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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 118 में से

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पृष्ठ 85

महाराज के निर्देश पर नदी किनारे तम्बू गाड़े गए। घोड़ों को ले जाकर सिपाहियों ने नदी
में पानी पिलाया।
महाराज अपने तम्बू में विश्राम की मुद्रा में लेट गए और तेनाली राम से कहा, “तेनाली
राम! अब भोजन का भी प्रबन्ध हो जाना चाहिए।“ ऐसा कहते समय वे अपने आस-पास
नजर दौड़ाते रहे। थोड़ी दूरी पर उन्हें एक खेत दिखा जिसमें मटर की फलियाँ ही फलियाँ
दूर तक दिखाई दे रही थीं। महाराज ने तेनाली राम से कहा, “क्यों न आज हम लोग इन्हीं
फलियों का आहार करें?”
“विचार तो अच्छा है महाराज!” तेनाली राम ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया।
महाराज ने कुछ सिपाहियों को बुलवाया और उनसे कहा, “आज फलियों का आहार तुम
लोगों को कैसा लगेगा?”
“महाराज! इस बियाबान में जो कुछ भी मिल जाए, वही उत्तम आहार है।“ एक
सिपाही ने हिम्मत करके कहा।
“तो जाओ सामने, खेत में फलियाँ तैयार हैं, तोड़कर कुछ हम दोनों के लिए लाओ और
तुम लोग भी खाओ। घोड़े तो मैदान में घास चर ही रहे होंगे।“
“जैसी आज्ञा महाराज!” कहकर सिपाही मुड़ने ही जा रहा था कि तेनाली राम ने
हस्तक्षेप किया, ”ठहरो!“ फिर महाराज की ओर देखते हुए बोला, “महाराज! मैं तो इस
तरह फलियाँ ग्रहण नहीं करूँगा। आप इस राज्य के राजा अवश्य हैं किन्तु इस खेत के
मालिक नहीं हैं। इस खेत का मालिक तो वही किसान होगा जिसने इस खेत में फलियाँ
उगाई हैं। इसे अपने पसीने से सींचा है। बिना उसकी आज्ञा के इस खेत की एक फली भी
तोड़ना अपराध है। और यह केवल अपराध ही नहीं है अपितु राजधर्म के विरुद्ध चरण है
जो कि एक राजा को शोभा नहीं देता।”
महाराज को तेनाली राम की बात उचित लगी। उन्होंने सिपाही को निर्देश दिया,
“जाओ! इस खेत के स्वामी का पता लगाकर उससे आज्ञा लो। यदि वह मिल जाए तो उससे
कहना-इस राज्य के राजा ने उसके खेत की फलियाँ मँगाई हैं।”
सिपाही जब उस खेत के मालिक का पता लगाते हुए उसके पास पहुँचा तो सिपाही को
देखकर खेत का मालिक घबरा गया। किन्तु जब उसे यह पता चला कि महाराज स्वयं उसके
खेत के पास विश्राम कर रहे हैं और अपनी भूख मिटाने के लिए खेत से थोड़ी फलियाँ तोड़ने
की आज्ञा चाहते हैं तब उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। प्रसन्नता से उसका हृदय भर
गया। मन-ही-मन वह विजयनगर के महाराज कृष्णदेव राय के प्रति श्रद्धा से भर
गया-‘कितने महान हैं महाराज! स्वयं राजा हैं मगर मुझ जैसे गरीब किसान की मेहनत का