने सिपाही को निर्देश दिया,
“जाओ! इस खेत के स्वामी का पता लगाकर उससे आज्ञा लो। यदि वह मिल जाए तो उससे
कहना-इस राज्य के राजा ने उसके खेत की फलियाँ मँगाई हैं।”
सिपाही जब उस खेत के मालिक का पता लगाते हुए उसके पास पहुँचा तो सिपाही को
देखकर खेत का मालिक घबरा गया। किन्तु जब उसे यह पता चला कि महाराज स्वयं उसके
खेत के पास विश्राम कर रहे हैं और अपनी भूख मिटाने के लिए खेत से थोड़ी फलियाँ तोड़ने
की आज्ञा चाहते हैं तब उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। प्रसन्नता से उसका हृदय भर
गया। मन-ही-मन वह विजयनगर के महाराज कृष्णदेव राय के प्रति श्रद्धा से भर
गया-‘कितने महान हैं महाराज! स्वयं राजा हैं मगर मुझ जैसे गरीब किसान की मेहनत का