तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवम आह्निक
अब तत्त्वों के भेद का निरूपण किया जाता है।
परमेश्वर ने त्रिकशास्त्र में प्रमाताओं के भेद सात प्रकार बतलाया है।
वे प्रमाता शिव, मन्त्रमहेश्वर, मन्त्रेश्वर, मन्त्र, विज्ञानाकल, प्रलयाकल
ओर सकल हैं, वे सात शक्तिमान हैं। इनकी सात शक्तियाँ हैं, जिनके
भेद से अर्थात् शक्तिमान् तथा शक्ति के भेद से पृथिवी से प्रधान तक
चौबीस तत्त्व चौदह प्रकार के भेद तथा अपने निजी स्वरूप के साथ
पन्द्रह प्रकार बनते हैं। इसमें जो निजी रूप है उसमें जो प्रमेयता की
योग्यता है वह अपने स्वरूप में ही स्थित है वही उसका जड़ रूप है—
यह अपराभट्टारिका के अनुग्रह से होता है।
जिन प्रमाताओं में शक्ति का विकास हुआ है और शक्ति में ही
श्रो परापरा देवी के अनुग्रह से विश्राम प्राप्त हुआ है वह उसी का शाक्त-
रूप है। ये ( शाक्त रूप भी ) सात प्रकार है क्योंकि शक्तियों की संख्या
उतनी ही हैं। शक्तिमान् रूप की प्रधानता आने पर प्रमाताओं के स्वरूप
में विश्रान्त जो रूप है वह शक्तिमत्-शिवरूप है—ये स्थितियाँ श्री परा-
भट्टारिका देवी के अनुग्रह से प्राप्त होती हैं। ये भी सात हैं, क्योंकि
शिव से सकल तक प्रमाताओं की संख्या उतने ही है। इस विषय में
ज्ञातव्य यह है कि शक्ति के भेद से ही प्रमाताओं का भेद उत्पन्न होता है।
इस भेद के स्पष्टीकरण के लिए सकल आदि के क्रम से उसका उल्लेख
किया जाता है। इस प्रसंग में उल्लेख्य है कि सकल आत्मा की शक्तियाँ
विद्या और कला हैं—उन दोनों के ही विशेषरूप बुद्धि और कर्मेन्द्रियों की
शक्तियाँ हैं। प्रलयाकल आत्मा में वे शक्तियाँ निर्विषयक होने के कारण
विद्या और कला अस्फुट हैं। विज्ञानाकल आत्मा में शक्तियाँ प्रायशः
क्षीण अवस्था प्राप्त करती हैं। उनके संस्कार से युक्त और प्रबुद्धस्थिति
प्राप्त करने वाली शुद्धविद्या मन्त्ररूपी आत्मा में स्थित है। कला और
विद्या के संस्कार से रहित अथवा प्रबुद्ध शुद्धविद्या मन्त्रेश्वर की साथी है।
वही शुद्धविद्या जो उन्मुख इच्छाशक्ति रूप है वह मन्त्रमहेश्वर की साथी
है। प्रस्फुट स्वातन्त्र्य शक्तिरूपिणी इच्छाशक्ति शिव की निजी शक्ति
है। अतः ये सात ही मुख्य शक्तियाँ हैं। इनके उपराग से प्रमाताओंमें
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