स्वरोदय विज्ञान
Swarodaya Vigyan
श्री स्वामी जी महाराज (पीताम्बरा पीठाधीश्वर) द्वारा
स्रोत: स्वरोदय विज्ञानं - पीताम्बरा पीठाधीश्वर · पीताम्बरा पीठ (उद्गम)
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(८२)
अथ अनाहद-विधि
श्रीशिव उवाच
तब शिव संकर बोले वानी, चित दैकरि तुम सुनौ भवानी ।
जो नर सुनें अनाहद चाहे, सौ तो सदा एकन्त निवाहे ।
बैठक ताहि दुजानू जानौ, दुहु चूतर तरवा पर आनौ ।
दोउ हाथ काननि पर कीजैं, तर्जनी तिनि के पीछे दीजे ।
सब्द अनाहद जागै जहा, निसि दिन मंगल ध्यान में तहां ।
बैठो बुधि विज्ञान सु पावै, जो अनहद सो ध्यान लगावै ।
महिमा ताकी कही न जाई, बहु बिस्तार न किन हू पाई ।
ऐसी विधि संकर कर ज्ञानी, रीति अनाहद सुखद बखानी ।
इति अनाहद-विधि
पार्वत्युवाच
बहुरि गौरि बोली सिव पाहीं, जोनी सब्द कर्म जग माहीं ।
करिकें कृपा सु मोसों कहियै, ताकैं कियै सिधि कहा लहियै ।
अथ शब्द-कर्म
श्रीशिव उवाच
बोले सिव गुरुजन यह भाखै साध पालथी आसन राखै ।
कटि अरु पीठि समासम करै, दोऊ कर तहांई लै धरै ।
कुहनी दोउ नाभि पर कहै, तरवा पर दोउ अंगूठा रहे ।
ब्रह्मरन्ध्र कौं धरै जुध्याना, साधै विरला संत सुजाना ।
अमर होइ सो जोगी जानौ, तिहुँ काल तिहि आगै मानों ।
इति शब्द-कर्म