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तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

८४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ८
अभिलाष रूप है जहाँ कर्म केवल कर्मरूप है१, राग जो बुद्धि का धर्म है
वह बुभुक्षा, पिपासा रूप होकर विचित्र रूप धारण करता है—इसका
विभाग के बारे में आगे बतलायेंगे। यह जो मल है वह ईश्वर के स्वरूप
गोपन करने की इच्छा से भिन्न अन्य कुछ नहीं है, फिर यह स्वरूप-गोपन
इच्छात्मक होकर ही पृथिवी वस्तुरूपी है। यह मल विज्ञान केवली आत्मा
में वर्तमान है, लेकिन वह मल ध्वंसोन्मुख है इसलिए अपना कार्य कर्म
की पुष्टि उससे नहीं होती है। प्रलयाकेवली आत्मा में मल फलोन्मुख होकर
स्थित है—अतः कर्म मल की सहकारिता प्राप्त कर संसार के वह नाना
प्रकार भोग के सम्पादन का निमित्त बनता है। इसलिए यह ठीक ही कहा
गया है कि विभिन्न प्रकार भोग की वासनाओं से मलिन अणुओं ( जीवों )
के भोग के सम्पादन के लिए श्रीमान् अघोरेश सृष्टि के कार्य करते हैं। मल
का क्षोभ ईश्वर की इच्छारूपी बल से होता है, क्योंकि जड़ (अचेतन) वस्तु
का स्वभाव से कहीं कुछ करने की शक्ति नहीं रहती है। जिसे अणु कहते
हैं वह चित् और अचित् रूप का आभासन है, उसका (अणुका) जो चिद्रूप
है वह ऐश्वर्य रूप ही है और जो अचिद्रूपता है वही मल है, उसकी उत्पत्ति
१. कला का स्वरूप स्वल्प कर्तृत्व रूप है। इस स्वरूप में विशेषणभाग किञ्चित्
अर्थात् स्वल्प है और इसका विशेष्यभाग कर्तृत्व है। यही कला माया से
उत्पन्न होती है। कला के कारण ही पुरुष में जो पूर्णकर्तृत्व है वह आवृत्त
होकर स्वल्पकर्तृत्व आ जाता है। ज्ञान के बिना कर्तृत्व किस आधार पर
होगा इसलिए कला से अशुद्ध विद्या का उदय होता है जो पुरुष में स्वल्प-
ज्ञता लाती है। लेकिन इतने से ही आत्मा को अपूर्णता पूरी नहीं होती
क्योंकि यह जो स्वल्पता है जिसके कारण आत्मा क्यों एक विशेष वस्तु को
ही जानता है और विशेष वस्तु के करने में ही समर्थ है—इसके उत्तर में
कहा जाता है कि उस पशु की आसक्ति या राग ही विशेष वस्तु की ओर
उसे आकृष्ट करता है और सभी प्रकार के भोग्य विषय अशुचि होने पर भी
उसे अच्छा लगता है। जीव का स्वल्प कर्तृत्व स्वल्पज्ञत्व और 'मुझे कुछ
मिल जाय' इस प्रकार राग के अलावा उसका कर्तृत्व भी काल के द्वारा
खण्डित हो जाता है और इसका स्वरूप 'मैंने किया, करता हूँ, करूँगा'
इस प्रकार कालाधीन होता है। फिर इसके अनन्तर वह जीव 'इस कारण
से इस प्रकार कार्य की उत्पत्ति होती है' ऐसे नियम के भी अधीन बन
जाता है।

आ. ८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ८५
परमेश्वर की इच्छारूपी है और उसी इच्छा से निरन्तर जो जो वस्तुएँ
उत्पन्न होनेवाली हैं और जिसका रूप अचेतनरूप से आभासित होंगे वही
जड़ रूपी माया नामका तत्त्व है जो समस्त कार्य वस्तुओं का व्यापक है
और उपादान भी है। इस उपादानरूपिणी मायातत्त्व के आभासन
करनेवाली परमेश्वर की माया नाम की जो शक्ति है वह तत्त्वरूपिणी
माया से भिन्न है। इसी प्रकार कला आदि तत्त्वों से लेकर पृथ्वी तत्त्व
तक सभी की द्विरूपता है। इनकी द्विरूपता के सम्बन्ध में श्रीअभिनवगुप्त
के गुरुचरणों ने प्रमाण का भी उल्लेख किया है। जो कुछ संकल्प में
पृथग् रूप में भासित होते हैं वे बाहर भी स्फुट रूप से घट जैसे भासते हैं।
अतः माया, कला और आकाश कुसुम आदि के विषय में यही मार्ग है इस
विषय में हेतु केवलान्वयी है। इस प्रकार से माया, कला, प्रकृति और
बुद्धि आदि विषयों में साक्षात्काररूपी ज्ञान जिनको उत्पन्न होता है वे भी
सिद्ध पुरुष हैं—यह सिद्ध हुआ। इस प्रकार की स्थिति में मायातत्त्व से
विश्व का उदय होता है। यह विश्वसृष्टि यद्यपि क्रमविहीन है तो भी
कार्यकारण-भाव की काल्पनिकता मानने पर क्रम का अवभास भी होता
है। इसका (क्रमका) उल्लेख किया जा रहा है। प्रत्येक आत्मामें कला
आदि वर्ग भिन्न-भिन्न है, क्योंकि उसके कार्य कर्तृत्व आदि का स्फुरण
प्रत्येक आत्मा में भिन्न-भिन्न रूप में अनुभूत होता है। कभी-कभी वह वर्ग
(कलादि) भिन्नता को छोड़कर ईश्वर की इच्छा से एक भी बन जाता है
नृत्य, गीत और वादन में सामाजिक पुरुषों को जैसे एकतानता आती है
उसी प्रकार यह सब कला आदि वर्ग जब शुद्ध होकर परमेश्वर विषयक
बनता है और उनके स्वरूपलाभ के अनुकूल बनकर अपने-अपने कार्य
करता है तब वही संसार का प्रतिकूल है। यह शुद्धता परमेश्वर की
शक्तिपात के कारण वैसा बनता है—इस विषय में आगे शक्तिपात की
व्याख्या के समय बतलायेंगे। अशुद्ध कला आदि इसके विपरीत है, माया
से कला उत्पन्न होती है—जो सुप्त अणु में किंचित् कर्तृत्व का आधान
करती है। अणु के साथ कला का योग ही संसाररूपी बीज की उच्छूनता
(किंचित् विकास) है। माया और अणु (जीव) के संयोग से उत्पन्न
कला माया में विकार उत्पन्न करती है। अणु आत्मा जो स्वभावतः
अविकारी है उसमें नहीं, अतः कला माया का ही कार्य है। इस प्रकार
परस्पर घनिष्ठसंश्लेष (सम्पर्क) होने के कारण पुरुष और कला में पृथक्त्व का
भान नहीं होता है। माया गर्भ में स्थित किसी अधिकारी ईश्वर की प्रसन्नत।

८६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ८
से सब प्रकार कर्म के नाश होने पर माया और पुरुष में विवेक उत्पन्न होता
है, जिसके फलस्वरूप माया के ऊपर भूमि में विज्ञानाकल जीव स्थित
रहते हैं, वे कभी माया से निम्न भूमि में नहीं जाते । इसी प्रकार जिसको
कला और पुरुष में विवेक उत्पन्न हुआ है वह कला के ऊर्ध्व भूमि में
रहता है । जिसे प्रकृति पुरुष विवेक हुआ है वह प्रधान से निम्नभूमि में
नहीं जाता है । मल और पुरुषमें विवेक सम्पन्न होने पर शिवसमानता
आती है, पुरुष की पूर्णता सम्बन्धी साक्षात्कार होने पर शिवत्व ही है ।
अतः कलातत्त्व ही किंचित् कर्तृत्व का आधान करनेवाला है, लेकिन जो
अज्ञान है उसमें कर्तृत्व नहीं आ सकता है, अतः किंचित् ज्ञानदायिनी
अशुद्ध विद्या जो कला से उत्पन्न हुई, वही विद्या बुद्धि की ओर देखती है
और उसमें स्थित सुख आदि को विवेक पूर्वक ग्रहण करती है, क्यों कि
बुद्धि गुणों से संकीर्ण होने के कारण बुद्धि में प्रतिबिम्बित वस्तुओं को एक
दूसरे से विविक्त रूप में ग्रहण नहीं कर सकती है । इसलिए बुद्धि में
प्रतिबिम्बित भाव समूह का विवेचन विद्या के द्वारा होता है, किंचित्
कर्तृत्व के किंचित् अंश की सिद्धि के लिए किसी विशेष विषय सम्बन्धी
कर्तृत्व के अर्थ में इसका तात्पर्य पर्यवसित होता है, किसी विशेष विषयक
कर्तृत्व का होना रागतत्त्व का कार्य है । किसी विशेष विषयक कार्य तो
अवैराग्य से ही सम्भव हो सकता है—ऐसी आपत्ति के उत्तर में कहा
जाता है कि अवैराग्य युक्त जीवों में भी राग का अभाव दिखलाई पड़ता
है,—और वैराग्य रहने पर भी धर्म आदि में अनुराग दिखलाई पड़ता
है । भोजन के द्वारा तृप्त पुरुष में अवैराग्य का अभाव ( वैराग्य ) रहने
पर भी हृदय में राग का अभाव नहीं रहता है । राग के अभाव होने पर
अवैराग्य की अनुत्पत्ति का प्रसंग होगा। काल तो कार्यों का कलन करता
हुआ उस कलना के द्वारा कर्तृत्व में परिच्छिन्नता लाता है । 'क्वचित्'
इस अंश में समानता रहने पर भी इसी विषय में ही कर्तृत्व है इस प्रकार
का होना नियति का कार्य है । कार्यकारणभाव में भी नियति का ही
व्यापार है । अतः कला से इन चारों की उत्पत्ति हुई है । किसी वस्तु
इस समय जानकर उस विषय में अनुरागी बनकर करता हूँ—इस प्रकार
जो चैतन्य शरीररूपी पुर्यष्टक में स्थित है वह पशु कहलाता है । यह जो
मायादिषट्क है उसे छः कंचुक कहते हैं । क्यों कि संवित् ( चैतन्य )
के माया के द्वारा आवरण डाले जाने पर उसके ऊपर कला आदि की
स्थिति कंचुक ( आवरण ) के समान होती है ।

आ. ८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ८७
इस प्रकार से देखने पर माया का कार्य जो किंचित् कर्तृत्व है उसमें
किंचित् रूपी विशेषण विशिष्ट कर्तृत्वरूपी जो विशेष्य है उसमें जो कला¹
काम करती है वह विद्या आदि तत्त्वों को जननी (कारण) है—ऐसा
इसका निरूपण हुआ है। अब इसका विशेषणरूपी जो भाग (अंश) है
जिसका किंचित् शब्द से उल्लेख हुआ है वह ज्ञेय तथा कार्यरूप है। जब
वही कला उसको अपने स्वरूप से अलग कर देती है तब वह सुख दुःख
मोहात्मक होकर और सभी भोग्य पदार्थों के अनुगामी बनकर एक
सामान्य रूप धारण कर लेती है और जिससे प्रकृतितत्त्व की उत्पत्ति होती
है जिसका दूसरा रूप उन गुणों का साम्यरूप है—इस प्रकार से भोक्तारूप
और भोग्य उभय एक ही साथ कलातत्त्व के अधीन होकर उत्पन्न होते हैं।
इस विषय में इनकी सृष्टि वास्तव में बिना क्रम² से होती है—ऐसा कहा
१. जब सृष्टि की धारा प्रवर्तित होती है तब जो जीव उस धारा में पतित हो
जाता है उस समय उसके सम्मुख कोई क्रम प्रतिभात नहीं होता है, लेकिन
योगी के साधनमार्ग में चलते समय क्रम अवश्य देखने को आता है। यह
जानना उचित है कि सृष्टि युगपत् होती है। किसी-किसी शास्त्र में नियति
के बाद काल का उल्लेख हुआ है, लेकिन यहाँ नियति का उल्लेख काल के
अनन्तर हुआ है क्योंकि कार्यकारण सम्बन्धी नियम का जो व्यापार है
अर्थात् कारण जो कार्य के पूर्वगामी है और कार्य जो कारण के बाद आने
वाले हैं, बिना काल के अवच्छेद से कैसे सम्भव हो सकता है, इसलिए
काल का उल्लेख नियति के पहले हुआ है।
माया आदि कंचुक षट्क के द्वारा जो प्रमाता संकुचित हो जाता
है वह 'विदि क्रिया' का कर्ता है, आगमों में उसे अणु कहते हैं। यहों
पच्चीसवां तत्त्व पुरुष है।
२ यद्यपि पुरुष में कर्तृत्व अनवच्छिन्न है लेकिन उस कर्तृत्व में किञ्चित् विशेषण
रहने के कारण उसकी कर्तृत्वशक्ति सीमित हो जाती है और किसी वेद्य
सम्बन्धी कर्तृत्व में वह पर्यवसित होती है। यह जो वेद्य है वह कोई
विशिष्ट वेद्य नहीं अपितु सामान्य वेद्यात्मक प्रधानरूपी तत्त्व है। कलातत्त्व
उस भोग्यरूपी तत्त्व को बाहर प्रकट कर देती है। कला के कारण ही एक
ओर अणुरूपी भोक्ता और दूसरी ओर भोग्यरूपी प्रधान का जन्म होता है।
अद्वय सिद्धान्त के अनुसार भोक्ता ही भोग्य रूप में स्थित है लेकिन माया
के कारण भेदभाव का उदय होता है।

८८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ८
गया है, लेकिन क्रम का भी अवभासन भी है—यह भी कहा गया है।
यह क्रम विद्या और राग आदि में विचित्र प्रकार देखा गया है जैसे कोई
जीव किसी वस्तु से अनुरक्त होकर बाद में उसे जानता है और कोई
पहले किसी वस्तु को जानकर बाद में अनुरक्त होता है। इसलिए विद्या
राग आदि का भिन्न प्रकार क्रमनिरूपण रौरव आदि शास्त्रों में जो कहा
गया है उसमें कोई विरोध हुआ ऐसा नहीं समझना चाहिए। अतः जो
भोग्यसामान्य १ है वह प्रधान ही है और जो प्रक्षोभ है वह गुणतत्त्व है।
इसमें वही सुख है जहाँ भोग्यरूप प्रकाशात्मक सत्त्व उपस्थित है, दुःख
प्रकाश तथा अप्रकाश का आन्दोलनात्मक है अतः यह रजसरूप और
क्रियात्मक है, मोह तमसात्मक है जहाँ प्रकाश का अभाव है। ये तीनों
वस्तुतः भोग्यरूप हैं। अतः क्षुब्ध प्रधान से अन्य कार्यों की उत्पत्ति होती
है। अक्षुब्ध प्रकृति से नहीं। अव्यक्त और महत् के बीच में क्षोभ अवश्य
ही मानना पड़ता है—इससे सांख्य दृष्टि से अज्ञात पृथग्रूप गुणतत्त्व २ है।
प्रकृति में यह क्षोभ तत्त्व के अधिपति ईश्वर के अधिष्ठान से उत्पन्न होता
है, नहीं तो किसी नियत पुरुष के प्रकृति की प्रवृत्ति सिद्ध नहीं होती।
इसके अनन्तर (क्षोभ के अनन्तर) गुणतत्त्व से बुद्धितत्त्व उत्पन्न होता है
१. बुद्धि के ऊपर तथा प्रकृति के नीचे गुणतत्त्व का स्थान है। प्रकृति गुणों की
साम्यावस्था का नाम है। उस स्थिति में गुणों में किसी प्रकार क्षोभ नहीं
रहता। जब तत्त्वाधिष्ठाता ईश्वरेच्छा से गुणों में वैषम्य का उदय होता है
तब उसे क्षोभ कहते हैं। प्रकृति का जो क्षुब्धरूप है वही गुणतत्त्व है। यह
जानने योग्य बात है कि प्रकृति के दो रूप हैं, एक उसकी साम्यावस्था है
और दूसरी वैषम्यावस्था है। गुणतत्त्व प्रकृति से भिन्न कोई तत्त्व नहीं है।
संसार की प्रवृत्ति क्षुब्ध गुणतत्त्व से होती है अक्षुब्ध प्रकृति से नहीं, जिस
पुरुष में भोगलिप्सा समाप्त हो गयी है ईश्वरेच्छा से प्रकृति में उसके लिए
क्षोभ उत्पन्न नहीं होता है, लेकिन इसके विपरीत भोगेच्छु के लिए
श्रीकण्ठनाथ प्रकृति को क्षुब्ध करते हैं। इसलिए मुक्त पुरुष के लिए ईश्वर
प्रकृति में कोई विकार उत्पन्न नहीं करते हैं।
२. बुद्धि आत्मा रूपी प्रकाश के प्रतिबिम्ब का आधार है। वह एक ओर बोध
का प्रतिबिम्ब धारण करती है, दूसरी ओर विषयों का। पुरुषरूपी प्रकाश
का प्रतिबिम्ब धारण करने के कारण बुद्धि जड़ होती हुई भी विषयों का
प्रकाशन कर सकती है।

आ. ८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ८९
जिसमें पुरुषरूपी प्रकाश और विषय का प्रतिबिम्ब अर्पित होता है।
बुद्धितत्त्व¹ से अहंकार उत्पन्न होता है। जिससे बुद्धि में प्रतिबिम्बित वेद्य
वस्तुओंके सम्पर्क से पुरुषरूपी प्रकाश मलिन होकर शुक्ति में रजत के
अभिमान के सदृश अनात्मा में आत्माभिमान रूपी अहंकार का
उदय होता है।² इसलिए 'कार' शब्द से अहंकार कार्यवस्तु है—ऐसा
कहा गया है। यह सिद्धान्त सांख्य मत के अनुसार ठीक नहीं लगता हैं,
क्योंकि वह सिद्धान्त आत्मा की 'अहं विमर्शमयता' का अंगीकार नहीं
करता है, लेकिन हमलोग उसकी कर्तृता भी स्वीकार करते हैं अर्थात्
आत्मा कर्ता है ऐसा मानते हैं। इस शुद्ध विमर्श का कोई प्रतियोगी
नहीं है, यह स्वात्मचमत्कार रूप अहं है।
यह हुआ अहंकार का इन्द्रियात्मक स्वरूप³ उसकी प्रकृतिरूपता
१. बुद्धिवृत्ति रूपी प्रकाश में 'मैं यह करता हूँ, यह जानता हूँ' इस प्रकार
जो अभिमान है अहंकार उसी स्वरूप का है। अनात्मवस्तु में आत्माभिमान
के अलावा इसका एक असाधारण कार्य भी है। अहंकार ही अपने संरम्भ
के बल से प्राणों का प्रेरक है; जब उसकी संरम्भरूपी प्रेरणा की समाप्ति
हो जाती है तब जीवों की मृत्यु होती है।
२. अहंकार के सात्त्विक भाग से मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियों की उत्पत्ति होती
है। मन में एक विशेषता यह है कि वह सब इन्द्रियों के विषयों से सम्बन्ध
रखता है, किन्तु इन्द्रियाँ नियत विषयक हैं—इसका कारण क्या है, इसके
अनुसन्धान करने पर ज्ञात होता है कि अहंकार मन के कारण होते समय
तन्मात्राओं के अविशिष्ट कर्ता है, लेकिन ज्ञानेन्द्रिय आदि के जन्म में वह
नियतरूप है। इसलिए इन्द्रियाँ नियत विषयक हैं, जैसे श्रोत्र शब्द का ही
ग्रहण करता है, स्पर्श का नहीं, लेकिन मन सर्वविषयक है क्योंकि मन
अहंकार के सात्त्विक अंश से उत्पन्न होकर भी अनियतविषयक या सर्व-
विषयक है।
३. बुद्धि, अहंकार और मन अन्तःकरण हैं जिसके अध्यवसाय, अभिमान
और संकल्प आदि वृत्तियाँ हैं। प्राण को अन्तःकरण नहीं कहा जा सकता
है, क्योंकि वह जड़ है लेकिन बुद्धि आदि जड़ होने पर भी उनमें चेतन का
सीधा सम्पर्क है क्योंकि कारणरूप अहंकार में प्राणों की प्रेरकता है। यह
बिना इच्छा से और इच्छा भी बोध या ज्ञान के बिना होना सम्भव नहीं
है—ये सभी गुण बुद्धि अहंकार और मन में वर्तमान हैं।

९० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ८
सत्त्व आदि के भेद से तीन प्रकार हैं जिसमें सात्त्विक अंश वह है जिससे
मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न होते हैं, उसमें मन जो कार्य है उसका
जनक या कर्ता अहंकार है जिसमें शब्दतन्मात्रा को उत्पन्न करने का
सामर्थ्य है। श्रोत्र का कारण होता हुआ वही शब्दजनक है, इस प्रकार
घ्राणेन्द्रिय में वही गन्धजनकता की शक्ति रखता है। इन्द्रियों की
भौतिकता युक्तिसिद्ध नहीं है—मैं सुनता हूँ इस प्रकार 'मैं' का अनुगम
रहने के कारण इन्द्रियाँ स्पष्टतया आहंकारिक हैं और वे ( इन्द्रियाँ )
करण होने के नाते इनके कर्ता के साथ सम्बन्ध होना अवश्य चाहिए,
नहीं तो दूसरे करण के योग स्वीकार करने पर अनवस्था आ जाती है।
अहंकार ही कर्ता और करणों में कर्ता का अंश है, इसलिए पुरुष के दो
मुख्य करण हैं—ज्ञानरूप अंश में विद्या और क्रिया में कला है क्योंकि
अन्धा और पंगु ( लंगड़े ) में अहन्तारूप ज्ञान ( रूपज्ञान ) और क्रिया
( गमन क्रिया ) अभाव नहीं रहता। तन्मात्राओं की बलवत्ता होने पर
सात्त्विक अहंकार में जो विशेषता आती है उससे पाँच कर्मेन्द्रियों का
उदय होता है। 'मैं चलता हूँ' इस प्रकार अहंकार से युक्त और कार्य
करने में समर्थ इन्द्रिय ही पादेन्द्रिय है, उसका मुख्य अधिष्ठान बाहरी
पैर, अन्यत्र भी वही इन्द्रिय है, क्योंकि पैर से रहित पुरुष में भी गति का
अभाव नहीं रहता है। यह कहना उचित नहीं कि उस हेतु से कर्तव्य का
सांकर्य होगा, क्योंकि क्रिया मात्र ही करण का कार्य है, गमन आदि का
मुख्यरूप क्रिया है, रूप आदि का बोध की क्रियारूपता नहीं है, वैशेषिक
शास्त्र में वे गुण कहते हैं, इसलिए कर्मेन्द्रियवर्ग अवश्य ही मानना
चाहिए। उनकी संख्या पाँच हैं क्योंकि अनुसन्धान पाँच ही है। जब बाहर
त्याग की अनुसन्धि अथवा ग्रहण की, या त्याग और ग्रहण दोनों की,
अथवा दोनों के अभाव ( अर्थात् जहाँ त्याग और ग्रहण दोनों न हों )
रहकर स्वरूप में विश्राम के लिए हो तो क्रमशः पायु, पाणि पाद और
उपस्थ आदि इन्द्रियाँ कार्य करती हैं। जब भीतर ही भीतर प्राणों के
आश्रयण कर कर्म की अनुसन्धि होती है तब वागिन्द्रिय कार्य करता है।
इसलिए इन्द्रिय के अधिष्ठान ( अर्थात् पादेन्द्रिय ) हाथ में होने पर उससे
जो गमन क्रिया होती है वह भी पादेन्द्रिय का ही कार्य है ऐसा मानना
पड़ता है, अतः कर्म अनन्त प्रकार के होने पर भी इन्द्रियाँ अनन्त प्रकार
के नहीं होती हैं। इतने दूर तक राजस गुणका सम्बन्ध है—ऐसा कहा
जाता है। दूसरे सिद्धान्त के अनुसार रजस् से मन उत्पन्न होता है ऐसा

आ. ८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ९१
कहा जाता है। फिर दूसरे लोग सात्त्विक गुण से मन और रजस् से इन्द्रियाँ
उत्पन्न होते हैं ऐसा कहते हैं। भोक्तारूप के गुणभाव और तमस् प्रधान
अहंकार से पाँच तन्मात्राएँ जिनका एकमात्र स्वरूप वेद्यमय है, उत्पन्न होते
हैं। विशेष विशेष शब्दों के जो क्षुब्धरूप हैं उनके पूर्वगामी सामान्यात्मक
अविशिष्ट जो स्वरूप है वही शब्द तन्मात्रा है। इसी प्रकार गन्ध तक
तन्मात्राओं के सम्बन्ध में कहना पड़ता है। शब्दतन्मात्रा के क्षुब्ध होने
से अर्थात् वह जब कार्यजनन के प्रति उन्मुख होती है तब अवकाशदानरूप
व्यापार करने वाले आकाश की उत्पत्ति होता है—क्योंकि शब्द वाच्य
वस्तुओं के लिए स्थानरूप अवकाश देने में सामर्थ्य रखता है। शब्द-
तन्मात्रा जब क्षुब्ध होती है तब वायु की उत्पत्ति होती है—शब्द भी
उसके सहचारी है वायु का आकाश से कभी वियोग नहीं होता। रूप के
क्षुब्ध होने पर तेज का जन्म होता है अन्य दो गुण (शब्द और स्पर्श)
पहले जैसे रहते हैं। क्षुब्ध रस तन्मात्रा से जल तत्त्व का जन्म होता है
शब्द, स्पर्श, रूप ये तीन पहले जैसे हैं। गन्ध तन्मात्रा के क्षुब्ध होने से
पृथिवी तत्त्व का उदय होता है, अन्य चार गुण पहले जैसे हैं। कोई-कोई
शब्द और स्पर्श से वायु—इस क्रम से पाँचों तन्मात्राओं से पृथिवी का
उदय मानते हैं। गुणों का समूह ही पृथिवी हैं, गुणों के समष्टि के अतिरिक्त
कोई गुणी नहीं है।
इन तत्त्व समूहों में ऊर्ध्व ऊर्ध्व गुण व्यापक है निकृष्ट गुण व्याप्य है।
जिसके बिना अन्य गुणों की उत्पत्ति नहीं हो सकती है उसे ही गुणों का
उत्कर्ष समझना चाहिए। अतः पृथवीतत्त्व शिवतत्त्व से लेकर जलतत्त्व के
द्वारा व्याप्त है, इसी प्रकार जल अग्नितत्त्व के द्वारा व्याप्त है—इस प्रकार
शक्तितत्त्व तक स्थिति है।
× × ×
भूतसमूह, तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, प्रकृति, कंचुक से आवृत्त पुरुष, विद्या
से शक्तितत्त्व शुद्धतत्त्व यह समग्ररूप संवित्स्पी सागर की लहरियाँ हैं—
जो इस प्रकार से प्रसृत हुआ है।
इति श्री अभिनवगुप्ताचार्य के द्वारा विरचित
तन्त्रसार का अष्टम आह्निक

अथ नवममाह्निकम्
अथ तत्त्वानां भेदो निरूप्यते ।
स च सप्तधा षडर्धशास्त्र एव परं परमेशेन उक्तः । तत्र शिवाः मन्त्र-
महेशाः मन्त्रेशाः मन्त्राः विज्ञानाकलाः प्रलयाकलाः सकला इति सप्त
शक्तिमन्तः । एषां सप्तैव शक्तयः, तद्भेदात् पृथिव्यादिप्रधानतत्त्वान्तं
चतुर्दशभिर्भेदैः प्रत्येकं स्वं रूपं पञ्चदशं तत्र स्वं रूपं प्रमेयतायोग्यं स्वाहम-
निष्ठम्—अपराभट्टारिकानुग्रहात्, प्रमातृषु उद्रिक्तशक्तिषु यत् विश्रान्ति-
भाजनं तत् तस्यैव शाक्तं रूपं श्रीमत्परापरानुग्रहात् । तच्च सप्तविधं
शक्तीनां तावत्त्वात् । शक्तिमद्रूपप्रधाने तु प्रमातृवर्गे यत् विश्रान्तं तच्छक्ति-
मच्छिवरूपं श्रीमत्पराभट्टारिकानुग्रहात्, तदपि सप्तविधं—प्रमातॄणां
शिवात्प्रभृति सकलान्तानां तावताम् उक्तत्वात् । तत्र शक्तिभेदादेव
प्रमातॄणां भेदः, स च स्फुटीकरणार्थं सकलादिक्रमेण भण्यते, तत्र सक-
लस्य विद्याकले शक्तिः तद्विशेषरूपत्वात् बुद्धिकर्माक्षशक्तीनां, प्रलया-
कलस्य तु ते एव निर्विषयत्वात् अस्फुटे । विज्ञानाकलस्य ते एव विगल-
त्कल्पे तत्संस्कारसचिवा प्रबुद्धचमात्रा शुद्धविद्या मन्त्रस्य । तत्संस्कार-
हीना सैव प्रबुद्धा मन्त्रेशस्य । सैव इच्छाशक्तिरूपतां स्वातन्त्र्यस्वभावां
जिघृक्षन्ती मन्त्रमहेश्वरस्य । इच्छात्मिका स्फुटस्वातन्त्र्यात्मिका शिवस्य
इति शक्तिभेदाः सप्त मुख्याः । तदुपरागकृतश्च शक्तिमत्सु प्रमातृषु भेदः—
करणभेदस्य कर्तृभेदपर्यवसानात्, शक्तेरेव च अव्यतिरिक्तायाः करणीकर्तुं
शक्यत्वात् न अन्यस्य—अनवस्थाद्यापत्तेः । वस्तुतः पुनरेक एव चित्स्वा-
तन्त्र्यानन्दविश्रान्तः प्रमाता, तत्र पृथिवी स्वरूपमात्रविश्रान्ता यदा
वेद्यते तदा स्वरूपम् अस्याः केवलं भाति चैत्रचक्षुर्द्दष्टं चैत्रविदितं जाना-
मीति, तत्र सकलशक्तिकृतं सकलशक्तिमद्रूपकृतं स्वरूपात्तरं भात्येव,
एवं शिवान्तमपि वाच्यं, शिवशक्तिनिष्ठं शिवस्वभावविश्रान्तं च विश्वं
जानामि इति प्रत्ययस्य विलक्षणस्य भावात् । ननु भावस्य चेत् वेद्यता
स्वं वपुः तत्सर्वान्प्रति वेद्यत्वं, वेद्यत्वमपि वेद्यम् इत्यनवस्था, तया च

आ. ९ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ९३
जगतोऽन्धसुप्रत्वं सुप्रकाशमेव, तया च वेद्यत्वावेद्यत्वे विरुद्धधर्मयोग इति
दोषः ? अत्र उच्यते—न तत् स्वं वपुः स्वरूपस्य पृथगुक्तत्वात्, किं तर्हि
तत् प्रमातृशक्तौ प्रमातरि च यत् विश्रान्तिभाजनं यत् रूपं तत् खलु
तत्, तत् स्वप्रकाशमेव तत् प्रकाशते न तु किंचिदपि प्रति इति सर्वज्ञत्वम् ।
अनवस्थाविरुद्धधर्मयोगश्च इति दूरापास्तम् । अनन्तप्रमातृवेद्यमपि
एकमेव तत् तस्य रूपं तावति तेषामेकाभासरूपत्वात् इति न प्रमात्रन्तर-
संवेदनानुमानविधनः कश्चित्, तच्च तस्य रूपं सत्यम् अर्थक्रियाकारित्वात्
तथैव, परदृश्यमानां कान्तां दृष्ट्वा तस्यै समोर्ष्यति, शिवस्वभावं विश्रा-
न्तिकुम्भं पश्यन् समाविशति समस्तानन्तप्रमातृविश्रान्तं वस्तु पश्यन्
पूर्णीभवति नर्तकीप्रेक्षणवत्, तस्यैव नीलस्य तद्रूपं प्रमातरि यत् विश्रान्तं
तथैव स्वप्रकाशस्य विमर्शस्योदयात्—इति पञ्चदशात्मकत्वं पृथिव्याः
प्रभृति प्रधानतत्त्वपर्यन्तम् । तावत्युद्रिक्तरागादिकञ्चुकस्य सकलस्य
प्रमातृत्वात्; सकलस्यापि एवं पाञ्चदश्यं तस्यापि तावद्भेद्यत्वात् । वितत्य
चैतत् निर्णीतं तन्त्रालोके । पुंसः प्रभृति कलातत्त्वान्तं त्रयोदशधा—सक-
लस्य तत्र प्रमातृतायोगेन तच्छक्तिशक्तिमदात्मनो भेदद्वयस्य प्रत्यस्तम-
मयात्, तथा च सकलस्य स्वरूपत्वमेव केवलं, प्रलयाकलस्य स्वरूपत्वे
पञ्चानां प्रमातृत्वे एकादश भेदाः । विज्ञानाकलस्य स्वरूपत्वे चतुर्णां
प्रमातृत्वे नव भेदाः । मन्त्रस्य स्वरूपत्वे द्वयोः प्रमातृत्वे सप्त । मन्त्रेशस्य
स्वरूपत्वे भगवत एकस्यैव प्रमातृत्वे शक्तिशक्तिमद्भेदात् त्रयः । शिवस्य
तु प्रकाशैकचित्स्वातन्र्यनिर्भरस्य न कोऽपि भेदः परिपूर्णत्वात् । एवम्
अयं तत्त्वभेद एव परमेश्वरानुत्तरनयैकाह्ये निरूपितः भुवनभेदवैचित्र्यं
करोति, नरकस्वर्गरुद्रभुवनानां पार्थिवत्वे समानेऽपि दूरतरस्य स्वभाव-
भेदस्य उक्तत्वात् । अत्र च परस्परं भेदकलनया अवान्तरभेदज्ञानकुतू-
हली तन्त्रालोकमेव अवधारयेत् । एवम् एकैकघटाद्यनुसारिणापि पृथिव्या-
दीनां तत्त्वानां भेदो निरूपितः । अधुना समस्तं पृथिवीतत्त्वं प्रमातृप्रमेय-
रूपम् उद्दिश्य निरूप्यते—यो धरातत्त्वाभेदेन प्रकाशः स शिवः यथा
श्रुतिः 'पृथिव्येवेदं ब्रह्म' इति । धरातत्त्वसिद्धिप्रदान् प्रेरयति स धरामन्त्र-
महेश्वरः, प्रेर्यो धरामन्त्रेशः, तस्यैवाभिमानिकविग्रहतात्मको वाचको
मन्त्रः, सांख्यादिपाशवविद्योत्तीर्णशिवविद्याक्रमेण अभ्यस्तपार्थिवयोगोऽ-
प्राप्तध्रुवपदः धराविज्ञानाकलः । पाशवविद्याक्रमेण अभ्यस्तपार्थिवयोगः
कल्पान्ते मरणे वा धराप्रलयकेवलः । सौषुप्ते हि तत्त्वावेशवशादेव चित्रस्य
स्वप्नस्य उदयः स्यात् गृहीतधराभिमानस्तु धरासकलः । अत्रापि शक्त्यु-

द्वैकन्यग्भावाभ्यां चतुर्दशत्वम् इति प्रमातृतापन्नस्य धरातत्त्वस्थ भेदाः,
स्वरूपं तु शुद्धं प्रमेयम् इति, एवम् अपरत्रापि । अथ एकस्मिन् प्रमातरि
प्राणप्रतिष्ठिततया भेदनिरूपणम्—इह नीलं गृह्णतः प्राणः त्रुटिषोडशकात्मा
वेद्यावेशपर्यन्तम् उदेति, तत्र आद्या त्रुटिरविभागरूपा, द्वितीया ग्राह-
कोल्लासरूपा, अन्त्या तु ग्राह्याभिन्ना तन्मयी, उपान्त्या तु स्फुटीभूत-
ग्राहकरूपा, मध्ये तु यत् त्रुटिद्वादशकं तन्मध्यात् आद्यं षट्कं निर्विकल्प-
स्वभावं विकल्पाच्छादकं, षट्त्वं च अस्य स्वरूपेण एका त्रुटिः, आच्छाद-
नीये च विकल्पे पञ्चरूपत्वम्, उन्मिमिषा उन्मिषत्ता, सा च इयं स्फुट-
क्रियारूपत्वात् त्रुटिद्वयात्मिका-स्पन्दनस्य एकक्षणरूपत्वाभावात्, उन्मि-
षितता स्वकार्यकर्तृत्वं च इत्येवमाच्छादनीयविकल्पपाञ्चविध्यात् स्वरू-
पाच्च षट् क्षणा निर्विकल्पकाः, ततोऽपि निर्विकल्पस्य ध्वंसमानता,
ध्वंसो विकल्पस्य, उन्मिमिषा उन्मिषत्ता त्रुटिद्वयात्मिका उन्मिषितता च
इति षट् त्रुटयः। स्वकार्यकर्तृता तु ग्राहकरूपता इति उक्तं न सा भूयो
गण्यते, इत्येवं विवेकधना गुरूपदेशानुशोलिनः सर्वत्र पाञ्चदश्यं प्रविभागेन
विविञ्चते । विकल्प न्यूनत्वे तु त्रुटिन्यूनता सुखादिसंवित्ताविव यावत्
अविकल्पतैव । लोकास्तु विकल्पविश्रान्तया ताम् अहन्तामयीम् अहन्ता-
च्छादितेदंभावविकल्पप्रसरा निर्विकल्पां विमर्शभुवम् अप्रकाशितामिव
मन्यन्ते—दुःखावस्थां सुखविश्रान्ता इव, विकल्पनिर्ह्लासेन तु सा प्रकाशत
एव इति इयम् असौ संबन्धे ग्राह्यग्राहकयोः सावधानता इति अभिनव-
गुप्तगुरवः । एवं च पाञ्चदश्ये स्थिते यावत् स्फुटेदन्तात्मनो भेदस्य न्यूनता
तावत् द्वयं द्वयं ह्रसति यावत् द्वितुटिकः शिवावेशः, तत्र आद्या त्रुटिः
सर्वतः पूर्णा, द्वितीया सर्वज्ञानकरणाविष्टाभ्यस्यमाना सर्वज्ञत्वसर्वकर्तृ-
त्वाय कल्पते न तु आद्या। यदाह श्रीकल्लटः 'त्रुटिपात इति' अत्र पात-
शब्दं सैव भगवती श्रीमत्काली मातृसद्भावो भैरवः प्रतिभा इत्यलं
रहस्यरहस्येनेन । एवं मन्त्रमहेशत्रुटेः प्रभृति तत्तद्रूपासनात् तत्तत्सिद्धिः ।
अथात्रैव जाग्रदवस्था निरूप्यते, —तत्र वेद्यस्य तद्विषयायाश्च संविदो
यत् वैचित्र्यम् अन्योन्यापेक्षं सत् सा अवस्था, न वेद्यस्य केवलस्य न चापि
केवलायाः संविदो न चापि पृथक् पृथक् द्वे । तत्र यदाधिष्ठेयतया बही-
रूपतया भानं तदा जाग्रदवस्था मेये मातरि माने च। यदा तु तत्रैव
अधिष्ठानरूपतया भानं संकल्पः तदा स्वप्नावस्था । यदा तु तत्रैव अधि-
ष्ठातृरूपतया बीजात्मतयैव भानं तदा सुषुप्तावस्था। इमा एव तिस्रः
प्रमेयप्रमाणप्रमात्रवस्थाः प्रत्येकं जाग्रदादिभेदात् चतुर्विधा उक्ताः। यदा

आ. ९ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ९५
तु तस्मिन्नेव प्रमातृविश्रान्तिगते प्रमातुः पूर्णतौन्मुख्यात् तद्वारेण पूर्णतो-
न्मुखतया भानं तदा तुर्यावस्था, सा च रूपं दृशाहमित्येवं-विधम् अंश-
त्रयम् उत्तीर्य पश्यामीति अनुपाधिका प्रमातृता स्वातन्त्र्यसारा, नैकट्य-
मध्यत्वदूरत्वैः प्रमातृप्रमाणप्रमेयताभिषेकं ददती तदवस्थात्रयानुग्राहक-
त्वात् त्रिभेदा। एतदेव अवस्थाचतुष्टयं पिण्डस्थपदस्थरूपस्थरूपातीत-
शब्दैर्योगिनो व्यवहरन्ति, प्रसंख्यानधनास्तु सर्वतोभद्रं व्याप्तिः महा-
व्याप्तिः प्रचय इति शब्दैः। अन्वर्थं चात्र दर्शितं तन्त्रालोके श्लोकवार्तिके
च। यच्च सर्वान्तर्भूतं पूर्णरूपं तत् तुर्यातीतं सर्वातीतं महाप्रचयं च
निरूपयन्ति। किं च यस्य यद्यदा रूपं स्फुटं स्थिरम् अनुबन्धि तत्
जाग्रत्, तस्यैव तद्विपर्ययः स्वप्नः, यः लयाकलस्य भोगः सर्ववेदनं सुषुप्तं,
यो विज्ञानाकलस्य भोगः भोग्याभिन्नीकरणं तुर्यं मन्त्रादीनां स भोगः,
भावानां शिवाभेदस्तुर्यातीतं सर्वातीतम्। तत्र स्वरूपसकलौ १. प्रलयाकलः
२. विज्ञानाकलः ३. मन्त्रतदीश तन्महेशवर्गाः ४. शिवः ५. इति पञ्चदशभेदे
पञ्च अवस्थाः। स्वरूपं प्रलयाकल इत्यादिक्रमेण त्रयोदशभेदे, स्वरूपं
विज्ञानाकलशक्तिः विज्ञानाकल इत्येकादशभेदे, स्वरूपं मन्त्राः तदीशाः
महेशाः शिवः इति नवभेदे; स्वरूपं मन्त्रेशाः महेशः शक्तिः शिव इति
सप्तभेदे, स्वरूपं महेशशक्तिः महेशः शक्तिः शिव इति पञ्चभेदे, स्वरूपं
क्रियाशक्तिः ज्ञानशक्तिः इच्छाशक्तिः शिव इति त्रिभेदे; अभिन्नेऽपि शिव-
तत्त्वे क्रियाज्ञानेच्छानन्दचिद्रूपक्लृप्त्या प्रसंख्यानयोगधनाः पञ्चपदत्वम्
आहुः ॥
भूम्यादौ तत्त्वजाले न हि भवति वपुस्तादृशं यत्प्रमातुः
संवित्द्विश्रान्तिवन्ध्यं स्फुरति स बहुधा मातृभावोऽस्य यस्मात् ।
तेनास्मिन्वेद्यजाले क्रमगतकलनां निर्विकल्पामहन्ता-
स्वातन्त्र्यामर्शसारां भुवमधिवसत प्राप्नुत स्वात्मसत्ताम् ॥
पहिल्ल उणाहरभावकलणुणुअब्भन्तरि एह
सञ्चिचवपसय इपुणुजल इच्छिहिणिक्कलेह ।
संवेअण पपरूढ इउभावकलाउससग्गु
भरिअइसुस्सुहुपुणुभरिउ ॥१॥

९६ तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ९
तुरिआणन्तरलग्गु
घडुबोहिणहंउजोअसिपह ।
वितत्त समत्थफुरणकमेण
कमेणलिहालमिसाणमिपञ्चावतु ॥२॥
इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे तत्त्वभेदप्रकाशनं
नाम नवममाह्निकम् ॥९॥

नवम आह्निक
अब तत्त्वों के भेद का निरूपण किया जाता है।
परमेश्वर ने त्रिकशास्त्र में प्रमाताओं के भेद सात प्रकार बतलाया है।
वे प्रमाता शिव, मन्त्रमहेश्वर, मन्त्रेश्वर, मन्त्र, विज्ञानाकल, प्रलयाकल
ओर सकल हैं, वे सात शक्तिमान हैं। इनकी सात शक्तियाँ हैं, जिनके
भेद से अर्थात् शक्तिमान् तथा शक्ति के भेद से पृथिवी से प्रधान तक
चौबीस तत्त्व चौदह प्रकार के भेद तथा अपने निजी स्वरूप के साथ
पन्द्रह प्रकार बनते हैं। इसमें जो निजी रूप है उसमें जो प्रमेयता की
योग्यता है वह अपने स्वरूप में ही स्थित है वही उसका जड़ रूप है—
यह अपराभट्टारिका के अनुग्रह से होता है।
जिन प्रमाताओं में शक्ति का विकास हुआ है और शक्ति में ही
श्रो परापरा देवी के अनुग्रह से विश्राम प्राप्त हुआ है वह उसी का शाक्त-
रूप है। ये ( शाक्त रूप भी ) सात प्रकार है क्योंकि शक्तियों की संख्या
उतनी ही हैं। शक्तिमान् रूप की प्रधानता आने पर प्रमाताओं के स्वरूप
में विश्रान्त जो रूप है वह शक्तिमत्-शिवरूप है—ये स्थितियाँ श्री परा-
भट्टारिका देवी के अनुग्रह से प्राप्त होती हैं। ये भी सात हैं, क्योंकि
शिव से सकल तक प्रमाताओं की संख्या उतने ही है। इस विषय में
ज्ञातव्य यह है कि शक्ति के भेद से ही प्रमाताओं का भेद उत्पन्न होता है।
इस भेद के स्पष्टीकरण के लिए सकल आदि के क्रम से उसका उल्लेख
किया जाता है। इस प्रसंग में उल्लेख्य है कि सकल आत्मा की शक्तियाँ
विद्या और कला हैं—उन दोनों के ही विशेषरूप बुद्धि और कर्मेन्द्रियों की
शक्तियाँ हैं। प्रलयाकल आत्मा में वे शक्तियाँ निर्विषयक होने के कारण
विद्या और कला अस्फुट हैं। विज्ञानाकल आत्मा में शक्तियाँ प्रायशः
क्षीण अवस्था प्राप्त करती हैं। उनके संस्कार से युक्त और प्रबुद्धस्थिति
प्राप्त करने वाली शुद्धविद्या मन्त्ररूपी आत्मा में स्थित है। कला और
विद्या के संस्कार से रहित अथवा प्रबुद्ध शुद्धविद्या मन्त्रेश्वर की साथी है।
वही शुद्धविद्या जो उन्मुख इच्छाशक्ति रूप है वह मन्त्रमहेश्वर की साथी
है। प्रस्फुट स्वातन्त्र्य शक्तिरूपिणी इच्छाशक्ति शिव की निजी शक्ति
है। अतः ये सात ही मुख्य शक्तियाँ हैं। इनके उपराग से प्रमाताओंमें
७

९८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ९
भिन्नता आती है, करणरूपी शक्तियों के भेद से कर्ताओं में भेद आते
हैं। यह भी ज्ञातव्य है कि जो शक्ति कर्ता से अभिन्न है वैसी शक्ति को
ही करण रूप में ग्रहण किया जा सकता है—दूसरे को नहीं, अन्यथा
अनवस्था का प्रसंग आता है। वस्तुतः एक ही प्रमाता है जो चित्
स्वातन्त्र्य और आनन्द में विश्रान्त है। जब पृथिवी केवल स्वरूप में ही
विश्रान्त रह कर वेद्य बनती है उस समय उसका स्वरूप ही केवल प्रतीति-
गोचर होता है।
चैत्र के आँखों द्वारा देखी हुई चैत्र के द्वारा विदित वस्तु को मैं
जानता हूँ इस प्रकार अनुभव में सब प्रकार शक्ति के द्वारा सब
प्रकार शक्तिमान के द्वारा विशेषित अन्य स्वरूप अवश्य ही भासते
हैं—इस प्रकार शिव तक तत्त्वों के सम्बन्ध में ऐसा कहना उचित
होगा, क्योंकि शिव और शक्ति में निष्ठित शिवस्वभाव में विश्रान्त
विश्व को मैं जानता हूँ इस प्रकार विलक्षण अनुभव भी होता है। अब
प्रश्न उठता है—अगर भावों की वेद्यता निजी स्वरूप है तो वह सबके
लिए वेद्य क्यों न बन जाता है, और वेद्यता भी फिर वेद्य हो जाती है
इस प्रकार अनवस्था आ जाती है और ऐसे होने पर जगत का अन्धत्व
स्पष्ट ही प्रतीत होने लगेगा। केवल इतना ही नहीं वेद्यत्व अवेद्यत्व रूप
विरुद्ध धर्म का योगरूपी महान् दोष भी आ जायेगा। इस आपत्ति के
उत्तर में मैं कहता हूँ कि वेद्यता भावों का निजी स्वरूप नहीं अपितु स्वरूप
उससे भिन्न है ऐसा वर्णित किया गया है। तब वह क्या है ? प्रमातारूपी
शक्ति में और प्रमाता में जो विश्राम प्राप्त हो सकता है वही उसका
स्वरूप है, वह वास्तविकतया स्वप्रकाशरूप है जो प्रकाशित होता है,
इस लिए वह किसी के प्रति प्रकाशमान नहीं होता है--अतः अनवस्था-
रूप दोष और विरुद्ध धर्म योग की आपत्ति दूर हो गयी है। अनन्त
प्रकार के प्रमाताओं के द्वारा संवेद्यमान होते हुए भी वह ( वेद्यता ) एक
ही है, उसका रूप ( शक्ति-शक्तिमद् रूप ) उतना ( एक ) ही है, क्योंकि
उन सभी का आभास एक ही है, अतः भिन्न भिन्न प्रमाताओं के संवेदनों
में किसी प्रकार बाधा उत्पन्न नहीं होती है। उसका जो रूप है वह
कल्पित नहीं अपितु सत्य है, क्योंकि अर्थक्रियाकारिता का निर्वाह भी उसी
प्रकार है। दूसरे के द्वारा देखी गयी अपनी प्रियतमा पर भर्ता की ईर्ष्या
उत्पन्न होती है, फिर शिव स्वभाव विश्राम भूमिरूपी कुम्भ को देख कर
समावेश उत्पन्न होता है, सब प्रकार और अनन्तप्रमाताओं के विश्रामभूमि-

आ. ९ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ९९
रूपी वस्तु को देख कर परिपूर्णता आती है जैसे नृत्य करने वाली के नृत्य
को देखने के समान उसी नील का जो स्वरूप प्रमाता में विश्रान्त रहता
है उसके उसी रूप में स्वप्रकाश विमर्श का उदय होता है—अतः पृथिवी
से प्रधान तक तत्त्वों की पंचदशात्मकता सिद्ध होता है। जिन प्रमाताओं
में राग आदि कंचुकों की जागरुकता आ जाती है उन सकल अर्थात् कला
से युक्त प्रमाता में वेद्यधर्मता आने के कारण उनमें भी पंचदशता रहती
है। इस विषय का विस्तृत विवरण तंत्रालोक में वर्णित किया गया है।
पुरुष से लेकर कलातत्त्व तक तत्त्वों का स्वरूप तेरह हैं—सकल आत्मा
की प्रमातृता रहने के कारण उसमें शक्ति और शक्तिमान् इन दो रूप
प्रत्यस्तमित हो जाते हैं, उस सकल आत्मा में केवल स्वरूप ही स्थित
रहता है। प्रलयाकल आत्मा का स्वरूप को लेकर और पाँचों को प्रमाता
के रूप में ग्रहण करने पर शक्ति शक्तिमान के भेद ग्यारह होते हैं। उसी
प्रकार विज्ञानाकल के स्वरूप को लेकर और बाकी चारों को प्रमाता के
रूप में ग्रहण करने पर नौ भेद हैं। मन्त्र के स्वरूप को लेकर तीनों को
प्रमाता के रूप में ग्रहण करने पर सात भेद हैं। मन्त्रेश्वर के स्वरूप को
लेकर और दो को प्रमाता के रूप में ग्रहण करने पर पाँच भेद हैं। मन्त्र-
महेश्वर के स्वरूप को लेकर एकमात्र परमेश्वर को प्रमाता के रूप में
ग्रहण करने पर शक्ति तथा शक्तिमान के भेद से तीन भेद हैं। शिव जो
एकमात्र प्रकाश तथा चैतन्यमय और स्वातन्त्र्य-निर्भर हैं उसमें कोई भेद
नहीं है क्योंकि वे परिपूर्ण-स्वभाव हैं।
इस प्रकार तत्त्वों के जो भेद 'परमेश्वरानुत्तरनयैक' नामक ग्रंथ में
निरूपण किये गये हैं वही भुवनों के भेद-हेतु नाना विचित्रता के कारण
बनते हैं; क्योंकि नरक, स्वर्ग और रुद्र के भुवनों की पार्थिवता समान
होने पर भी दूर में स्थित स्वभाव के जो भेद हैं वही उसका कारण
बतलाया गया है।
इस विषय में परस्पर भेदों की गणना होने पर कितने अवान्तर भेद
होते हैं कौतहूली पाठक इसे जानने के लिए तन्त्रालोक से जान लें। अतः
एक-एक घंटे के अनुसरण के द्वारा भी पृथ्बी आदि तत्त्वों के भेद का
निरूपण हुआ है।
अब समग्र पृथ्वी तत्त्व जो प्रमाता और प्रमेय रूप है उसके सम्बन्ध
में निर्देश किया जा रहा है। जो प्रकाश धरातत्त्व के साथ अभिन्न रूप

१०० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ९
में प्रकाशित होता है वह शिव है—जैसे श्रुति में कहा गया है—'यह जो
पृथिवी है वही ब्रह्म है।' जो धरातत्त्व में सिद्धि प्राप्तों को प्रेरित करते हैं
वे धरामन्त्रमहेश्वर हैं, जो प्रेरित होते हैं वे धरामन्त्रेश्वर हैं, उस धरातत्त्व
में अभिमानवश जो विग्रह धारण किये हैं उनका वाचक मन्त्र हैं। सांख्य
आदि पशु शास्त्रों में निरूपित विद्या से उत्तीर्ण और शिवशास्त्रोक्त विद्या
के द्वारा पार्थिव योग में जो अभ्यस्त हुए हैं अथच ध्रुवपद को प्राप्त नहीं
हुए हैं वे धराविज्ञानाकल कहलाते हैं। पशुशास्त्र में कथित विद्या की
प्रक्रिया से जो व्यक्ति पार्थिव योग में अभ्यस्त हुआ है वह कल्प के अन्त
में या मृत्यु के अनन्तर धराप्रलयाकेवल स्थिति को प्राप्त करता है।
सुषुप्त अवस्था में विचित्र स्वप्नों का उदय होगा, जिसमें धरासम्बन्धी
अभिमान वर्तमान है वह धरा-सकलरूपी आत्मा है। इसमें भी शक्ति के
उद्रेक और न्यग्भाव के कारण चतुर्दशता है, इस प्रकार प्रमातारूप धारण
करनेवाले धरातत्त्व के भेद हैं, इसका स्वरूप शुद्ध प्रमेय है। इस प्रकार
अन्यस्थल में भी जानना चाहिए।
अब एक प्रमाता के प्राण में उसकी स्थिति के अनुसार जो भेद उत्पन्न
होते हैं उसका निरूपण हो रहा है।
नील के ग्रहण करते समय प्राण सोलह त्रुटियों का स्वरूप धारण कर
वेद्य वस्तु तक उदित होता है। इन सोलहों में पहली त्रुटि केवल अविभाग
रूपी है, दूसरी त्रुटि ग्राहकरूपता को उल्लसित ( जगाता ) करता है,
सबसे अन्तिम त्रुटि ग्राह्य वस्तु से अभिन्न है और ग्राह्य वस्तु का स्वरूप
धारण करता है, अन्तिम त्रुटि के संलग्न ( उपान्त्य ) त्रुटि स्फुट
ग्राहक रूपी है। इन चारों से भिन्न मध्य में स्थित जो बारह त्रुटियाँ हैं
उनमें से पहले की छः त्रुटियाँ निर्विकल्प-स्वभाव हैं ओर वे विकल्पों के
आच्छादक हैं। इन षट्कों में सबसे पहली स्वरूपतः एक त्रुटि है।
विकल्पों को आवृत्त करनेवाली त्रुटियाँ पाँच हैं जैसे उन्मेष करने की
इच्छा, उन्मिषत्ता—ये दो स्फुट क्रियारूपी होने के कारण दो त्रुटिवाली
हैं, क्योंकि स्पन्दन ( क्रिया ) एकक्षण स्थायी नहीं होती है, उन्मिषितता,
अपने कार्यों का कर्तृत्व इस प्रकार आवृत्त किये जानेवाले विकल्पों की
संख्या पाँच होने के कारण और निजी स्वरूप इन सबको लेकर निर्वि-
कल्पक स्थिति छः क्षण स्थायी है। इसके उपरान्त विकल्प की ध्वंस-
मान्ता, विकल्प का नाश, उन्मेष की उन्मुखता और उन्मिषत्ता जो दो

आ. ९ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १०१
त्रुटिवाली है, उन्मिषितता ये छः त्रुटियाँ हैं। परन्तु स्वकार्यकर्तृता जो
ग्राहक रूप है अतः इसकी गिनती नहीं होती है। इसलिए विचारशील
विद्वान जो गुरु के उपदेश के अनुसार चलते हैं सब जगह (अर्थात् धरा
से प्रकृति तत्त्व तक सभी जगह) इस प्रकार पञ्चदशात्मकता का विवेचन
करते हैं। विकल्पों की न्यूनता आने पर त्रुटियों की न्यूनता आती है जैसे
सुख के अनुभव के समय दुःख के विस्मरण के समान विकल्प का भी
विश्राम अविकल्प स्थिति तक हो जाता है। विकल्प की विश्रान्ति के
द्वारा लोग उस अहन्तामयी स्थिति जो अहन्ता द्वारा आवृत इदं-भाव-रूप
विकल्प की प्रसरभूमि निर्विकल्प स्थिति रूपी विमर्श भूमि है जो अभी
अप्रकाशित है ऐसे मानते हैं। दुःखरूपी स्थिति को सुख में विश्रान्त होने
के समान विकल्प के ह्रास के द्वारा उसका प्रकाशन होता है, इसलिए
ग्राह्य और ग्राहकों में जो सम्बन्ध है उसकी ओर अवधानता आवश्यक
है—ऐसा ही श्रीअभिनवगुप्त के गुरुओं का अभिमत है।
पञ्चदशात्मकता की स्थिति इस प्रकार होनेपर स्फुट इदन्तात्मक भेद
की न्यूनता दो-दो के क्रम से जैसे-जैसे होती रहती है और अन्त में दो
त्रुटिवाले शिवावेश सम्पन्न होता है। उन दो त्रुटियों में पहली त्रुटि सब
प्रकार से परिपूर्ण है और दूसरी त्रुटि सब प्रकार ज्ञान और करणों से
परिपूर्ण है इस प्रकार अभ्यास से वह सर्वज्ञत्व और सर्वकर्तृत्व के प्रदान
करनेवाली बन जाती है—लेकिन आद्य त्रुटि ऐसी नहीं है। श्रीकल्लट
आचार्य ने इसलिए कहा है—‘त्रुटिपात इति’। यहाँ पात शब्द से वही
भगवती श्रीमत्काली, मातृसद्भाव, भैरव, प्रतिभा को समझना चाहिए।
अब इस रहस्य को खोलना उचित नहीं लगता है।
इस प्रकार मन्त्रमहेश्वर सम्बन्धी त्रुटि से आरम्भ कर अन्य-अन्य
त्रुटियों के अभ्यास से भिन्न-भिन्न प्रकार की सिद्धियाँ आती हैं। इसके
उपरान्त इसीमें जाग्रत् आदि स्थितियों का निरूपण हो रहा है। उसमें वेद्य
के और उसके सम्बन्धी संवित् की जो विचित्रता है उसके परस्पर की अपेक्षा
से जिन अवस्थाएँ हैं वही जाग्रत् आदि हैं। यह न केवल वेद्य और संवित्
की अवस्था नहीं, न तो यह एक दूसरे से पृथक् भी नहीं। जब अधिष्ठेय
(आधार) के रूप में बाह्य वस्तु के रूप में इसकी प्रतीति होती है तब
जाग्रत स्थिति मेय, माता और मान (प्रमाण) के रूप में प्रकट होती
है। जब उसी स्थिति में अधिष्ठान (प्रमाण) के रूप में उसका भान

१०२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ९
अर्थात् संकल्प का उदय होता है तब उसे स्वप्नावस्था कहते हैं। जब
उसी स्थिति में प्रमाता के साथ एकात्मता अर्थात् भावी कार्यों के बीज
के रूप में भान होता है तब वही सुषुप्तावस्था है। यही तीन प्रमेय, प्रमाण
और प्रमाता रूप अवस्थाएँ जाग्रदादि के भेद से चार प्रकार स्थितियों से
प्राप्त करती हैं—ऐसा कहा गया है।
जब प्रमाता के स्वरूप में विश्रान्त प्रमाता की पूर्णता के प्रति जो
आभिमुख्य है उस उन्मुखता के द्वारा पूर्णता-उन्मुखीन जो भान है तब
वही तुर्यावस्था है। इसका रूप 'मैं इस रूप को दृष्टि के द्वारा इस प्रकार
प्रमेय, प्रमाण और प्रमाता आदि तीन रूपों को अतिक्रमण कर देखता
हूँ' इस प्रकार उपायहीन (अनुपायिक) प्रमातृता के रूप में भासित होता
है जिसका सार ही स्वतन्त्रता है जो नैकट्य, मध्यत्व और दूरत्व के द्वारा
अवस्थाओं में प्रमाणता और प्रमेयता रूप धर्म का आधान करती है और
तीन अवस्थाओं का अनुग्राहक बन जाती है और तीन प्रकार बन जाती
है। ये चार अवस्थाएँ योगिगण पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ, रूपातीत शब्दों
के द्वारा वर्णन करते हैं। ज्ञानी पुरुषगण इन्हें सर्वतोभद्र, व्याप्ति, महा-
व्याप्ति, प्रचय आदि शब्दों से वर्णना करते हैं। इन शब्दों की सार्थकता
का उल्लेख तन्त्रालोक और मालिनीविजयवार्तिक में हुआ है। सबमें
अनुस्यूत जो पूर्णरूप है और जो तुर्यातीत और सबके अतीत स्वरूप है
उसे ही महाप्रचय के रूप में ज्ञानियों के द्वारा निरूपण हुआ हैं। अपितु
जिसका स्वरूप जब स्फुट, स्थिर, अनुबन्धी (एक दूसरे से सम्बन्धित)
रहता है वह जाग्रत् है। उसका विपरीत जो स्वरूप है वह स्वप्न है।
प्रलयाकल का जो भोग है और जो वस्तु के बोध का अभाव रूप है वह
सुषुप्त है। विज्ञानाकल आत्मा का जो भोग है तथा भोग्य वस्तु के साथ
अभिन्नता का आपादन करता है वही तुर्य है और वही मन्त्र आदि
अधिकारी पुरुषों का भोग है। सभी भावों की शिव के साथ जो अभिन्नता
है वह तुर्यातीत है जो सबकी अतीत स्थिति है। उसमें स्वरूपसकल
१. प्रलयाकल, २. विज्ञानाकल, ३. मन्त्र मन्त्रेश्वर मन्त्रमहेश्वर, ४ शिव
इनके पन्द्रह भेदों में पाँच अवस्थाएँ हैं। स्वरूप, प्रलयाकल आदि के क्रम
से तेरह भेद हैं। स्वरूप, विज्ञानाकल की शक्ति, विज्ञानाकल आदि के
क्रम से ग्यारह भेद हैं। स्वरूप, मन्त्र, मन्त्रेश्वर, मन्त्रमहेश्वर, शिव आदि
के क्रम से नौ भेद हैं। स्वरूप, मन्त्रेश्वर, मन्त्रमहेश्वर, शक्ति और शिव

आ. ९ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १०३
आदि के क्रम से सात भेद हैं । स्वरूप, महेशशक्ति, महेश, शक्ति और शिव
ये पाँच भेद हैं । स्वरूप, क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति, इच्छाशक्ति और शिव
तीन भेदों में हैं। शिवतत्त्व में भिन्नता का अभाव है इसलिए उसमें क्रिया,
ज्ञान, इच्छा, आनन्द और चित् की कल्पना से ज्ञानी तथा योगीगण
पञ्चरूपता का अङ्गीकार करते हैं ।
पृथ्वी आदि तत्त्वों के समूहों में प्रमाता का वास्तविक स्वरूप संवित्
में विश्रान्त न रहकर विचित्र तथा विविध रूपों में भासित होता है
लेकिन उनका जो प्रमातृरूप निखिल वेद्यसमूहों में विविध क्रमरूपी है
वह निर्विकल्प अहन्तात्मक है उसका सार स्वातन्त्र्य परामर्शमय है।
आप इस भूमि में स्थित हों और अपना आत्मस्वरूप प्राप्त करें ।
इति श्री अभिनवगुप्त रचित तन्त्रसार का
नवम आह्निक ।