स्वरोदय विज्ञान
Swarodaya Vigyan
श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा
स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)
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(स्वरोदय विज्ञान)
(स्व)
आपु ही जाइ ईश्वरहि जाँनै, तब कछु अलख भेद पहिचानै ।
जो कछु बाहिर खोजै चाहियै, सो सब खोजि सरीरहि लहियै ।
गुरु अज्ञा तै खोजै कोई, परम लाभ जय ताकौं होई ।
ता तै सो साफन अब कहियै, जाकौं साधि परम पद लहियै ।
कही सिवा सुनियै हरि देवा, देव अदेव न जानै मेवा ।
जो तुम सुर की बात बखानी, सो सब मै अपने मन आनी ।
करि विस्तार तासु कौं भाखौं, होइ कृपाल गुप्त मति राखो ।
ताकी सकल साधना कहियै, जाकौं साधि परम पद लहियै ।
कौन भांति स्वर साधन कीजे, कृपा सिध भो प्रति कहि दीजे ।
यह सुनि बोले वचन गिरीसा, सब सुर जिने नवाबैं सीसा ।
शिव उवाच
चित दे सुनि गिरिराज कुमारी, यह स्वर ज्ञान सदा सुखकारी ।
समुझाऊँ दोऊ स्वर की वाता, जो अभ्यास मोहि दिनराता ।
जेते गुन ब्रह्माण्ड हि भरे, सूर-ससी सो जानौं खरे ।
गुन ब्रह्माण्ड मध्य हैं जेते, मानुष तन मैं जानहुं तेते ।
नासा स्वर दोउ रंध जु जानौं, दच्छिन रवि को घर पहिचानौ ।
जानौं बहुरि चंद्र उत्रायन, दोउ स्वर चलै आपने भाइन ।
कबहुं दच्छिन सूर्य बहै है, कवहुं चन्द्रमा वाम गहै है ।
इक दिसि उदय होहि दोहु नांही, मिलै न कबहुं आपुस मांही ।
तपति अधिक जाके तन होई, दच्छिन स्वर जो रोकै कोई ।
रेनि द्वैस रवि कौ आरंभै, सीत जानि ससि कौ सुर थंभै ।
रेनि द्वैस स्वर बाम जू सारै, नासै तपति सीत विस्तारै ।
तन सों सकल सीत मिटि जाई, होइ तपति ते तहां अधिकाई ।
दोऊ स्वरनि सरन नहि दीजे, चहिये सो स्वर पलटि जु लीजे ।