सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

६६ तर्कसंग्रहः [ शब्दपरिच्छेदः
वाक्यं द्विविधम्—वैदिकं लौकिकं च । वैदिकमीश्वरोक्तत्वात्
सर्वमेव प्रमाणम् । लौकिकं त्वाप्तोक्तं प्रमाणम् । अन्यदप्रमाणम् ।
वाक्यार्थज्ञानं शाब्दज्ञानम् । तत्करणं तु शब्दः ।
वाक्य दो प्रकार के होते हैं—वैदिक-वाक्य और लौकिक-वाक्य । वैदिक-वाक्य
ईश्वरोक्त होने के कारण सभी प्रमाण है । किन्तु लौकिक-वाक्य आप्तजनद्वारा कहा
हुआ ही प्रमाण है, शेष ( अनाप्तजनद्वारा कथित ) वाक्य अप्रमाण है ।
वाक्य के अर्थ का बोध शाब्दज्ञान या शाब्दबोध कहाता है । और शाब्दज्ञान
का करण ( असाधारण कारण ) शब्द प्रमाण है ।
॥ इति शब्दपरिच्छेदः ॥
न्यायबोधिनी
ब्दबोधः । सन्निधिं निरूपयति—पदानामिति । असहोच्चारितानि = विल-
म्बोच्चारितानि ।
वैदिकमिति । वेदवाक्यमित्यर्थः । इदमुपलक्षणम् । वेदमूलस्मृत्यादी-
न्यपि ग्राह्याणि । लौकिकं त्विति । वेदवाक्यभिन्नमित्यर्थः । ( आप्तत्वं
च प्रयोगहेतुभूतयथार्थज्ञानवत्त्वम् ) ।
॥ इति न्यायबोधिन्यां शब्दपरिच्छेदः ॥
हिन्दी-कला
सिञ्चति' यहां पर सेक-करणत्व का अग्नि में बाधनिश्चय है, क्योंकि वह जल का धर्म
है, इसलिये उक्तवाक्य से शाब्दबोध नहीं हो सकेगा ।
प्रमाणभूत आप्तवाक्य दो प्रकार का है—वैदिक और लौकिक । वैदिकवाक्य
का अर्थ है—वेदवाक्य । किन्तु 'वैदिक' यह कहना उपलक्षण मात्र है, इससे वेद-
मूलक स्मृति-पुराणादिवाक्य भी प्रमाण के अन्तर्गत हैं । वेदवाक्य तो ईश्वरोक्त
होने के कारण सब प्रमाण हैं । किन्तु लौकिक वाक्य वे ही प्रमाण हैं, जो आप्तजन
द्वारा उक्त हैं । आप्त वह है, जो शब्दप्रयोग के लिए अपेक्षित यथार्थज्ञान वाला हो ।
इति तर्कसंग्रहन्यायबोधिन्याः 'हिन्दी-कलायाम्' शब्दपरिच्छेदः ।
••••०••••

अथावशिष्टपरिच्छेदः
अयथार्थानुभवस्त्रिविधः—संशय-विपर्यय-तर्कभेदात् ।
एकस्मिन्धर्मिणि विरुद्धनानाधर्मवैशिष्ट्यावगाहिज्ञानं संशयः ।
यथा—स्थाणुर्वा पुरुषो वेति ।
मिथ्याज्ञानं विपर्ययः । यथा—शुक्तौ 'रजतम्' इति ।
अयथार्थानुभव तीन प्रकार का होता है—संशय-विपर्यय और तर्क के भेद से ।
एक धर्मी में विरुद्ध नानाधर्म के वैशिष्ट्य (सम्बन्ध) का अवगाहन करने
वाला ज्ञान संशय है । जैसे—"यह स्थाणु है या पुरुष है" इस प्रकार का अनिश्च-
यात्मक ज्ञान संशय कहाता है ।
मिथ्याज्ञान को विपर्यय कहते हैं । जैसे—शुक्ति में हुआ रजत का ज्ञान मिथ्या-
ज्ञान (भ्रमज्ञान) होने से विपर्यय है ।
न्यायबोधिनी
यथार्थानुभवं निरूप्यायथार्थानुभवं विभजते—संशयेत्यादिना ।
एकेति । एकधर्मावच्छिन्नविशेष्यतानिरूपितभावाभावप्रकारकज्ञानं
संशय इत्यर्थः । भावद्वयकोटिकसंशयाप्रसिद्धेः (पुरुषो वा) स्थाणुर्वेत्यत्र
स्थाणुत्वस्थाणुत्वाभावपुरुषत्वपुरुषत्वाभावकोटिक एव संशय इत्यर्थः ।
मिथ्याज्ञानमिति । अयथार्थज्ञानमित्यर्थः । विपर्ययो नाम भ्रमः ।
हिन्दी-कला
अब तक यथार्थानुभव का निरूपण हुआ । बुद्धि के दूसरे भेद अयथार्थानुभव का
विभाग मूलकार करते हैं—अयथार्थानुभव तीन प्रकार का होता है—संशय-विपर्यय
और तर्क के भेद से । मूलोक्त संशयलक्षण का परिष्कृत स्वरूप यों है—एकधर्मा-
वच्छिन्ना जो विशेष्यता, उससे निरूपिता जो भावाभावनिष्ठा प्रकारता, तादृश-
प्रकारताशाली जो ज्ञान, वह संशय है । जैसे, तमो द्रव्यं न वा' इस संशय में एक तम
विशेष्य है, तथा द्रव्यत्व और द्रव्यत्वाभाव ये दो प्रकार हैं । इसलिये एक ही विशेष्य
में भावाभावरूप दो विशेषणों का ज्ञान होने से यह संशय है ।
इस प्रकार संशय में एक कोटि भाव की होती है और दूसरी कोटि अभाव की ।
अतः भावद्वयकोटिक संशय के अप्रसिद्ध होने से "स्थाणुर्वा पुरुषो वा" इस स्थल में
स्थाणुत्व और पुरुषत्वकोटिक संशय न होकर स्थाणुत्व-स्थाणुत्वाभाव एवं पुरुषत्व-
पुरुषत्वाभावरूप भावाभावकोटिक ही संशय होता है, ऐसा अभिप्राय है ।
विपर्यय का अर्थ है—मिथ्याज्ञान अर्थात् भ्रम ।

६८ तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः
व्याप्यारोपेण व्यापकारोपस्तर्कः । यथा—यदि वह्निर्न स्यात्तर्हि
धूमोऽपि न स्यादिति ।
स्मृतिरपि द्विविधा—यथार्था अयथार्था च । प्रमाजन्या
यथार्था, अप्रमाजन्या अयथार्था ।
सर्वेषामनुकूलवेदनीयं सुखम् ।
प्रतिकूलवेदनीयं दुःखम् ।
व्याप्य के आरोप से व्यापक का आरोप तर्क है । जैसे—"पर्वत में यदि वह्नि न
हो तो धूम भी न हो" इस प्रकार का आरोप करना तर्क है । यहाँ वह्न्यभाव व्याप्य
है और धूमाभाव व्यापक है ।
स्मृति भी दो प्रकार की होती है—यथार्थ स्मृति और अयथार्थ स्मृति । प्रमात्मक
ज्ञान से हुई स्मृति यथार्थ स्मृति है और अप्रमात्मक ज्ञान ( भ्रमात्मक ज्ञान ) से हुई
स्मृति अयथार्थ स्मृति है ।
सभी के लिये अनुकूल प्रतीत होने वाला सुख है, और प्रतिकूल प्रतीत होने वाला
दुःख है ।
न्यायबोधिनी
व्याप्यारोपेणेति । तर्के व्याप्यस्य व्यापकस्य च बाधनिश्चयः कारणम्,
अन्यथा बाधनिश्चयाभाव इष्टापत्तिदोषेण तर्कानुत्पत्तेः ।
सुखं निरूपयति—सर्वेषामिति । इतरेच्छानधीनेच्छाविषयत्वमिति
निष्कर्षः । यथाश्रुते घटोऽनुकूल इत्याकारकज्ञानदशायामनुकूलत्वप्रकारक-
हिन्दी-कला
व्याप्य के आरोप से व्यापक का आरोप तर्क है । जैसे—पर्वत में यदि वह्नि का
अभाव हो तो धूम का भी अभाव होना चाहिये । यहाँ वह्न्यभाव व्याप्य है । इसलिये
उसका आरोप होने पर व्यापकीभूत धूमाभाव का भी आरोप होगा । तर्क में वादी
प्रतिवादी दोनों को व्याप्य और व्यापक का बाधनिश्चय होना चाहिये, तभी
तर्कप्रयोग हो सकता है । इसलिए तर्क में उक्त बाधनिश्चय कारण है ( यदि बाध-
निश्चय न हो तो इष्टापत्तिदोष के कारण तर्क उत्पन्न ही न हो सकेगा ।
सुख का निष्कृष्ट लक्षण है—इतरेच्छानधीनेच्छाविषयत्व । अर्थात् जो स्वतः
एव इच्छा का विषय हो, अन्य इच्छा के अधीन इच्छा विषय न हो, वह सुख है । यहाँ
यदि मूलोक्त यथाश्रुत लक्षण रहने दिया जाय तो "घटोऽनुकूलः" इस प्रकार के
अनुकूलत्वप्रकारक ज्ञान की विशेष्यता के घट में भी होने से घट में भी सुख-लक्षण
की अतिव्याप्ति हो जायगी । इसलिये 'अनुकूलत्व' सुख का लक्षण नहीं है । परिष्कृत

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ६१
इच्छा कामः । क्रोधो द्वेषः । कृतिः प्रयत्नः ।
कामना को इच्छा कहते हैं । किसी के प्रति क्रोध को द्वेष कहते हैं । कृति को
प्रयत्न कहते हैं ।
न्यायबोधिनी
ज्ञानविशेष्यत्वस्य घटादावपि सत्त्वाद् घटादावतिव्याप्तिरिति । सुखेच्छाधीने
भोजनादावतिव्याप्तिवारणाय इतरेच्छानधीनेतीच्छाविशेषणम् । सुखेच्छा
तु सुखत्वप्रकारकज्ञानमात्रजन्यैव ।
दुःखं निरूपयति—प्रतिकूलेति । अत्रापीतरद्वेषानधीनद्वेषविषयत्वमिति
निष्कृष्टलक्षणम् । द्वेषविषयत्वमात्रोक्तौ सर्पादावतिव्याप्तिस्तत्रापि द्वेष-
विषयत्वसत्त्वादतस्तत्रातिव्याप्तिवारणायेतरद्वेषानधीनेति द्वेषविशेषणम् ।
सर्पजन्यदुःखादौ द्वेषात्सर्पेऽपि द्वेष इति सर्पद्वेषस्य सर्पजन्यदुःखद्वेषजन्यत्वा-
दन्यद्वेषाजन्यद्वेषविषयत्वरूपदुःखलक्षणस्य सर्पादौ नातिव्याप्तिः । फलेच्छा
हिन्दी-कला
लक्षण में भी यदि केवल इच्छाविषयत्व ही कहा जाय तो सुखेच्छाधीन-भोजनादि में
भी सुखलक्षण की अतिव्याप्ति होने लगेगी । अतः 'इतरेच्छानधीन' यह द्वितीय इच्छा
का विशेषण कहा । सुखेच्छा तो केवल सुखत्वप्रकारक ज्ञान से ही उत्पन्न होती है,
न कि वह दूसरी इच्छा के अधीन होती है । अतएव सुख स्वतः काम्य होता है और
इतर पदार्थ की कामना सुखेच्छा के अधीन होती है ।
'प्रतिकूलवेदनीयत्व' दुःख का लक्षण मूल में कहा गया है । किन्तु यहाँ भी "इतर
द्वेषानधीनद्वेषविषयत्व" ही दुःख का निष्कृष्ट लक्षण है । इस लक्षण में भी यदि
केवल 'द्वेषविषयत्व' दुःख का लक्षण कहा जाय तो सर्प आदि में भी दुःखलक्षण की
अतिव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि सर्प में भी द्वेषविषयता है । अतः इस अतिव्याप्ति
के निवारणार्थ 'इतरद्वेषानधीन' यह द्वेष का विशेषण कहा गया । सर्प से होने वाले
दुःख के प्रति द्वेष के कारण ही सर्प में भी द्वेष होता है । इसलिये सर्पजन्य दुःख के
प्रति द्वेष के अधीन ही सर्प के प्रति द्वेष होने से इतरद्वेषानधीनद्वेषविषयत्वरूप
दुःखलक्षण की सर्पादि में अतिव्याप्ति न होगी ।
सुख और दुःख के उक्त निष्कृष्टलक्षण बनाने का रहस्य यह है कि फलेच्छा
उपायेच्छा का कारण होती है, इसी लिये फलेच्छा के अधीन उपायेच्छा होती है ।
इसी प्रकार फल के प्रति द्वेष होने से उपाय के प्रति द्वेष उत्पन्न होता है, इसलिये
फलद्वेष के अधीन उपायद्वेष होता है । फल दो हैं—अनुकूल फल सुख तथा प्रति-
कूल फल दुःख ।

७० तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः
विहितकर्मजन्यो धर्मः । निषिद्धकर्मजन्यस्त्वधर्मः ।
बुद्ध्यादयोऽष्टावात्ममात्रविशेषगुणाः । बुद्धीच्छाप्रयत्ना नित्या
अनित्याश्च । नित्या ईश्वरस्य, अनित्या जीवस्य ।
संस्कारस्त्रिविधः—वेगो भावना स्थितिस्यापकश्चेति ।
वेगः पृथिव्यादिचतुष्टयमनोवृत्तिः ।
अनुभवजन्या स्मृतिहेतुर्भावना, आत्मामात्रवृत्तिः ।
अन्यथाकृतस्य पुनस्तदवस्थापादकः स्थितिस्थापकः,
कटादिपृथिवीवृत्तिः । इति गुणाः ।
वेदविहित कर्म के अनुष्ठान से उत्पन्न होने वाला धर्म है, और वेद द्वारा निषिद्ध
कर्म के अनुष्ठान से उत्पन्न होने वाला अधर्म कहाता है ।
बुद्धि आदि आठ (बुद्धि-सुख-दुःख-इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-धर्म और अधर्म) आत्मा-
मात्र के विशेषगुण हैं। इनमें बुद्धि, इच्छा और प्रयत्न, ये तीन गुण नित्य भी हैं,
अनित्य भी हैं। ईश्वर के ये तीनों गुण नित्य हैं और जीव के अनित्य हैं ।
संस्कार तीन प्रकार का होता है—वेग भावना और स्थितिस्थापक । वेग-
नामक संस्कार पृथिवी-जल-तेज-वायु और मनमें रहता है । अनुभव से जो उत्पन्न हो
और स्मृति का हेतु हो, उसे भावना कहते हैं । वह केवल आत्मा में रहती है । अन्य
स्थिति में बना दी गई वस्तु को पुनः उसकी पहली अवस्था में ला देनेवाले संस्कार को
स्थितिस्थापकनामक संस्कार कहते हैं । वह चटाई आदि पृथिवी-द्रव्य में रहता है ।
न्यायबोधिनी
उपायेच्छां प्रति कारणम्, अतः फलेच्छावशादुपायेच्छा भवति । एवं फले
द्वेषादुपाये द्वेषः ।
धर्माधर्मौ निरूपयति—विहितेति । वेदविहितेत्यर्थः । निषिद्धेति । वेद-
निषिद्धेत्यर्थः ।
बुद्ध्यादयोऽष्टाविति । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मा इत्यर्थः ।
संस्कारं विभजते संस्कार इति । भावनां लक्षयति—अनुभवेति ।
अनुभवजन्यत्वे सति स्मृतिहेतुत्वं भावनालक्षणम् । अत्रानुभवजन्यत्वे सतीति
हिन्दी-कला
वेद में विहित कर्म से उत्पन्न धर्म है और वेद में निषिद्ध कर्म से उत्पन्न अधर्म है ।
बुद्धि से लेकर अधर्म तक अर्थात् बुद्धि-सुख-दुःख-इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-धर्म और अधर्म
ये आठ विशेषगुण आत्मा मात्र के हैं ।
संस्कार के तीन भेद हैं—वेग-भावना और स्थितिस्थापक । अनुभव से जो जन्य
हो और स्मृति का हेतु हो, वह भावना है । इस लक्षण में यदि "अनुभव-जन्यत्वे

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ७१
न्यायबोधिनी
विशेषणानुपादाने आत्ममनःसंयोगेऽतिव्याप्तिरात्ममनःसंयोगस्य ज्ञानमात्रं
प्रत्यसमवायिकारणत्वेन स्मृतिं प्रत्यपि कारणत्वादतस्तदुपादानम्। आत्ममनः-
संयोगस्यानुभवजन्यत्वाभावान्नातिव्याप्तिः। तावन्मात्रे कृतेऽनुभवध्वंसेऽति-
व्याप्तिः, ध्वंसं प्रति प्रतियोगिनः कारणत्वेनानुभवध्वंसस्याप्यनुभवजन्य-
त्वात्, अतः स्मृतिहेतुत्वोपादानम्। अनुभवध्वंसे स्मृतिहेतुत्वाभावान्नाति-
व्याप्तिः।
ननु विशिष्टबुद्धिं प्रति विशेषणज्ञानस्य कारणता सकलतान्त्रिकमत-
सिद्धा, यथा दण्डविशिष्टबुद्धिं प्रति दण्डज्ञानं कारणम्। दण्डविशिष्टबुद्धि-
र्नाम दण्डप्रकारकबुद्धिः। तथाच दण्डप्रकारकबुद्धित्वावच्छिन्नं प्रति दण्डज्ञा-
नत्वेन कारणत्वमित्यापतितम्। दण्डप्रकारकबुद्धिः दण्डी पुरुष इत्याकारक-
बुद्धिस्तत्र दण्डज्ञानं कारणम्। न हि दण्डमजानानः पुमान् 'दण्डी पुरुषः' इति
प्रत्येति। एवं च यत्रायं दण्ड इति प्रत्यक्षं जातं, तदनन्तरं दण्डी पुरुष इत्या-
कारकप्रत्यक्षमुत्पन्नं, तत्र दण्डी पुरुष इत्याकारकप्रत्यक्षेऽतिव्याप्तिः। तद्धि
हिन्दी-कला
सति" ऐसा विशेषण न दिया जाय तो आत्मा-मन के संयोग में भावनालक्षण की
अतिव्याप्ति हो जायगी। क्योंकि आत्मा-मन का संयोग ज्ञानमात्र के प्रति असमवायि-
कारण होने से स्मृति के प्रति भी हेतु होगा। अतः उक्त विशेषण के उपादान
करने से उक्त अतिव्याप्ति नही हुई, क्योंकि आत्मा मन के संयोग में अनुभवजन्यत्व
नहीं है। एवं यदि अनुभवजन्यत्वमात्र भावना का लक्षण किया जाय तो अनुभव-
ध्वंस में भावनालक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। क्योंकि ध्वंस के प्रति प्रतियोगी
कारण होता है, इसलिये अनुभवध्वंस भी अनुभवरूप अपने प्रतियोगी से जन्य है।
अतः भावना के लक्षण में स्मृतिहेतुत्व का भी उपादान किया। अनुभवध्वंस में स्मृति-
हेतुत्व नहीं होने से उक्त अतिव्याप्ति नहीं होगी।
शङ्का--विशिष्टबुद्धि के प्रति विशेषणज्ञान कारण होता है, यह सर्वमतसिद्ध
है। जैसे, दण्डविशिष्ट बुद्धि (दण्डी-बुद्धि) के प्रति दण्डज्ञान कारण होता है।
दण्डविशिष्ट बुद्धि का मानी है-दण्डप्रकारक बुद्धि। अतः दण्डप्रकारकबुद्धित्वा-
वच्छिन्न के प्रति दण्डज्ञानत्वेन रूपेण कारणता प्राप्त हुई। दण्डप्रकारक बुद्धि "दण्डी
पुरुषः" इत्याकारक बुद्धि है, उसके प्रति दण्डज्ञान कारण है। क्योंकि दण्ड को नहीं
जानने वाला पुरुष "दण्डी पुरुषः" ऐसी प्रतीति नहीं करता है।
अतः जहां "अयं दण्डः" ऐसा प्रत्यक्ष हुआ और उसके बाद 'दण्डी पुरुषः' इत्या-
कारक प्रत्यक्षज्ञान उत्पन्न हुआ, वहां उस 'दण्डी पुरुषः' इत्याकारक प्रत्यक्ष में

७२ तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः
न्यायबोधिनी
स्वाव्यहितपूर्वक्षणोत्पन्नदण्डज्ञानात्मकानुभवजन्यं जनिष्यमाणे दण्डी पुरुष
इत्याकारकस्मरणे कारणं च, स्मृतिं प्रत्यनुभवस्य कारणत्वात् । तथा चानु-
भवजन्यत्वे सति स्मृतिहेतुत्वरूपभावनालक्षणस्य यथोक्त 'दण्डी पुरुष' इत्या-
कारकानुभवे विद्यमानत्वादतिव्याप्तिरिति चेत्—
अत्र ब्रूमः—अनुभवजन्यत्वं हि अनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपितकार्य-
ताश्रयत्वम् । तत्र कारणतायामनुभवत्वावच्छिन्नत्वं निवेश्यते । तथा चानु-
भवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्वमिति फलितम्, अतो नोक्ताति-
व्याप्तिः । तथा हि - दण्डप्रकारकबुद्धित्वावच्छिन्नकार्यता निरूपितदण्डज्ञान-
निष्ठा या कारणता, तस्या न दण्डानुभवत्वमवच्छेदकं, दण्डानुभवादिव दण्ड-
स्मरणादपि दण्डप्रकारकबुद्धेरुत्पत्तेः । अतो दण्डप्रकारकबुद्धित्वावच्छिन्नं
प्रति अनुभवस्मरणसाधारणदण्डज्ञानत्वेनैव दण्डज्ञानस्य कारणतायाः स्वीक-
रणीयत्वेन दण्डज्ञानत्वस्यैव तदवच्छेदकत्वात् । तथा चानुभवत्वावच्छिन्न-
कारणतानिरूपितकार्यत्वस्योक्तप्रत्यक्षेऽभावान्नातिव्याप्तिः ।
हिन्दी-कला
पूर्वोक्त भावनालक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि 'दण्डी पुरुषः' यह प्रत्यक्ष-
ज्ञान अपने अव्यवहित पूर्वक्षण में उत्पन्न दण्डज्ञानरूप अनुभव से जन्य है, तथा भावी
'दण्डी पुरुषः' इत्याकारक स्मृति के प्रति हेतु भी है, क्योंकि स्मृति के प्रति अनुभव
कारण होता है । इस प्रकार "अनुभवजन्यत्वे सति स्मृतिहेतुत्व" रूप भावनालक्षण के
'दण्डी पुरुषः' इत्याकारक अनुभव में वर्तमान होने से यहाँ भावनालक्षण की अति-
व्याप्ति हो गयी ।
समाधान — लक्षण में उक्त अनुभवजन्यत्व का अर्थ है— अनुभवत्वावच्छिन्न जो
कारणता, उससे निरूपितकार्यता का आश्रयत्व । यहाँ कारणता में अनुभवत्वा-
वच्छिन्नत्व का निवेश किया गया है। इसीलिये पूर्वोक्त अतिव्याप्ति नहीं होगी ।
क्योंकि दण्डप्रकारक ( 'दण्डी पुरुषः' इत्याकारक ) बुद्धित्वावच्छिन्नकार्यता निरूपिता जो
दण्डज्ञाननिष्ठा कारणता है, उसमें दण्डानुभवत्व अवच्छेदक नहीं है । अर्थात् उक्त
कारणता दण्डानुभवत्वावच्छिन्ना नहीं है । क्योंकि जैसे दण्डानुभव से दण्डप्रकारक
बुद्धि उत्पन्न होती है, वैसे ही दण्डस्मरण से भी वह होती है । इसलिये दण्डप्रकारक-
बुद्धित्वावच्छिन्न के ( 'दण्डी पुरुषः' इस बुद्धि के ) प्रति अनुभव-स्मरणसाधारण दण्ड-
ज्ञानस्वरूप से ही दण्डज्ञान की कारणता स्वीकार्य होने से दण्डज्ञानत्व ही कारणता
का अवच्छेदक होगा, न कि दण्डानुभवत्व । अतः "अनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपित-
कार्यताश्रयत्व" लक्षण की अतिव्याप्ति 'दण्डी पुरुष' इस प्रत्यक्ष में नहीं होगी ।

न्यायबोधिनी-कलासंबलितः ७३
चलनात्मकं कर्म । ऊर्ध्वदेशसंयोगहेतुरुत्क्षेपणम् । अधोदेश-
संयोगहेतुरपक्षेपणम् । शरीरस्य सन्निकृष्टसंयोगहेतुराकुञ्चनम् ।
विप्रकृष्टसंयोगहेतुः प्रसारणम् । अन्यत्सर्वं गमनम् ।
चलनात्त्मक क्रिया को कर्म कहते हैं । कर्म के पाँच भेद हैं । उनमें ऊपर देश में
संयोग का हेतु कर्म उत्क्षेपण है । नीचे के देश में संयोग का हेतु कर्म अपक्षेपण है ।
शरीर के निकट-देश में संयोग का हेतु कर्म आकुञ्चन है । शरीर के दूरवर्ती देश में
संयोग का हेतु कर्म प्रसारण है । तथा इन चारों से भिन्न सभी प्रकार का कर्म गमन
कहाता है ।
न्यायबोधिनी
भावनायां तु लक्षणमिदं वर्तते । तथाहि—अनुभवेनैव भावनाख्य-
संस्कारोत्पत्त्या भावनात्वावच्छिन्नं प्रत्यनुभवस्यानुभवत्वेनैव कारणतया
भावनात्वावच्छिन्नकार्यतानिरूपितानुभवनिष्ठकारणतायामनुभवत्वमवच्छेद-
कम् । अतोऽनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्वं भावनायां
वर्तते इति नासम्भवः ।
नन्वेवं स्मृतिहेतुत्वविशेषणवैयर्थ्यम् । तद्ध्यनुभवध्वंसेऽतिव्याप्तिवारणाय
प्रागुपात्तम् न हि यथोक्तानुभवजन्यत्वविवक्षायामनुभवध्वंसेऽतिव्याप्तिः
प्रसज्यते । तथाहि—ध्वंसत्वावच्छिन्नं प्रति प्रतियोगिनः कारणत्वं प्रतियोगि-
त्वेन रूपेण, तत्तद्ध्वंसत्वावच्छिन्नं प्रति च तत्तत्प्रतियोगिव्यक्तेस्तत्तद्व्य-
क्तित्वेनेत्येव ध्वंसप्रतियोगिनोः कार्यकारणभावः । तथा च ध्वंसनिष्ठकार्य-
हिन्दी-कला
भावना में तो उक्त परिष्कृत लक्षण संगत ही है। क्योंकि अनुभव से ही भावनाख्य
संकार की उत्पत्ति होने से भावनात्वावच्छिन्न कार्य के प्रति केवल अनुभवत्वेन रूपेण
अनुभव कारण होता है । इसलिये भावनात्वावच्छिन्ना जो भावनानिष्ठा कार्यता,
उस कार्यता से निरूपिता जो अनुभवनिष्ठा कारणता, उसमें अनुभवत्व अवच्छेदक
होगा । अतः “अनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्व” लक्षण भावना में
वर्तमान है । इसलिये उक्त लक्षण में असंभवदोष नहीं होगा ।
शङ्का—उक्त प्रकार से लक्षण का परिष्कार करने पर लक्षण में ‘स्मृतिहेतुत्व’
विशेषण देना व्यर्थ है । यह विशेषण अनुभवध्वंस में भावनालक्षण की अतिव्याप्ति का
वारण करने के लिए पहले दिया गया था । किन्तु अनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपित-
कार्यताश्रयत्वरूप अनुभवजन्यत्व स्वीकार करने पर अनुभवध्वंस में लक्षण की
अतिव्याप्ति प्रसक्त ही नहीं है । क्योंकि ध्वंसत्वावच्छिन्न के प्रति प्रतियोगित्वरूप से

७४ तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः
न्यायबोधिनी
तानिरूपिता याऽनुभवनिष्ठा कारणता, तस्यां प्रतियोगित्वमवच्छेदकं तत्त-
द्व्यक्तित्वं च, न त्वनुभवत्वमपीत्यनुभवध्वंसेऽनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानि-
रूपितकार्यताश्रयत्वरूपानुभवजन्यत्वविरहेणैवातिव्याप्तिवारणसम्भवात् कृतं
स्मृतिहेतुत्वविशेषणेनेति चेत्—
न, स्मृतावतिव्याप्तिवारणायैव तदुपादानात् । तथाहि-स्मृतिं प्रत्यनुभव
एव कारणं न तु स्मृतिरप्यतो घटस्मृतित्वावच्छिन्नं प्रति घटानुभवत्वेनैव
कारणत्वं न तु घटज्ञानत्वेन । तथा च घटस्मृतिनिष्ठकार्यतानिरूपिता या
घटानुभवनिष्ठा कारणता, तस्यां घटानुभवत्वमवच्छेदकम् । तेनानुभवत्वाव-
च्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्वस्य स्मृतौ विद्यमानत्वादतिव्याप्तिवार-
णाय स्मृतिहेतुत्वमुक्तम् । न हि स्मृतिः स्मृतिहेतुः, अतो न तत्रातिव्याप्ति-
रित्यलं पल्लवतल्लजकल्पानल्पजल्पनेन ।
हिन्दी-कला
ही प्रतियोगी कारण होता है। तथा तत्तद्ध्वंसत्वावच्छिन्न के प्रति तत्तद्-
व्यक्तित्वरूप से ही तत्तत्प्रतियोगिव्यक्ति कारण होता है। ऐसा ही कार्यकारण-
भाव ध्वंस और प्रतियोगी में माना गया है। प्रकृत में अनुभवध्वंसनिष्ठकार्यतानिरू-
पिता जो अनुभवनिष्ठां कारणता है, उसमें प्रतियोगित्व या तत्तद्व्यक्तित्व अवच्छेदक
होगा, न कि अनुभवत्व अवच्छेदक होगा । इस प्रकार अनुभवध्वंस में अनुभवत्वाव-
च्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्वरूप परिष्कृत अनुभवजन्यत्व नहीं रहने से
अनुभवध्वंस में अतिव्याप्ति का वारण सुतरां हो जाता है। इसलिये 'स्मृतिहेतुत्व'
विशेषण देना व्यर्थ है।
समाधान--स्मृति में भावनालक्षण की अतिव्याप्ति का वारण करने के लिये ही
'स्मृतिहेतुत्व' विशेषण का उपादान है। क्योंकि स्मृति के प्रति अनुभव ही कारण
होता है, न कि स्मृति भी । अतः घटस्मृतित्वावच्छिन्न ( घटस्मृति ) के प्रति घटानुभव
घटानुभवत्वरूप से ही कारण होता है, घटज्ञानत्वरूप से नहीं। इसलिये घटस्मृति-
निष्ठकार्यतानिरूपिता जो घटानुभवनिष्ठ कारणता है, उसमें घटानुभवत्व ही
अवच्छेदक होगा। इस प्रकार अनुभवत्वावच्छिन्नकारणतानिरूपितकार्यताश्रयत्व के
स्मृति में भी विद्यमान होने से उसमे प्रसक्त जो भावनालक्षण की अतिव्याप्ति, उसके
वारणार्थ स्मृतिहेतुत्व-विशेषण लक्षण में कहा गया। स्मृति तो अनुभवजन्य होती
हुई भी स्मृति का हेतु नहीं है, अतः उसमें परिष्कृत भावनालक्षण की अति-
व्याप्ति नहीं हुई। इसे अधिक पल्लवित करना अनावश्यक है।

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ७५
नित्यमेकमनेकानुगतं सामान्यम्। द्रव्यगुणकर्मवृत्ति। परं
सत्ता, अपरं द्रव्यत्वादि।
जो नित्य हो, एक हो और अनेक में समवायसम्बन्ध से रहे, वह सामान्य है।
वह द्रव्य, गुण और कर्म में रहता है। सामान्य दो प्रकार का होता है—परसामान्य
और अपरसामान्य। सत्ता परसामान्य (परजाति) है तथा द्रव्यत्व आदि अपर-
सामान्य (अपरजाति) है।
न्यायबोधिनी
सामान्यं निरूपयति—नित्यमेकमिति। नित्यत्वे सत्यनेकसमवेतत्वं सामा-
न्यलक्षणम्। नित्यत्वविशेषणानुपादानेऽनेकसमवेतत्वस्य संयोगादौ सत्त्वा-
तत्रातिव्याप्तिस्तद्वारणाय नित्यत्वविशेषणम्। अनेकसमवेतत्वानुपादाने
नित्यत्वमात्रोपादाने आकाशादावतिव्याप्तिस्तद्वारणायनेकसमवेतत्वम्।
अनेकसमवेतत्वानुपादाने नित्यत्वविशिष्टसमवेतत्वमात्रोक्तावाकाशगतैकत्व-
परिमाणादौ जलपरमाणुगतरूपादौ चातिव्याप्तिः, जलपरमाणुगतरूपादेरा-
काशगतैकत्वपरिमाणादेर्नित्यत्वात् समवेतत्वाच्च, अतः अनेकेति समवेत-
विशेषणम्।
हिन्दी-कला
“नित्यमेकमनेकानुगतं सामान्यम्” यह मूलोक्त सामान्य का स्वरूप है। “नित्यत्वे
सति अनेकसमवेतत्वं सामान्यत्वम्” यह सामान्य का परिष्कृत लक्षण है। इसमें
“नित्यत्वे सति” यह पद न दिया जाय तो अनेकसमवेतत्व (समवायसम्बन्ध से अनेक
में रहना) संयोगादि में भी है, अतः उसमें सामान्यलक्षण की अतिव्याप्ति हो
जायगी। उसके वारण के लिये नित्यत्वविशेषण दिया। संयोग तो द्विष्ठ होने से अनेक-
समवेत है। यदि “अनेकसमवेतत्व” विशेषण न दिया जाय और नित्यत्वमात्र लक्षण
किया जाय तो आकाशादि नित्यपदार्थ में अतिव्याप्ति हो जायगी, उसके वारणार्थ
'अनेकसमवेत' पद दिया। आकाश के नित्य होने पर भी समवेत (समवायसम्बन्ध
से वर्तमान) नहीं होने से अतिव्याप्ति नहीं हुई। 'अनेकसमवेतत्व' के अन्तर्गत
'अनेक' पद न दिया जाय, अर्थात् “नित्यत्वविशिष्टसमवेतत्व” मात्र लक्षण किया
जाय तो आकाशगत एकत्व एवं परिमाण आदि में तथा जलीयपरमाणुगत रूपादि में
भी सामान्यलक्षण की अ तव्याप्ति होने लगेगी। क्योंकि जलीयपरमाणुगतरूप
आदि तथा आकाशगत एकत्व-संख्या एवं परिमाण आदि नित्य होते हुए समवेत
(समवायसम्बन्ध से रहने वाला) पदार्थ है। अतः 'अनेक' यह समवेत का विशेषण
दिया। जलीयपरमाणुगत रूपादि एवं आकाशगत एकत्व-परिमाण आदि एक एक
में समवेत होने से अनेकसमवेत नहीं हैं। अतः अतिव्याप्तिदोष का वारण हो गया।

७६ तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः
नित्यद्रव्यवृत्तयो व्यावर्तका विशेषाः ।
जो नित्य द्रव्य में रहने वाला एवं इतर का व्यावर्तक ( भेदक ) है, वह विशेष-
नामक पदार्थ कहाता है ।
न्यायबोधिनी
नित्यद्रव्यवृत्तय इति । नित्यद्रव्येषु परमाण्वादिषु वर्तमानाः, अत एव
व्यावर्तकाः = इतरभेदानुमितिहेतवः = नित्यद्रव्यवृत्तित्वरूपपक्षधर्मताप्रयो-
ज्येतरभेदानुमापकताशालिन इत्यर्थः । नित्यद्रव्यनिष्ठविशेष्यता निरूपितैक-
मात्रवृत्तिभेदानुमितिजनकतावच्छेदकप्रकारताश्रयत्वं विशेषाणां लक्षणमिति
भावः ।
पार्थिवपरमाणौ जलादिभेदानुमापकगन्धेऽतिव्याप्तिवारणाय एकमात्र-
वृत्तित्वं भेदविशेषणम् । घटादौ तदितरभेदानुमापके तद्रूपादावतिव्याप्ति-
हिन्दी-कला
नित्य द्रव्य में वर्तमान हों और इतर व्यावर्तक हों, वे विशेष हैं। इस मूलोक्त
विशेषलक्षण का स्पष्टार्थ यों है—नित्य द्रव्य जो परमाणु आदि हैं, उनमें वर्तमान
हों, और इसीलिये व्यावर्तक अर्थात् इतरभेदानुमिति के हेतु हैं। तात्पर्य यह है कि
नित्य द्रव्य पक्ष है, उसमें विशेष-हेतु का वर्तमान रहना ही पक्षधर्मता है। इस
प्रकार नित्यद्रव्यवृत्तित्वरूप पक्षधर्मता के बल से विशेषपदार्थ इतरभेदानुमापक
होता है। इस प्रकार विशेष का यह लक्षण हेतुगर्भ है। अर्थात् नित्यद्रव्यवृत्ति
होने के कारण इतरव्यावर्तक ( इतरभेदानुमापक ) विशेष हैं ।
विशेष का परिष्कृत लक्षण यह है—नित्यद्रव्यनिष्ठ जो विशेष्यता, उससे
निरूपिता तथा एकमात्रवृत्तिभेदानुमितिजनकता की अवच्छेदिका जो प्रकारता,
उसका आश्रयत्व विशेष का लक्षण है । इस परिष्कृत लक्षण का स्पष्टीकरण 'संस्कृत-
कला' व्याख्या में द्रष्टव्य है ।
भेद में एकमात्रवृत्तित्वविशेषण देने का यह प्रयोजन है कि नित्यद्रव्य पार्थिव
परमाणु में जलादिभेद का अनुमापक गन्ध होता है, ( जैसे, पार्थिवपरमाणुः जलादि-
भिन्नः गन्धवत्त्वात् ) वहाँ गन्ध में विशेषलक्षण की अतिव्याप्ति न हो । "तद्घटः
तदितरभिन्नः, तदीयरूपात्" यहाँ पर एक द्रव्य तद्घट में इतरभेद का अनुमापक तद्रूप
में विशेषलक्षण की अतिव्याप्ति न हो जाय, इसके लिये लक्षण में "नित्यद्रव्यनिष्ठ-
विशेष्यतानिरूपित" यह प्रकारता का विशेषण कहा । घट के अनित्य द्रव्य होने से
तद्रूपनिष्ठा प्रकारता नित्यद्रव्यनिष्ठविशेष्यतानिरूपिता नहीं है । इसलिये अति-
व्याप्ति नहीं हुई ।
मूलोक्त लक्षण में "नित्यद्रव्यवृत्तयः" यह पद प्रयोजकत्व के अभिप्राय से दिया
गया है, तथा 'व्यावर्तकाः' यह पद प्रयोज्यत्व के अभिप्राय से दिया गया है । अर्थात्

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ७७
नित्यसम्बन्धः समवायः । अयुतसिद्धवृत्तिः । ययोर्द्वयोर्मध्ये
एकमविनश्यदवस्थमपराश्रितमेवावतिष्ठते तावयुतसिद्धौ । यथा
अवयवावयविनौ गुणगुणिनौ क्रियाक्रियावन्तौ जातिव्यक्ती विशेष-
नित्यद्रव्ये चेति ।
नित्यसम्बन्ध को समवाय कहते हैं। यह अयुतसिद्ध पदार्थों में रहता है। जिन
दो पदार्थों के मध्य एक अविनाश की अवस्था में रहता हुआ दूसरे के आश्रित ही
रहता है, वे दोनों अयुतसिद्ध कहे जाते हैं। जैसे—अवयव-अवयवी, गुण-गुणी,
क्रिया-क्रियावान्, जाति-व्यक्ति और विशेष-नित्यद्रव्य ये अयुतसिद्ध हैं। अर्थात्
अवयवी जबतक रहेगा, अवयव के आश्रित ही होकर रहेगा। ऐसे ही गुण, क्रिया,
जाति और विशेष क्रमशः गुणी, क्रियावान्, व्यक्ति और नित्यद्रव्य के आश्रित ही रहते
हैं। इसलिये गुण-गुणी आदि भी अयुतसिद्ध पदार्थ हैं।
न्यायबोधिनी
वारणाय निरूपितान्तं प्रकारताविशेषणम् । एतेन 'व्यावर्तका' इत्यस्य नित्य-
द्रव्यविशेष्यकेतरभेदानुमितिप्रयोजका इत्यर्थकतया लक्षणपरत्वेन साफल्ये-
ऽपि नित्यद्रव्यवृत्तय इति विफलमेव, स्वरूपाख्यानस्यापि कृतत्वादिति
प्रत्युक्तम् ।
समवायं निरूपयति नित्येति । सम्बन्धत्वं विशिष्टप्रतीतिनियामक-
त्वम् । तावन्मात्रोक्तौ संयोगेऽतिव्याप्तिरतो नित्य इति विशेषणम् । ययो-
हिन्दी-कला
विशेषपदार्थ के इतरव्यावर्तक होने में नित्यद्रव्यवृत्तित्वरूप पक्षधर्मता प्रयोजक है।
यही प्रयोज्यप्रयोजकभाव प्रकट करने के लिये "नित्यद्रव्यवृत्तय" यह पद सार्थक
होता है। अन्यथा 'व्यावर्तकाः' इस पद का ही 'नित्यद्रव्यविशेष्यकेतरभेदानुमिति-
प्रयोजकाः' इतना अर्थ होने से लक्षण पर्यवसित हो जाता है, अतः 'नित्यद्रव्यवृत्तयः'
यह पद निष्फल ही हो जाता। यह कहना कि—'नित्यद्रव्यवृत्तयः' यह पद लक्षणपरक
न होने पर भी स्वरूपकथनमात्र के लिये है अर्थात् वस्तुस्थितिमात्र को बताता है,
यही उसकी सार्थकता है—तो यह भी ठीक नहीं है। क्योंकि उक्त प्रयोजन भी
'व्यावर्तकाः' इस पद से ही सिद्ध हो जाता है। अतः प्रयोज्य-प्रयोजकभाव सूचित
करने में ही 'नित्यद्रव्यवृत्तयः' इस पद की सार्थकता जाननी चाहिये।
नित्यसम्बन्धत्व समवाय का लक्षण है। अन्य संयोगादि सम्बन्ध अनित्य होते हैं।
विशिष्टप्रतीति का नियामकत्व सम्बन्ध का लक्षण है। समवाय के लक्षण में यदि
नित्य-पद न दिया जाय, किन्तु सम्बन्धत्वमात्र कहा जाय तो संयोग में समवायलक्षण
की अतिव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि वह भी सम्बन्ध है। नित्य-पद देने से संयोग के
अनित्य होने के कारण अतिव्याप्ति का वारण हो गया।

७८ तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः
अनादिः सान्तः प्रागभावः, उत्पत्तेः पूर्वं कार्यस्य ।
सादिरनन्तः प्रध्वंसः, उत्पत्त्यनन्तरं कार्यस्य ।
त्रैकालिकसंसर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताकोऽत्यन्ताभावः । यथा-
भूतले घटो नास्तीति ।
जो अनादि होता हुआ सान्त ( अन्तवान् ) हो, उसे प्रागभाव कहते हैं । जैसे—
उत्पत्ति के पूर्व कार्य का प्रागभाव रहता है । जो सादि ( आदिमान् ) होता हुआ
अनन्त हो, उसे प्रध्वंस कहते हैं । जैसे— कार्य का अपनी उत्पत्ति के अनन्तर प्रध्वंस
उत्पन्न होता है ।
त्रैकालिकसंसर्ग से अवच्छिन्न है प्रतियोगिता जिस अभाव की, वह अभाव
अत्यन्ताभाव कहाता है । जैसे—"भूतले घटो नास्ति" यह अभाव अत्यन्ताभाव है ।
न्यायबोधिनी
द्वयोर्मध्य इति । यन्निष्ठकालनिरूपिताधेयतासामान्यं यदवच्छिन्नं तदुभया-
न्यतरत्वमयुतसिद्धत्वमित्यर्थः ।
अत्यन्ताभावं निरूपयति--त्रैकालिकेति । ( प्रागभावाप्रतियोगित्वे सति
ध्वंसाप्रतियोगित्वे सत्यन्योन्याभावभिन्नत्वे सति अभावत्वमत्यन्ताभावस्य
लक्षणम् । ध्वंसप्रागभावान्योन्याभावाकाशादीनां वारणाय यथाक्रमं विशेष-
णोपादानम् । वस्तुतस्तु संसर्गाभावत्वं तादात्म्यभिन्नसम्बन्धावच्छिन्नप्रति-
हिन्दी-कला
यद्वृत्तिकालनिरूपित-आधेयतासामान्य जिससे अवच्छिन्न होकर रहे, वे दोनों
परस्पर में अयुतसिद्ध कहे जाते हैं । जैसे घट-घटत्व दोनों अयुतसिद्ध हैं, अर्थात् जुदा
होकर नहीं रहते । घट को छोड़कर घटत्व कहीं अन्यत्र नहीं रहता और घटत्वविहीन
होकर घट भी नहीं रहता । दोनों साथ-साथ काल में रहते हैं । विशेष स्पष्टीकरण
'संस्कृत-कला' में द्रष्टव्य है ।
पूर्वोक्त चतुर्विध अभावों में अत्यन्ताभाव का लक्षण कहते हैं— त्रैकालिकससर्गा-
वच्छिन्नप्रतियोगिताक अभाव अत्यन्ताभाव है । अर्थात् पूर्वकालिकसंसर्गावच्छिन्नप्रतियो-
गिताक प्रागभाव होता है तथा ध्वंसोत्तरकालि ससर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताक प्रध्वंसा-
भाव होता है । किन्तु अत्यन्ताभाव तो त्रैकालिकसंसर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताक होता है ।
न्यायबोधिनीकार अत्यन्ताभाव का परिष्कृत लक्षण कहते हैं—जो प्रागभाव का
अप्रतियोगी होता हुआ ध्वंस का भी अप्रतियोगी हो तथा अन्योन्याभाव से भिन्न अभाव
हो, वह अत्यन्ताभाव है । ध्वंस प्रागभाव का प्रतियोगी होता है तथा प्रागभाव ध्वंस का
प्रतियोगी होता है, इसलिये ये दोनों छूट गये । तृतीय विशेषण से अन्योन्याभाव छूट
गया । और चतुर्थ 'अभावत्व' विशेषण कहने से आकाश का वारण हो गया । इस प्रकार

न्यायबोधिनी-कलासंबलितः ७९
तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकोऽन्योन्याभावः, यथा-
घटः पटो नेति ।
सर्वेषां पदार्थानां यथायथमुक्तेष्वन्तर्भावात्सप्तैव पदार्था इति
सिद्धम् ।
तादात्म्यसम्बन्ध से अवच्छिन्न है प्रतियोगिता जिस अभाव की, वह अभाव
अन्योन्याभाव है। जैसे—"घटः पटो न, पटो घटो न" इत्यादि अभाव अन्योन्या-
भाव है।
न्यायसूत्रोक्त प्रमाण-प्रमेयादि सोलह तथा अन्यों द्वारा स्वीकृत शक्ति-सादृश्य-
स्वत्व आदि सभी पदार्थों का यथायोग्य उक्त द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-विशेष-समवाय
और अभाव में ही अन्तर्भाव हो जाने से पदार्थ के सात ही भेद हैं, यह सिद्ध हुआ।
न्यायबोधिनी
योगिताकाभावत्वम् । ध्वंसप्रागभावयोश्च न संसर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताक-
त्वमिति तेनैव तद्वारणे त्रैकालिकेति स्वरूपाख्यानमेवेति बोध्यम् )
अन्योन्याभावं निरूपयति—तादात्म्येति । अभावत्रयवारणाय विशेष-
णम् । घटाभाववान्नेति प्रतीतिविषयघटादिवारणाय विशेष्यम् ।
ननु सादृश्यादीनामतिरिक्तपदार्थानामनिरूपणेन न्यूनतेत्यत आह —
हिन्दी-कला
लक्षणोक्त सभी पदों का उपादान सार्थक है। वस्तुतः मूलोक्त संसर्गाभावत्व का अभिप्राय
है—तादात्म्य से भिन्नसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावत्व । और यही अत्यन्ताभाव
का मूलानुसारी लक्षण है। ध्वंस और प्रागभाव तो ससर्गविच्छिन्नप्रतियोगिताक नहीं
होते हैं अर्थात् इनकी प्रतियोगिता संसर्गविच्छिन्ना नहीं होती है, इसी से उनका वारण
हो जायगा। अतः मूलोक्त लक्षण में जो त्रैकालिक-पद दिया है, वह केवल स्वरूप-
कथन के लिये है, न कि ध्वंस ओर प्रागभाव में अतिव्याप्तिवारण करने के लिये है।
अतः लक्षण में त्रैकालिकत्व का सन्निवेश नहीं है । "भूतले घटो नास्ति" यह अत्यन्ता-
भाव का उदाहरण है।
तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक अभाव अन्योन्याभाव है। इसमें तादात्म्य-
सम्बन्धावच्छिन्नत्वविशेषण देने से शेष तीनों अभावों का वारण हो गया। यदि
तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकत्व न कह कर तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रति-
गितावगाहिज्ञानविषयत्व लक्षण किया जाय तो "घटाभाववान्न" इस ज्ञान के विषय
घटादि में भी अन्योन्याभावलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। अतः "प्रति-
योगिताक" यह विशेष्य पद दिया। यहाँ प्रतियोगितानिरूपक घट नहीं हो सकता।
शङ्का—मीमांसकोक्त सादृश्य-शक्ति आदि तथा न्यायसूत्रोक्त प्रमाण आदि अतिरिक्त
पदार्थों का यहाँ निरूपण नही करने से ग्रन्थकार की न्यूनता क्यों न सिद्ध हुई ?

८० तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः
काणादन्यायमतयोर्बालव्युत्पत्तिसिद्धये ।
अन्नम्भट्टेन विदुषा रचितस्तर्कसंग्रहः ॥
कणादमुनिद्वारा प्रतिपादित वैशेषिक एवं गौतममुनिद्वारा प्रतिपादित न्यायमतों में
बालकों की व्युत्पत्ति ( बोध ) सिद्धि के लिए विद्वान् अन्नम्भट्ट ने इस तर्कसंग्रहनामक
ग्रन्थ की रचना की ।
॥ इति श्रीमन्महामहोपाध्यायान्नम्भट्टविरचितस्तर्कसंग्रहः समाप्तः ॥
न्यायबोधिनी
सर्वेषामिति । प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्तावयव-तर्क-
निर्णय-वादजल्प-वितण्डा-हेत्वाभास-च्छल-जाति-निग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञा-
नान्निःश्रेयसाधिगम' इति न्यायस्यादिमसूत्र उक्तानां प्रमाणप्रमेयादीना-
मित्यर्थः ।
तद्भिन्नत्वविशिष्टतद्गतभूयोधर्मरूपसादृश्यस्यापि घटपटादिरूपत्वेन
नातिरिक्तत्वम् । एवमन्येषामप्यूह्यम् ।
काणादेति । कणादस्येदं काणादम् । काणादन्यायमते इति द्वन्द्वगर्भकर्म-
धारयः । कणादप्रोक्तगौतमप्रोक्तमतयोरिति यावत् । काणादन्यायाभिन्नम-
तद्वयविषय ( क ) बालसमवेताभिन्नव्युत्पत्तिसिद्धिप्रयोजकान्नंभट्टविद्वन्निष्ठभूत-
कालीनकृतिविषयाभिन्नस्तर्कसंग्रहाख्यग्रन्थ इत्यन्वयबोधः ।
हिन्दी-कला
समाधान— न्यायसूत्रोक्त प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनादि का यथायोग्य इन्हीं सात
पदार्थों में अन्तर्भाव होने से न्यूनता नहीं है । इसी प्रकार "तद्भिन्नत्वे सति तद्गत-
भूयोधर्मवत्त्वरूप सादृश्य भी घट-पटादि द्रव्यरूप होगा तथा कहीं गवादिरूप होगा,
अतः यह सप्तातिरिक्त नहीं है ।
विशेष स्पष्टीकरण 'संस्कृत-कला' व्याख्या में द्रष्टव्य है ।
ग्रन्थ के अन्त में उल्लिखित "काणादन्यायमतयोः" इस श्लोक में काणादपद
कणादप्रोक्तपरक है, तथा न्यायपद गौतमप्रोक्तपरक है । अतः पहले काणादपद और
न्यायपद में द्वन्द्वसमास होगा, जिसका अर्थ होगा "दोनों महर्षियों द्वारा प्रोक्त ।
पुनः काणादन्यायपद का द्विवचनान्त 'मते' इस पद के साथ कर्मधारयसमास होगा ।
इस प्रकार काणाद और न्याय से अभिन्न जो मतद्वय अर्थात् कणादप्रोक्त ओर गौतम-
प्रोक्त से अभिन्न जो मतद्वय, तद्विषयक बालक में समवेत ( समवायसम्बन्ध से
वर्तमान ) जो व्युत्पत्ति, उसकी सिद्धि की प्रयोजिका जो अन्नंभट्टनामक विद्वान् में
स्थित भूतकालीना कृति, उसका विषय यह तर्कसंग्रहनामक ग्रन्थ है । इस प्रकार का
अन्वयबोध उक्त श्लोक से होता है ।

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ८१
न्यायबोधिनी
कृष्णावलम्बिनो गाः पूषा गोवर्धनस्तमभ्यर्चन् ।
विपुलाभीरसभाजनजितविबुधेन्द्रस्तवाभिरचनाभिः ॥ २ ॥
॥ इति तर्कसंग्रह-न्यायबोधिनी समाप्ता ॥
हिन्दी-
"हे कृष्ण ! सच्चिदानन्दघन परमात्मन् ! मेरी समस्त इन्द्रियों को अपने
चरणारविन्द में लगाते हुए रक्षा करो" इस बुद्धि से समस्त संसार के प्रकाशक
भगवान् भास्कर के समान जिज्ञासुजन को न्यायशास्त्र के व्याख्यान से समस्त पदार्थों
का बोध कराने वाले गोवर्धन सुधी, रसों के शिरोमणिभूत भक्तिरस से पूरित होने के
कारण महापण्डितों द्वारा की गई स्तुतियों को भी जीतने वाले अपने प्रशस्त वाणी-
विलासों द्वारा उस परमात्मभूत भगवान् कृष्ण की अभ्यर्चंना करते हैं ।
इति न्यायवेदान्तसांख्ययोगाचार्यश्रीकेदारनाथत्रिपाठि-
प्रणीतायां तर्कसंग्रहन्यायबोधिन्याः
'हिन्दी-कला' व्याख्यायामवशिष्टपरिच्छेदः पूर्णः ।

प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् ।
आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्तिता ॥
इति न्यायविद्याप्रशस्तिः

अथ तर्कसङ्ग्रहन्यायबोधिन्याः
‘संस्कृत-कला’ व्याख्या
प्रत्यक्षपरिच्छेदः
विश्ववन्द्यपदपद्मरेणुभिः स्पर्शमात्रधृततारणव्रतैः।
ईश्वरस्य भवलीनमानसान् स्वान् कथं नहि पुनीमहि द्रुतम् ? ॥
यं तमीश्वरममन्यतैवं वै भिन्नधीमिरखिलोऽपि मानवः।
न्यायतोऽपि मतिमानयन्नयं तं नमंश्च कुरुते कुतूहलम् ॥
न्या.बो. शास्त्राण्यप्यञ्जसा भान्ति भास्वतो यस्य सत्तया।
पृ.१. सूर्य्यनारायणं शुक्लं गुरुं तं नौमि विश्रुतम् ॥
“समाप्तिकामो मङ्गलमाचरेदिति” श्रुतिप्रामाण्यात् चिकीर्षितस्य
ग्रन्थस्य निर्विघ्नपरिसमाप्त्यर्थं मङ्गलकरणं नितरामावश्यकमिति निश्चित्य मनसि
विधीयमानं मङ्गलं शिष्या अप्येवं कुर्युुरिति बुद्ध्या ग्रन्थादौ निबध्नन् चिकीर्षितं
प्रतिजानीते—अखिलेति। अखिलानागमान् सञ्चरति तच्छीलमिति विग्रहे
‘सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये’ इति पाणिनिसूत्रेण णिनिः। तत् = समस्तागमजन्य-
प्रतिपत्तिविषयमित्यर्थः। समस्तागमप्रतिपाद्यमिति यावत्। भूप्रभृतिभागानां
मनुष्यादिकर्तृकसञ्चाराश्रयत्ववत् आगमानां भगवत्कर्तृकयथाश्रुतसञ्चाराना-
श्रयत्वादिति भावः। कृष्ण इति आख्या यस्य तत् कृष्णाख्यम् इति पूर्वं बहुव्रीहिः
समासः, पश्चात् श्रिया युक्तं कृष्णाख्यं श्रीकृष्ण्णाख्यमिति मध्यमपदलोपिसमासः,
न तु श्रिया युक्तः कृष्णः श्रीकृष्णः, श्रीकृष्ण इति आख्या यस्य तत् श्रीकृष्ण-
ख्यमिति रीत्या समासः, श्रीशब्दस्य नामानन्तर्गतत्वात्। श्रीशब्दस्यापि नामान्त-
र्गत्वे तु हर्यादिपदानां द्व्यक्षरत्वानुपपत्तिः। परं—लोकोत्तरम्, महः—तेजः।
“तस्य भासा सर्वमिदं विभाति” इति श्रुतिबलाद् भगवतस्तेजोरूपतोक्तियुक्त्तैव।
ध्यात्वा—तद्विषयकध्यानान्तरमित्यर्थः। क्त्वाप्रत्ययस्य अव्यवहितोत्तराथंकत्वा-
दिति भावः। सुष्ठु ध्यायतीति सुधीः—विद्वान्। गोवर्धननामा सुधीः गोवर्धन-
सुधीरिरिति शाकपार्थिवादिपदवत् मध्यमपदलोपिसमासः। न्यायबोधिनीम्—
एतन्नाम्नीं न्यायपदार्थबोधिकां व्याख्यां, तनुते—विस्तारयति, विवरणग्रन्थनिर्माणेण
बहुतरसम्बद्धां करोति। तर्कसंग्रहग्रन्थस्थार्थान् भूयसः शिष्यान् बोधयतीति तु
फलितोऽर्थः।

८४ तर्कसंग्रहे [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः
चिकीर्षितस्य तर्कसंग्रहग्रन्थस्य निर्विघ्नसमाप्त्यर्थं श्रीमदन्नम्भट्टेन कृतस्येष्ट-
देवतानमस्कारात्मकमङ्गलस्य तेनैव यो ग्रन्थादौ निबन्धः कृतस्तस्य शिष्यशिक्षा-
रूपप्रयोजनं ज्ञापयितुं न्यायबोधिनीकारः—चिकीर्षितस्येत्यादिना ।
न्या.बो. ‘अथ पदार्थान् विभजते’ इत्यत्र ‘अथेति’ शब्द आनन्तर्यार्थः, मङ्गलकरणा-
पृ.२. नन्तरमित्यर्थः । वस्तुतस्तु तर्कसंग्रहग्रन्थस्य बालानां सुखबोधार्थं कृतत्वात् ये ग्रहण-
धारणपटवस्तेषामेवात्र बालत्वात्—शिष्याणां पठिष्यमाणविषयग्रहणधारणपटुत्व-
सम्पत्त्यनन्तरमित्यर्थः । ‘पदार्थान् विभजते’ इत्यत्र द्वितीयाविभक्तेः कर्मत्व-
मर्थः । धातूत्तरप्रत्ययस्य कृतिमत्त्वमर्थः । तथा च पदार्थकर्मकविभागानुकूलकृतिमान्
मूलकार इति सम्पूर्णवाक्याद् बोधः । विभागपदार्थश्च स्वसमभिव्याहृतपदार्थता-
वच्छेदकव्याप्यमिथोविरुद्धयावद्धर्मप्रकारकबोधानुकूलो व्यापारः । अत्र च स्वपदेन
विपूर्वकभज्धातुः ग्राह्यः । तत्समभिव्याहृतम् अर्थात् तत्संनिकटे विद्यमानं
पदं—पदार्थानिति पदं, तदर्थतावच्छेदकं पदार्थत्वम्, तद्व्याप्या मिथोविरुद्धाश्च
यावन्तो धर्माः—द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्व, सामान्यत्व, विशेषत्व, समवायत्वा-
भावत्वधर्माः । यतो हि यथा यत्र यत्र धूमोऽस्ति तत्र तत्र वह्निरवश्यं विद्यते
तस्माद् धूमो वह्निव्याप्य इति कथ्यते । तथैव यत्रयत्र द्रव्यत्वादयः सप्त धर्माः
सन्ति तत्र तत्र पदार्थत्वमवश्यमस्ति, तस्मात् पदार्थत्वव्याप्या द्रव्यत्वादिधर्माः ।
मिथो विरुद्धास्ते द्रव्यत्वादिधर्मा इत्यत्र तु शङ्कैव नास्ति । नहि द्रव्यत्वाधिकरणे
गुणत्वम्, गुणत्वाधिकरणे द्रव्यत्वं वास्ति । एवमन्यत्रापि । यावद्धर्मप्रकारकबोधाः—
इदं द्रव्यम्, अयं गुणः, इदं कर्म, इदं सामान्यं, अयं विशेषः, अयं समवायः,
अयमभाव इति बोधाः सन्ति ! तथा हि प्रत्येकं सविकल्पके ज्ञाने कश्चित् प्रकारो
भवति कश्चिद् विशेष्य इति । यथा अयं घट इति ज्ञाने घटत्वं प्रकारः घटश्च
विशेष्यो भवति, तथा इदं द्रव्यमित्यादिपूर्वोक्तज्ञानेष्वपि द्रव्यत्वगुणत्वादयः
प्रकाराः सन्ति, तस्मात् पूर्वोक्ता बोधाः द्रव्यत्वादिप्रकारकाः जाताः, तादृश-
बोधानामनुकूलो व्यापारः द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य विशेष, समवायाभावा इति
रीत्या पृथक्-पृथक् लेखनकथनादिरूपः, स एव च विभागपदेन कथ्यते । अग्रेप्येव-
मेव द्रव्याणि विभजते, गुणान् विभजते इत्यादिस्थलेषु विभागपदार्थो
वेदितव्यः ।
ननु द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावाः पदार्थाः इति लेखनमात्रेण
गणयित्वैव सप्त पदार्था इति ज्ञानसंभवे सप्तग्रहणं किमर्थमित्यत आह—तत्रेत्यादि ।
तत्र—द्रव्यगुणेत्यादिवाक्ये, सप्तग्रहणम्-सप्तपददानमित्यर्थः। व्याप्तिलाभायेति ।
साहचर्यनियमो हि व्याप्तिः । तथाहि यत्र यत्र धूमो विद्यते तत्र तत्र वह्निरस्तीति
धूमो वह्निव्याप्यो भवति, तथा यत्र यत्र पदार्थत्वं तत्र तत्र द्रव्यादिसप्तान्यतमत्व-
मस्ति, अर्थात् स स द्रव्यादिसप्तानाम् अन्यतम एव भवति । यथा पदार्थत्वं द्रव्ये-

न्यायबोधिनी-संस्कृत-कला [८५]

ऽस्ति तर्हि द्रव्यमपि सप्तसु अन्यतममेव वर्तते । एवं पदार्थत्वाश्रयाः प्रत्येकं गुणा-
दयोऽपि द्रव्यादिषु सप्तसु अन्यतमा एव वर्तन्ते । अतः पदार्थत्वं द्रव्यादिसप्तान्य-
तमत्वव्याप्यमिति सिद्धमेव । तथा चैतादृशव्याप्तिलाभायैव सप्तग्रहणमिति ।
अयं भावः—यथा धूमो वह्निव्याप्यः सन् वह्न्यभावस्थाने न भवति किन्तु
वह्न्यधिकरणे एवोत्पद्यते, तथैव पदार्थत्वमपि द्रव्यादिसप्तान्यतमत्वव्याप्यं सत्
द्रव्यादिसप्तान्यतममतिक्रम्य न तिष्ठति किन्तु तदन्तर्गतमेव तिष्ठति । अर्थात्
द्रव्यादिसप्तभ्योऽन्योऽष्टमः कश्चित् पदार्थ एव न भवतीति स्पष्टं भवति ।
सप्तैव पदार्था इति पूर्वोक्तं दूषयितुं शक्तिरूपमष्टमं पदार्थमाशङ्कते-
नन्विति । तथाहि मण्यादीति । अयमत्र पूर्वपक्षाशयः । काष्ठादिरूपेन्धनादौ
वह्नेः संयागे सति दाहो जायते, किन्तु तत्रैव चन्द्रकान्तमणिसंयोगे कृते वह्निसत्त्वे-
ऽपि दाहो न जायते, तस्य मणेरपसारणे तु जायते । अतः कल्प्यते यत् मणिसमवधाने
वह्नेः दाहकताशक्तिर्नश्यति, सैव शक्तिर्मण्यभावदशायामुत्पद्यते इति । तस्मादेतत्
सिद्ध्यति यत् अस्त्येका शक्तिर्या उत्पद्यते विनश्यति चेति । सैव चाष्टमः पदार्थ
इति । अत्रोत्तरमाह—मणेः प्रतिबन्धकत्वेनेति ।
अयमत्र समाधानाश्यः—यथा कुलालो यदा घटं कर्तुमारभते तदैव
यदि कश्चित् राजपुरुष आयाति तदा इच्छन्नपि स घटं कर्तुं न
पारयति, तेन किं कुलालस्य घटकरणशक्तिर्नष्टा ? नहि, किन्तु तत्र राज-
पुरुषस्य प्रतिबन्धकत्वं मन्यते तदभावस्य च कारणत्वं मन्यते । तथैव
मणिसमवधाने वह्निसत्त्वेऽपि यदि दाहो न जायते तदा वह्नेर्दाहकताशक्ति-
र्नष्टा इति न मन्तव्यम्, किन्तु मणेर्दाहं प्रति प्रतिबन्धकत्वमेव तत्र स्वीकरणीयम् ।
प्रतिबन्धकसत्त्वे कार्य्यासञ्जनात् प्रतिबन्धकाभावस्यापि कार्यं प्रति कारणत्व-
स्वीकारात् । तदानीं प्रतिबन्धकाभावरूपं कारणमेव नास्तीति कुतो दाहो जायेत ?
मण्यभावदशायान्तु प्रतिबन्धकाभावरूपकारणसत्त्वात् दाहो भविष्यत्येवेति न
काचित् क्षतिः । तस्मादनेनैव पथा सर्वनिर्वाहे व्यर्था शक्तिकल्पना । नहि युक्त्य-
भावादेव शक्तिरस्वीकारार्हा, दोषादपि नाङ्गीकारार्हेत्याह अनन्तेति । तथा च
वारं वारं मण्यपसारणेऽनन्ताः शक्तयः, मणिस्थापने चानन्तास्तासां ध्वंसाः प्राग-
भावाश्च स्वीकरणीया भविष्यन्तीति महदन्याय्यमिति भावः । अक्षराथंस्तु
व्याख्यानुसारी स्वयं करणीयः ।
न्या.बो. द्रव्याणि विभजते इति । अस्यापि द्रव्यकर्मकविभागानुकूलव्यापारवान्
पृ.३. मूलकार इति पूर्वरीत्यैवार्थ :
पूर्वाचार्यैः नवानामेव पृथिव्यादीनां द्रव्याणां स्वीकृतत्वात् तद्दूषयितुं
तमोरूपं दशमं द्रव्यमाशङ्कते—नन्वित्यादिना । तथाहितीति । नीलं तमश्चल-
तीति प्रतीतिः तमसि नीलरूपं चलनक्रियाञ्च बोधयति । यद् गुणवत् क्रियावद्