स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३२७
सकता है—कार्यकारणभावमूलक ( Cosmological ), सत्तामूलक ( Ontological ), प्रयोजनमूलक
( Teleological ) ।
( १ ) कार्यकारणभावमूलक : न्याय-वैशेषिकोंका ईश्वरकी सिद्धिमें यह सुप्रसिद्ध प्रमाण है ।
नैयायिकोंका कहना है : 'जितने भी कार्य होते हैं, वे सब किसी बुद्धिमान कर्ताके बनाये हुए देखे जाते हैं ।
इसलिये पृथिवी, पर्वत आदि किसी कर्ताके बनाये हुए हैं, क्योंकि ये कार्य हैं। जो जो कार्य होते हैं, वे
किसी कर्ताकी अपेक्षा रखते हैं, जैसे घट । पृथिवी, पर्वत आदि भी कार्य हैं, इसलिये ये भी किसी कर्ताके
बनाये हुए है । यह कर्ता ईश्वर ही है ।'¹ शंका—हम जो घट आदि साधारण कार्योंको देखते हैं, उनका
कोई कर्ता अवश्य है परन्तु पृथिवी, पर्वत आदि असाधारण कार्योंके कर्ताका अनुमान नहीं किया जा सकता ।
अतएव 'जो कार्य होते हैं, वे किसी कारणकी अपेक्षा रखते हैं' यह अनुमान ठीक नहीं है । समाधान—
हमने उक्त अनुमानमें सामान्य रूपसे व्याप्तिका ग्रहण किया है । जिस प्रकार रसोईघरमें धूम और अग्निकी
व्याप्तिका ग्रहण होनेपर उस व्याप्तिसे पर्वत आदिमें भी धूम और अग्निकी व्याप्तिका ग्रहण किया जा सकता है,
उसी तरह घट आदि कार्य और कुम्हार आदि कर्ताका संबंध देखकर पृथिवी, पर्वत आदि सम्पूर्ण कार्योंके
कर्ताका अनुमान किया जाता है । उक्त अनुमानमें घट केवल दृष्टांतमात्र है। दृष्टांतके सम्पूर्ण धर्म दाष्टाँ-
तिक में नहीं आ सकते । इसलिये जैसे छोटेसे छोटे कार्यका कोई कर्ता है, उसी तरह बड़ेसे बड़े पृथिवी
आदि कार्योंका कर्ता ईश्वर है। शंका—अंकुर आदिके कार्य होनेपर भी उनका कोई कर्ता नहीं देखा
जाता, इसलिये उक्त अनुमान बाधित है । समाधान—अंकुर आदि कार्य हैं, इसलिये उनका कर्ता भी
ईश्वर ही है । ईश्वर अदृश्य है, अतएव हम उसे अंकुर आदिको उत्पन्न करता हुआ नहीं देख सकते ।
( २ ) सत्तामूलक : पश्चिमके एन्सेल्म ( Anselm ) और दकार्त ( Descarte ) आदि विद्वान ईश्वर-
के अस्तित्वमें दूसरा प्रमाण यह देते हैं कि यदि ईश्वरकी सत्ता न होती तो हमारे हृदयमें ईश्वरके अस्तित्व-
की भावना नहीं उपजती । जिस प्रकार त्रिभुजकी कल्पनाके लिये यह मानना आवश्यक है कि त्रिभुजके
तीन कोण मिलकर दो समकोणके बराबर होते हैं, उसी प्रकार ईश्वरकी कल्पनाके लिये ईश्वरका अस्तित्व
मानना अनिवार्य है ।² ( ३ ) प्रयोजनमूलक : ईश्वरके सद्भावमें तीसरा प्रमाण है कि हमें सृष्टिमें एक
अद्भुत व्यवस्था दृष्टिगोचर होती है । यह सृष्टिकी व्यवस्था और उसका सामंजस्य केवल परमाणु आदिके
संयोगके फल नहीं हो सकते । इसलिये अनुमान होता है कि कोई ऐसी शक्तिशाली महान् चेतनाशक्ति
अवश्य है जिसने इस सृष्टिकी रचना की है ।³
१. ह्यूम ( Hume ) आदि पश्चिमके विद्वानोंने इस तर्कका खण्डन किया है । इन लोगोंका कहना है कि
जिस प्रकार हम सम्पूर्ण कार्योंके कारणका पता लगाते-लगाते आदिकारण ईश्वर तक पहुँचते हैं, उसी
प्रकार ईश्वरके कारणका भी पता क्यों न लगाया जाय ? यदि हम ईश्वर रूप आदिकारणका पता लगा-
कर रुक जाते हैं, तो इससे मालूम होता है कि हम ईश्वरको केवल श्रद्धाके आधारपर मान लेना चाहते
हैं । जैन, बौद्ध आदि अनीश्वरवादियों ने भी यह तर्क दिया है ।
२. काण्ट ( Kant ) आदि पाश्चिमात्य दार्शनिकोंने इस युक्तिका खण्डन किया है । इन लोगोंका कथन
है कि यदि हम मनुष्य-हृदयमें ईश्वरकी कल्पनाके आधारसे ईश्वरके अस्तित्वको स्वीकार करें तो
"संसारमें जितने भिक्षुक हैं, वे मनमें अशर्फियोंकी कल्पना करके करोड़पति हो जायें।"
३. काण्ट (Kant), स्पेंसर, (Spencer), प्रोफेसर टिण्डल ( Tyndall ), प्रोफेसर नाइट ( Knight )
आदि विद्वानोंका कहना है कि हम ससीम ब्रह्माण्डको देखकर उससे असीम उपादान कारणका अनुमान
नहीं कर सकते । इसलिये जब तक हम अन्य प्रमाणोंके द्वारा ईश्वरका निश्चय न कर लें, अथवा जब
तक स्वयं ईश्वरके समान शक्तिशाली न बन जांय, तब तक ईश्वरके विषयमें हम अपना निर्णय नहीं दे
३२८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
आचार्य उदयनने ईश्वर की सिद्धिमें निम्न प्रमाणोंका उल्लेख किया है—
(क) सृष्टि कार्य है, इसलिये इसका कोई कारण होना चाहिये । (ख) सृष्टिके आदिमें दो
परमाणुओंमें संबंध होनेसे द्वयणुककी उत्पत्ति होती है, इस आयोजन-क्रियाका कोई कर्त्ता होना चाहिये ।
(ग) सृष्टिका कोई आधार चाहिये । (घ) बुनने आदि कार्योंको सृष्टिके पहले किसीने सिखाया होगा,
इसलिये कोई आदिशिक्षक होना चाहिये । (ङ) वेदोंमें कोई शक्तिका प्रदाता होना चाहिये । (च) कोई
श्रुतिका बनानेवाला होना चाहिये । (छ) वेदवाक्योंका कोई कर्ता होना चाहिये । (ज) दो परमाणुओंके
संबंधसे द्वयणुक बनता है, इसका कोई ज्ञाता होना चाहिये¹।
ईश्वरविषयक शंकायें
शंका—जगतके निर्माण करनेमें ईश्वरकी प्रवृत्ति अपने लिये होती है, अथवा दूसरेके लिये ? ईश्वर
कृतकृत्य है, उसकी सम्पूर्ण इच्छाओंकी पूर्ति हो चुकी है, अतएव वह अपनी इच्छाओंको पूर्ण करनेके लिये
जगतका निर्माण नहीं कर सकता । यदि ईश्वर दूसरोंके लिये सृष्टिकी रचना करता है तो उसे बुद्धिमान
नहीं कहा जा सकता । करुणासे बाध्य होकर भी ईश्वरने सृष्टिका निर्माण नहीं किया, अन्यथा जगतके
सम्पूर्ण प्राणियोंको सुखी होना चाहिये था ।² ईश्वरवादी—वास्तवमें करुणाके वशीभूत होकर ही ईश्वरकी
सृष्टिके निर्माण करनेमे प्रवृत्ति होती है³। ईश्वर भिन्न-भिन्न प्राणियोंके पुण्य और पाप कर्मोंके अनुसार
सृष्टिका सर्जन करता है, इसलिये सर्वथा सुखमय सृष्टिको रचना नहीं हो सकती । जीवोंके अच्छे ओर
बुरे कर्मोंके अनुसार जगतको रचना करनेसे ईश्वरको स्वतंत्रतामें कोई बाधा नहीं पड़ सकती । क्योंकि जिस
तरह अपने हाथ, पैर आदि अवयव अपने कार्यमें बाधक नहीं होते, इसी तरह जोवोंके कर्मोंकी अपेक्षा रख-
कर सृष्टिके निर्माण करने से ईश्वरको परावलम्बी नहीं कहा जा सकता । शंका—सृष्टिका बनानेवाला
ईश्वर शरीर सहित होकर सृष्टि रचता है, अथवा शरीर रहित होकर ? यदि ईश्वरको सशरीर माना
जाय तो ईश्वरको अदृष्टका विषय कहना चाहिये, क्योंकि सम्पूर्ण शरीर अदृष्टसे ही निश्चित होते हैं।
इसी प्रकार ईश्वरको अशरीरी भी नहीं मान सकते, क्योंकि अशरीर ईश्वर सृष्टिको उत्पन्न नहीं कर
सकता । ईश्वरवादी—जिस प्रकार शरीर रहित आत्मा शरीरमें परिवर्तन उत्पन्न करती है, उसी तरह
अशरीरी ईश्वर अपनी इच्छासे संसारका सर्जन करता है । ईश्वरमें इच्छा और प्रयत्नकी उत्पत्ति होनेके
लिये भी ईश्वरको सशरीरी मानना ठीक नहीं। क्योंकि ईश्वरकी इच्छा और प्रयत्न स्वाभाविक हैं, कारण
कि हम लोग ईश्वरकी बुद्धि, इच्छा और प्रयत्नको नित्य स्वीकार करते हैं।⁴ अथवा परमाणुओंको ही
सकते । इसलिये प्रयोजनमूलक अनुमानसे हम विश्वके नियामक अथवा संयोजक ईश्वरका ही अनुमान
कर सकते हैं, इससे विश्वके रचयिता अथवा उत्पादक ईश्वरका अनुमान नहीं हो सकता ।
१. कार्यायोजनधृत्यादेः पदात् प्रत्ययतः श्रुतेः ।
वाक्यात् संख्याविशेषाच्च साध्यो विश्वविदव्ययः ॥ न्यायकुसुमाञ्जलि ५-१ ।
२. जे. एस. मिल (J. S. Mill) आदि पश्चिमके विद्वानोंने भी ईश्वरके विरुद्ध यह शंका उपस्थित
की है ।
३. अनुपभुक्तफलानां कर्मणां न प्रक्षयः सर्गमन्तरेण च तत्फलोभोगाय नरकादिसृष्टिमारभते दयालुरेव
भगवान् । उपभोगप्रबन्धेन परिश्रांतानामंतरांतरा विश्रांतये जंतूनां भुवनोपसंहारमपि करोतीति सर्व-
मेतत्कृपानिबंधनमेव । न्यायमंजरी पृ. २०२ ।
४. यत्पुनर्विकल्पितं सशरीर ईश्वरः सृजति जगद् अशरीरो वेति तत्राशरीरस्यैव सृष्टत्वमस्याभ्युपगच्छामः ।
ननु क्रियावेशनिबन्धनकम् कर्तृत्वं न पारिभाषिकं तदशरीरस्य क्रियाविरहात् कथं भवेत् । कस्य च
कुत्राशरीरस्य कर्तृत्वं दृष्टमिति । उच्यते । प्रयत्नज्ञानचिकीर्षायोगित्वं कर्तृत्वमाचक्षते । तच्चेश्वरे
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३२९
ईश्वरका शरीर माना जा सकता है। जिस प्रकार हमारी आत्मामें इच्छा होनेके कारण हमारे शरीरमें क्रिया
होती है, उसी तरह ईश्वरकी नित्य इच्छासे परमाणुओंमें क्रिया होती है। शंका—ईश्वर प्रत्यक्ष, अनुमान,
आगम और उपमान प्रमाणोंसे सिद्ध नहीं होता। किसी पदार्थको प्रत्यक्ष प्रमाणसे जाननेके लिये इन्द्रिय और
पदार्थोंका संबंध होना आवश्यक है; परन्तु ईश्वरका इन्द्रियोंसे संबंध नहीं हो सकता, क्योंकि ईश्वरवादी
ईश्वरको इन्द्रियोंके विषयके बाह्य मानते हैं, इसलिये प्रत्यक्षसे ईश्वरको नहीं जान सकते। अनुमान प्रत्यक्ष-
पूर्वक ही होता है, अतएव ईश्वरका प्रत्यक्ष न होनेसे ईश्वरको अनुमानसे भी नहीं जान सकते। आप्तके उप-
देशमें और उपमान प्रमाणमें भी प्रत्यक्षकी आवश्यकता पड़ती है, इसलिये उपमान और शब्दसे भी ईश्वरकी
सिद्धि नहीं होती¹। ईश्वरवादी—ईश्वर हमारे इन्द्रियप्रत्यक्षका विषय नहीं है, यह ठीक है। परन्तु इससे
हम ईश्वरका अभाव सिद्ध नहीं कर सकते। अधिकसे अधिक हम यह कह सकते हैं कि ईश्वर प्रत्यक्षसे सिद्ध
नहीं किया जा सकता। परन्तु किसी हालतमें प्रत्यक्षसे ईश्वरका अभाव सिद्ध नहीं होता। अनुमानसे ईश्वरकी
सिद्धि और असिद्धि दोनों नहीं हो सकती। उपमान प्रमाणका ईश्वरसिद्धिसे कोई संबंध नहीं है। तथा शब्द
प्रमाणसे ईश्वरकी सिद्धि होती ही है²।
ईश्वरके विषयमें आधुनिक पाश्चात्य विद्वानोंका मत
पश्चिमके आधुनिक दार्शनिक विद्वान प्रायः ईश्वरको सृष्टिका कर्ता नहीं मानते हैं। इन लोगोंका कहना
है कि यदि ईश्वर सृष्टिका कर्ता होता और वह प्राणियोंका शुभचिन्तक होता तो गत यूरोपीय महायुद्धमें
असंख्य नर-नारियोंका रक्त पानीकी तरह कभी नहीं बहाया जाता। अतएव यदि सृष्टिकर्ता ईश्वर कृपालु है,
तो उसे नाना प्रकारके दुःख और व्याधियोंसे परिपूर्ण सृष्टिकी कभी रचना नहीं करनी चाहिये थी। इस बात-
को पाश्चात्य विद्वानोंने विभिन्न रूपोंमें प्रगट किया है। एच. जी. वेल्स ( H. G. Wells ) का कथन है
कि ईश्वरको सर्व शक्तिमान सृष्टिका सर्जक नहीं कह सकते। यदि ईश्वर सृष्टिके प्राणियोंको युद्ध, मृत्यु आदिसे
बचानेमें समर्थ होकर भी केवल अपनी क्रीड़ाके लिये ही सृष्टिका निर्माण करता है तो मैं उसे घृणाकी दृष्टिसे
देखता हूँ। विलियम जेम्स ( William James ) के कथनानुसार हमें ऐसे ईश्वरकी आवश्यकता है जो
हमारे जैसा ही हो, और हम उसे अपना मित्र, साथी, नायक, सेनापति और राजा मानकर अपनी असहाय
और हीन दशामें उससे सहानुभूति प्राप्त कर सकें। इस विश्वमें ईश्वरीय क्रम दिखाई नहीं देता, इसलिये हम
अनादि, अनन्त ईश्वरकी कल्पना नहीं कर सकते। प्रो. हेल्महोल्ट्ज़ ( Prof. Helmholtz ) का कहना
है कि आंखमें वे सब दोष हैं जो किसीके देखनेके यंत्रमें पाये जा सकते हैं, और कुछ अधिक भी। इसमें कुछ
अत्युक्ति नहीं है कि यदि कोई चश्मा बेचनेवाला इन दोषोंवाला चश्मा मुझे देता तो मैं उसकी मूर्खता या
असावधानीको बड़े बलपूर्वक दिखाता और उसके चश्मेको लोटा देता। कॉमटे ( Comte ) आदिका कहना
है कि सौर्यमण्डल ऐसा नहीं बना जिससे अधिकसे अधिक लाभ हो सकता। आवश्यकता थी कि चांद पृथिवी-
के चारों ओर उतने ही समयमें घूमता जितनेमें पृथिवी सूर्यके चारों ओर घूमती है। यदि ऐसा होता तो चांद
हर रातको पूरा-पूरा चमका करता। लैंग ( Lange ) और हक्सले ( Huxley ) आदि विद्वानोंका कथन
है, सृष्टिमें उतना ही अपव्यय है जितना खेतमें एक खरगोशको मारनेके लिये करोड़ों तोपें छोड़नेमें होता है।
१. ईश्वरविषयक अन्य शंकाओंके लिये देखिये न्यायमंजरी पृ. १९०-४।
२. कुसुमांजलि स्तवक ३। तथा देखिये श्रीधरकी न्यायकंदली, पृ. ५४-५७; जयन्तकी न्यायमंजरी, पृ. १९४
से आगे। जयन्तने ईश्वरकी सिद्धिमें सामान्यतोदृष्ट अनुमान दिया है—सामान्यतोदृष्टं तु लिंगमीश्वर-
सत्तायामिदं ब्रूमहे। पृथिव्यादिकार्यं धर्मि तदुत्पत्तिप्रकारप्रयोजनाद्यभिज्ञकर्तृपूर्वकमिति साध्यो धर्मः कार्य-
त्वात् घटादिवत्।
४२
३३० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
प्लोटिनस ( Plotinus ) कहा करता था कि मुझे तो अपनी उत्पत्तिकी रीतिका ध्यान करके लज्जा आती
है। इससे प्रतीत होता है या तो ईश्वर सृष्टिको न बनाता, या वह बुद्धिमान नहीं है। ईश्वरको चाहिये था
कि कान, नाक, या अंगूठा आदिसे सन्तोत्पत्ति करता¹। इसी प्रकार मैक्टैगर्ट ( McTaggart ), कैनन
राशडल ( Canon Rashdall ) आदि विद्वानोंने ईश्वरको अकर्ता और असर्वव्यापक माना है² ।
न्याय-वैशेषिक साहित्य
कणादके वैशेषिक सूत्रोंकी रचना अक्षपादके न्यायसूत्रोंसे पहले मानी जाती है। यूई ( Ui ) वैशेषिक
दर्शनकी उत्पत्ति बुद्धके समय, और कमसे कम ईसाकी प्रथम शताब्दीके अन्तमें वैशेषिकसूत्रोंकी रचनाका समय
मानते हैं। प्रशस्तपाद वैशेषिकसूत्रोंके समर्थ भाष्यकार हो गये हैं। इनका समय ईसाकी पाँचवी-छठी शताब्दी
बताया जाता है। वैशेषिकसूत्रोंके ऊपर रावणभाष्य और भारद्वाजवृत्ति नामके भाष्योंका भी उल्लेख मिलता
है। ये भाष्य आजकल लुप्त हो गये हैं। प्रशस्तपादभाष्य पर व्योमशेखरने व्योमवती, श्रीधरने न्याय-
कन्दली, उदयनने किरणावलि और श्रीवत्सने लीलावती, तथा नवद्वीपके जगदीश भट्टाचार्यने भाष्यसूक्ति और
शंकरमिश्रने कणादरहस्य टीकायें लिखी हैं। इसके अतिरिक्त शिवादित्यकी सप्तपदार्थी, लौगाक्षिभास्करकी
तर्ककौमुदी, विश्वनाथका भाषापरिच्छेद, तर्कसंग्रह, तर्कामृत आदि ग्रंथ वैशेषिकदर्शनका ज्ञान करनेके लिये
महत्त्वपूर्ण हैं।
न्यायसूत्रोंकी रचनाके विषयमें विद्वानोंका मतभेद है। प्रो. याकोबीका मत है कि न्यायसूत्र
२००-४५० ईसवी सन्में रचे गये हैं। यूई ( Ui ) ने इस समयको १५०-२५० ईसवी सन् स्वीकार किया
है। प्रो. ध्रुवने उक्त मतोंकी विस्तृत समालोचना करते हुए न्यायसूत्रोंके रचनाके समयको ईसवी सन्के पूर्व
दूसरी शताब्दी माना है³। वात्स्यायन न्यायसूत्रोंके प्रथम भाष्यकार गिने जाते हैं। इनका समय ईसाकी
चौथी शताब्दी माना जाता है। वात्स्यायन पर बौद्ध तार्किक दिङ्नागके आक्षेपोंका परिहार करनेके
लिये उद्योतकर ( ६३५ ई. स. ) ने वात्स्यायनभाष्य पर न्यायवार्तिककी रचना की। न्यायवार्तिक
पर वाचस्पतिमिश्रने ( ८४० ई. स. ) न्यायवार्तिक-तात्पर्यटीका लिखी। वाचस्पतिको न्यायसूचिनिबंध
और न्यायसूत्रोद्धारका भी कर्ता कहा जाता है। वाचस्पतिमिश्रने वेदांत, सांख्य, योग और पूर्वमीमांसा
दर्शनों पर भी ग्रंथोंकी रचनाकी है। वाचस्पतिके बाद जयंतभट्टका ( ८८० ई० स० ) नाम बहुत
महत्त्वका है। इन्होंने कुछ चुने हुए न्यायसूत्रों पर स्वतंत्र टीका लिखी है। जयन्तने न्यायमंजरी,
न्यायकलिका आदि ग्रन्थोंकी रचना की है। मल्लिषेणने स्याद्वादमंजरीमें जयन्तका उल्लेख किया है।
उदयन आचार्य दसवीं शताब्दीके विद्वान हैं। इन्होंने वाचस्पतिकी तात्पर्यटीकापर तात्पर्यटीका-
परिशुद्धि नामकी टीका, तथा न्यायकुसुमांजलि, आत्मतत्त्वविवेक, लक्षणावलि, किरणावलि, न्यायपरिशिष्ट
नामक ग्रंथोंकी रचना की है। उदयनकी रचनाओं पर, गंगेश नैयायिकके पुत्र वर्धमान आदिने
१. ये उद्धरण पं. गंगाप्रसाद उपाध्यायकी आस्तिकवाद नामक पुस्तकके १० वें अध्यायमें फ्लिन्ट ( Flint )
की Theism के आधारसे दिये गये हैं।
२. कहा जाता है कि जिस समय कुसुमांजलिके कर्ता उदयनके नाना युक्तियोंसे ईश्वरका अस्तित्व सिद्ध
करनेपर भी ईश्वरने दयालुताका भाव प्रदर्शन नहीं किया, उस समय उदयनने ईश्वरको ऐश्वर्यके
मदसे मत्त हुआ कहकर ईश्वरके अस्तित्वकी स्थितिको अपने अधीन बताकर निम्न श्लोककी रचना की-
ऐश्वर्यमदमत्तोऽसि मां अवज्ञाय वर्तसे ।
पराक्रान्तेषु बौद्धेषु मदधीना तव स्थितिः ॥
३. देखिये प्रो. ध्रुवकी स्याद्वादमंजरी भूमिका, पृ. ४१-५४।
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३३१
टीकायें लिखी हैं। इसके अतिरिक्त भासर्वज्ञका न्यायसार, तथा मुक्तावली, दिनकरी, रामरुद्री नामकी
भाषापरिच्छेदकी टीकायें, तर्कसंग्रह, तर्कभाषा, तार्किकरक्षा आदि न्यायदर्शनके उल्लेखनीय ग्रन्थोंमेंसे
हैं। न्यायदर्शनमें नव्यन्यायका जन्म मिथिलाके गंगेश उपाध्यायसे आरंभ होता है। गंगेशका जन्म
ई० स० १२०० में हुआ था । गंगेशने तत्त्वचिन्तामणि नामक स्वतंत्र ग्रन्थकी रचना की । इस ग्रंथमें नैया-
यिकोंके चार प्रमाणोंपर चर्चाकी गई है । तेरहवीं शताब्दीमें गंगेशके तत्त्वचिंतामणिपर जयदेवने प्रत्यक्षालोक
नामकी टीका लिखी । इसके पश्चात् वासुदेव सार्वभौम ( ई० स० १५०० ) ने तत्त्वचिंतामणिव्याख्या लिखी ।
वासुदेवके चैतन्य, कृष्णानंद, रघुनंदन और रघुनाथ नामके चार उत्तम शिष्य थे । इनमें रघुनाथने तत्त्वचिंता-
मणि पर दीधिति, और वैशेषिक मतका खंडन करनेके लिये पदार्थखंडन, तथा ईश्वरकी सिद्धिके लिये
ईश्वरानुमान नामक ग्रंथ लिखे । इसके अतिरिक्त मथुरानाथ ( १५८० ई. स. ), जगदीश ( १५९० ई. स. )
और गदाधर ( १६५० ई० स० ) ने तत्त्वचिंतामणि पर टीकायें लिखकर नव्यन्यायको पल्लवित किया ।
सांख्य-योग परिशिष्ट ( घ )
( श्लोक २५ )
सांख्य, योग, जैन और बौद्ध दर्शनोंकी तुलना और उनकी प्राचीनता
सांख्य जैन और बौद्धोंकी तरह वेदोंको नहीं मानते, मीमांसकोंके यज्ञ-याग आदिकी निन्दा करते हैं,
तत्त्वज्ञान और अहिंसापर अधिक भार देते हैं, सांसारिक जीवनके दुख रूप साक्षात्कार करनेका उपदेश
करते हैं, जातिभेद स्वीकार नहीं करते, ईश्वरको नहीं मानते, संन्यासको प्रधानता देते हैं, जैनोंकी तरह
आत्मबहुत्ववाद और बौद्धोंके क्षणिकवादकी तरह परिणामवादको मानते हैं, तथा जैन और बौद्धोंके तीर्थंकरों-
की तरह कपिलका जन्म क्षत्रिय कुलमें होना स्वीकार करते हैं। इस परसे अनुमान किया जा सकता है कि
सांख्य, योग, जैन और बौद्ध इन चारों संस्कृतियोंको जन्म देनेवाली कोई एक प्राचीन संस्कृति होनी
चाहिये। ऋग्वेदमें एक जटाधारी मुनिका वर्णन आता है; इस युग में एक सम्प्रदाय वैदिक देवता और इन्द्र
आदिमें विश्वास नहीं करता। यह सम्प्रदाय वेदकी ऋचाओंपर भी कटाक्ष किया करता था। यजुर्वेदमें भी
वैदिक धर्मके विरुद्ध प्रचार करनेवाले यतियोंका उल्लेख आता है। एतरेय ब्राह्मण आदि ब्राह्मणोंमें भी वेदको
न माननेवाले सम्प्रदायोंकी चर्चा और कर्मकाण्डकी अपेक्षा तपश्चरण, ब्रह्मचर्य, त्याग, इन्द्रियजय आदि भाव-
नाओंकी उत्कृष्टताका उल्लेख किया गया है। उपनिषद् साहित्यमें तो ऐसे अनेक उल्लेख मिलते हैं जहां ब्राह्मण
क्षत्रिय गुरुसे अध्ययन करते हैं, ऋषि ब्रह्मचर्यको ही वास्तविक यज्ञ मानते हैं, वेदको अपराविद्या
कहकर यज्ञ, याग आदिका तिरस्कार करते हैं, और भिक्षाचर्याकी प्रधानताका प्रतिपादन कर ब्रह्मविद्याके
महत्त्वका प्रसार करते हैं। महाभारतमें भी जातिसे वर्णव्यवस्था न मानकर कर्मसे वर्णव्यवस्था माननेके,
अपनी आंख और शरीरका मांस आदि काटकर दान करनेके, तथा अनेक प्रकारकी कठोर तपश्चर्यायें
करनेके अनेक उदाहरण पाये जाते हैं। इस पर से ऋग्वेदमें भी एक ऐसी संस्कृतिके मौजूद रहनेका अनुमान
होता है, जो संस्कृति कर्मकाण्डकी अपेक्षा ज्ञानकाण्डको, और गृहस्थधर्मकी अपेक्षा संन्यासधर्मका अधिक महत्व
देती थी। १ इस संस्कृतिको श्रमण अथवा क्षत्रिय संस्कृति कह सकते हैं। २ उपनिषदोंका साहित्य अधिकतर
इसी सांसकृतिके मस्तिष्ककी उपज ३ कहा जाता है।
१. सिन्धमें मोहेन्जोदरो और हरप्पाकी खुदाईमें पायी जानेवाली ध्यानस्थ मूर्तियोंसे भी इस संस्कृतिकी
प्राचीनताका अनुमान किया जा सकता है।
२. ब्राह्मण और श्रमण इन दोनों वर्गोंके इतिहासका मूल बहुत प्राचीन है। जिस तरह ब्राह्मणोंके धर्मशास्त्र,
पुराण आदि ग्रन्थोंमें श्रमणोंका नास्तिक और असुरके रूपमें उल्लेखकर उनका स्पर्श करके सचेल स्नान
आदिका विधान किया गया है, उसी तरह जैन, बौद्ध आदिके ग्रन्थोंमें ब्राह्मणोंका मिथ्यादृष्टि, कुमार्गगामी,
अभिमानी आदि शब्दोंसे तिरस्कार किया गया है। जितेन्द्रबुद्धि आदि वैयाकरणोंने ब्राह्मण और श्रमणोंके
विरोधको सर्प और नकुलकी तरह जाति-विरोध कहकर उल्लेख किया है। विशेषके लिये देखिये पं०
सुखलालजीकी 'पुरातत्त्व' में प्रकाशित 'साम्प्रदायिकता अने तेना पुरावाओनुं दिग्दर्शन' नामक लेखमाला।
इस लेखमालाका इस पुस्तकके लेखकद्वारा किया हुआ हिन्दी अनुवाद 'जैनजगत' में भी प्रकाशित हुआ है।
३. विशेषके लिये देखिये, सन् १९३४ में बम्बईमें होनेवाली २१ वीं इन्डियन सांइस कांग्रेसके अवसरपर
रायबहादुर आर. पी. चन्दा ( R. P. Chanda ) का श्रमणसंस्कृति ( Shramanism ) पर पढ़ा
स्याद्वादमञ्जरी (परिशिष्ट) ३३३
सांख्य-योगदर्शन
सांख्य और योगदर्शन बुद्धके समयके पहिले दर्शन माने जाते हैं। १ पतंजलिके योगसूत्र
सांख्यप्रवचनके नामसे कहे जाते हैं, वाचस्पतिमिश्र भी सांख्य-योगके उपदेष्टा वार्षगण्यको
'योगशास्त्रव्युत्पादयिता' कहकर उल्लेख करते हैं, तथा स्वयं महर्षि पतंजलि सांख्य तत्त्वज्ञान
पर ही योग सिद्धांतोंका निर्माण करते हैं। इससे मालूम होता है कि किसी समय सांख्य और योग
दर्शनोंमें परस्पर विशेष अन्तर नहीं था। वास्तवमें सांख्य और योग दोनों दर्शनोंको एक दर्शनकी ही दो
धारायें कहना चाहिये। इन दोनोंमें इतना ही अन्तर कहा जा सकता है कि सांख्यदर्शन तत्त्वज्ञानपर अधिक
भार देता हुआ तत्त्वोंकी खोज करता है और तत्त्वोंके ज्ञानसे ही मोक्षकी प्राप्ति स्वीकार करता है, जब कि
योगदर्शन यम, नियम आदि योगकी अष्टांगी प्रक्रियाका विस्तृत वर्णन करके योगकी सक्रियात्मक प्रक्रियाओंके
द्वारा चित्तवृत्तिका निरोध होनेसे मोक्षकी सिद्धि मानता है।२ सांख्यदर्शनको कापिलसांख्य और योगदर्शनको
पातंजलसांख्य कह सकते हैं।
सांख्यदर्शन
शुद्ध आत्माके तत्त्वज्ञानको सांख्य कहते हैं३। अन्यत्र सम्यग्दर्शनके प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रको सांख्य
कहा है।४ अन्यत्र पच्चीस तत्त्वोंका वर्णन करनेके कारण सांख्यदर्शनको सांख्य कहा जाता है।५ गुणरत्नने
गया लेख; प्रो. विन्टरनीज़की Some Problems in Indian Literature नामक पुस्तकमें
Ascetic Literature ih Ancient lndia नामक अध्याय; इलियट ( Eliot ) की Hinduism
and Buddhism, भाग २, अध्याय ६ और ७।
१. वेबर ( Weber ) आदि विद्वानोंके मतमें सांख्यदर्शन सम्पूर्ण वर्तमान भारतीय दर्शनोंमें प्राचीनतम है।
महाभारतमें सांख्य और योगदर्शनका 'सनातन' कहकर उल्लेख किया है।
२. सांख्य और योगदर्शनमें भेद प्रदर्शन करनेके लिये सांख्यको निरीश्वर सांख्य और योगको सेश्वर सांख्य
भी कहा जाता है। न्यायसूत्रोंके भाष्यकार वात्स्यायनने सांख्य और योग दर्शनोंमें निम्न प्रकारसे भेदका
प्रदर्शन किया है—सांख्य लोग असत्की उत्पत्ति और सत्का नाश नहीं मानते। उनके मतमें चेतनत्व
आदिकी अपेक्षा सम्पूर्ण आत्मायें समान हैं, तथा देह, इन्द्रिय, मन और शब्दमै; स्पर्श आदिके विषयोंमें और
देह आदिके कारणोंमें विशेषता होती है। योग मतके अनुयायी सम्पूर्ण सृष्टिको पुरुषके कर्म आदि द्वारा
मानते हैं, दोष और प्रवृत्तिको कर्मोंका कारण बताते हैं, आत्मामें ज्ञान आदि गुणोंको, असत्की उत्पत्ति-
को, और सत्के नाशको स्वीकार करते हैं—नासतः आत्मलाभः न सत आत्महानम्। निरतिशयाश्चेतनाः।
देहेन्द्रियमनस्सु विषयेषु तत्कारणेषु च विशेष इति सांख्यानाम्। पुरुषकर्मादिनिमित्तो भूतसर्गः। कर्महेतवो
दोषाः प्रवृत्तिश्च। स्वगुणविशिष्टाश्चेतनाः। असदुत्पद्यते उत्पन्नं निरुध्यते। न्यायभाष्य १-१-२९।
३. शुद्धात्मतत्त्वविज्ञानं सांख्यमित्यभिधीयते। न्यायकोश पृ० ९०४ टिप्पणी
४. न्यायकोश पृ० ९०४।
५. पंचविंशतितत्त्वानां संख्यानं संख्या। तदधिकृत्य कृतं शास्त्रं सांख्यम्। हेमचन्द्र-अभिधानचिन्तामणि-टीका
३-५२६। यूनानी विद्वान पाइथैगोरस (Pythagoras) संख्या ( Number ) के सिद्धांतको मानते थे।
प्रो० विन्टरनीज ( Winternitz ) आदि विद्वानोंके अनुसार पाइथैगोरसपर भारतीय सांख्य सिद्धान्तों-
का प्रभाव पड़ा है। ग्रीक और सांख्यदर्शनकी तुलनाके लिये देखिये प्रो० कीथ ( Keith का Sam-
khya System अ० ६, पृ० ६५ से आगे।
३३४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
षड्दर्शनसमुच्चयकी टीकामें सांख्यमतके साधुओंके आचारका निम्न प्रकारसे वर्णन किया वै—“सांख्य मतके
अनुयायी साधु त्रिदंडी अथवा एकदंडी होते हैं, ये कौपीन धारण करते हैं, गेरुए रंगके वस्त्र पहिनते हैं, बहुतसे
चोटी रखते हैं, बहुतसे जटा बढ़ाते हैं, और बहुतसे छुरेसे मुंडन कराते हैं । ये मृगचर्मका आसन रखते हैं,
ब्राह्मणोंके घर आहार लेते हैं, पांच ग्रास मात्र भोजन करते हैं, और बारह अक्षरोंको जाप करते हैं। इनके
भक्त नमस्कार करते समय 'ओं नमो नारायणाय' कहते हैं, और साधु केवल 'नारायणाय नमः' बोलते
हैं । सांख्य परिव्राजक जीवोंकी रक्षाके लिए लकड़ीको मुखवस्त्रिका (बीटा) रखते हैं। ये जीवोंकी दया
पालनेके लिये स्वयं जल छाननेका वस्त्र रखते हैं और अपने भक्तोंको पानी छाननेके लिये छत्तीस अंगुल लंबा
और बीस अंगुल चौड़ा मजबूत बस्त्र रखनेका उपदेश देते हैं। ये मीठे पानीमें खारा पानी मिलानेसे जीवोंकी
हिंसा मानते हैं, और जलकी एक बूँदमें अनंत जीवोंका अस्तित्व स्वीकार करते हैं। इनके आचार्योंके
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३३५
प्रत्यक्ष अनुमान और शब्द ये तीन प्रमाण माने गये हैं। वैदिक ग्रन्थोंमें कपिलको नास्तिक और श्रुतिविरुद्ध १
तंत्रका प्रवर्तक कहकर कपिलप्रणीत सांख्य और पतंजलिके योगशास्त्रको अनुपादेय कहा है ।
सांख्यदर्शनके प्ररूपक
कपिल—सांख्यदर्शनके आद्य प्रणेता, आदि विद्वान कपिल परमर्षि कहे जाते हैं २ । कपिल क्षत्रिय थे ।
कुछ लोग कपिलको ब्रह्माका पुत्र बताते हैं । भागवतमें कपिलको विष्णुका अवतार कहकर उन्हें अपनी माता
देवहूतिको सांख्य तत्त्वज्ञानका उपदेष्टा कहा गया है ३ । विज्ञानभिक्षुने कपिलको अग्निका अवतार बताया है ।
श्वेताश्वतर उपनिषद्में कपिलका हिरण्यगर्भके अवतार रूपमें उल्लेख आता है । रामायणमें कपिल योगीको
वासुदेवका अवतार और सगरके साठ हजार पुत्रोंका दाहक बताया गया है । अश्वघोष बुद्धके जन्मस्थान
कपिलवस्तुको कपिल ऋषिकी बसाई हुई नगरी कहकर उल्लेख करते हैं। कपिलने अपने पवित्र और प्रधान
दर्शनको सर्व प्रथम आसुरिको सिखाया था ! आसुरिने पंचशिखको सिखाया और पंचशिखने इस दर्शनको
विस्तृत किया । पंचशिखके पश्चात् यह दर्शन भार्गव, वाल्मीकि, हारीत और देवल प्रभृतिने और ईश्वरकृष्णने
सीखा । कपिलको सांख्यप्रवचनसूत्र और तत्त्वसमास नामके ग्रंथोंका प्रणेता कहा जाता है, परन्तु इस कथनका
कोई आधार नहीं जान पड़ता ४ ।
आसुरि—आसुरि कपिलके साक्षात् शिष्य और पंचशिखके गुरु कहे जाते हैं । आसुरिका मत था कि
सुख और दुख बुद्धिके विकार हैं और ये जिस प्रकार चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब जलमें है, उसी तरह पुरुषमें प्रति-
विम्बित होते हैं ५ आसुरिके सिद्धांतोंके विषयमें विशेष पता नहीं लगता । आसुरिका समय ईसाके पूर्व ६००
वर्ष कहा जाता है ।
पंचशिख—वाचस्पतिमिश्र, भावागणेश आदि टीकाकार पंचशिखका उल्लेख करते हैं । भावागणेशकी
योगसूत्रवृत्तिसे मालूम होता है कि तत्त्वसमासपर पंचशिखने विवरण अथवा व्याख्या लिखी थी । पंचशिखका
वर्णन महाभारतमें आता है। कहा जाता है कि पंचशिख अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंद-
मय आत्माके शिखास्थानमें रहनेवाले ब्रह्माको जानते थे, इसलिये उनका नाम पंचशिख पड़ा। कपिल मतका
अनुसरण करनेके कारण पंचशिख कापिलेय नामसे भी कहे जाते थे । चीनके बौद्ध सम्प्रदायके अनुसार पंच-
१. अतश्च सिद्धमात्मभेदकल्पनयापि कपिलस्य तन्त्रं वेदविरुद्धं वेदानुसारि मनुवचनविरुद्धं च। ब्रह्मसूत्र, शांकरभाष्य
२-१-१ । तथा-नास्तिककपिलप्रणीतसांख्यस्य पतञ्जलिप्रणीतयोगशास्त्रस्य चानुपादेयत्वमुक्तं भारते मोक्षधर्मेषु—
सांख्यं योगः पाशुपतं वेदारण्यकमेव च।
ज्ञानान्येतानि भिन्नानि नात्र कार्या विचारणा ।।
गीता. मध्वभाष्य, अ. २ श्लो. ३९ । न्यायकोश पृ. ९०४ टिप्पणी ।
२. सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः पुरातनः ।
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः । महाभारत, मोक्षधर्म ।
प्रो. राधाकृष्णन् आदि विद्वान् सांख्य सिद्धांतके अव्यक्त बीजका ऋग्वेदमें पाये जानेका उल्लेख करते हैं।
३. कपिलस्तत्त्वसंख्याता भगवानात्ममायया ।
जातः स्वयमजः साक्षादात्मप्रज्ञप्तये नृणाम् । भागवत ३-२५-१ ।
४. सांख्यसूत्र सर्वप्रथम अनिरुद्ध ( १५०० ई. स. ) की वृत्ति सहित और कुछ समय बाद विज्ञानभिक्षुके
भाष्य ( १६५० ई. स. ) सहित देखनेमे आते हैं। अनिरुद्ध और विज्ञानभिक्षुके पूर्ववर्ती ईश्वरकृष्ण,
शंकर, वाचस्पतिमिश्र, माधव आदि विद्वान सांख्यसूत्रोंका उल्लेख नहीं करते, इस परसे विद्वान
सांख्यसूत्रोंको चौदहवीं शताब्दीके बाद बना हुआ अनुमान करते हैं ।
५. देखिये पृ. १३८ ।
३३६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
शिखको षष्टितंत्रका १ प्रणेता कहा जाता है, परन्तु यह ठीक नहीं है। पंचशिख चौबीस तत्त्वोंको स्वीकार करते
हैं और भूतोंके समूहसे आत्माकी उत्पत्ति मानते हैं। प्रो. दासगुप्तका मत है कि ईश्वरकृष्णकी सांख्यकारिका-
का और महाभारतमें वर्णन किये हुए सांख्यसिद्धान्तोंका चरक ( ७८ ई. स. ) में कोई उल्लेख नहीं मिलता,
इसलिए महाभारतमें आया हुआ पंचशिखका सांख्य मौलिक सांख्यदर्शन है, तथा सांख्यकारिकाका ईश्वरकृष्ण-
का सांख्य सांख्यदर्शनका अर्वाचीनका रूप है। गार्बे ( Garbe ) पंचशिखको ईसाकी प्रथम शताब्दीका
विद्वान कहते हैं।
वार्षगण्य —वार्षगण्य विन्ध्यवासीके गुरु थे। महाभारतमें वार्षगण्यको सांख्य-योगके प्रणेताओंमें माना
गया है। वाचस्पतिने इनका योगशास्त्र-व्युत्पादयिता कहकर उल्लेख किया है। अहिर्बुध्न्यसंहितामें और
वाचस्पति आदिने वार्षगण्यको षष्टितंत्रका रचयिता कहा है। इनका समय ईसवी सन् २३०-३०० कहा
जाता है।
विन्ध्यवासी —विन्ध्यवासीका उल्लेख मीमांसाश्लोकवार्तिक और तत्त्वसंग्रहपंजिका में आता है। इनका
असली नाम रुद्रिल था। वसुबंधुके जीवनचरितके लेखक परमार्थके अनुसार, विन्ध्यवासीने वसुबंधुके गुरु
बुद्धिमित्रको शास्त्रार्थमें पराजित करके अयोध्याके विक्रमादित्य राजासे पारितोषिक प्राप्त किया था । विन्ध्य-
वासी जय प्राप्त करके विन्ध्याचलको लौट गये और वहीं पर इन्होंने शरीर छोड़ा। इनका समय ई. स.
२५०-३२० कहा जाता है ।२
ईश्वरकृष्ण —ईश्वरकृष्ण सांख्यकारिकाके कर्ता हैं। सांख्यकारिको सांख्यसप्तति भी कहते हैं। यह
ग्रंथ षष्टितंत्रके आधारसे रचा गया है। सांख्यकारिकाके ऊपर माठर और गौड़पादने टीकायें लिखी हैं। बौद्ध
साधु परमार्थ छठी शताब्दीमें सांख्यकारिकाको चीनमें ले गये थे, और वहाँ उन्होंने इसका चीनी अनुवाद
करके इसके ऊपर टीका लिखी थी। पहले ईश्वरकृष्ण और विन्ध्यवासीको एक ही व्यक्ति समझा जाता था,
परन्तु कमलशील तत्त्वसंग्रहपञ्जिका में ईश्वरकृष्ण और विन्ध्यवासीका अलग-अलग उल्लेख करते हुए विन्ध्यवा-
सीका रुद्रिल नामसे उल्लेख करते हैं। गुणरत्न भी विन्ध्यवासी और ईश्वरकृष्णको अलग-अलग नामसे कहते
हैं, इसलिये ईश्वरकृष्ण और विन्ध्यवासीको एक व्यक्ति नहीं कहा जा सकता। कुछ लोग ईश्वरकृष्णका समय
वार्षगण्यके पूर्व मानकर ईश्वरकृष्णका समय दूसरी शताब्दी मानते हैं। कुछका कहना है कि महाभारतके
वार्षगण्य ईश्वरकृष्णसे बिलकुल अनभिज्ञ हैं, इसलिये वार्षगण्यको ईश्वरकृष्णके उत्तरकालीन नहीं कहा जा
सकता। इन विद्वानोंके मतमें ईश्वरकृष्णका समय ईसवी सन् ३४०-३८० माना जाता है।
वाचस्पतिमिश्र —नवमी शताब्दीमें वाचस्पतिने न्याय-वैशेषिक दर्शनोंकी तरह सांख्यकारिकापर सांख्य-
तत्त्वकौमुदी और व्यासभाष्यपर तत्त्ववैशारदी नामक टीकाकी रचनाकी है।
विज्ञानभिक्षु —वाचस्पतिमिश्रके बाद विज्ञानभिक्षु अथवा विज्ञानयति एक प्रतिभाशाली सांख्य विचा-
रक हो गये हैं। इन्होंने सांख्यसूत्रोंपर सांख्यप्रवचनभाष्य तथा सांख्यसार, पातंजलभाष्यवार्तिक, ब्रह्मसूत्रके
ऊपर विज्ञानामृतभाष्य आदि ग्रन्थोंकी रचनाकी है। बहुतसे सिद्धांतोंमें विज्ञानभिक्षुका वाचस्पतिमिश्रसे भिन्न
अभिप्राय था। विज्ञानभिक्षुने पंचशिख और ईश्वरकृष्णके समयमें लुप्त हुए ईश्वरवादका सांख्यदर्शनमें फिरसे
प्रतिपादन किया है। भावागणेशदीक्षित, प्रसादमाधवयोगी और दिव्यसिंहमिश्र नामके इनके तीन प्रधान
शिष्य थे।
१. वाचस्पतिमिश्र आदि विचारकोंके अनुसार षष्टितंत्र वार्षगण्यका बनाया हुआ है। षष्टितन्त्रका भगवती
ज्ञातृधर्मकथा, नन्दि आदि जैन आगमोंमें उल्लेख आता है। जैन कथाके अनुसार षष्टितंत्र आसुरिका
बनाया हुआ कहा जाता है। जैन टीकाकारोंने षष्टितंत्रका अर्थ कापिलीय शास्त्र किया है।
२. तत्त्वसंग्रह, अंग्रेजी भूमिका।
स्याद्वादमञ्जरी (परिशिष्ट) ३३७
इनके अतिरिक्त सनक, नन्द, सनातन, सनत्कुमार, अंगिरा वोढु आदि अनेक सांख्य विचारक हो गये
हैं, जिनका अब केवल नाम शेष रह गया है।
योगदर्शन
योगशब्द ऋग्वेदमें अनेक स्थलोंपर आता है, परन्तु यहाँ यह शब्द प्रायः जोड़नेके अर्थमें प्रयुक्त हुआ
है। श्वेताश्वतर, तैत्तिरीय, कठ, मैत्रायणी आदि प्राचीन उपनिषदोंमें योग समाधिके अर्थमें पाया जाता है।
यहाँ योगके अंगोंका वर्णन किया गया है। आगे जाकर शांडिल्य, योगतत्त्व, ध्यानविन्दु, हंस, अमृतनाद,
वराह, नादविन्दु, योगकुण्डली आदि उत्तरकालकी उपनिषदोंमें यौगिक प्रक्रियाओंका सांगोपांग वर्णन मिलता
है। सांख्यदर्शनके कपिल मुनिकी तरह हिरण्यगर्भ योगदर्शनके आदि वक्ता माने जाते हैं। हिरण्यगर्भको
स्वयंभू भी कहते हैं। महाभारत और श्वेताश्वतर उपनिषद्में हिरण्यगर्भका नाम आता है। पतंजलि आधुनिक
योगसूत्रोंके व्यवस्थापक समझे जाते हैं। १ व्यासभाष्यके टीकाकार वाचस्पति और विज्ञानभिक्षु भी पतंजलिका
योगसूत्रोंके कर्त्ता रूपमें उल्लेख नहीं करते। प्रो० दासगुप्त आदि विद्वानोंके मतानुसार व्याकरण महाभाष्यकार
और योगसूत्रकार पतंजलि दोनों एक ही व्यक्ति थे। पतंजलिका समय ईसाके पूर्व दूसरी शताब्दी माना जाता
है। पतंजलिके योगसूत्रोंके ऊपर व्यासने भाष्य लिखा है। व्यासका समय ईसाकी चौथी शताब्दी कहा
जाता है। ये व्यास महाभारत और पुराणकार व्याससे भिन्न व्यक्ति माने जाते हैं। व्यासके भाष्यके ऊपर
वाचस्पति मिश्रने तत्त्ववैशारदी नामकी टीका लिखी है। व्यासभाष्यपर भोज (दसवीं शताब्दी) ने भोजवृत्ति,
विज्ञानभिक्षुने योगवार्त्तिक और नागोजी भट्ट (सतरहवीं शताब्दी) ने छायाव्याख्या नामकी टीकायें लिखी हैं।
योगकी अनेक शाखायें हैं। सामान्यसे योगके दो भेद हैं-राजयोग और हठयोग। पतंजलि ऋषिके योगको
राजयोग कहते हैं। प्राणायाम आदिसे परमात्माके साक्षात्कार करनेको हठयोग कहते हैं। हठयोगके ऊपर
हठयोगप्रदीपिका, शिवसंहिता, घेरण्डसंहिता आदि शास्त्र मुख्य हैं। ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोगके भेद-
से योगके तीन भेद भी होते हैं। योगतत्त्व उपनिषद्में मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग और राजयोग इस तरह
योगके चार भेद किये हैं।
जैन और बौद्ध दर्शनमें योग
महाभारत, पुराण, भगवद्गीता आदि वैदिक ग्रंथोंके अतिरिक्त जैन और बौद्ध साहित्यमें
भी योगका विशद वर्णन मिलता है। जैन आगम ग्रन्थ और प्राचीन जैन संस्कृत साहित्यमें योग
शब्द प्रायः ध्यानके अर्थमें प्रयुक्त किया गया है। यहाँ ध्यानका लक्षण, भेद प्रभेद आदिका विस्तृत वर्णन मिलता
है। योगविषयक साहित्यको पल्लवित करनेमें सर्वप्रथम हरिभद्रसूरिका नाम विशेष रूपसे उल्लेखनीय है।
हरिभद्रने योगके ऊपर योगबिन्दु, योगदृष्टिसमुच्चय, योगविंशिका, षोडशक आदि ग्रन्थोंके लिखनेके साथ पतं-
जलिके योगशास्त्रका पांडित्य प्राप्त करके पतंजलिके योगसूत्रोंके साथ जैनयोगकी प्रक्रियाओंकी तुलना की है।
हरिभद्रके योगदृष्टिसमुच्चयमें मित्रा; तारा आदि आठ दृष्टियोंका स्वरूप जैन साहित्यमें बिलकुल अभूतपूर्व है।
जैन योगशास्त्रके दूसरे विद्वान् हेमचन्द्रसूरि हैं। इन्होंने योगपर योगशास्त्र नामक स्वतंत्र ग्रंथ लिखकर अनेक
जैन यौगिक प्रक्रियाओंका पतंजलिकी प्रक्रियाओंसे समन्वय किया है। हेमचन्द्रके योगशास्त्रमें शुभचन्द्र आचार्य
के ज्ञानार्णवमें आये हुए ध्यान आदिके वर्णनके साथ ध्यान, आसन आदिका विस्तृत वर्णन मिलता है। जैन-
योग-साहित्यको वृद्धिगत करनेवाले सतरहवीं सदीके अंतिम विद्वान् यशोविजय उपाध्याय माने जाते हैं।
१. तुलना करो-ननु
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ।
इति याज्ञवल्क्यस्मृतेः पतंजलिः कथं योगस्य शासितेति चेत्-अद्धा । अतएव तत्र तत्र पुराणादौ विशिष्य
योगस्य विप्रकीर्णतया दुर्ग्राह्यार्थत्वं मन्यमानेन भगवता कृपासिंधुना फणिपतिना सारं संजिघृक्षुणानुशासन-
मारब्धं न तु साक्षाच्छासनम् । सर्वदर्शनसंग्रह १५ ।
४३
३३८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
यशोविजयजीने योगके ऊपर अध्यात्मसार, अध्यात्मोपनिषद्, तथा योगलक्षण, पातंजलयोगलक्षणविचार, योग-
भेद, योगविवेक, योगावतार, मित्रा, तारादित्रय, योगमाहात्म्य आदि द्वात्रिंशिकायें लिखनेके साथ हरिभद्रकी
योगविंशिका और षोडशकपर टीका लिखकर, पतंजलिके योगसूत्रोंपर जैन प्रक्रियाके अनुसार वृत्ति रची है।
यशोविजयजीने उक्त ग्रंथोंमें भगवद्गीता, योगवासिष्ठ, तैत्तिरीय उपनिषद्, पातंजल योगसूत्र आदि वैदिक ग्रंथों
का उपयोग किया है और साथ ही जैन और पतंजलिके योगकी प्रक्रियाओंकी तुलना करते हुए अनेक स्थलोंपर
पतंजलिकी प्रक्रियाका प्रतिवाद किया है। १ बौद्ध ग्रंथोंमें भी योगका वर्णन मिलता है। स्वयं बुद्धने बोधि
प्राप्त करनेके पूर्व योगका अभ्यास किया था। पातंजल योगदर्शनकी तरह बौद्ध शास्त्रोंमें भी अहिंसा, सत्य,
अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा आदिको धर्मके प्रधान अङ्ग मान इनके विशद वर्णन
के साथ हेय, हेयहेतु, हान और हानोपायको तरह दुःख, समुदाय, निरोध और मार्ग इन चार आर्यसत्योंका
उपदेश दिया है। महायान सम्प्रदायकी विज्ञानवाद शाखा योगाभ्यासपर विशेष ध्यान देनेके कारण ही योगा-
चार नामसे कही जाती थी। योगाचार सम्प्रदायमें ध्यान, पारमिता, समाधि आदि प्रक्रियाओंका विस्तृत
वर्णन पाया जाता है। बौद्धतन्त्रकी क्रियातन्त्रका नाम बहुत महत्त्वका है। अनुत्तरयोगतन्त्रके पंचक्रममें भी
योगकी पांच दशाओंका वर्णन आता है। हीनयान सम्प्रदायमें भी योगाभ्यासको महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया
है। २
१. जैन योगके विषयमें विशेष जाननेके लिए देखिये पं० सुखलालजीकी योगदर्शन और योगविंशिकाकी भूमिका।
२. हीनयानके योगसंबंधी सिद्धांतोंके लिये देखिये मिसेज राइस डेविड्सका Yogavchara's Mannual,
पाली टैक्स्ट सोसायटी, १९१६ ।
An exact line-by-line transcription of the text from the image:
मीमांसक परिशिष्ट ( ङ )
( श्लोक ११ और १२ )
मीमांसकोंके आचार विचार
मीमांसक दर्शनको जैमिनीय दर्शन भी कहते हैं। मीमांसक लोग उपनिषदोंसे पूर्ववर्ती वेदोंको ही
प्रमाण मानते हैं, इसलिये ये पूर्वमीमांसक कहे जाते हैं। मीमांसक धूममार्गके अनुयायी होते हैं। ये यज्ञ-यागके
द्वारा देवताओंको प्रसन्न करके स्वर्गकी प्राप्ति ही अपना मुख्य धर्म समझते हैं। १ मीमांसक वैदिक हिंसाको
हिंसा नहीं मानते, पितरोंको तृप्त करनेके लिये श्राद्ध करते हैं, देवताओंको प्रसन्न करनेके लिये मांसकी आहुति
देते हैं, तथा अतिथियोंका मधुपर्क आदिसे सत्कार करते हैं। पूर्वमीमांसावादियोंको कर्ममीमांसक भी कहते
हैं। "मीमांसक साधु कुकर्मसे रहित होते हैं, यजन आदि छह् कर्मोंमें रत रहते हैं, ब्रह्मसूत्र रखते हैं, और
गृहस्थाश्रममें रहते हैं। ये लोग सांख्य साधुओंकी तरह एकदण्डी अथवा त्रिदंडी होते हैं। ये गेरुआ रंगके
वस्त्र पहिनते हैं, मृगचर्मके ऊपर बैठते हैं; कमण्डलु रखते हैं और सिर मुं
३४० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
प्रतिपादक होनेसे ज्ञानके साधन हैं, तथा अपौरुषेय होनेके कारण स्वतः प्रमाण हैं ।१ वेदवाक्योंका
अनुमान प्रमाणसे खण्डन नहीं हो सकता, क्योंकि अनुमान प्रमाण वेद प्रमाणसे बहुत निम्न कोटिका
है। वेदके अपौरुषेय होनेपर भी अव्यच्छिन्न अनादि सम्प्रदायसे वेद वाक्योंके अर्थका ज्ञान होता है ।
वेदवाक्य लौकिक वाक्योंसे भिन्न होते हैं जैसे 'अग्निमीळे पुरोहितम्', 'ईषे त्वोर्जे त्वा', 'अग्न आयाहि
वोतये' आदि। वेद दो प्रकारका होता है—मंत्र रूप और ब्राह्मण रूप। यह मंत्र और ब्राह्मण रूप
वेद विधि, मंत्र, नामधेय, निषेध और अर्थवादके भेदसे पाँच प्रकारका है। २ विधिसे धर्म संबंधी नियमोंका
ज्ञान होता है जैसे—'स्वर्गके इच्छुकको यज्ञ करना चाहिये' यह विधि है। अपूर्व, नियम, परिसंख्या, उत्पत्ति,
विनियोग, प्रयोग, अधिकरण आदिके भेदसे विधिके अनेक भेद होते हैं। मंत्रसे याज्ञिकको यज्ञ सम्बन्धी देव-
ताओं आदिका ज्ञान होता है। नामधेयसे यज्ञसे मिलनेवाले फलका ज्ञान होता है। निषेध विधिका ही दूसरा
प्रकार है। निन्दा, प्रशंसा, परकृति और पुराकल्पके भेदसे अर्थवाद चार प्रकारका होता है।
२. शब्दकी नित्यता—मीमांसक वेदको नित्य और अपौरुषेय मानते हैं, इसलिये इनके मतमें
शब्दको भी नित्य और सर्वव्यापक स्वीकार किया गया है ३ । मीमांसकोंका कहना है कि हमें एक स्थानपर
प्रयुक्त गकार आदि वर्णोंका, सूर्यकी तरह, प्रत्यभिज्ञानके द्वारा सब जगह ज्ञान होता है, इसलिये शब्दको
नित्य मानना चाहिये । तथा, एक शब्दका एक बार संकेत ग्रहण कर लेनेपर कालान्तरमें भी उस संकेतसे
वेदस्याध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम् ।
वेदाध्ययनसामान्यादधुनाध्ययनं यथा ।।
इत्यनुमानं प्रतिसाधनं प्रगल्भत इति चेत् । तदपि न प्रमाणकोटिं प्रवेष्टुमीष्टे ।
भारताध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकं ।
भारताध्ययनत्वेन सांप्रताध्ययनं यथा ।।
इत्याभाससमानयोगक्षेमत्वात् । ननु तत्र व्यासः कर्तेति स्मर्यते ।
को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद्भवेत् ।
इत्यादाविति चेत् । तदप्यसारम् । ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ( तै०
आ० ३-१२ ) इति पुरुषसूक्ते वेदस्य सकर्तृकता प्रतिपादनात् । किं चानित्यः शब्दः सामान्यवत्त्वे सत्य-
स्मदादिबाह्येन्द्रियग्राह्यत्वाद्घटवत् । नन्विदमनुमानं स एवायं गकार इति प्रत्यभिज्ञाप्रमाणप्रतिहतमिति
चेत् । तदतिफल्गु । लूनपुनर्जातकेशदलितकुन्दादाविव प्रत्यभिज्ञायाः सामान्यविषयत्वेन बाधकत्वाभावात् ।
नन्वशरीरस्य परमेश्वरस्य ताल्वादिस्थानाभावेन वर्णोच्चारणासंभवात्कथं तत्प्रणीतत्वं वेदस्य स्यादिति
चेत् । न तद्भद्रम् । स्वभावतोऽशरीरस्यापि तस्य भक्तानुग्रहार्थं लीलावियग्रहग्रहणसंभवात् । तस्माद्वेदस्या-
पौरुषेयत्ववाचोयुक्तिः न युक्ता । सर्वदर्शनसंग्रह-जैमिनिदर्शन ।
१. वेदान्ती लोग वेदको अपौरुषेय और आदिमान्, तथा सांख्य लोग वेदको पौरुषेय और आदिमान् मानते हैं।
२. मन्त्र और ब्राह्मण रूप वेदके चार भेद हैं—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद । ऋग्वेदकी दस,
यजुर्वेदकी छियास्सी, सामवेदकी एक हजार ( ये अनध्यायके दिनोंमें पढ़ी जानेके कारण इन्द्रके वज्रसे
नष्ट हो गई मानी जाती हैं ) और अथर्ववेदकी नौ शाखायें हैं । ऋग्वेदका आयुर्वेद, यजुर्वेदका धनुर्वेद,
सामवेदका गान्धर्ववेद और अथर्ववेदका अर्थशास्त्र ( स्थापत्य ) ये चारों वेदोंके चार उपवेद होते हैं ।
शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष ये छह वेदके अंग, तथा पुराण, न्याय, मीमांसा
और धर्मशास्त्र ये चार उपांग हैं। ऋग्वेदका एतरेयब्राह्मण, यजुर्वेदका तैत्तिरीय और शतपथ ब्राह्मण,
सामवेदका गोपथब्राह्मण तथा अथर्ववेदका ताण्ड्यब्राह्मण ये वेदोंके ब्राह्मण हैं ।
३. शब्दो नित्यः व्योममात्रगुणत्वात् व्योमपरिमाणवत्-प्रभाकर ।
शब्दो नित्यः निस्स्पर्शद्रव्यत्वात् आत्मवत्-भट्ट ।
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३४१
शब्दके अर्थका ज्ञान होता है। यदि शब्द नित्य न होता तो हमारे पितामह आदिसे निश्चित किये हुए शब्दोंके
संकेतसे हमें उसी अर्थका ज्ञान न होता, इसलिये शब्दको नित्य ही मानना चाहिये। यदि कहो कि शब्दको
नित्य स्वीकार करनेपर सब लोगोंको हमेशा शब्द सुनाई देने चाहिये, तो यह ठीक नहीं। क्योंकि जिस समय
प्रत्येक वर्ण संबंधी तालु, ओष्ठ आदिका वायुसे संबंध होता है, उसी समय शब्दकी अभिव्यक्ति होती है। जिस
समय मनुष्य यत्नसे किसी शब्दका उच्चारण करता है, उस समय वायु नाभिसे उठकर, उरमें विस्तीर्ण हो,
कण्ठमें फैल, मस्तकमें लग वापिस आती हुई नाना प्रकारके शब्दोंकी अभिव्यक्ति करती है, इसलिये शब्दकी
व्यंजक वायुमें ही उत्पत्ति और विनाश होता है। अतएव शब्दको नित्य मानना चाहिये। १
३. ईश्वर और सर्वज्ञ—मीमांसक ईश्वरको सृष्टिकर्ता और संहारकर्ता नहीं मानते। उनके मतमें
अपूर्व ही यज्ञ आदिका फल देनेवाला है, इसलिये ईश्वरको जगत्का कर्ता माननेकी कोई आवश्यकता नहीं
रहती। वेदोंको बनानेके लिये भी ईश्वरकी आवश्यकता नहीं, क्योंकि वेद अपौरुषेय होनेसे स्वतः प्रमाण हैं।
मीमांसकोंका कथन है कि यदि ईश्वर शरीर रहित होकर सृष्टिका सर्जन करता है तो अशरीरी ईश्वरके
जगत्के सर्जन करनेकी इच्छाका प्रादुर्भाव नहीं हो सकता। यदि ईश्वर शरीर सहित होकर जगत्को बनाता
है तो ईश्वरके शरीरका भी कोई दूसरा कर्ता मानना चाहिये। परमाणुओंको ईश्वरका शरीर मानना भी
ठीक नहीं। क्योंकि बिना प्रयत्नके परमाणुओंमें क्रिया नहीं हो सकती। तथा, ईश्वरके प्रयत्नको नित्य माननेसे
परमाणुओंमें सदा ही क्रिया होती रहनी चाहिये। ईश्वरको धर्म-अधर्मका अधिष्ठाता भी नहीं मान सकते।
क्योंकि संयोग अथवा समवाय किसी भी संबंधसे धर्म और अधर्मका ईश्वरके साथ संबंध नहीं हो सकता।
तथा, यदि ईश्वर सृष्टिका कर्ता है, तो वह दुखी जगत्की क्यों रचना करता है ? जीवोंके भूत कर्मोंके कारण
ईश्वर द्वारा दुखी जीवोंकी सृष्टि मानना भी ठीक नहीं। क्योंकि जिस समय ईश्वरने सृष्टि की, उस समय कोई
भी जीव मौजूद नहीं था। दयासे प्रेरित होकर भी ईश्वरकी सृष्टि रचनाको नहीं मान सकते, क्योंकि सृष्टिको
बनानेके समय प्राणियोंका अभाव था। फिर भी यदि अनुकंपाके कारण जगत्का सर्जन माना जाय, तो
ईश्वरको सुखी प्राणियोंको ही जन्म देना चाहिये था। क्रीड़ाके कारण भी सृष्टिका निर्माण नहीं मान सकते।
क्योंकि ईश्वर सर्वथा सुखी है, उसे क्रीड़ा करनेकी आवश्यकता नहीं है। ईश्वर सृष्टिकी रचना करके फिर
उसका संहार क्यों करता है ? इसका कारण भी समझमें नहीं आता। इसलिये बीजवृक्षकी तरह अनादि
कालसे सृष्टिकी परंपरा माननी चाहिये। वास्तवमें नित्य और अपौरुषेय वेदोंके वाक्य ही प्रमाण हैं। कोई
अनादि ईश्वर न सृष्टिका निर्माण और न सृष्टिका संहार करता है। २
१. नैयायिक 'सकारणक होनेसे, 'ऐन्द्रियक होनेसे' और 'विनाशी होनेसे' शब्दको अनित्य मानते हैं। देखिये
न्यायसूत्र २-२-१३। न्यायदर्शनमें 'वीचीतरंग' न्यायसे और 'कदम्बकोरक' न्यायसे शब्दकी उत्पत्ति
मानी गई है। वैयाकरण अकार आदि वर्णको नित्य मानते हैं-वर्णो नित्यः ध्वन्यन्यशब्दत्वात् स्फोटवत् ।
२. सर्वज्ञत्वन्निषेध्या च स्रष्टुः सद्भावकल्पना ।
न च धर्मादृते तस्य भवेल्लोकाद्विशिष्टता ॥
न चाऽननुष्ठितो धर्मो नाऽनुष्ठानमृतेः मतेः ।
न च वेदादृते सा स्याद्वेदोन च पदादिभिः ॥
तस्मात् प्रागपि सर्वेऽमी स्रष्टुरासन् पदादयः ।
न हि स्रष्टुरस्मदादिभ्योऽतिशयः सहजः संभवति पुरुषत्वादस्मदादिवदेव । अतो धर्मनिमित्तो वक्तव्यः । न चाऽन-
नुष्ठितो धर्मः कार्यं करोति । न चाऽसतिज्ञानेऽनुष्ठानं संभवति । न च वेदादृते ज्ञानं । न च वेदः पदपदार्थसंबं-
धैर्विना शक्नोति अर्थमवबोधयितुं । अतः प्रागपि सृष्टेः सन्त्येव पदादयः । यथाह मनुः —
सर्वेषां च स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् ।
वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ॥
श्लोकवार्तिक संबंधाक्षेपपरिहार श्लोक ११४-११६ न्यायरत्नकार टीका।
३४२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
मीमांसक सर्वज्ञको भी नहीं मानते। मीमांसकोंका कहना है कि सर्वज्ञकी प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे
उपलब्धि नहीं होती, इसलिये उसका अभाव ही मानना चाहिये। तथा मनुष्यकी प्रज्ञा, मेधा आदिमें थोड़ा
बहुत ही अतिशय पाया जा सकता है। जिस प्रकार व्याकरणशास्त्रका प्रकृष्ट पंडित ज्योतिषशास्त्रका ज्ञाता
नहीं कहा जा सकता, जिस प्रकार वेद, इतिहास आदिका विद्वान् स्वर्गोंके देवताओंको प्रत्यक्षसे जाननेमें पंडित
नहीं कहा जा सकता, जिस प्रकार आकाशमें दश योजन कूदनेवाला मनुष्य सैकड़ों प्रयत्न करनेपर भी एक
हज़ार योजन नहीं कूद सकता, और जिस प्रकार कर्ण इन्द्रियमें अतिशय होनेपर भी उससे रूपका ज्ञान नहीं
हो सकता, उसी तरह प्रकृष्टसे प्रकृष्ट ज्ञानी भी अपने विषयका अतिक्रमण न करके ही इन्द्रियजन्य पदार्थोंका
ही ज्ञान कर सकता हैं। कोई भी प्राणी संपूर्ण लोकोंके संपूर्ण समयोंके संपूर्ण पदार्थोंका ज्ञाता नहीं हो सकता।
अतएव कोई अतींद्रिय पदार्थोंके साक्षात्कार करनेवाला सर्वज्ञ नहीं है।१
४. प्रमाणवाद—मीमांसक पहले नहीं जाने हुए पदार्थोंको जाननेको प्रमाण मानते हैं। प्रभाकर मत-
के अनुयायो प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, अर्थापत्ति ये पांच, और कुमारिल भट्ट इन पांच प्रमाणोंमें अभा-
वको मिलाकर छह प्रमाण स्वीकार करते हैं। मीमांसक स्मृतिज्ञानके अतिरिक्त सम्पूर्ण ज्ञानोंको स्वतः प्रमाण
मानते हैं। मीमांसकोंका कहना है कि ज्ञानकी उत्पत्तिके समय ही हमें पदार्थोंका ज्ञान ( ज्ञप्ति ) होता है।
अतएव ज्ञान अपनी उत्पत्तिमें और पदार्थोंके प्रकाश करनेमें किसी दूसरेकी अपेक्षा नहीं रखता। जिस समय
हमें कोई ज्ञान होता है, वह ज्ञान स्वतः ही प्रमाण होता है, तथा ज्ञानके स्वतः प्रमाण होनेसे ही हमारी पदा-
र्थोंमें प्रवृत्ति होती है। इसलिये ज्ञानके उत्पन्न होते ही ज्ञानके प्रामाण्यका पता लग जाता है। यदि ऐसा न
हो तो हमारी पदार्थोंमें प्रवृत्ति न होनी चाहिये। परन्तु अप्रामाण्य ज्ञानमें यह बात नहीं होती। कारण कि
मिथ्या ज्ञानमें हमारी इन्द्रियों आदिमें दोष होनेके कारण उत्तरकालमें होनेवाले बाधक ज्ञानसे ही हमारे ज्ञान-
का अप्रामाण्य सिद्ध होता है। अतएव मीमांसकोंके मतमें स्मृति ज्ञानको छोड़कर प्रत्येक ज्ञान, जब तक कि वह
उत्तरकालमें किसी बाधक ज्ञानसे अप्रमाण रूप सिद्ध नहीं होता, स्वतः प्रमाण कहा जाता है, और उत्तरकालमें
वही ज्ञान अप्रमाण सिद्ध होनेपर परतः कहा जाता है। नैयायिक मीमांसकोंके स्वतः प्रामाण्यवादका विरोध
करते हैं, प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनोंको परतः मानते हैं। सांख्य प्रामाण्य और अप्रामाण्य को स्वतः, जैन दोनोंको
कथंचित् स्वतः और कथंचित् परतः, तथा बौद्ध अप्रामाण्य ज्ञानको स्वतः और प्रामाण्यको परतः मानते हैं।२
आत्मा—मीमांसक लोग आत्माके अस्तित्वको स्वीकार करते हैं। इनके मतमें आत्माको शरीर,
इन्द्रिय और बुद्धिसे भिन्न मानकर आत्मबहुत्ववादके सिद्धांतको स्वीकार किया गया है। मीमांसक विद्वान्
१. संभवतः मीमांसक लोग ईश्वर और सर्वज्ञका सद्भाव न माननेके कारण 'लोकायत' 'नास्तिक' आदि
नामोंसे कहे जाने लगे थे। कुमारिल भट्टने इस आक्षेपको दूर करनेके लिये श्लोकवार्तिककी रचना कर
उसमें 'आत्मवाद' नामक भिन्न प्रकरण लिखा है—
प्रायेणैव हि मीमांसा लोके लोकायतीकृता ।
तामास्तिकपथे कर्तुमयं यत्नः कृतो मयाः ॥ श्लोकवार्तिक पृ० ४ श्लोक १० ।
तथा—इत्याह नास्तिक्यनिराकरिष्णु—
रात्मास्तितां भाष्यकृदत्र युक्त्या ।
दृढत्वमेतद्विषयश्च बोधः
प्रयाति वेदान्तनिषेवणेन ॥ पृ० ७२८ श्लोक १४८ ।
२. परापेक्षं प्रमाणत्वं नात्मानं लभते क्वचित् ।
मूलोच्छेदकरं पक्षं को हि नामाध्यवस्यति ॥
यदि हि सर्वमेव ज्ञानं स्वविषयतथात्वावधारणे स्वयमसमर्थं विज्ञानान्तरमपेक्षेत ततः कारणगुणसंवादार्थक्रि-
याज्ञानान्यपि स्वविषयभूतगुणाद्यवधारणे परमपेक्षेरन्, अपरमपि तथेति न कश्चिदर्थो जन्मसहस्रेणाप्यध्यव-
सीयेतेति प्रामाण्यमेवोत्सीदेत् । शास्त्रदीपिका पृ० २२ ।
स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३४३
कुमारिलभट्ट और प्रभाकरके आत्मा संबंधी सिद्धांतोंमें मतभेद पाया जाता है । कुमारिलके मतमें आत्माको कर्ता,
भोक्ता, ज्ञानशक्तिवाला, नित्य, विभु और परिणामी मानकर अहंप्रत्ययका विषय माना जाता है १ । प्रभाकर
भी आत्माको कर्ता, भोक्ता और विभु स्वीकार करते हैं, परन्तु वे आत्मामें परिवर्तन नहीं मानते २ । प्रभा-
करके सिद्धांतके अनुसार आत्मा ज्ञाता है और पदार्थ ज्ञेय हैं । ज्ञाता और ज्ञेय एक नहीं हो सकते, इसलिये
आत्मा कभी स्वसंवेदनका विषय नहीं हो सकता । यदि आत्माको स्वसंवेदक माना जाय तो गाढ़ निद्रामें भी
ज्ञान मानना चाहिये ।
मोक्ष—गौतमधर्मसूत्र आदि धर्मशास्त्रोंमें धर्म, अर्थ और काम केवल इन तीन पुरुषार्थोंको मानकर
धर्मको ही मुख्य पुरुषार्थ स्वीकार किया गया है । मीमांसा दर्शनके प्राचीन आचार्य धर्मको सम्पूर्ण सुखोंका
कारण मानकर उससे स्वर्गकी प्राप्ति करना ही अपना अन्तिम ध्येय समझते थे । इन लोगोंके सामने मोक्षका
प्रश्न इतना बलवान नहीं था । परन्तु उत्तरकालीन मीमांसक आचार्य मोक्ष संबंधी प्रश्नसे अछूते न रह सके ।
प्रभाकरके मतके अनुसार संसारके कारण भूतकालीन धर्म और अधर्मके नाश होने पर शरीरके आत्यन्तिक
रूपसे नाश होनेको मोक्ष कहा है । ३ जिस समय जीवके शम, दम, ब्रह्मचर्य आदिके द्वारा आत्मज्ञान होनेसे
देहका अभाव हो जाता है, उस समय मोक्षकी प्राप्ति होती है । मोक्ष अवस्थाको आनन्द रूप नहीं कह सकते,
क्योंकि निर्गुण आत्मामें आनन्द नहीं रह सकता । इसलिये सुख और दुख दोनोंके क्षय होनेपर स्वात्मस्फुरण
रूप अवस्थाको ही मोक्ष कहते हैं । कुमारिल भट्टके अनुसार परमात्माकी प्राप्तिकी अवस्था मात्रको मोक्ष कहा
गया है । कुमारिल भी मोक्षको आनंद रूप नहीं मानते । ४ पार्थसारथिमिश्र आदिने भी सुख-दुख आदि समस्त
विशेष गुणोंके नाश होनेको मुक्ति माना है ।
मीमांसक और जैन
मीमांसक याज्ञिक हिंसाको, जातिसे वर्णव्यवस्थाको और वेदके स्वतः प्रमाणको स्वीकार करते हैं ।
परन्तु जैन सांख्य, बौद्ध, आजीविक आदि श्रमण सम्प्रदायोंकी तरह उक्त बातोंका विरोध करते हैं । जैन लोग
हिंसाके उग्र विरोधी हैं । ये लोग जातिसे वर्ण व्यवस्थाको नहीं मानते । ब्राह्मणोंकी मान्यता है कि सबसे
पहले ब्रह्माके मुखसे ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति हुई, उसके बाद ब्रह्माके अन्य अवयवोंसे क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जन्मे,
इसलिये ब्राह्मण ही सर्वपूज्य हैं । परन्तु आदिपुराण आदि जैन पुराणोंमें इससे विरुद्ध कल्पना देखनेमें
आती है । आदिपुराणके अनुसार पहले पहल जब ऋषभदेव भगवानने असि, मसि आदि छह कर्मोंका उपदेश
किया, उस समय उन्होंने पहले क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंकी सृष्टि की, और बादमें व्रतधारी श्रावकोंमेंसे ब्राह्मण
१. ज्ञानशक्तिस्वभावोऽतो नित्यः सर्वगतः पुमान् ।
देहान्तरक्षमः कल्प्यः सोऽगच्छन्नेव योक्ष्यते ॥ मी० श्लोकवार्तिक आत्मवाद ७३ ।
२. बुद्धीन्द्रियशरीरेभ्यो भिन्न आत्मा विभुर्ध्रुवः ।
नानाभूतः प्रतिक्षेत्रमर्थवित्तिषु भासते ॥ प्रकरणपंचिका पृ० १४१ ।
३. अतो नाविद्यास्तमयो मोक्षः । अत्यन्तिकस्तु देहोच्छेदो निःशेषधर्माधर्मपरिक्षयनिबंधनो मोक्ष इति सिद्धम् ।
प्रकरणपंचिका पृ० १५६ ।
४. सुखोपभोगरूपश्च यदि मोक्षः प्रकल्प्यते ।
स्वर्ग एव भवेदेष पर्ययेण चयी च सः ॥
न हि कारणवत्किंचिदक्षयित्वेन गम्यते ।
तस्मात्कर्मक्षयादेव हेतुभावेन मुच्यते ॥
न ह्यभावात्मकं मुक्त्वा मोक्षनित्यत्वकारणम् ।
भावरूपं सर्वमुत्पत्तिमद्धर्मकं घटादिक्षयधर्मकमेव । अतो न सुखात्मिका मुक्तिरात्मज्ञानेन क्रियते इति ।....
सिद्धयति चाभावात्मकत्वे मोक्षस्य नित्यता न त्वानन्दात्मकत्वे ।
श्लोकवार्तिक संबंधाक्षेपपरिहार श्लोक १०५-१०७ न्यायरत्नाकर टीका ।
३४४ श्रीमद्राजचन्द्रशास्त्रमालायां
वर्णका जन्म हुआ। वास्तवमें किसीको जातिसे ऊँच अथवा नीच नहीं कहा जा सकता, इसलिये गुण और
कर्मके अनुसार ही वर्णव्यवस्था माननी चाहिये। वैदिक वेदको अपौरुषेय और नित्य होनेके कारण प्रमाण
मानते हैं, और वेदविहित याज्ञिक हिंसाको पाप रूप नहीं गिनते। जैनोंका मानना है कि पूर्वकालीन आर्यवेद
हिंसाके विधानसे रहित, और पूर्वकालीन यज्ञ दयामय होते थे। वर्तमान हिंसाप्रधान वेद बादमें महाकालअसुर-
ने रचे हैं और हिंसामय यज्ञोंका भी प्रचार हुआ है। जैन प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग, और द्रव्यानु-
योग इन चार वेदोंको मानते हैं। सिद्धसेन दिवाकरने वेदोंके ऊपर द्वात्रिंशिकाकी रचना की है। भगवानके निर्वा-
णोत्सवके बाद स्वयं इन्द्र और देवोंने श्रावक ब्रह्मचारियोंको गार्हपत्य, परमाहवनीयक और दक्षिणाग्नि नामके तीन
कुंड बना उनमें त्रिसंध्य अग्नि स्थापित करके अग्निहोत्रद्वारा जिन भगवानकी पूजा करनेका उपदेश किया था।
जैन और मीमांसकोंके सिद्धान्तोंकी तुलना करते समय यह बात विशेष रूपसे ध्यान देने योग्य है कि
कुमारिलभट्ट प्रकारान्तरसे जैनोंके अनेकांतवादके सिद्धांतको स्वीकार करते हैं। कुमारिलका पदार्थोंको
उत्पाद, व्यय और स्थिति रूप सिद्ध करना १ अवयवोंको अवयवीसे भिन्नाभिन्न मानना २, वस्तुको स्वरूपपररूपसे
सत्-असत् स्वीकार करना ३, तथा सामान्य और विशेषको सापेक्ष मानना ४, स्पष्ट रूपसे कुमारिलके अनेकांत-
वादके समर्थन करनेको सूचित करता है। तत्त्वसंग्रहकारके कथनसे भी यही मालूम होता है कि निर्ग्रन्थ जैनोंकी
तरह विप्रमीमांसक भी अनेकांतवादके सिद्धांतको मानते थे। ५ गुणरत्न भी मीमांसकोंके प्रकारान्तरसे अनेकांतके
१. वर्धमानकभंगे च रुचकः क्रियते यदा ।
तदा पूर्वार्थिनः शोकः प्रीतिश्चाप्युत्तरार्थिनः ॥
हेमार्थिनस्तु माध्यस्थ्यं तस्माद्वस्तु त्रयात्मकम् । श्लोकवार्तिक वनवाद २१-२२ ।
२. पूर्वोक्तादेव तु न्यायात्सिध्येदत्रावयव्यपि ।
तस्याप्यत्यन्तभिन्नत्वं न स्यादवयवैः सह ॥ ७५ ॥
३. स्वरूपपररूपाभ्यां नित्यं सदसदात्मके ।
वस्तुनि ज्ञायते केचिद्रूपं किंचित्कदाचन ।
सर्वं हि वस्तु स्वरूपतः सद्रूपं पररूपतश्चासद्रूपं । यथा घटो घटरूपेण सन् पटरूपेणासन् । घटोऽप्यसद्रूपेण भावा-
न्तरे घटादौ समवेतः तस्मिन् स्वीयाऽसद्रूपाकारां बुद्धि जनयति । योऽयं घटः स पटो न भवतीति । मी० श्लोक-
वार्तिक अभावपरिच्छेद १२ न्यायरत्नाकर ।
४. अन्योन्यापेक्षिता नित्यं स्यात्सामान्यविशेषयोः ।
विशेषाणां च सामान्ये ते च तस्य भवन्ति हि ॥
निर्विशेषं न सामान्यं भवेच्छशविषाणवत् ।
सामान्यरहितत्वाच्च विशेषास्तद्वदेव हि ॥
एवं च परिहर्तव्या भिन्नाभिन्नत्वकल्पना ॥
केनचिद्धात्मनैकत्वं नानात्वं चास्य केनचित् ।
गोत्वं हि शाबलेयात्मना बाहुलेयाद्भिद्यते । स्वरूपेण च न भिद्यते । तथा व्यक्तिरपि गुणकर्मजात्यन्तरात्मना
गोत्वाद्भिद्यते । स्वरूपेण च न भिद्यते । तथा व्यक्त्यन्तरादपि व्यक्तिः जात्यात्मना न भिद्यते । स्वरूपेण च
भिद्यते इति । अपेक्षाभेदादविरोधः । समाविशन्ति हि विरुद्धान्यपि एकत्वापेक्षाभेदात् । एकमपि हि किंचिदपेक्ष्य
ह्रस्वं किंचिदपेक्ष्य दीर्घं । तथैकोऽपि चैत्रो द्वित्वापेक्षया भिन्नोऽपि स्वात्मापेक्षया न भिद्यते । अनेन एकानेकत्वमपि
परिहर्तव्यं । तदेव हि वस्तु स्वरूपेण सर्वत्र सर्वदा चैकमपि शाबलेयादिरूपेणानेकं भवतीति न विरोधः ।
मी० श्लोकवार्तिक आकृतिवाद ९।१० तथा ५६ न्यायरत्नाकर ।
देखा पं० हंसराज शर्मा—दर्शन और अनेकांतवाद ।
५. कल्पनारचितस्यैव वैचित्र्यस्योपवर्णने ।
को नामातिशयः प्रोक्तो विप्रनिर्ग्रन्थकापिलैः ॥ तत्त्वसंग्रह पृ० ५०१ ।
स्याद्वादमञ्जरी (परिशिष्ट) ३४५
माननेका उल्लेख करते हैं।$^१$
मीमांसादर्शनका साहित्य
मीमांसासूत्रोंके रचयिता जैमिनी माने जाते हैं। वैदिक परम्पराके अनुसार जैमिनी ऋषि वेदव्यासके
शिष्य थे। वेदव्यासने मूल वेदकी चार संहिताओंकी रचना की और सामवेदकी संहिताको जैमिनीको पढ़ाया।
जैमिनीका समय ईसाके पूर्व २०० वर्ष माना जाता है। जैमिनीसूत्रोंके ऊपर भर्तृमित्र, भवदास, हरि और
उपवर्ष नामके विद्वानोंने टीकायें लिखीं हैं, जो आजकल उपलब्ध नहीं हैं। जैमिनोसूत्रोंपर भाष्य लिखनेवाले
शबरस्वामीका नाम मुख्य रूपसे उल्लेखनीय है। यह शबरभाष्य उत्तरकालके मीमांसक लेखकोंका खास
आधार रहा है। शबरस्वामीके सिद्धांतोंका तत्त्वसंग्रहमें खण्डन है। प्राच्य विद्वान शबरको वात्स्यायनका सम-
कालीन और नागार्जुनका उत्तरकालवर्ती मानते हैं। दूसरे लोग शबरका समय ईसाकी चौथी शताब्दी मानते
हैं। शबरभाष्यके बाद मीमांसकदर्शनके मुख्य विचारक प्रभाकर और कुमारिलभट्ट हो गये हैं। प्रभाकरने
(ई० स० ६५०) शबरभाष्य पर बृहती नामकी टीका लिखी है। शास्त्रीय परम्पराके अनुसार प्रभाकर कुमा-
रिलके शिष्य कहे जाते हैं। इन दोनोंके विचारोंमें मतभेद होनेके कारण दोनोंके सिद्धांतोंकी अलग-अलग
शाखायें हो गई हैं। प्रभाकरका मत गुरुमत के नामसे प्रसिद्ध है।$^२$ बृहती लिखते हुए प्रभाकर कुमारिलके
सिद्धांतोंका उल्लेख नहीं करते जब कि कुमारिल बृहतीकारके मतका उल्लेख करते हुए मालूम होते हैं। इससे
विद्वानोंका मत है कि प्रभाकर कुमारिलके शिष्य नहीं थे, किन्तु वे कुमारिलके पूर्ववर्ती हैं। प्रभाकरकी बृह-
तीके ऊपर प्रभाकरके शिष्य कहे जाने वाले शालिकानाथमिश्रने ऋजुविमला नामको टीका, और प्रभाकरके
सिद्धांतोंके विवेचन करनेके लिये प्रकरणपंचिका नामक ग्रंथ लिखे हैं। प्रभाकरकी बृहती और शालिकानाथकी
ऋजुविमला अभी सम्पूर्ण रूपसे प्रकाशमें नहीं आये, इसलिये प्रकरणपंचिका ही प्रभाकरके सिद्धांतोंको जान-
नेका एक आधार है। कुमारिलभट्ट, भट्टपाद और वार्तिककारके नामसे भी कहे जाते हैं। तिब्बती ग्रंथोंमें
इनको कुमारलील कहा है। कुमारिल (ई० स० ७००) ने शबरभाष्यके ऊपर स्वतंत्र रूपसे टीका लिखी
है। यह टीका श्लोकवार्तिक, तन्त्रवार्तिक और टुपटीका नामके तीन खंडोंमें विभक्त हैं। कुमारिल और उद्यो-
तकर बौद्धदर्शन और न्यायके खंडन करनेके लिये अद्वितीय समझे जाते थे। शान्तरक्षितने तत्त्वसंग्रहमें कुमारिलका
खंडन किया है। कुमारिल धर्मकीर्ति और भवभूतिके समकालीन कहे जाते हैं। कुमारिलके पश्चात् कुमारिलके
अनुयायी मंडनमिश्रका नाम विशेष रूपसे उल्लेखनीय है। मंडनमिश्रने विधिविवेक, भावना विवेक, मीमांसानु-
क्रमणी और कुमारिलकी तन्त्रवार्तिककी टीका लिखी है। कहा जाता है कि ये मण्डनमिश्र आगे जाकर वेदा-
न्तमतके अनुयायी हो गये। इसके अतिरिक्त, पार्थसारथिमिश्रने कुमारिलकी श्लोकवार्तिक पर न्यायरत्ना-
कर, तथा शास्त्रदीपिका, तन्त्ररत्न और न्यायरत्नमाला; सुचरितमिश्रने श्लोकवार्तिककी टीका और
काशिका; तथा सोमेश्वरभट्टने तन्त्रवार्तिककी टीका और न्यायसुधा नामके ग्रंथ लिखे। मीमांसादर्शनका ज्ञान
करनेके लिये माधवका न्यायमालाविस्तर, आपदेवका मीमांसान्यायप्रकाश, लौगाक्षिभास्करका अर्थसंग्रह और
खण्डदेवकी भाट्टदीपिका आदि ग्रंथ उल्लेखनीय हैं।
१. मीमांसकास्तु स्वयमेव प्रकारान्तरेणैकानेकाद्यनेकान्तं प्रतिपद्यमानास्तत्प्रतिपत्तये सर्वथा पर्यनुयोगं नार्हन्ति।
षड्दर्शनसमुच्चयटीका।
२. कहा जाता है कि कुमारिलभट्ट 'अत्र तुनोक्तम् तत्रापि नोक्तम् इति पौनरुक्तम्' इस वाक्यका अर्थ नहीं
समझ सके थे। कुमारिलने इसका अर्थ किया, 'यहाँ भी नहीं कहा गया, वहाँ भी नहीं कहा गया, इस-
लिये फिर कहा गया'। प्रभाकरने कहा कि इस वाक्यका यह अर्थ ठीक नहीं, इसका अर्थ करना
चाहिये—'यहाँ यह 'तु' से सूचित किया गया है, और वहाँ 'अपि' से सूचित किया गया है, इसलिये
फिर कहा गया है'। कुमारिल इससे बहुत प्रसन्न हुए और अपने शिष्य प्रभाकरको 'गुरु' कहने लगे।
वेदान्त परिशिष्ट ( च )
( श्लोक १३ )
वेदान्तदर्शन
वेदान्तदर्शनका निर्माण वेदोंके अंतिम भाग उपनिषदोंके आधारसे हुआ है, इसलिये इसे वेदान्त
कहते हैं। वेदान्तको उत्तरमीमांसा अथवा ब्रह्ममीमांसा भी कहते हैं। यद्यपि पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा
दोनों दर्शन मौलिक रूपसे भिन्न-भिन्न हैं, परन्तु बोधायनने इन दर्शनोंको 'संहित' कहकर उल्लेख किया
है, तथा उपवर्षने दोनों दर्शनोंपर टीका लिखी है। इससे विद्वानोंका अनुमान है कि किसी समय पूर्वमीमांसा
और उत्तरमीमांसा एक ही समझे जाते थे। "उत्तरमीमांसक साधु अद्वैतवादी होते हैं। ये ब्राह्मण ही होते
हैं। इनके नामके पीछे भगवत् शब्द लगाया जाता है। ये साधु कुटीचर, बहूदक, हंस और परमहंसके भेदसे
चार प्रकारके होते हैं। कुटीचर लोग मठमें वास करते हैं, त्रिदण्डी होते हैं, शिखा रखते हैं, ब्रह्मसूत्र पहनते हैं,
गृह-त्यागी होते हैं और यजमानोंके घर आहार लेते हैं, तथा एकाध बार अपने पुत्रके यहां भी भोजन करते हैं।
बहूदक साधुओंका वेष कुटीचरोंके समान होता है। ये लोग ब्राह्मणोंके घर नीरस भोजन लेते हैं, विष्णुकी जाप
करते हैं, और नदीके जलमें स्नान करते हैं। हंस साधु ब्रह्मसूत्र और शिखा नहीं रखते, कषाय वस्त्र धारण करते
हैं, दण्ड रखते हैं, गांवमें एक रात और नगरमें तीन रात रहते हैं, धूंआ निकलना बंद होनेपर और आगके बुझ
जानेपर ब्राह्मणोंके घर भोजन करते हैं और देश-देशमें भ्रमण करते हैं। जिस समय हंस आत्मज्ञानी हो जाते
हैं, उस समय वे परमहंस कहे जाते हैं। ये चारों वर्णोंके घर भोजन लेते हैं, इनके दंड रखनेका नियम नहीं है,
ये शक्ति हीन हो जानेपर भोजन ग्रहण करते हैं? १" वेदान्तके माननेवाले आजकल भी भारतवर्ष और उसके
बाहर पाये जाते हैं। जब कि न्याय, वैशेषिक, सांख्य आदि अन्य भारतीय दर्शनोंकी परम्परा नष्ट-प्राय हो
गई है। ई० स० १६४० में दाराशिकोहने उपनिषदोंका फारसी भाषामें अनुवाद किया था। जर्मन तत्त्ववेत्ता
शोपेनहोर ( Schopenhauer ) ने औपनिषदिक तत्त्वज्ञानसे प्रभावित होकर भारतीय तत्त्वज्ञानकी मुक्त-
कंठसे प्रशंसा की है। शांकर वेदान्तके सिद्धांतोंकी तुलना पश्चिमके आधुनिक विचारक ब्रैडले (Bradley) के
सिद्धांतोंके साथ की जा सकती है।
वेदान्तसाहित्य
वेदान्त दर्शनका साहित्य बहुत विशाल है। सर्वप्रथम वेदान्तदर्शन उपनिषदोंमें, और उपनिषदोंके बाद
महाभारत और गीतामें देखनेमें आता है। तत्पश्चात् औडुलोमि, आश्मरथ्य, काशकृत्स्न,कार्ष्णाजिनि, बादरि,
आत्रेय और जैमिनी वेदान्तदर्शनके प्रतिपादक कहे जाते हैं। इन विद्वानोंका उल्लेख बादरायणने अपने ब्रह्मसूत्रमें
किया है। वेदान्तदर्शनके प्रतिपादकोंमें बादरायणके ब्रह्मसूत्रोंका नाम बहुत महत्त्वका है। ब्रह्मसूत्रोंको वेदान्त-
सूत्र अथवा शारीरकसूत्रोंके नामसे भी कहा जाता है। वेदान्तसूत्रोंके समयके विषयमें विद्वानोंमें बहुत मतभेद
है। वेदान्तसूत्रोंका समय ईसवी सन् ४०० के लगभग माना जाता है। वेदान्तसूत्रोंके ऊपर अनेक आचार्योंने
टीकायें लिखी हैं। बादरायणके पश्चात् ब्रह्मसूत्रोंके वृत्तिकार बोधायनका नाम सबसे पहले आता है। बहुतसे
विद्वान बोधायन और उपवर्ष दोनोंको एक ही व्यक्ति मानते हैं। बोधायन ज्ञानकर्मसमुच्चयके सिद्धांतको मानते
थे। द्रमिडाचार्यने छान्दोग्य उपनिषद्के ऊपर टीका लिखी थी। इस टीकाका उल्लेख छान्दोग्य उपनिषदपर
शांकरी टीकाके टीकाकार आनन्दगिरिने किया है। द्रमिडाचार्य 'भाष्यकार' के नामसे भी कहे जाते थे।
१. गुणरत्नसूरि-षड्दर्शनसमुच्चय टीका।