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तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 294 में से

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पृष्ठ 165

८४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ८
अभिलाष रूप है जहाँ कर्म केवल कर्मरूप है१, राग जो बुद्धि का धर्म है
वह बुभुक्षा, पिपासा रूप होकर विचित्र रूप धारण करता है—इसका
विभाग के बारे में आगे बतलायेंगे। यह जो मल है वह ईश्वर के स्वरूप
गोपन करने की इच्छा से भिन्न अन्य कुछ नहीं है, फिर यह स्वरूप-गोपन
इच्छात्मक होकर ही पृथिवी वस्तुरूपी है। यह मल विज्ञान केवली आत्मा
में वर्तमान है, लेकिन वह मल ध्वंसोन्मुख है इसलिए अपना कार्य कर्म
की पुष्टि उससे नहीं होती है। प्रलयाकेवली आत्मा में मल फलोन्मुख होकर
स्थित है—अतः कर्म मल की सहकारिता प्राप्त कर संसार के वह नाना
प्रकार भोग के सम्पादन का निमित्त बनता है। इसलिए यह ठीक ही कहा
गया है कि विभिन्न प्रकार भोग की वासनाओं से मलिन अणुओं ( जीवों )
के भोग के सम्पादन के लिए श्रीमान् अघोरेश सृष्टि के कार्य करते हैं। मल
का क्षोभ ईश्वर की इच्छारूपी बल से होता है, क्योंकि जड़ (अचेतन) वस्तु
का स्वभाव से कहीं कुछ करने की शक्ति नहीं रहती है। जिसे अणु कहते
हैं वह चित् और अचित् रूप का आभासन है, उसका (अणुका) जो चिद्रूप
है वह ऐश्वर्य रूप ही है और जो अचिद्रूपता है वही मल है, उसकी उत्पत्ति
१. कला का स्वरूप स्वल्प कर्तृत्व रूप है। इस स्वरूप में विशेषणभाग किञ्चित्
अर्थात् स्वल्प है और इसका विशेष्यभाग कर्तृत्व है। यही कला माया से
उत्पन्न होती है। कला के कारण ही पुरुष में जो पूर्णकर्तृत्व है वह आवृत्त
होकर स्वल्पकर्तृत्व आ जाता है। ज्ञान के बिना कर्तृत्व किस आधार पर
होगा इसलिए कला से अशुद्ध विद्या का उदय होता है जो पुरुष में स्वल्प-
ज्ञता लाती है। लेकिन इतने से ही आत्मा को अपूर्णता पूरी नहीं होती
क्योंकि यह जो स्वल्पता है जिसके कारण आत्मा क्यों एक विशेष वस्तु को
ही जानता है और विशेष वस्तु के करने में ही समर्थ है—इसके उत्तर में
कहा जाता है कि उस पशु की आसक्ति या राग ही विशेष वस्तु की ओर
उसे आकृष्ट करता है और सभी प्रकार के भोग्य विषय अशुचि होने पर भी
उसे अच्छा लगता है। जीव का स्वल्प कर्तृत्व स्वल्पज्ञत्व और 'मुझे कुछ
मिल जाय' इस प्रकार राग के अलावा उसका कर्तृत्व भी काल के द्वारा
खण्डित हो जाता है और इसका स्वरूप 'मैंने किया, करता हूँ, करूँगा'
इस प्रकार कालाधीन होता है। फिर इसके अनन्तर वह जीव 'इस कारण
से इस प्रकार कार्य की उत्पत्ति होती है' ऐसे नियम के भी अधीन बन
जाता है।