तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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परमेश्वर की इच्छारूपी है और उसी इच्छा से निरन्तर जो जो वस्तुएँ
उत्पन्न होनेवाली हैं और जिसका रूप अचेतनरूप से आभासित होंगे वही
जड़ रूपी माया नामका तत्त्व है जो समस्त कार्य वस्तुओं का व्यापक है
और उपादान भी है। इस उपादानरूपिणी मायातत्त्व के आभासन
करनेवाली परमेश्वर की माया नाम की जो शक्ति है वह तत्त्वरूपिणी
माया से भिन्न है। इसी प्रकार कला आदि तत्त्वों से लेकर पृथ्वी तत्त्व
तक सभी की द्विरूपता है। इनकी द्विरूपता के सम्बन्ध में श्रीअभिनवगुप्त
के गुरुचरणों ने प्रमाण का भी उल्लेख किया है। जो कुछ संकल्प में
पृथग् रूप में भासित होते हैं वे बाहर भी स्फुट रूप से घट जैसे भासते हैं।
अतः माया, कला और आकाश कुसुम आदि के विषय में यही मार्ग है इस
विषय में हेतु केवलान्वयी है। इस प्रकार से माया, कला, प्रकृति और
बुद्धि आदि विषयों में साक्षात्काररूपी ज्ञान जिनको उत्पन्न होता है वे भी
सिद्ध पुरुष हैं—यह सिद्ध हुआ। इस प्रकार की स्थिति में मायातत्त्व से
विश्व का उदय होता है। यह विश्वसृष्टि यद्यपि क्रमविहीन है तो भी
कार्यकारण-भाव की काल्पनिकता मानने पर क्रम का अवभास भी होता
है। इसका (क्रमका) उल्लेख किया जा रहा है। प्रत्येक आत्मामें कला
आदि वर्ग भिन्न-भिन्न है, क्योंकि उसके कार्य कर्तृत्व आदि का स्फुरण
प्रत्येक आत्मा में भिन्न-भिन्न रूप में अनुभूत होता है। कभी-कभी वह वर्ग
(कलादि) भिन्नता को छोड़कर ईश्वर की इच्छा से एक भी बन जाता है
नृत्य, गीत और वादन में सामाजिक पुरुषों को जैसे एकतानता आती है
उसी प्रकार यह सब कला आदि वर्ग जब शुद्ध होकर परमेश्वर विषयक
बनता है और उनके स्वरूपलाभ के अनुकूल बनकर अपने-अपने कार्य
करता है तब वही संसार का प्रतिकूल है। यह शुद्धता परमेश्वर की
शक्तिपात के कारण वैसा बनता है—इस विषय में आगे शक्तिपात की
व्याख्या के समय बतलायेंगे। अशुद्ध कला आदि इसके विपरीत है, माया
से कला उत्पन्न होती है—जो सुप्त अणु में किंचित् कर्तृत्व का आधान
करती है। अणु के साथ कला का योग ही संसाररूपी बीज की उच्छूनता
(किंचित् विकास) है। माया और अणु (जीव) के संयोग से उत्पन्न
कला माया में विकार उत्पन्न करती है। अणु आत्मा जो स्वभावतः
अविकारी है उसमें नहीं, अतः कला माया का ही कार्य है। इस प्रकार
परस्पर घनिष्ठसंश्लेष (सम्पर्क) होने के कारण पुरुष और कला में पृथक्त्व का
भान नहीं होता है। माया गर्भ में स्थित किसी अधिकारी ईश्वर की प्रसन्नत।