स्वरोदय विज्ञान
Swarodaya Vigyan
श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा
स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)
न)
(६६)
(स्वरोदय विज्ञान)
जो पिय करै तौ त्रिय वस्य होई, जो त्रिय करै तौ पि यवस्य सोई।
जो चाहियै हेतु काहू सों कीजै, भाषों सुनौ ताहि सो जानि लीजै
लै चन्द्र नाडी दिन सात ताई, लै अंजुली नीर भू में सु नाई।
ताको धरै ध्यान जो चित भावै, गुर ज्ञान पूरौं सु ऐसै बतावै।
निज स्वास जानौ नीचे को थीवै, सो नीर गौरी तिहि काल पीवै।
तौ प्रीति वाढ़ै कछु संस नाँही, यों साचु मानौ निज चित माँही।
औरौ कहौ जू हित वृद्धि रीती, जासों बढ़ावै अनजान प्रीती।
चमेली डारी सप्तांगु लीजै, ज्ञानी बतावै सो चित दीजै।
लै नाम ताको विधि आन छाड़ै, ताके तरै देहरी ताहि गाड़ै।
जो चंद जानौं निजु स्वास माही, तौं यौं करै जू कछु संसै नाही।
सो आप ही सों प्रीतिहि लगावै, यों गुर बखानै जो चित भावै।
यह कोई जानै जो चित्तई लहै जू, काहू को प्यारी आपै रहे जू।
जो हौं कहौजू काजहि करै सो, सोक आपने जीयको तो हरै सो।
भानोदये चंद्र नाडी जु जानौं, सैमरि चमेली कौ मूल आनौं।
ले खेर हू की चौथी तिलनु की, है पांचई सो जानौं चंदन की।
लै कै इनै पांच खूटी गढ़ावै, पांचों को गाड़ै जहां भूमि पावै।
चारौ चहू दिसि तिल मध्य कीजै, जी भावतौ जो तेहिनाम लीजै।
चारंगुली ते भुव मध्य राखै, औरु करौ जू गुनि लोइ भाखै।
लै सूत की जसुनि तार नीकी, कातै जु कन्या भावत जी की।
खूटी जु गाड़ै तिनि मैं लपेटे, मन में जु इच्छा सो ताहि भेटै।
तारे लपेटै जेहि काल जोई, या भांति भावै तेहि काल सोई।
ताके हिये में सो होइ प्यारी, जो लोई ज्ञानी सोई उचारों।
इति वसीकरण - विधि
अथ डर कौ उपाय
काहू सौ कोउ मन मैं डरै, जू ताको बतावौं सु या विधि करे जू।
(स्वरोदय विज्ञान)
(७०
७१)
लैं वृक्ष ते जू अरसी सुमन कों, लै नाम ताकौ थिर राखि मन कौ।
सो लैं नदी में तेहि नाम डारे, तौ होइ किरपाल रोसे निवारे।
नाडी इडा में यह रीति ठानै, तो सिद्धि होई साँची बखानै।
ता पाँइ तल की लै मृतिका कौ, बहे सूर्य नाडी जेहि काल जाकौ।
सो सात चुटकी उन्मान कीजै, लै और माटी तेहि माँहि दीजै।
ता द्वार पै मंडलै खँचि आवै, सो बीच ताके तेहि काल घावै।
गई मित्र ताकौजु या विधि करै जु, सुरजान ज्ञानी सु यों उच्चरैजू।
जो बाम कौ तौ पग बाम जानौ, जो पुरिष होई दाहिनों बखानी।
नाडी ससी की कछु लै सुगंधे, याकौ जु दीजै सो प्रीति बंधे।
इति डर की उपाय
अथ रोस कौ उपाउ
जो कोउ रुठौ कबहूँ न मानै, ताहेत भेदी भेदहि बखानै।
रात्रैस नाडी पुनि वार ताकौ, पीपर की डारी लै आव जाकौ।
सप्तोंगुरी है परमान जाकौ, सो आपने जू तुम पास राखौ।
बायँ जु जावै जब फेरि आवो; दै पाऊँ वायौ तहाँ बैठि जावो।
ताके तरे देहिरि ताहि गाडै, जो मैं बताऊँ मत कोंन छाडै।
सो आपु मानो कछु संस नाही, ज्ञानी बखानौ धरिचिन्त मांही।
इति रोस की उपाउ
अथ जिभ्या - स्थंमन विधि
जौ मौम के जू लैं सात टूकै लै सूर्य नाडी मुख मांही मूकै।
मुख ही में गोलीजो बांधि लीजै, ताकौ सुध्यानैमन माँहि कीजै।
ताकीसु जिभ्या बँधि जाइ जानौ, भाषी सु ऊनो कबहूँ न मानौ।
जे हेत की रीति तु सो बखानी, अन हेत हूँ की सुनियै भवानी।
(७०)
(स्वरोदय विज्ञान)
इति जिभ्या स्थंभव-विधि
अथ उच्चाटन उथाटन - विधि
सत्रै उचाटै मन में जुचित्ता, तो मंत्र सुनियै दै कान मित्ता।
समसान माटी जो जाइ लीजै, सो सात चुकटी नीकें गिनीजै।
पै सूरनाडी तेहिकाल जानौं, जिहि काल माटी कौं जाइ आनौं।
जल जो बहै जू ताकै किनारै, घड़ी येक मैं जूल्यायै पियारै।
स्वासा जो जानौं बाहिर को आवै, सो मृतिका लै तामै बहावै।
जो नाम ध्यानै इति भांति ठानो, सो न बसै जू तेहि नग्र मानौ।
जौ भानु नाडी स्वर मैं सु जानौं, पीपर की खूटी तौ येक ठानौं।
सप्तांगुली है परमान जाकौं, जिहि देहरी पै गाडौं सु ताकौं।
सो गांव छांडै बहु दुःख पावै, जोगी जु जाने सो यह बतावै।
द्वै मैं जु चाहै हित कौ नसावौं, तौ अर्क के जू मुनि पुष्प लावौं।
लै नाम दोऊ तिनो की जरवै, जो सूर्य नाडी तिहि काल पावै।
केती बखानी विधि मारिवे की, ते नाहि मानै जन जो विवेकी।
ताही ते नाही कहिवे मैं आई, जो भावते के मन मैं न भाई।
सत्रै जु चाहै निज मित्र कीजै, ताको बखानी चित दै सुनी जै।
नाडी ससी की तिथि वार ताके, बैठो ससी धातु मतीर वाके।
तब मित्र होई जो सत्र कोई, इहि भांति भाषौ ज्ञानी जु सोई।
इति उचाटन-विधि
अथ अनुग्रह -विधि
काहू अनुग्रह कीनौ जु चाहौं, जा भांति भाषौ सो तुम निबाहौं।
गुरु प्रात मानौं सित पक्ष माँही, भानोदये जो जेहि काल नाँही।
लै चन्द नाडी कल्यान चाहै, आसीर्वादे जिहि विधि निबाहै।
सब सुःख बाढै धन बुद्धि होई, गौरी न जानौं यह संस कोई।
(७२)
(स्वरोदय विज्ञा)
(स्वरो)
इति अनुग्रह -वि
अथ आप-विधि
काहू जु चाहै आपहि दियै जू तौ चाहियै मीत ऐसे कियै जू।
जो सूर्य कौ वार सो भौम जानौ, भानोदये स्याम पाखै जु मानौं।
उदैं विंब रवि कौ सुनीकैं दिखाई, है पिगिला मै तेहि काल बाँई।
जिहि आप दीजै सौ सर्व लागै, सब सुख जानौ तासौं सु भागै।
जो साध जग में आपै सुनाई, कीजै अनुग्रह धरि चित माहीं।
जी में बिने वासों मानि लीजै, कीजै अनुग्रह आपै न दीजै।
काहू जु आपौं सो नीचे जानौं, साधू सुनौ जू यह बात मानौं।
है रामजी की तुम कौ दुहाई, आपौं त काहू यह बुद्धि पाई।
श्रीराम करेंगे सभी न्याउ तेरौ, ताही के हाथै सब कौ नवेरौ।
आपहि देह तौ तुम सोचि लोजौ, जामेभलौं है तुम चित दीजौ।
इति श्री महा स्वरोदये ज्ञान दीपके उमा महेश्वर संवादे भाषा।
रिषीकेश कृते रतित्यादि विधि वर्णनानाम चतुर्थो प्रकास ॥४॥
पंचम - प्रकाश
काल-ज्ञान-वर्णन
दोहा
छन्द भुजंग प्रयात करि, पंचम कहौ प्रकास।
काल ज्ञान जामै कहौ, सुनौ सकल सुखरास।
आये काल काहा करै, सुनौ सकल तुम सोइ।
आयु बढ़ै जाकैं कियै, जोगी स्वर मुनि लोइ।
छंद भुजंग प्रयास
चतुर्भाति जानौं हियै काल ज्ञानौं।
दय विज्ञान
युग्रह -विधि
(स्वरोदय विज्ञान)
(७३)
महाकाल जानौ सो जोगी बखानौ ।
तहाँ आदि स्वासा सुनौ जानियै जू ।
भली भाँति ताकौ हियै राखियै जू ।
अथ काल ज्ञान
सरै सूर्य नाड़ी दिनौ राति जानौ ।
न आवै ससी कबहू जो सु मानौ ।
रही आयु थोरी जियै वर्ष थौरौ ।
सुजोगी बखानै करै काल जोरौ ।
रही आयु ताकी सु तीनी अब्द जानौ ।
महादेव भाषी सु यों सांचु मानौ ।
जो पै दौस दो लौ सरै सूर्य नाड़ी ।
रही आयु द्वै वर्ष ताकी विचारी ।
सरै तीनि लौ तौ जियै वर्ष एकै ।
भजै रामनामै सुजानै विवेकै ।
दिवस पांच लौ जो सरे सूर्य नाड़ी ।
कहौ आयु ताकी सु मासै विचारी ।
सरै पिगिला पक्षनौ जानियै जू ।
त्रमासै अबदी तहाँ मानियै जू ।
सरै मास लौ आयु षट् मास जानौ ।
कहै काल ज्ञानी सु यों सांचु मानौ ।
निसा कौ ससी के प्रवाहै जु जानौ ।
सरै सूर्यनाड़ी जबै द्वौ समानौ ।
सबै मास ऐसौ निरंतर बहै जू ।
तीसै मास एकै अबदी कहे जू ।
सुनौ विष्णु पद भोह दोऊ कहावै
धटै आयु जाकी न तौ दृष्टि आवै ।
(७४)
(स्वरोदय विज्ञा (७५))
कहो द्यौस नों है रही आयु बाकी ।
भजौ रामनामै यहै मुक्ति ताकी ।
कदै वक्र जातौ जु नासाग्र जानौ ।
न दीखै अवदी दिना सात मानौ ।
नहीं और कीजै तहां तौ उपाई ।
भजौ राम नामै महा सुःख पाई ।
कहौ मात्र मंडल सुहै तारुका जू ।
न दीखै जुनै ना रही आयुषा जू ।
दिना पांच लौ जीव ताकौ बखानौ ।
महादेव बानी सबै सांचू मानौ ।
जु आरुन्धाती नाम जिभ्या कहावै ।
घटै आयु जौ पै नतौ दृष्टि आवै ।
कहै द्यौस नों है रही आयु बाकी ।
कहौ और निश्चै रही नाहिं ताकी ।
द्वै मूत्र विष्टा जहाँ एक कालै ।
सरै वायुता संग तौ जानि कालै ।
रही द्यौस लौ सुनियै आयु ताकी ।
अवस्था सुनौ होइ ऐसी जु जाकी ।
द्रगनि कौ मूदि अंगुली एक लावै ।
सु दावै मलै तौ वलै नै क पावै ।
अरुन सामरौ चक्र जा कौ न दीखै ।
दसई द्यौस जीवै भजे जगत ईसै ।
उठै प्रात ही सो वन को सिधावै ।
उदै होइ जब ऊपर को आवै ।
तहाँ होहि ठाड़ौ रविहि पीठी दै जू ।
जहां येकसी भूमिलै ना चलै जू ।
शरीरदय विज्ञान) ३५)
(स्वरोदय विज्ञान)
दोऊ हाथ नीचें तवैं छाडि देईं ।
कहुं ये क चिंता न तौ चित लेईं ।
करै दृष्टि ऊंची सु भू को निहारै ।
तहौ छाँह अपनी बड़ी सो विचारै ।
सबै विंब पेखे बड़ी आयु जानौं ।
द्रगनि होन तौ पांच मासै बखानौं ।
बिना कान तौ जानियै तीनि मासै ।
कछू औरहू भेद ज्ञानी प्रकासै ।
हिये में परै दृष्टि तौ छिद्र जानौं ।
तहां तीनि वर्ष सुनौं मित्र मानौं ।
बिना नैन पेखे जु दौं वर्ष जानौं ।
चरण जो न पेखे सु येकै बखानौं ।
सबै सुद्ध विंब लिखे जो सु ज्ञानी ।
रही ताहि नव वर्ष लौं मृत्यु मानी ।
न देखे जु विंब षटै मास वाकी ।
लखौं दौतिही घोस है मृत्यु ताकी ।
करै या जतन मित्र यौं जुक्ति जानौं ।
सिवा में बखानी सबै साँचु मानौं ।
इति काल-ज्ञान
अथ काल कौ उपाइ
जु पै लोइ ज्ञानी लखे कालु आयौं ।
उपायै करै जू सु योगी बतायौं ।
तजै ग्रह कौं जू तबै होइ त्यागी ।
सबै रोग मैटै सु है बीतरागी ।
करै पूरकौ पिंगला में तहां लौं ।
(स्वरोदय विज्ञान)
(७) (७)
धरै कुंभकी सक्ति जाकी तहां लौं ।
इडा नांडि का रेचकौ जानि कीजै ।
बढ़ै आयु निश्चै बहुत काल जीजै ।
जहाँ भूकुटी में मनै थाभि राखै ।
लगावै तहाँ टकटकी ईस भाषै ।
बढ़ै आयु ताकी प्रति दौस मानौ ।
घटी तीनो संकर बखानी सु मानौ ।
सुजाना जु पद्मासनै जानि बाधै ।
पवन मूल कौ सो तबै ऊर्ध साधै ।
तहां नासिका पवन कौ पूर ज्ञानी ।
इडा पिंगला कौ तलै जानि आनी ।
अर्ध औ उर्ध द्वै बखानी जहां जू ।
सबै बीच में सुषमना सो तहाँ जू ।
गुरु ज्ञान लैकै करै जोग रीतै ।
अमर होइ जोगी सोई काल जीतै ।
दसम द्वार माँही सबै पूर्ण धावै ।
कमल नाभि ते सक्ति ऊंची उठावै ।
दोहू में जवै होइ संजोग नीकौ ।
अभी दृष्टि होई जो सुखकार जी कौ ।
गिरे अंग पै सो अमर होई प्रानी ।
हिंये राखि ता कौ जु संकर बखानी ।
सदां जुक्ति ऐसी करै जो सु ज्ञानी ।
हरै काल चीन्है प्रथम जो सु ज्ञानी ।
हरै काल चीन्है प्रथम जो बखानी ।
ससी सूर्य जौनों, निसा में प्रवाहै ।
सदा भ्यास कौ जो क्रिया को निवाहै ।
(७६) (७७)
(स्वरोदय विज्ञान)
गगन मंडल में ससी सूर्य जीनों ।
सुलीला सरूपी जियै साधु तो लौ ।
जियै साध साधै जु है सिद्ध जानों ।
करै तो परम पद लहै सांचु मानों ।
इति काल कौ उपाइ
कहें पंच परकास में काम जेतै ।
बिना साधना सो नहीं सिद्ध तै तै ।
छटै में कही साधन रीति या तै ।
जु चाहौ कि साधै लहौ सिद्धि ता तै ।
उमा गुप्त ही सो प्रगट में सुनाई ।
हियै समझिले बात मन में जु आई ।
इति श्री महास्वरोदये ज्ञाना-दीपके उमा महेश्वर संवादे ।
भाषारिषीकेस कृते काल ज्ञान वर्णनोनाम पंचमो प्रकास । ॥५॥
षष्ठम-प्रकाश
योग-साधना-विधि
दोहा
षष्ठम कहौ प्रकास में, लियौ चौपही रीति ।
जहा साधना जोग की, किहि विधि, सुनियै मीत ॥
चौपाई
द्वौ मारग जग भीतर जानों, मित्र प्रवृत्ति निवृत्ति बखानों ।
जे प्रवृत्त माया में बहैं, जे निवृत्त तीरहि लगि रहैं ।
सिद्धि सिद्धि नव निद्धि जु चाहै, इनि ही के हित कष्ट निवाहै ।
तिनि जन पूरन ज्ञान न पायौ, नट ज्यौ नाचौ जगत रिझायौ ।
सो उपाइ ज्ञानी किनि करै, जासे भव सागर कौ तिरै ।
(७८)
(स्वरोदय विज्ञान)
(स्व)
आपु ही जाइ ईश्वरहि जाँनै, तब कछु अलख भेद पहिचानै ।
जो कछु बाहिर खोजै चाहियै, सो सब खोजि सरीरहि लहियै ।
गुरु अज्ञा तै खोजै कोई, परम लाभ जय ताकौं होई ।
ता तै सो साफन अब कहियै, जाकौं साधि परम पद लहियै ।
कही सिवा सुनियै हरि देवा, देव अदेव न जानै मेवा ।
जो तुम सुर की बात बखानी, सो सब मै अपने मन आनी ।
करि विस्तार तासु कौं भाखौं, होइ कृपाल गुप्त मति राखो ।
ताकी सकल साधना कहियै, जाकौं साधि परम पद लहियै ।
कौन भांति स्वर साधन कीजे, कृपा सिध भो प्रति कहि दीजे ।
यह सुनि बोले वचन गिरीसा, सब सुर जिने नवाबैं सीसा ।
शिव उवाच
चित दे सुनि गिरिराज कुमारी, यह स्वर ज्ञान सदा सुखकारी ।
समुझाऊँ दोऊ स्वर की वाता, जो अभ्यास मोहि दिनराता ।
जेते गुन ब्रह्माण्ड हि भरे, सूर-ससी सो जानौं खरे ।
गुन ब्रह्माण्ड मध्य हैं जेते, मानुष तन मैं जानहुं तेते ।
नासा स्वर दोउ रंध जु जानौं, दच्छिन रवि को घर पहिचानौ ।
जानौं बहुरि चंद्र उत्रायन, दोउ स्वर चलै आपने भाइन ।
कबहुं दच्छिन सूर्य बहै है, कवहुं चन्द्रमा वाम गहै है ।
इक दिसि उदय होहि दोहु नांही, मिलै न कबहुं आपुस मांही ।
तपति अधिक जाके तन होई, दच्छिन स्वर जो रोकै कोई ।
रेनि द्वैस रवि कौ आरंभै, सीत जानि ससि कौ सुर थंभै ।
रेनि द्वैस स्वर बाम जू सारै, नासै तपति सीत विस्तारै ।
तन सों सकल सीत मिटि जाई, होइ तपति ते तहां अधिकाई ।
दोऊ स्वरनि सरन नहि दीजे, चहिये सो स्वर पलटि जु लीजे ।
य विज्ञान)
(स्वरोदय विज्ञान)
(७६)
पार्वत्युवाच
गौरी कही सुनौं सिव देवा, स्वर पलटन कौ कहियै भेवा।
रवि में ससि ससि में रवि आवै, कहा करै जिहि फेरिन चावै।
श्री शिव उवाच
जब सिव संकर बोले बानी, सुनौ प्रिया सुन्दर सुखदानी।
बहनि जु नाडी तूल सौ रोकै, औरौं भांति गुनी अबलोकै।
जो स्वर सरे सोइ दिसि जानौ, लावै कृखि सु कुहुनी माँनौ।
अँगुरी हाथ भिन्न सब कीजै, पुनि कछु भार भूमि पर दीजै।
जो स्वर बहै बन्द हो जाई, बन्द होई सो चलै वहाई।
चलते स्वर सौ सोवै कोई, नाडी सून्य ऊर्ध्व लै जोई।
निश्चै चलै और स्वर ताकौ, ऐसै भेद लहौ तुम याकौ।
निसि पति सरै जु दिन में बाहैं, रजनी कौ दिनपति अवगाहैं।
जो कोउ क्रिया सदा यह करै, सकल रोग सो तन के हरै।
पीरा सीस अस्थि जो होई, सत्य पीर नासैं सब सोई।
टौना टामन कछु न लागै, बीछू सर्प सकल विष भागै।
तन में रहै सदा तरुनाई, हर्ष अनंद वंस अधिकाई।
दिन कौ पान करै ससि जोई, रवि कौ राति निवाहै सोई।
बढ़े आयु निश्चै जिय जानौं, काहू भांति न संसय मानौं।
पै भोजन अस्नान जु जानौं, तिनि में सूर स्वरै पहिचानौं।
चारि घरी स्वर फेरि जु कीजै, याते अधिक बहन नहि दीजै।
प्रथमारम्भ कियै चित्त चाहै, जो नर स्वर सिद्धी अवगाहै।
ताकी रीति सकल अब कहियै, जाके कियै सदा सुख लहियै।
(८०)
(स्वरोदय विज्ञान)
(८)
अथ स्वर-सिद्धि-विधि
वर्ष एक लौं साथै आसन, जहाँ यह कहत महा भय-नासन।
जहाँ अस्थल उत्तम अति होई, पुनि उत्पात न जाने कोई
दुर्भति दुष्ट तहाँ नहि आवै, सांत चित कोउ एक सिध्दावै।
सूक्ष्म भोजन तहाँ सु जानौ, त्याग अनूल ताको पहिचानौ।
मीठी मठा गाइको लेई, चावल संग लेइ पुनि सोई।
और सकल भोजन परिहरै, एक बार यह साधन करै।
आसन तहाँ पालथी जानौ, नतौ दुजाना बैठक मानौ।
सूर्य चन्द्र कौ बैठक होई, बैठे सुचित जू साधक जोई।
जो अभ्यास करें सुख पावै, नासाअग्र ध्यान सो धावै।
प्रथम पीर उपजै कछु नैना। चालीस दिन बीतै होई चैन।।
जोगी स्वर ईश्वर स्वर ज्ञानी, गिरिजापति येहि भांति बखानी।
पसु पंछी मानस जे मरै, साधक दृष्टि तहां लौ परै।
चाहे तो अपनौ तनु त्यागै, मृतक सरीर जाइ पुनि जागै।
जो चाहे तो फेरिहु आवै, याकौ मंत्र गुरु पहि पावै।
जब यह ध्यान भाल ठहराई, बहुरि तहां तै मरितष्क जाई।
आवै जबै सीस के मांही, पृथ्वी परै न साधक छांही।
स्वर्ग पताल सवै, वृग आवै, देव अपसरा दर्सन पावै।
ग्रह नक्षत्र सब तिनि के रूपा, नेत्र निकट सो लखै अनूपा।
जब पुनि दृष्टि पृष्टि पर आवै, बात सात सागर की पावै।
साधक क्रिया यहै अभ्यासै, सो सब दुविधा भ्रमै विनासै।
निमै होइ परम-पद पावै, जो साधन सौं चित लगावै।
एक वर्ष में साधजु होइ, जो पै विघन न आवै कोई।
चाहे रहे जगत अनुरागी, चाहे होइ सकल कौ त्यागी।
करनी कठिन करी नहि जाई, रिषीकेस मुख भाषि सुनाई।
हौं नहि यह करनी करि जानौ, चतुराई करि बात बखानी।
विज्ञान)
(८१)
(स्वरोदय विज्ञान)
जैसों बल अपने तन पावै, सो तैंसों वह भार उठावै।
जेतो साधन सों मन लावै, ते तौ लाभ दास हूं पावै।
बोले शंकर सुनो भवानी, यह साधन की गति जु बखानी।
जोगी सावधान जो साथै, ब्रह्म लीन होइ लाइ समाधै।
चालीस दिन बितीत जब होई, अलख चिन्ह पुनि देखै सोई।
यामैं कछु संदेह न जानों, जो हम कहौ साचु करि मानौं।
पार्वत्युवाच
गौरी कहै सुनों जगदीसा, हंसासन साथै जु गुनीनों।
ताकौ भेद नहीं हम जानों, मो पर होइ कृपाल बखानौ।
अथ हंसानन-विधि
श्री शिव उवाच
सिर अरु पृष्ठ कटिहि सम राखै, पिडुरी पर पिडुरी गुरु भाखै।
बाये पग की ऐडी जोई, दक्षिण जानु राखियै सोई।
दक्खिन जानु सु बाँई जानौ, बहुरौ नाम जपौ मन मानौ।
निर्गम स्वर सो हंस कहावै, नाम जु हंस प्रवेस जु पावै।
हंस जु आतम करि पहिचानौ, जो सुहंस परमाल्मा मानौ।
जो इनि दुहुनि एक करि राखै, नाम निरंजन सो रस चाखै।
लहै निरंजन अनुभव जागै, व्याधि मलिनता जड़िता भागै।
जो इहि भांति साधि चित्त लाबै, परम हंस की पदवी पावै।
इति हंसानन
पार्वत्युवाच
सुनिये शब्द अनाहद कैसैं, शिवा कही जब सिव सों ऐसैं।
(स्वरोदय विज्ञान)
(८२)
अथ अनाहद-विधि
श्रीशिव उवाच
तब शिव संकर बोले वानी, चित दैकरि तुम सुनौ भवानी ।
जो नर सुनें अनाहद चाहे, सौ तो सदा एकन्त निवाहे ।
बैठक ताहि दुजानू जानौ, दुहु चूतर तरवा पर आनौ ।
दोउ हाथ काननि पर कीजैं, तर्जनी तिनि के पीछे दीजे ।
सब्द अनाहद जागै जहा, निसि दिन मंगल ध्यान में तहां ।
बैठो बुधि विज्ञान सु पावै, जो अनहद सो ध्यान लगावै ।
महिमा ताकी कही न जाई, बहु बिस्तार न किन हू पाई ।
ऐसी विधि संकर कर ज्ञानी, रीति अनाहद सुखद बखानी ।
इति अनाहद-विधि
पार्वत्युवाच
बहुरि गौरि बोली सिव पाहीं, जोनी सब्द कर्म जग माहीं ।
करिकें कृपा सु मोसों कहियै, ताकैं कियै सिधि कहा लहियै ।
अथ शब्द-कर्म
श्रीशिव उवाच
बोले सिव गुरुजन यह भाखै साध पालथी आसन राखै ।
कटि अरु पीठि समासम करै, दोऊ कर तहांई लै धरै ।
कुहनी दोउ नाभि पर कहै, तरवा पर दोउ अंगूठा रहे ।
ब्रह्मरन्ध्र कौं धरै जुध्याना, साधै विरला संत सुजाना ।
अमर होइ सो जोगी जानौ, तिहुँ काल तिहि आगै मानों ।
इति शब्द-कर्म
(६३)
(स्वरोदय विज्ञान)
पार्वत्यवाच
बोली गौरि जोरि कर दोऊ, पूरन क्रिया कहौ सिव सोऊ।
अथ पूरक-कर्म
श्रीशिव उवाच
बोले सिव जो पूरन गहै, हलकौ तनहि बूल सम लहै।
जैसे तूलहि पवन उड़ावै, त्यौ साधक जल में चलि आवै।
जो कोउ चाहै पुरक साधै, आसन तहां पालथी बांधै।
पूरक करै पवन को खैचै, उदर हलाइ सु अंतर ऐंचै।
नासा स्वर को खैचत रहै, जब लगी पवन सकल तन बहै।
एक वर्ष यह साधन करै, सिद्धि होइ सो जल में तरै।
तन की व्याधि सकल पुनि नासै, बहु आनंद हिय माहि प्रकासै।
इति पूरक-कर्म
पार्वत्युवाच
तवै सिवा सिव सौ प्रति कहियै, कर्म खेचरी किहि विधि लहियै।
अथ खेचरी-कर्म
श्रीशिव उवाच
बोले सिव सो पवनहि थंभै, कर्म खेचरी जो आरम्भै।
तालु रध जीभ सौ मूदैं, वायुन निकसै, तन में कूदैं।
सौधा नौन जगत विख्याता, काली मिरच मिलावै गाता।
जिभ्यासौ षट मास लगावै, सांझा भोर नहि सो बिसरावै।
दोह कर जिभ्या दोहन करै, चिंता कछु न चित में धरै।
भीजे बसन दुहै पुनि ताको, बाहिर मुखते खैचै बाको।
कोमल होइ जीभ पुनि बाढ़े, जौं जौं साधक खैचत गादैं।
(८४)
(स्वरोदय विज्ञान)
(स्वरो)
पै जो कोऊ इहि विधि राखै, भूलि न कबहु तमोलहि चाखै ।
तर्जन और अंगुष्ठा कहियै, तिनि के नखहि बढायै रहियै ।
रसना तैँ सिरा द्वौ जानौ, अरुन स्याम तुभ तिनि कों मानौ ।
तिनि कों काटि नखनि सों लीजै, लांबी कोमल रसना कीजै ।
नासा लों जिभ्या जब आवै, साध मनोरथ पूरन पावै ।
बहुरौ प्रथम पूरकैं ठानै, रसना तालू रध समानै ।
रसना सबहि तालु मंहि जाई, वायु सकल तन रहै समाई ।
ग्रीव हाड़ ठोड़ी सों बांधै, रोकै पवन वर्ष भरि साधै ।
ऐसी भांति क्रिया जो साधै, एक वर्ष लों धरै समाधै ।
इति खेचरी-कर्म
पार्वत्युवाच
मौरी कहै सुनौ सिव ज्ञानी, तुम्हरी महिमा जगत बखानी ।
सिद्धासन जो जग में कहियै, ताकी सिद्धि कौन विधि लहियै ।
कहा होहि तिहि आसन साधै, सिद्धि कौन ताकै अवराधै ।
हो कृपाल सो मोसों भाखों, दासी जानि गुप्त मत राखौ ।
अथ सिद्धासन-विधि
श्रीशिव उवाच
ऐसे सुनि बोले त्रिपुरारी, चित दै सुनियै अचल कुमारी ।
आसन सिद्धि, सिद्ध जो साधै, बैठक तासु दुजानू बांधै ।
दक्षिण पद की पीठि जू जानों, चरण बाम तरवा पर आनो ।
आधे तलु एड़ी दिसि जोई, दोउ अंड तर दावै सोई ।
मूत्र बीज की नाड़ी रोकै, ऐसी भाँति लहै सुख ओकै ।
रसना तालु रंध्र में दीजै, पवन रोकि सो तन में लीजै ।
सिद्धासन इहि विधि साधै, मैटे चित सों सकल उपाधै ।
(स्वरोदय विज्ञान)
(८५)
भूख प्यास ताकों नहि लागै, तेहि लखि मृत्यु दूरि तें भागे।
सीत ऊष्म डरु ताकों नाहीं, छूटै धंध सकल जग माहीं।
महादेव देवनि के देवा, कही सिवा प्रति यह स्वर भेवा।
कबीरौवाच
जद्यपि कर्म क्रिया अरु आसन, हैं अनेक सब दुख विनासन।
बहुतक कहैं करै कोउ ऐकै, गुर प्रसाद कोउ लहै विवेकै
तातै मैं सब नाहि बखानी, भाखै सुगम-सिद्धि मैं जानी
क्रिया जोग की अगम अपारा, कह लों ताहि करै सिंसार
गोरिख सब इक इक करि साधी, भाँति भाँति करि हिय आराधी
केतिक और साध जै भये, साधन साधि सिद्ध है गये
जथा सिद्ध जग में परवाना, सोई जोग अलख पहिचाना
माया नदी जगत में छाई, विविध सपन तहाँ देति दिखाई
ज्ञान जोग जोगै नर जोई ताकों स्वप्न होइ नहि कोई
सकल सिधि कछु काम न आवै, सिध सु परमात्म कौ धावै
सो परमात्मा खों जो भाई, मिटी जाइ तिहि आवाजाई
जाके लखै परम सुख पावै, तासौ क्यों नहि चित लगावै
जिहि परमात्मा में जग ऐसै, मन में विविधि कल्पना जैसै
छिन प्रकटै छिन दीखै नाहीं, जहां ते उपजे तहां समाहीं
जौ परमात्मा खोजै चहियै, तौ पहिले यह जतन निवहियै
साधक सूक्ष्म भोजन पावै, दिन दिन प्राणायाम बढ़ावै
तातै सब इन्द्रिनि कों जीतैं, तिनि कों तिनि के गुन तैं रीतै
पंचभूत को एक सरीरा, जानत जाहि सवै मतिधीरा
लिंग सरीरा दूसरो लहियै, क्षर अक्षर इनि देउवनि कहियै
सूक्ष्म सरीर तीसरौ राखौ, जे ज्ञानी ते इहि विधि भाखौ
(८६)
(स्वरोदय विज्ञान)
भू जल तेज वायु नम जानौ, स्थूल सरीर सु इनि को मानौ
मन अरु बुधि चित्त अहंकारा, इनि तै लिंग सरीर संवारा
सूक्ष्म सरीर तेजमय जानौ, क्रम ते इक इक कौ तुम मानौ।
जब इन्द्रिनि को बसि करि पावै, मन चित्त बुधि अहंकार नसावै।
लिंग सरीर बसै द्रग ताकी, ससि सम आभा बरनी जाकी।
ताकै सूक्ष्म सरीरहि जानौ, जाकौ रस सम तेज बखानौ।
आपनुपो लखिबौ यह कहियै, याहि लखै परमात्म लहियै।
परमात्म याकैउ परतै, जाकी कहियै अलख अनंतै।
जा ते ये प्रकास सब पावै, स्व प्रकास जेहि वेद बतावै।
सब में बसै सबनि ते न्यारा, सोई सब संतनि कौ प्यारा।
जातैं साधन जतन सो करै, जासै निरगम की गम परै।
वातिनि जोग सिद्धि नहि होई, जो लौ सुचित न साथै कोई।
अलखै लखै अलख को पावै, काहु भाति न चित भरमावै।
वातिनि जोग सिद्धि नहि होइ, जौनों सुचित न साथै कोई॥
जो लौ नहीं लहै जगदीसै, तौ लौ साचु झूटु सौ दीसै।
इति श्री महा स्वरोदये ज्ञान दीपके उमा महेश्वर संवादे।
भाषा रिषीकेस कृते योग साधन नाम षष्ठमो प्रकास ॥६॥
सम्पूर्णम् । संवत् १६३८॥ आषाढ कृष्ण ५ गुरुवासराँ॥
हस्ताक्षर जुगलकिशोर कशिव नूरगंज वारे के
॥ शुभम् भवत् ॥ श्री शुभ ॥
न) (स्वरोदय विज्ञान)
(८७)
कुछ उपयोगी सूचनाएँ
(१) ज्वर हो या किसी प्रकार की वेदना हो, फोड़ा, घाव, चाहें जो हो, किसी भी प्रकार की बीमारी के लक्षण ज्यों ही मालूम हों त्यों ही जिस नासिका से श्वास चलता हो उस नासिका को तुरन्त बन्द कर देना चाहिए। जितनी देर या जितने दिन तक शरीर स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त न हो जाय, उतनी देर या उतने दिनों तक उस नाक को बन्द ही रखना चाहिए। इससे शरीर शीघ्र स्वस्थ हो जायेगा, अधिक दिन दुःख नहीं भोगना पड़ेगा।
(२) रास्ता चलने पर या किसी प्रकार का मेहनत का कार्य करने पर, जब शरीर बहुत ही थक जाय अथवा उस कारण से धातू गर्म हो जाय तो कुछ देर दाहिने करवट सो जाना चाहिए; इससे शीघ्र ही थोड़े समय में ही थकावट दूर हो जायेगी और शरीर स्वस्थ हो जाएगा।
(३) प्रतिदिन भोजन के बाद हाथ-मुंह धोकर कंघी से सिर के बाल झाड़ने चाहिए। कंघी इस तरह चलानी चाहिए कि उसके काँटे सिर में स्पर्श करें। इससे सिर पीड़ा और सम्बन्धी अन्य कोई बीमारी तथा वात व्याधि पैदा होने का भय नहीं रहता। ऐसी कोई पीड़ा यदि होगी तो वह बढ़ेगी नहीं। वरन् क्रमश आराम हो जायेगा। बाल शीघ्र नहीं पकेंगे।
(४) यदि कड़ी धूप में कहीं बाहर जाना हो तो रुमाल, चादर अथवा तौलिया आदि के द्वारा दोनों कानों को ढक लेना चाहिए, इससे धूप में चलने पर धूप जनित कोई दोष शरीर को स्पर्श नहीं करेगा और न शरीर गर्म और दुखी होगा। कानों को इस तरह ढकना चाहिए कि पूरे कान ढक जाय और कान में हवा न लगे।
(८८)
(स्वरोदय विज्ञान)
(५) स्मरण शक्ति कम हो जाने पर मस्तक के ऊपर एक काठ की कील, उसके ऊपर एक काठ का टुकड़ा रख कर धीरे-धीरे उस आघात करना चाहिए।
(६) प्रतिदिन आधे घण्टे पआसन से बैठकर दांतों की जड़ में जीभ का अग्रभाग दबा कर रखने से सब तरह की व्याधियां नष्ट हो जाती है।
(७) ललाट के ऊपर पूर्ण चन्द्र के समान ज्योति का ध्यान करने से आयु बढ़ती है और कुष्ठादि रोग दूर होते हैं। सर्वदा दृष्टि के आगे पीत वर्ण उज्ज्वल ज्योति का ध्यान करने से बिना औषधि सब तरह के रोग अच्छे हो जाते हैं। और देह वृद्धावस्था के लक्षणों से रहित हो जाती है। सिर गर्म होने या घूमने पर मस्तक में श्वेत वर्ण या पूर्ण शरच्चन्द्र का ध्यान करने से पांच-सात मिनट में प्रत्यक्ष फल दिखाई देता है।
(८) प्यास से व्याकुल होने पर ऐसा ध्यान करना चाहिए कि जीभ के ऊपर कोई खट्टी चीज रखी हुई है। शरीर गर्म होने पर ठण्डी चीज शीतल होने पर गर्म चीज का ध्यान करना चाहिए।
(९) प्रतिदिन दोनों समय स्थिरासन से बैठ कर नाभि की ओर एकटक देखते हुए नाभि में वायु धारण और नाभिकन्द का ध्यान करने से अग्निमान्द्य, असाध्य अजीर्ण और प्रबल अतिसार इत्यादि सब प्रकार के उदरामय अवश्य आरोग्य हो जाते हैं और परिपाक शक्ति तथा जठराग्नि बढ़ जाती है।
(१०) सबेरे नींद टूटने पर जिस नासिका से श्वास चलता हो, उस और का हाथ मुंह पर रख कर शय्या से उठने पर मनोकामना सिद्ध होती है।
(११) रक्त अपामार्ग की जड़ हाथ में बाँध रखने से भूत प्रेतादि जनित सब प्रकार के ज्वर नष्ट होते हैं।
(१२) इमली के पौधे को उखाड़ कर उसकी जड़ गर्भिणी के सामने के सिर