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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

६२ सूरसागर सार सटीक
चाँपी पूँछ लुकावत अपनी, जुवतिनि कौं नहिं सकत दिखाइ ।
प्रभु अंतरजामी सब जानत, अब डारों इहिं सकुचि मिटाइ ।
सूरदास प्रभु तन बिस्तारचौ, काली बिकल भयौ तब जाइ ॥३१॥
अर्थ—नाग ने कृष्ण को लपेट किया । मुंह से गर्व की बातें करते हो (कृष्ण
कहते है) हे सर्पराज, तुम मुझे नही जानते हो । चरण से शिखा तक लपेट लिया है
इससे मुझसे अत्यधिक धृष्टता करते हो । दबी हुई अपनी पूँछ को छिपाते हो (क्योकि)
उसे तुम युवतियो को दिख। नही सकते । हृदय की बात जानने वाले प्रभु सब कुछ
जानते है (इसलिए) उन्होंने कहा अब इसके संकोच को मिटा डालूं । सूरदास कहते हैं
कि कृष्ण ने (जब) शरीर का विस्तार किया तब काली विफल हो गया ॥३१॥
जबहिं स्याम तन, अति बिस्तारचौ ।
पटपटात टूटत अंग जान्यौ, सरन-सरन सु पुकारचौ ।
यह बानी सुनतहिं करुनामय, तुरत गए सकुचाइ ।
यहै बचन सुनि द्रुपद-सुता दीन्हौ बसन बढ़ाइ ।
यहै बचन गजराज सुनायौ, गरुड़ छोड़ि तहँ धाए ।
यहै बचन सुनि लाखा गृह मैं, पांडव जरत बचाए ।
यह बानी सहि जात न प्रभु सौं, ऐसे परम कृपाल ।
सूरदास प्रभु अंग सकोरचौ ब्याकुल देख्यौ ब्याल ॥३२॥
अर्थ—जब कृष्ण ने शरीर का अत्यधिक विस्तार कर लिया (तब) पटपटा
कर टूटते हुए शरीर को जानकर (काली ने) शरण-शरण (कहकर) पुकारा । यह
वाणी सुनते ही करुणा से भरे हुए कृष्ण तुरन्त सकुचा गये । द्रौपदी के मुख से यही
वचन सुनकर वस्त्र (चीर) बढ़ा दिया था । यही वचन (जब) हाथी ने सुनाया (तब)
गरुड़ को छोड़कर वहीं दौडे थे । यही वचन सुन कर लाख से बने घर (लाक्षागृह)
मे पांडवो को जलने से बचाया था । (शरणागत की दीन) वाणी प्रभु से सही नही
जाती । वे ऐसे परम कृपालु हैं । सूरदास कहते हैं सांप को व्याकुल देखकर कृष्ण
ने अपना अङ्ग सिकोड़ लिया ॥३२॥
नाथत ब्याल बिलंब न कीन्हौ ।
पग सौं चाँपि धींच बल तीरचौ, नाक फौरि गरि लीन्हौ ।
कूदि चढ़े ताके माथे पर काली करत बिचार ।
स्रवननि सुनी रही यह बानी, ब्रज ह्वै है अवतार ।
तेइ अवतरे आइ गोकुल मैं, मैं जानी यह बात ।
अस्तुति करन लग्यौ सहसौ मुख, धन्य-धन्य जग-तात ।
बार-बार कहि सरन पुकारचौ, राखि-राखि गोपाल ।
सूरदास प्रभु प्रगट भए जब, देख्यौ ब्याल बिहाल ॥३३॥

वृन्दावन लीला ६३
अर्थ—(कृष्ण ने) नाग को नाथते देर नही की। पैर से दबाकर, गरदन के
बल तोड़कर, नाक को फोड़कर पकड़ लिया। (फिर) कूदकर उसके मस्तक पर (कृष्ण)
चढ़ गये। (तब) काली विचार करता है कि कानों में यह वाणी सुनी थी कि ब्रज मे
अवतार होगा। उन्ही (भगवान् ने) गोकुल में आकर अवतार लिया है। मैं यह बात
जान गया। अपने हज़ार मुख से विनती करने लगा कि हे जग के पिता तुम धन्य हो।
बार-बार शरण, कहकर पुकार की कि हे गोपाल रक्षा करो। सूरदास कहते हैं कि
कृष्ण ने जब नाग को व्याकुल देखा तो वे (विष्णु रूप में) प्रकट हुए ॥३३॥
आवत उरग नाथे स्याम।
नंद जसुदा गोपी, कहत हैं बलराम।
मोर-मुकुट, विसाल लोचन, स्रवन कुंडल लोल।
कोटि पितांबर, बेष नटवर, नृतत फन प्रति डोल।
देव दिवि दुंदुभि बजावत, सुमन गन बरषाइ।
सूर स्याम बिलोकि ब्रज-जन, मातु-पितु सुख पाइ ॥३४॥
अर्थ—नंद, यशोदा, गोप गोपी तथा बलराम सभी कह रहे हैं कि नाग को
नाथ कर कृष्ण आ रहे हैं। (उनके सिर पर) मोर का मुकुट है। (उनके) नेत्र विशाल
हैं। कानों मे चंचल कुंडल, कटि (कमर) मे पीताम्बर, नटवर का वेष धरे (कृष्ण
काली के) प्रति फण पर घूम-घूम कर नाच रहे है। देव आकाश में दुन्दुभी बजा रहे हैं
तथा अत्यधिक फूल बरसा रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण को देखकर ब्रजवासी तथा
माता-पिता सुखी हो गये ॥३४॥
गोपाल राइ निरतत फन-प्रति ऐसे।
गिरि पर आए बादर देखत, मोर अनंदित जैसे।
डोलत मुकुट सीस पर हरि के, कुडल-मडित-गड।
पीत बसन, दामिन मनु घन पर, तापर सुर-कोदंड।
उरग-नारि आगैं, सब ठाढ़ी, मुख मुख अस्तुति गावैं।
सूर स्याम अपराध छमहु अब, हम मागैं पति पावैं ॥३५॥
अर्थ —गोपालराज प्रति फण पर ऐसे नाच रहे हैं जैसे पर्वत पर आये हुए
बादल को देखते ही मोर आनंदित होकर (नाचने लगता है)। कृष्ण के सिर पर मुकुट
डोल रहा है। कनपटी कुंडल से सुशोभित है। पीताम्बर (ऐसा लग रहा है) मानो
बादलो के ऊपर बिजली और उस पर इन्द्रधनुष हो। नाग की सभी पत्नियां आगे
खडी होकर (अपने-अपने) मुख से स्तुति (गा) कर रही है। सूरदास कहते हैं कि (वे
कहती हैं) हे कृष्ण अब अपराध को क्षमा कर दीजिए। हम लोग यह मांगते हैं कि
हमारे पति फिर मिल जावे ॥३५॥
गरुड़-त्रास तैं जौ ह्वां आयीं।
तौ प्रभु चरन-कमल फन-फन प्रति, अपनें सीस धरायीं।

६२ सूरसागर सार सटीक
------------। ऋषि साप दियौ खगपति कौं, ह्याँ तब रह्यौ छपाइ ।
प्रभु वाहन-डर भाजि बच्यौ, नातरु लेतौ खाइ ।
यह सुनि कृपा करी नंद-नंदन, चरन चिह्न प्रगटाए ।
सूरदास प्रभु अभय ताहि करि, उरग-द्वीप पहुँचाए ॥३६॥
अर्थ-(काली नाग कहता है) गरुड के भय से जो यहां आ गया तभी प्रभु के
चरण-कमल को प्रत्येक फन से अपने सिर पर धारण कराया । वे ऋषि धन्य हैं जिन्होने
पक्षियो के स्वामी (गरुड) को शाप दिया था (कि गरुड़ कालीदह में नही आ सकता)
तभी (मै) यहाँ छिपा रहा । प्रभु की सवारी (गरुड) के डर से भाग कर बच गया
नही तो (वह मुझे) खा लेता । यह सुनकर नन्द के नन्दन (पुत्र) कृष्ण ने कृपा करके
(उसके मस्तक पर) चरण के चिह्न को प्रकट किया । सूरदास कहते है कि कृष्ण ने
उसे भयरहित करके नागो के द्वीप मे भेज दिया ॥३६॥
सहस सकट भरि कमल चलाए ।
अपनी समसरि और गोप जे, तिनकौं साथ पठाए ।
और बहुत काँवरि दधि-माखन, अहिरनि काँधैं जोरि ।
नृप कैं हाथ पत्र यह दीजौ, विनती कीजो मोरि ।
मेरो नाम नृपति सौं लीजौ, स्याम कमल लै आए ।
कोटि कमल आपुन नृप-मांगे, तीनि कोटि हैं पाए ।
नृपति हमहिं अपनौं करि जानी, तुम लायक हम नाहिं ।
सूरदास कहियौ नृप आगैं, तुमहिं छाँड़ि कहँ जाहिं ! ॥३७॥
अर्थ-हजारो गाड़ियो को कमल से भरकर चला दिया । अपनी समानता वाले
जो और गोप थे उनको साथ भेज दिया और अहीरो के कन्धे से जोडकर दही और
मक्खन से भरी बहँगियो को (भेजा) । (किसी गोप के हाथ मे पत्र देकर नन्द कहते
है) राजा (कस) के हाथ मे यह पत्र देकर मेरी (ओर से) विनती करना । नृपति से
मेरा नाम लेकर (कहना) कृष्ण कमल ले आये । हे राजा आपने एक करोड कमल
मांगे थे, तीन करोड पा गये है । राजा हम लोगो को अपना ही करके जानिए ।
(यद्यपि) आपके लायक हम नही है । सूरदास कहते हैं कि (नन्द ने कहा) कि राजा
के आगे कहना कि तुम्हे छोड़कर (हम लोग) कहां जायें ॥३७॥
मुरली
जब हरि मुरली अधर धरत ।
थिर चर, चर थिर, पवन थकित रहैं, जमुनाजल न बहत ।
खग मोहैं, मृग-जूथ भुलाहीँ, निरखि मदन-छवि छरत ।
पसु मोहैं सुरभी विथकित, तृन दंतनि टेकि रहत ।
सुक सनकादि सकल मुनि मोहैं, ध्यान न तनक गहत ।
सूरदास भाग हैं तिनके, जे या सुखहिं लहत ॥३८॥

वृन्दावन लीला ६३

अर्थ-जब कृष्ण बांसुरी ओठ पर धरते हैं तब न चलने वाले चलकर, गरदन के
और चलने वाले स्थिर हो जाते हैं। पवन शिथिल (थका हुआ) रह जाता है। यमुना
के पानी का बहना बन्द हो जाता है। पक्षी मोहित हो जाते हैं। (इसे) देखकर काम-
देव की छवि अपहृत (क्षीण) हो जाती है। पशु मोह जाते हैं। गाये विशेष रूप से
थकित होकर तृण को दांतों से पकड़े रह जाती हैं। शुकदेव, सनक आदि मुनि मोह
मे पड़ जाते हैं और तनिक भी ध्यान नही धर पाते। सूरदास कहते है कि वे भाग्यवान
है जो इस सुख को पाते हैं ॥३८॥
(कहौं कहा) अंगनि की सुधि विसरि गईँ।
स्याम अधर मृदु सुनत मुरलिका, चकित नारि भईँ।
जो जैसे तौ तैसे रहि गई, सुख-दुख कह्यौ न जाई।
लिखी चित्र सी सूर ह्वै रहिं इकटक पत्र बिसराई ॥३६॥
अर्थ- (केसे कहूँ) (स्त्रियाँ) अंगो की याद ही (ज्ञान) भूल गईं। कृष्ण के
ओठो से वंशी की मीठी (ध्वनि) सुनते ही स्त्रियां चकित हो गयीं। जो जैसे थी वैसे
ही रह गयी। सुख-दुख (कुछ) कहा नही जाता। सूरदास कहते हैं कि वे सब विना
पलक मारे एकटक देखती हुई लिखे हुए चित्र की तरह हो गयी ॥३६॥
मुरली धुनि श्रवन सुनत, भवन रहि न परै।
ऐसी को चतुर नारि, धीरज मन धरै।
सुर नर मुनि सुनत सुधि न, सिव-समाधि टरै।
अपनी गति तजत पवन, सरिता नहिं ढरै।
मोहन मुख-मुरली, मन मोहिनि बस करै।
सूरदास सुनत श्रवन, सुधा-सिंधु भरै ॥४०॥
अर्थ-मुरली की आवाज कान से सुनते ही कोई (गोपी) भवन में रह नही
पाती। कौन ऐसी चतुर स्त्री है जो मन में धीरज धर सके। (वंशी की ध्वनि) सुनते
ही देवता, मनुष्य, मुनि सभी की स्मृति खो जाती है। शिव की समाधि डिग जाती
है। हवा अपनी चाल को छोड़ देता है। नदी का बहना रुक जाता है। मोहन के मुख
की वंशी मन को मोहने वाली नारियो को बस मे कर लेती है। सूरदास कहते हैं कि
कानों से सुनते ही (कानो मे) अमृत का सागर भर जाता है ॥४०॥
बाँसुरी बजाइ आछे रंग सौं मुरारी।
सुनि कै धुनि छूटि गई, संकर की तारी।
वेद पढ़न भूलि गए, ब्रह्मा ब्रह्मचारी।
रसना गुन कहि न सकै, ऐसी सुधि बिसारी।
इंद्र-सभा थकित भइ, लगी जय करारी।
रंभा कौ मान मिट्यौ, भूली नृत कारी।

९६ सूरसागर सार सटीक
जमुना जू थकित भईँ, नहीं सँभारी।
सूरदास मुरली है, तीन-लोक प्यारी ॥४१॥
अर्थ - कृष्ण ने अच्छे राग (मोहक ढंग) से वंशी बजायी । (वंशी) की ध्वनि
को सुनकर शंकर का ध्यान टूट गया । ब्रह्मचारी (ब्रह्मा, वेद पढना भूल गये । इस
तरह से स्मृति) समाप्त हो गई कि वाणी गुण को कह ही नही सकती । जब तेजी से
(मुरली की ध्वनि) सुनाई पडी तब इन्द्र की सभा थकित हो गई । रंभा का गर्व मिट
गया (वह) नाचना भूल गयी । यमुना शिथिल हो गई । (वह) होश नही सँभाल
पायी । सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण की) वंशी तीनो लोक को प्रिय है ॥४१॥
मुरली तऊ गुपालहिं भावति ।
सुनि री सखी जदपि नंदलालहिं, नाना भाँति नचावति ।
राखति एक पाइ ठाढ़ौ करि, अति अधिकार जनावति ।
कोमल तन आज्ञा करवावति, कटि टेढ़ी ह्वै आवति ।
अति अधीन सुजान कनीड़े, गिरिधर नार नवावति ।
आपुन पौंढ़ि अधर सज्जा कर, पर पल्लव पलुटावति ।
भृकुटी कुटिल, नैन नासा-पुट, हम पर कोप करावति ।
सूर प्रसन्न जानि एकौ छिन, धर तैं सीस डुलावति ॥४२॥
अर्थ-(एक सखी दूसरी सखी से कहती है) मुरली तब भी कृष्ण को अच्छी
लगती है । सुनो सखी यद्यपि वह नन्दलाल को अनेक भाँति से नचाती है। (उन्हे) एक
ही पैर पर खड़ा करके रखती है और (अपना) अत्यधिक अधिकार जनाती है । (कृष्ण
के) कोमल तन से आज्ञा (का पालन) करवाती है (इसी से कृष्ण की) कमर टेढी हो
आती है । अत्यधिक आधीन तथा कृपा से दबे हुए सुजान कृष्ण की गरदन को झुक-
वाती है । स्वयं (कृष्ण के) ओठ रुपी सेज पर लेट कर पल्लव सदृश हाथ से पैर दबवाती
है। भौंहे, नेत्र, नथुने कुटिल करके हम पर क्रोध करवाती है । सूरदास कहते हैं कि (गोपी
कहती हैं) कृष्ण को एक भी क्षण प्रसन्न जानकर धड से सिर हिलवाती है ॥४२॥
अधर-रस मुरली लूटन लागी ।
जा रस कौं षटरितु तप कीन्हीं, सो रस पियति सभागी ।
कहाँ रही, कहँ तैं यह आई, कौनैं याहि बुलाई ?
चक्रित भई कहतिं ब्रजबासिनि यह तौ भली न आई ।
सावधान क्यौं होतिं नहीं तुम, उपजी बुरी बलाई ।
सूरदास प्रभु हम पर ताकौं, कीन्हौ सौति बजाई ॥४३॥
अर्थ - मुरली (कृष्ण के) ओठो का रस लूटने लगी । जिस रस के लिए (हम
व्रज बालाओ ने) छहो ऋतुओं मे तप किया, उसी रस को भाग्यशाली (वंशी) पीती
है । (यह) कहाँ थी, कहाँ से आ गयी, इसे किसने बुलाया । (ऐसा) कहती हुई ब्रज-

वृन्दावन लीला ६७
वासिनियां चकित हो गई (और कहने लगी) कि इस (मुरली) का आना अच्छा नही
हुआ । तुम लोग सावधान क्यों नही हो जाती हो क्योकि (यह) एक बुरी बला पैदा
हो गयी है । सूरदास कहते है कि (हम ब्रज की नारियों के ऊपर कृष्ण ने) उसे सोत
के रूप में घोषित कर दिया है ॥४३॥
अबहीं तैं हम सबनि बिसारी ।
ऐसे बस्य भये हरि बाके, जाति न दसा बिचारी ।
कबहूँ कर पल्लव पर राखत, कबहूँ अधर लै धारी ।
कबहुँ लगाइ लेत हिरदै सौं, नैंकहुँ करत न न्यारी ।
मुरली स्याम किए बस अपनैं, जे कहियत गिरधारी ।
सूरदास प्रभु कैं तन-मन-धन, बाँस बँसुरिया प्यारी ॥४४॥
अर्थ—अब तो (वे कृष्ण) हम सब को भूल गये । कृष्ण ऐसे उसके वश मे हो
गये है कि उस दशा का विचार ही नही किया जा सकता । कभी उसे हाथ रूपी
पल्लवो पर रखते हैं कभी ओंठ पर धारण करते हैं। कभी (उसे) हृदय से लगा लेते
हैं, (इस तरह) तनिक समय के लिए भी (वंशी को) अपने से अलग नही करते ।
मुरली ने (ऐसे) कृष्ण को वश मे कर लिया है जो कि गिरधारी कहे जाते है ।
सूरदास कहते हैं कि कृष्ण को तन, मन, धन सभी से बाँस की बाँसुरी प्रिय है ॥४४॥
मुरली की सरि कौन करै ।
नंद-नंदन त्रिभुवन-पति नागर सो जौ बस्य करै ।
जबहीं जब मन आवत तब तब अधरनि पान करै ।
रहत स्याम आधीन सदाई आयसु तिनहिं करै ।
ऐसी भई मोहिनी माई मोहन मोह करै ।
सुनहु सूर याके गुन ऐसे ऐसी करनि करै ॥४५॥
अर्थ—मुरली की समता कौन कर सकता है । जिस (मुरली ने) तीनों लोक
के स्वामी नन्द के पुत्र चतुर कृष्ण को अपने वश मे कर लिया है। जब-जब (उसके)
मन मे आता है तब-तब ओठ का पान करती है। कृष्ण सदा उसी के आधीन रहते हैं
और उसी की आज्ञा का पालन करते हैं। वह ऐसी मोहने वाली है कि मोहन को ही
मोह लेती है। सूरदास सुनो इसके गुण ऐसे ही है और ऐसी इसकी करनी है ॥४५॥
काहैं न मुरली सौं हरि जोरैं ।
काहैं न अधरनि धरैं जु पुनि-पुनि मिली अचानक भीरैं ।
काहैं नहीं ताहि कर धारैं, क्यौं नहिं ग्रीव नवावैं ।
काहैं न तनु त्रिभंगा करि राखैं ताके मनहिं चुरावैं ।
काहैं न यौ आधीन रहैं ह्वैं, वै अहीर वह बेनु ।
सूर स्याम कर तैं नहिं टारत, बन-बन चारत धेनु ॥४६॥
७

६८ सूरसागर सार सटीक
अर्थ-मुरली से कृष्ण क्यो न सम्बन्ध जोड़ें। उसे बार-बार ओठो से क्यो न
लगायें जो उन्हे अचानक सहज ही मिल गयी। उसे क्यों न हाथ में धारण करें और
क्यों न गरदन झुकाये। क्यों न शरीर को तीन जगह टेढ़ा करके, उसके मन को
चुरायें। क्यों न इस तरह से उसके अधीन रहें क्योकि (स्वयं) अहीर हैं और वह
(मुरली) बांस है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण उसे हाथ से नही टालते, (लेकर ही)
वन-वन गाय चराते हैं ॥४६॥
मुरलिया कपट चतुरई ठानी ।
कैसेँ मिलि गई नंद-नंदन कीँ, उन नाहिंँन पहिचानी ।
इक वह नारि, वचन मुख मीठे, सुनत स्याम ललचाने ।
जाँति-पांति की कौन चलावै, वाकैँ रंग भुलाने ।
जाकौ मन मानत है जासौँ, सौ तहँई सुख मानै ।
सूर स्याम वाके गुन गावत, वह हरि के गुन गानै ॥४७॥
अर्थ-मुरली ने कपटपूर्ण चतुरता ठान ली है। यह नन्द के पुत्र कृष्ण को
कैसे मिल गयी। उनकी यह (कोई) पहचानी भी तो नही है। एक तो वह स्त्री है
(दूसरे) उसके वचन मीठे हैं, सुनते ही कृष्ण ललचा गये। जाति-पांति की कौन चर्चा
करे (बस) उसी के रंग मे भूल गये। जिसका मन जिसे स्वीकार करता है उसे वही
सुख मिलता है। सूरदास कहते हैं कि वह कृष्ण का गुण गाती है, कृष्ण उसका गुण
गाते हैं ॥४७॥
स्यामहिँ दोप कहा कहि दीजै ।
कहा बात मुरली सौँ कहियै, सब अपनैहिँ सिर लीजै ।
हमहीँ कहति बजावहु मोहन, यह नहीँ तब जानी ।
हम जानी यह बाँस बँसुरिया, को जानै पटरानी ।
वारे तैँ मुँह लागत-लागत, अब ह्वैँ गई सयानी ।
सुनहु सूर हम भोरी-भारी, याकी अकथ कहानी ॥४८॥
अर्थ-कृष्ण को कैसे दोप दिया जाय। वंशी से क्या कहे, सब (दोप) अपने
ही सिर पर लीजिए। हमी तो कहते है कि मोहन इसे बजाओ। तब यह (सब) हमने
नही जाना था। हमने तो समझा था कि यह वांस की वाँसुरी (ही) है, (इसे)पटरानी
कौन समझ सकता है। वचपन से मुँह लगते-लगते अब सयानी हो गई है। सूरदास
सुनो हम सब भोली-भाली हैं, इसकी कहानी तो न कही जा सकने वाली है ॥४८॥
मुरली कहै सु स्याम करैँ री ।
वाही कैँ वस भये रहत हैं वाकैँ रग ठरैँ री ।
घर-वन, रैन-दिना सँग डोलत, कर तैँ करत न न्यारी ।
आई वन बलाइ यह हमकौँ, कहा दीजियै गारी ।

वृन्दावन लीला ६६
अब लौं रहें हमारे माई, इहिँ अपने अब कीन्हेँ ।
सूर स्याम नागर यह नागरि, दुहुँनि भलैं कर चीन्हेँ ॥४६॥
अर्थ—मुरली जो कहती है वही कृष्ण करते है। उसी के वश में हुए रहते हैं,
उसी के रङ्ग मे ढल गये हैं। घर, वन, रात-दिन साथ लिये घूमते है, हाथ से उसे
अलग नही करते । उनके पास आकर यह हम लोगो के लिए विपत्ति बन गयी । गाली
देने से ही क्या लाभ । अब तक तो कृष्ण हमारे थे, अब इसने अपना बना लिया ।
सूरदास कहते है कि कृष्ण चतुर नागर (छैला) है और यह नागरी बनी है दोनों ने
अच्छी पहचान कर ली है ॥४६॥
मेरे दुख कौ ओर नहीँ ।
षट रितु सीत उष्ण बरषा मैं, ठाढ़े पाइ रही ।
कसकी नहीं नैकहूँ काटत, घामैं राखी डारि ।
अगिनि सुलाक देत नहिँ मुरकी, बेध बनावत जारि ।
तुम जानति मोहिं बाँस बँसुरिया, अगिनि छाप दै आई ।
सूर स्याम ऐसैं तुम लेहु न, खिज्झति कहाँ हौ माई ॥५०॥
अर्थ—(मुरली गोपियों की खीझ का उत्तर देती हुई कहती है) मेरे दुख का
अन्त नही है। छहौ ऋतुओं, ठण्डी, गर्मी तथा वर्षा में एक पैर पर खड़ी रही । काटते
समय तनिक भी कसक नही हुई फिर (कृष्ण ने) मुझे धूप मे डालकर रखा । आग से
गरम की गयी शलाका देते समय हिली डुली नही । फिर जलाकर (कृष्ण) छेद बनाते
हैं । तुम मुझे बाँस की वांसुरी (मात्र) समझती हो । आग की छाप देकर (मैं कृष्ण के
पास) आई हूँ । सूरदास कहते है कि (मुरली कहती है) हे सखियो तुम लोग खीझती
क्यों हो। इस प्रकार तुम लोग भी (कृष्ण से आदर) क्यो नही ले लेती हो ॥५०॥
श्रम करिहौ जब मेरी सी ।
तब तुम अधर-सुधा-रस बिलसहु, मैं ह्वै रहिहौँ चेरी सी ।
बिना कष्ट यह फल न पाइहौ, जानति हौ अवडेरी सी ।
षटरितु सीत तपनि तन गारौ, बाँस बँसुरिया केरी सी ।
कहा मौन ह्वै ह्वै जु रही हौ, कहा करत अवसेरी सी ।
सुनहु सूर मैं न्यारी ह्वै हौँ, जब देखौँ तुम मेरी सी ॥५१॥
अर्थ— (मुरली गोपियो से कहती है) जब (तुम लोग) मेरे समान परिश्रम
करोगी तब तुम (कृष्ण) के ओठो के रस का भोग करोगी, मैं दासी बनकर ही
रहूँगी । बिना कष्ट के यह फल नही पाओगी (इसे तुम) झझट समझती हो । बाँस की
बांसुरी के समान छहो ऋतुओ मे ठंडी, गर्मी से शरीर गलाओ । अब कैसे मौन बनती
जा रही हो । चिन्ता क्यों करती हो । सूरदास कहते हैं कि (मुरली कहती है कि)
(गोपियो) जब मैं अपने समान (मेहनत) करते हुए तुम्हें देखूंगी तब मैं स्वयं शान्त हो
जाऊँगी ॥५१॥

१०० सूरसागर सार सटीक
मुरली स्याम बजावन दै री ।
स्रवननि सुधा पियति काहैँ नहिँ, इहिँ तू जनि बरजै री ।
सुनति नहीँ वह कहति कहा है, राधा राधा नाम ।
तू जानति हरि भूल गए मोहिँ, तुम एकै पति बाम ।
वाही कैँ मुख नाम धरावत, हमहिँ मिलावत ताहि ।
सूर स्याम हमकौँ नहिँ बिसरे, तुम डरपति हौ काहि ॥५२॥
अर्थ—(एक गोपी राधा से कहती है) श्याम को मुरली बजाने दे । कानो से
अमृत क्यों नही पीती । इसे तुम रोको मत । सुनतो नही हो कि वह क्या कह रही
है । (वह) राधा का नाम (ही) तो पुकार रही है । तुम जानती हो कि मुझे कृष्ण भूल
गये । तुम पति कृष्ण की एकमात्र पत्नी हो । वही (मुरली) (कृष्ण) के मुख पर नाम
धरातो है और हमे कृष्ण से मिलवाती है । सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है)
कृष्ण हमे भूल नही सकते तुम (अनायास) क्यों डरती हो ॥५२॥
मुरलिया मोकौँ लागति प्यारी ।
मिली अचानक आइ कहूँ तैँ, ऐसी रही कहाँ री ।
धनि याके पितु-मातु, धन्य यह, धन्य-धन्य मृदु बोलनि ।
धन्य स्याम गुन गुनि कै ल्याए, नागरि चतुर अमोलनि ।
यह निरमोल मोल नहिँ याकौ, भलो न यातैँ कोई ।
सूरदास याके पटतर कौ, तौ दीजै जौ होई ॥५३॥
अर्थ—मुरली मुझे बहुत प्रिय लगती है । यह अचानक (कही से) आकर (कृष्ण
को) मिल गयी । (इस तरह के गुणो से भरी) यह कहाँ थी । इसके माता-पिता धन्य
हैं; यह (स्वयं) धन्य है; इसकी मीठी बोली धन्य है । कृष्ण धन्य है जो इस चतुर
अनमोल नागरी (शिष्ट स्त्री) को ले आये । यह निरमोल है इसकी कोई कीमत नही
है । इससे अच्छा और कोई नही है । सूरदास कहते है कि इसके समान जो हो वही
इसकी समानता करे ॥५३॥
कमरी
धनि धनि यह कामरी मोहन स्याम की ।
यहै ओढ़ि जात बन, यहै सेज कौ बसन, यहै निवारिनि मेह-
बूँद छाँह घाम की ।
याही ओट सहत सिसिर-सीत, याही गहने हरत लै धरत
ओट कोटि बाम की ।
यहै जाति-पाँति, परिपाटी यहै सिखवत, सूरज प्रभु के यहै
सब बिसराम की ॥५४॥
अर्थ—यह कृष्ण की कमरी धन्य है । इसे ओढकर (कृष्ण) वन जाते हैं । यही
(उनके) सेज का वस्त्र है । यही बादल की बूँदो का निवारण करने वाली है तथा

वृन्दावन लीला १०१

धूप में छाया (करने वाली है)। इसी की ओट में (कृष्ण) शीत ऋतु की ठंडी सहते
हैं। (इसी की सहायता से) कृष्ण हजारों स्त्रियो के आभूषण चुराकर इसी की ओट मे
लाकर रखते हैं (अर्थात् छिपाते हैं)। यही जाति-पांति तथा परिपाटी सिखाती है। सूर
के प्रभु कृष्ण के सब विश्रामों का यह एक मात्र उपाय है ॥५४॥
यह कमरी कमरी करि जानति ।
जाके जितनी बुद्धि हृदय मैं, सौ तितनौ अनुमानति ।
या कमरी कैं एक रोम पर, वारौं चीर पटंबर ।
सो कमरी तुम निंदति गोपी, जो तिहुँ लोक अडंबर ।
कमरी कैं बल असुर संहारे, कमरिहिं तैं सब भोग ।
जाति-पाँति कमरी सब मेरी, सूर सबै यह जोग ॥५५॥
अर्थ- इस कमरी को (कुछ लोग) केवल कमरी ही करके जानते हैं। जिसके
हृदय में जितनी बुद्धि है वह उतना ही अनुमान लगाता है। इस कमरी के एक रोम
पर चीर तथा रेशमी वस्त्र न्योछावर कर दूँ। गोपी उसी कमरी की तुम निन्दा करती
हो जो तीनों लोकों का आच्छादन है। कमरी के बल से असुरों का नाश किया । कमरी
ही से सभी भोग हैं। मेरी जाति-पाँति सब कुछ कमरी ही है। सूरदास कहते हैं कि
यही सब प्रकार का योग है ॥५५॥
चीर-हरन
भवन रवन सबही बिसरायौ ।
नँद-नंदन जब तैं मन हरि लियौ, बिरथा जनम गँवायौ ।
जप, तप, व्रत, संजम, साधन तैं, द्रवनि होत पाषान ।
जैसे मिलै स्याम सुंदर बर, सोइ कीजै, नहिं आन ।
यहै मंत्र दृढ़ कियौ सबनि मिलि, यातैं होइ सुहोइ ।
वृथा जनम जग मैं जिनि खोवहु, ह्याँ अपनी नहिं कोइ ।
तब प्रतीत सबहिनि कौं आइ, कीन्हौ दृढ़ बिस्वास ।
सूर स्यामसुंदर पति पावैं, यहै हमारी आस ॥५६॥
अर्थ- सभी गोपियो ने घर और पति को भुला दिया। जब से नन्द के पुत्र
कृष्ण ने मन हर लिया (तब से लगता है कि) सारा जीवन व्यर्थ है। जप, तप, व्रत
संयम तथा (अन्य) साधनो से पत्थर पिघल जाता है। जैसे कृष्ण वर (पति) के रूप
मे मिले, वही कीजिए, दूसरा कुछ नही। सब गोपियो ने मिलकर यही मन्त्र दृढ किया
इसी से जो होगा, सो होगा । संसार मे व्यर्थ में जन्म मत खोओ, यहाँ पर अपन
कोई नही है। तब सभी को ज्ञान आया तथा सब ने दृढ विश्वास कर लिया। सूरदास
कहते हैं श्यामसुन्दर हमे (गोपियो को) पति रूप मे मिलें यही हमारी आशा है ॥५६॥
जमुना तट देखे नंद नदन ।
मोर-मुकुट मकराकृत-कुंडल, पीत-बसन तन चंदन ।

१०२ सूरसागर सार सटीक
लोचन तृप्त भए दरसन तैं उर की तपनि बुझानी ।
प्रेम-मगन तब भईं सुंदरी, उर गदगद, मुख-बानी ।
कमल-नयन तट पर हैं ठाढे, सकुचहिं मिलि ब्रज नारी ।
सूरदास-प्रभु अंतरजामी, व्रत-पूरन पगधारी ॥५७॥
अर्थ-(गोपियो ने) कृष्ण को यमुना के तट पर देखा । (सिर पर) मोर का
मुकुट, (कान मे) मकर के आकार का कुण्डल, शरीर मे पीताम्बर तथा चन्दन धारण
करने वाले (कृष्ण) के दर्शन से आंखे तृप्त हो गयी तथा हृदय की तपन बुझ गयी ।
तब सुन्दरियां प्रेम मे डूब गईं तथा उनके हृदय गद्गद् हो गये । वाणी, मुख मे ही रह
गयी । कमल के समान नेत्र वाले कृष्ण तट पर खडे हैं, मिलने से ब्रज की स्त्रियो में
संकोच हो रहा है । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण अन्तर की बात जानने वाले हैं, उन्होने
व्रत पूरा करने के लिए कदम बढाया ॥५७॥
बनत नहिं जमुना कौ ऐबौ ।
सुंदर स्याम घाट पर ठाढे, कहौ कौन विधि जैबौ ।
कैसेँ बसन उतारि धरैँ हम, कैसेँ जलहिं समैबौ ।
नंद नंदन हमकौँ देखैंगै, कैसेँ करि जु अन्हैबौ ।
चोली, चीर, हार लै भाजत, सो कैसेँ करि पैबौ ।
अकन भरि-भरि लेत सूर प्रभु, काल्हि न इहिं पथ ऐबौ ॥५८॥
अर्थ-यमुना का आना (हम गोपियों के लिए) ठीक नही लगता है । सुन्दर
कृष्ण घाट पर खडे हैं, कहो किस तरह जाना होगा । हम लोग वस्त्रों को उतारकर
कैसे रखे और जल मे कैसे पैठे । कृष्ण हम लोगों को देखेगे (इस दशा मे) स्नान कैसे
होगा । चोली, चीर, हार लेकर (कृष्ण) भागते हैं । इन सब को कैसे पायेगे । सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण (सब गोपियो) को गोद मे भर लेते हैं (आलिंगन कर लेते हैं) कल
इस रास्ते से आना नही होगा ॥५८॥
नीकैं तप कियौ तनु गारि ।
आपु देखत कदम पर चढि, मानि लियौ मुरारि ।
वर्ष भर व्रत-नेम-संजम, श्रम कियौ मोहिं काज ।
कैसे हूँ मोहिं भजै कोऊ, मोहिं विरद को लाज ।
धन्य व्रत इन कियौ पूरन, सीत तपति निवारि ।
काम-आतुर भजीँ मोकौँ, नव तरुनि ब्रज-नारि ।
कृपा-नाथ कृपाल भए तब, जानि-जन की पीर ।
सूर-प्रभु अनुमान कीन्हौँ, हरौँ इनके चीर ॥५६॥
अर्थ-शरीर को गलाकर (गोपियो) ने बहुत तप किया । (कृष्ण ने) कदम पर
चढ़कर (जब) देखा तब उनकी (तपस्या) को मान लिया । (कृष्ण कहते है) पूरे साल
(तुम लोगो ने) मेरे लिए व्रत, नियम तथा संयम किया । मुझे किसी भी तरह कोई

वृन्दावन लीला १०३

भजे मुझे तो अपने विरद को चिन्ता है ही। शीत तथा गर्मी का त्याग करके इन्होने
अपना व्रत पूरा कर लिया इसलिये ये धन्य हैं। ब्रज की नवयुवती स्त्रियो ने मुझे
कामातुर होकर भजा है। कृपा के नाथ तथा कृपा के पालन करने वाले कृष्ण ने जनों
(भक्त जनो) की पीड़ा को जानकर यह निश्चय किया कि इनके (गोपियो के) चीर
को हरूँ ॥५९॥
बसन हरे सब कदम चढ़ाए।
सोरह सहस गोप-कन्यनि के, अंग आभूषन सहित चुराए।
नीलांवर, पाटंवर, सारी, सेत पीत चुनरी, अरुनाए।
अति बिस्तार नीप तरु तामैँ, लै-लै जहाँ तहाँ लटकाए।
मनि आभरन डार-डारनि प्रति, देखत छवि मनहीँ अँटकाए।
सूर, स्याम जु तिनि व्रत पूरन, कौ फल डारनि कदम फराए ॥६०॥
अर्थ—सब वस्त्रो को हरकर (कृष्ण ने) कदम पर चढा दिया। सोलह हजार
कन्याओं के अङ्ग आभूषणो को एक साथ चुरा लिया। नीले वस्त्र, रेशमी वस्त्र, साडी,
सफेद, पीली तथा लाल चुनरी (सभी प्रकार के वस्त्रों को) ले लेकर अत्यधिक फैले
हुए कदम्ब के वृक्ष पर जहाँ तहाँ लटका दिया। मणि से बने गहनों को प्रत्येक डार
पर अँटका कर मन से उसी की छवि देखते हैं। सूरदास कहते हैं कि उन गोपियों के
व्रत को पूर्ण करने के लिये (व्रत) फल कदम्ब की डालों में फला दिया ॥६०॥
हमारे अम्बर देहु मुरारी।
लै सब चीर कदम चढ़ि बैठे, हम जल-माँझ उघारी।
तट पर बिना बसन क्यौँ आवैँ, लाज लगति है भारी।
चोली हार तुम्हिं कौँ दीन्हौँ, चीर हमहिँ यौँ डारी।
तुम यह बात अचम्भौ भाषत, नाँगी आवहु नारी।
सूर स्याम कछु छोह करौ जू, सीत गई तनु मारी ॥६१॥
अर्थ—(गोपियाँ कृष्ण से विनती करती हैं) मुरारी हम लोगो के वस्त्रों को दे
दो। सब वस्त्रों को चुराकर (तुम) कदम्ब पर चढ़कर बैठे हो, हम लोग जल के बीच
बिना वस्त्र के (उघारी) हैं। तट पर बिना वस्त्र के कैसे आवे, क्योकि हमें बहुत लाज
लग रही है। चोली, हार तुम्ही को दे दिया लेकिन चीर तो हमें दे डालो। तुम यह
आश्चर्य से भरी बात कह रहे हो कि नारियां नङ्गी ही बाहर आओ। सूरदास कहते
हैं कि (गोपियाँ विनय करती हैं) कृष्ण कुछ दया करो, हमारे शरीर में ठण्डी लग
गयी है ॥६१॥
लाज ओट यह दूरि करौ।
जोइ मैं कहौँ करौ तुम सोई, सकुच बापुरिहि कहा करौ।
जल तैँ तीर आइ कर जोरहु, मैं देखौँ तुम बिनय करौ।
पूरन व्रत अब भयौ तुम्हारौ, गुरुजन सका दूरि करौ।

१०४ सूरसागर सार सटीक
अब अंतर मोसों जनि राखहु, वार-वार हठ वृथा करौ ।
सूर स्याम कह्यौ चीर देत हौं, मौ आगें सिंगार करौ ॥६२॥
अर्थ--(कृष्ण गोपियो से कहते हैं) यह लाज का अन्तर दूर कर दो। जो मैं
कहूँ वही करो, तुम बेचारी संकोच क्यो करती हो । जल से तीर पर आकर हाथ
जोड़ो। तुम लोग विनय करो हम देखें । अब तुम्हारे व्रत पूरे हो गये, गुरुजनों की
शंका दूर कर दो । अब हमसे कोई भेद न रखो । वार-वार व्यर्थ ही हठ करती हो ।
सूरदास कहते हैं (कृष्ण ने कहा) चीर दे रहा हूँ मेरे सामने श्रृङ्गार करो ॥६२॥
ब्रत पूरन कियौ नंद-कुमार । जुवतिनि के मेटे जंजार ॥
जप तप करि अब जनि तन गारौ । तुम घरनी मैं कंत तुम्हारौ ॥
अंतर सोच दूरि करि डारौ । मेरो कह्यौ सत्य उर धारौ ॥
सरद-रास तुम आस पुराऊँ । अकन भरि सबकौं उर लाऊँ ॥
यह सुनि सब मन हरष बढ़ायौ । मन-मन कह्यौ कृस्न पति पायौ ॥
जाहु सब घर घोष कुमारी । सरद-रास दैहौँ सुख भारी ॥
सूर स्याम प्रगटे गिरिधारी । आनंद सहित गईं घर नारी ॥६३॥
अर्थ-नन्द कुमार कृष्ण ने (युवतियों के) व्रत को पूरा कर दिया। तथा
उनके (सब) जंजाल को मिटा दिया । (कृष्ण कहते है) अब जप-तप करके अपने शरीर
को गलाओ मत । तुम पत्नी हो मैं तुम्हारा पति हूँ। अन्तर की चिन्ता को दूर कर
डालो। मेरे कहने को सत्य मानकर हृदय मे धारण करो । शरद के रास मे तुम्हारी
आशा पूरी करूँगा, गोद मे भरकर सबको हृदय से लगाऊँगा । यह सुनकर सब के मन
का हर्ष बढ़ गया । (वे) अपने-अपने मन मे कहने लगी कि कृष्ण पति रूप मे मिल
गये । सब गोपियां अपने घर जाओ। शरद के रास मे भरपूर सुख दूँगा । सूरदास
कहते है कि कृष्ण के प्रकट होने पर गोपियां आनन्द सहित अपने घर गयी ॥६३॥
गोवर्द्धन धारण
वाजति नद-अवास वधाई ।
बैठे खेलत द्वार आपनैं, सात वरस के कुँवर कन्हाई ।
बैठे नंद सहित वृषभानुहिं, और गोप बैठे सब आई ।
थापैं देत घरनि के द्वारैँ, गावर्ति मंगल नारि वधाई ।
पूजा करत इंद्र की जानी, आए स्याम तहाँ चतुराई ।
बार वार हरि बूझत नंदहिं, कौन देव की करत पुजाई ।
इंद्र बड़े कुल-देव हमारे, उनतैं सब यह होति बड़ाई ।
सूर स्याम तुम्हरे हित कारन, यह पूजा हम करत सदाई ॥६४॥
अर्थ- नन्द के घर वधाई बजती है। सात वर्ष के कृष्ण द्वार पर बैठे खेल रहे
हैं। नन्द के साथ वृषभानु बैठे है, अन्य गोप भी आकर बैठ गये । स्त्रियां घर के द्वारों
पर थाप देती हैं और मङ्गल तथा वधाई गा रही हैं। (उन्हे) इन्द्र की पूजा करते हुए

वृन्दावन लीला १०५
जानकर कृष्ण आतुर होकर वहाँ आये । बार-बार कृष्ण नंद से पूँछते है कि किस देवता
की पूजा कर रहे हो । (नंद उत्तर देते हैं) इंद्र हमारे बड़े कुल देवता हैं उन्ही से इतनी
बड़ाई होती है । कृष्ण तुम्हारे ही हित के लिए, यह पूजा हम सदा करते है ॥५४॥
मेरौ कह्यौ सत्य करि जानौ ।
जौ चाहौ ब्रज की कुसलाई, तौ गोबर्धन मानौ ।
दूध दही तुम कितनी लैहौ, गोसुत बढ़ें अनेक ।
कहा पूजि सुरपति सैं पायौ, छांड़ि देहु यह टेक ।
मुँह माँगे फल जौ तुम पावहु, तौ तुम मानहु मोहिं ।
सूरदास प्रभु कहत ग्वाल सौं, सत्य बचन करि दोहिं ॥६५॥
अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) मेरी बात सत्य करके जानो । यदि ब्रज की कुशलता
चाहते हो तो गोवर्धन को (देवता की तरह) मानो । दूध, दही तुम कितना (भी)
लो, गायों के बछड़े अनेक प्रकार से बढ़ेंगे । इंद्र की पूजा से तुम लोगो ने क्या पाया,
यह टेक छोड़ दो । मुँह मांगा फल यदि तुम पाओ तो मेरा कहना सही मानो । सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण ग्वालो को सौगन्ध खाकर समझाते है कि बात सत्य है ॥६५॥
बिप्र बुलाइ लिए नँदराइ ।
प्रथमारम्भ-जज्ञ कौ कीन्हौ, उठे बेद-धुनि गाइ ।
गोबर्धन सिर तिलक चढ़ायौ, मेटि इंद्र ठकुराइ ।
अन्नकूट ऐसौ रुचि राख्यो, गिरि की उपमा पाइ ।
भाँति-भाँति व्यंजन परसाएँ, कापैं बरन्यो जाइ ।
सूर स्याम सौं कहत ग्वाल गिरि जेवहिं कहौ बुझाइ ॥६६॥
अर्थ—नन्द ने ब्राह्मणो को बुला लिया । पहले यज्ञ का आरम्भ किया, (सब)
वेद की ध्वनि गा उठे । इंद्र के स्वामित्व को मिटाकर गोवर्धन के सिर पर तिलक
लगाया । अन्न के पिण्ड को इस प्रकार बनाया जो पर्वत की उपमा पाए । तरह-तरह के
भोजन को परोसा जिसका वर्णन किससे किया जा सकता है। सूरदास कहते हैं कि ग्वाल,
कृष्ण से कह रहे है कि पर्वत को समझा कर कहो कि वह जेए (खाना खाए) ॥६६॥
गिरिबर स्याम की अनुहारि ।
करत भोजन अधिक रुचि यह, सहस भुजा पसारि ।
नंद कौ कर गहें ठाढ़े, यहै गिरि कौ रूप ।
सखी ललिता राधिका सौं, कहति देखि स्वरूप ।
यहै कुंडल, यहै माला, यहै पीत पिछौरि ।
सिखर सोभा स्याम की छवि, स्याम-छवि गिरि जोरि ।
नारि बदरौला रही, वृषभानु-घर रखवारि ।
तहाँ तैं उहिं भोग अर्प्यौ, लियौ भुजा पसारि ।

१०६ सूरसागर सार सटीक
राधिका-छवि देखि भूली, स्याम, निरखैँ ताहि ।
सूर प्रभु-बस भई प्यारी, कोर-लोचन चाहि ॥६७॥
अर्थ - श्रेष्ठ पर्वत (गोवर्द्धन) कृष्ण के ही समरूप है। यह अपनी हजारो भुजा
पसार कर भोजन करता है । नन्द का हाथ पकड़े खडे यही गिरि का रूप है । सखी
ललिता राधा से इस रूप को देखकर कहती है । यही कुण्डल, यही माला, यही
पीताम्बर पर्वत की शोभा है जो कृष्ण की भी है । बदरीला नाम की नारी वृषभानु
के घर की रखवाली करती थी उसने वही से भोग चढ़ाया उसे भुजा पसार कर ले
लिया । राधिका इस छवि को देखकर भूल गयी, कृष्ण उन्हे देख रहे हैं । सूरदास
कहते है कि प्यारी (राधा) नेत्र के कटाक्ष से देखकर कृष्ण के वश मे हो गयी ॥६७॥
ब्रज बासिनि मोकौँ विसरायो ।
भली करी बलि मेरी जो कछु, सो सब लै परबतहिं चढ़ायौ ।
मोसौँ गर्व कियौ लघु प्रानी, ना जानियै कहा मन आयौ ।
तैँतिस कोटि सुरनि कौ नायक, जानि-बूझि इन मोहिँ भुलायौ ।
अब गोपनि भूतल नहिँ राखौँ, मेरो बलि मोहिँ नहिँ पहुँचायौ ।
सुनहु सूर मेरैँ मारत धौँ, परबत कैसेँ होत सहायौ ॥६८॥
अर्थ--ब्रज वासियो ने मुझे (इंद्र को) भुला दिया । अच्छा किया जो मेरी
बलि थी उसे लेकर सब पर्वत को चढा दिया । छोटे प्राणियों ने मुझसे गर्व किया ।
उनके मन मे न जाने क्या (भावना) आयी । तैंतीस करोड देवताओ के नायक को
जान-बूझकर इन लोगों ने भुला दिया । अब गोपो को धरती पर नही रहने दूंगा
क्योकि उन्होने हमारी बलि हमारे पास नही पहुँचायी । सूरदास कहते है (इन्द्र कहते
हैं) मेरे मारते समय देखता हूँ पर्वत कैसे सहायक होता है ॥६८॥
गिरि पर वरषन लागे बादर ।
मेघवर्त्त, जलवर्त्त, सैन सजि, आए लै लै आदर ।
सलिल अखड धार धर टूटत, किये इद्र मन सादर ।
मेघ परस्पर यहै कहत हैं, धोइ करहु गिरि खादर ।
देखि देखि डरपत ब्रजवासी, अतिहिँ भए मन कादर ।
यहै कहत ब्रज कौन उबारै, सुरपति कियैँ निरादर ।
सूर स्याम देखैँ गिरि अरनैँ, मेघनि कीन्ही दादर ।
देव आपनौ नहीं सम्हारत, करत इद्र सौ ठादर ॥६६॥
अर्थ--पर्वत पर बादल बरसने लगे । मेघवर्त्त तथा जलवर्त्त नामक प्रलयकालीन
मेघ अपनी सेना सजाकर आदर पूर्वक लाये । अखंड पानी की धारा से पृथ्वी टूटने
लगी । (इससे) बादलो ने आदरपूर्वक इंद्र के मन की बात पूरी की। मेघ आपस मे यही
कहते है कि पर्वत को धोकर नीची जमीन मे बदल दो । देख-देखकर ब्रज के निवासी
डरने लगे तथा वे मन से बहुत अधीर हो गये । (वे) यही कहते है कि देवराज का

वृन्दावन लीला १०७
अनादर करने पर ब्रज की रक्षा कौन करेगा ? सूरदास कहते हैं कि कृष्ण अपने गिरि
को देखे । बादलो ने निर्णय कर लिया है। (तुम लोग) अपने देवता को नही
सम्हालते और इन्द्र से झगड़ा करते हो ॥६६॥
ब्रज के लोग फिरत बितताने ।
गयनि लै बन ग्वाल गए, ते धाए आवत ब्रजहिँ पराने ।
कोउ चितवत नभ-तन चक्रित ह्वै, कोउ गिरि परत धरनि अकुलाने ।
कोउ लै रहत ओट वृच्छि की, अंध-धुध दिसि बिदिस भुलाने ।
कोउ पहुँचे जैसेँ तैसेँ गृह, कोउ ढूँढ़त गृह नहिँ पहिचाने ।
सूरदास गोबर्धन-पूजा, कीन्हे कौ फल लेहु बिहाने ॥७०॥
अर्थ— ब्रज के लोग व्याकुल होकर घूम रहे है। गायो को लेकर जो ग्वाल
वन में गये थे वे ब्रज को दौड़ते हुए चले आ रहे है। कोई चकित होकर नभ की ओर
देखता है, कोई धरती पर आकुल होकर गिर पड़ता है। कोई वृक्षों की ओट लेता है,
अँधेरे के धुंध मे दिशाये भूल गईं। कोई जैसे-तैसे घर पहुँचा और कोई ढूंढता हुआ
(अपना) घर ही नही पहचान पा रहा है। सूरदास कहते हैं कि गोवर्द्धन पूजा का फल
(तुम लोग) शीघ्र लो ॥७०॥
राखि लेहु अब नंदकिसोर ।
तुम जौ इंद्र की मेटी पूजा, बरसत है अति जोर ।
ब्रजवासी तुम तन चितवत हैं, ज्यौँ करि चंद चकोर ।
जनि जिय डरौँ नैन जनि मूंदौ, धरिहौँ नख की कोर ।
करि अभिमान इंद्र झरि लायौ, करत घटा घनघोर ।
सूर स्याम कह्यौ तुम कौँ राखौँ, बूँद न आवै छोर ॥७१॥
अर्थ (ब्रजवासी कृष्ण से निवेदन करते हैं) कृष्ण अब रक्षा करो । तुमने जो
इंद्र की पूजा मिटायी (इसी से) बहुत जोर से बरस रहा है। ब्रजवासी तुम्हारी ओर
उसी तरह से देखते हैं जैसे चकोर चन्द्रमा की तरफ (देखता है) । (कृष्ण ने कहा)
मन मे डरो मत, न तो आंख मूंदो । नाखून की कोर से (पर्वत को) धारण करुँगा ।
इन्द्र अभिमान करके लगातार वर्षा कर रहा है और घनघोर घटा कर रहा है। पर
मैं तुम्हारी रक्षा करुँगा और एक बूंद भी न आएगी ॥७१॥
स्याम लियौ गिरिराज उठाइ ।
धीर धरौ हरि कहत सबनि सौँ, गिरि गोबर्धन करत सहाइ ।
नन्द गोप ग्वालनि के आगैँ, देव कह्यौ यह प्रगट सुनाइ ।
काहे कौँ व्याकुल भएँ डोलत, रच्छा करै देवता आइ ।
सत्य बचन गिरि-देव कहत हैं, कान्ह लेहि मोहिँ कर उचकाइ ।
सूरदास नारी-नर ब्रज के, कहत धन्य तुम कुँवर कन्हाइ ॥७२॥

१०८ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—कृष्ण ने पर्वतराज गोवर्द्धन को उठा लिया। कृष्ण सबसे कहते हैं कि
धैर्य धरो, गोवर्द्धन पर्वत सहायता कर रहा है। नंद, गोप तथा ग्वालो के सामने देव
ने यह प्रत्यक्ष सुनाकर कहा। (तुम लोग) व्याकुल होकर क्यो घूमते हो देवता आकर
रक्षा करता है। गिरि देवता सत्य वचन कहते हैं कि कृष्ण मुझे हाथ से उठाकर ऊँचा
कर दे। सूरदास कहते है कि ब्रज के नर और नारी कृष्ण से कहते हैं कि तुम धन्य
हो ॥७२॥
गिरि जनि गिरै स्याम के कर तैं।
करत विचार सबै ब्रजवासी, भय उपजत अति उर तैं।
लै-लै लकुट ग्वाल सब धाए, करत सहाय जु तुरतैं।
यह अति प्रबल, स्याम अति कोमल, रबकि रबकि हरबर तैं।
सप्त दिवस कर पर गिरि धारयौ, वरसि थक्यो अम्बर तैं।
गोपी ग्वाल नंद-सुत राख्यो, मेघ-धार जलधर तैं।
जमलाजुन दोउ सुत कुवेर के, तेउ उखारे जर तैं।
सूरदास प्रभु इन्द्र-गर्व हरि, ब्रज राख्यो करबर तैं ॥७३॥
अर्थ—पर्वत कृष्ण के हाथ से गिर न जाय। सभी ब्रजवासी (ऐसा) विचार
करते हैं और हृदय मे अत्यधिक भय पैदा हो रहा है। लाठी ले लेकर सभी ग्वाल दौडे
और तुरन्त सहायता करने लगे। यह (पर्वत) अत्यन्त प्रबल है, और कृष्ण अत्यन्त
कोमल हैं, हड़बड़ मे यह कंपता है। सात दिन तक पर्वत को (कृष्ण ने) हाथ पर रखा।
(बादल) आकाश से बरसते-बरसते थक गये। कृष्ण ने गोपी, ग्वाल आदि को बादल की
जलधारा से बचाया। जमल तथा अर्जुन कुवेर के दोनो पुत्रों को जड़ से उखाड़ दिया।
सूरदास कहते हैं कि प्रभु ने इंद्र के गर्व को हर कर संकट से ब्रज की रक्षा की ॥७३॥
मेघनि जाइ कही पुकारि ।
दीन ह्वै सुरराज आगैं, अस्त्र दीन्हे डारि।
सात दिन भरि बरसि ब्रज पर, गई नैकूँ न झारि ।
अखंड धारा सलिल निर्झरचौ, मिटी नहिं लगारि ।
धरनि नैंकु न बूँद पहुँची, हरषे ब्रज-नर-नारि ।
सूर घन सब इन्द्र आगैं, करत यहै गुहारि ॥७४॥
अर्थ—बादलो ने जाकर पुकार कर कहा और दीन होकर इन्द्र के आगे अस्त्र
डाल दिये। सात दिन तक (हमने) ब्रज पर वर्षा की (ब्रज पर) कोई आंच नही
आयी। अखंड धारा से पानी बरसाया, उसका क्रम टूटा नही। (लेकिन) धरती पर
तनिक (भी) बूंद नही पहुँची, (इससे) ब्रज के नर-नारी प्रसन्न हो गये। सूरदास कहते
हैं कि इन्द्र के आगे बादेल यही गोहार करते हैं ॥७४॥

वृन्दावन लीला १०६
घरनि घरनि ब्रज होति बधाई ।
सात वरष को कुँवर कन्हैया, गिरिवर धरि जीत्यौ सुरराई ।
गर्व सहित आयौ ब्रज बोरन, वह कहि मेरी भक्ति घंटाई ।
सात दिवस जल वरषि सिरान्यौ, तव आयौ पाइनि तर धाई ।
कहाँ कहाँ नहिं संकट मेटत, नर-नारी सब करत बड़ाई ।
सूर स्याम अव कैं ब्रज राख्यो, ग्वाल करत सब नंद दोहाई ॥७५॥
अर्थ - ब्रज के घर-घर में बधाई हो रही है । सात वर्ष के कृष्ण ने गोवर्द्धन को
धारण करके इन्द्र को जीत लिया । गर्व के साथ (इन्द्र के बादल) ब्रज को डुबाने के लिए
आये थे । उसने (इन्द्र ने) कहा कि मेरी भक्ति को घटा दिया । सात दिन तक जल
बरसा कर निराश हो गये तब दौड़कर पैरों के नीचे आये । कहाँ-कहाँ (कृष्ण)
संकट नहीं मिटाते, नर-नारी सब बड़ाई करते हैं । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने अब
की बार ब्रज को रख लिया, (इससे) सभी ग्वाल नन्द की दुहाई दे रहे हैं ॥७५॥
(तेरैं) भुजनि बहुत बल होइ कन्हैया ।
बार-बार भुज देखि तनक सें, कहति जसोदा मैया ।
स्याम कहत नहिं भुजा पिरानी, ग्वालिन कियौ सहैया ।
लकुटिनि टेक सबनि मिलि राख्यो, अरु बाबा नँदरैया ।
मोसौँ क्यों रहतौ गोवरधन, अतिहिं बड़ौ यह भारी ।
सूर स्याम यह कहि परवोध्र्यौ, चकित देखि महतारी ॥७६॥
अर्थ- बार-बार छोटी-छोटी भुजाओ को देखकर यशोदा माता कहती है कन्हैया
तुम्हारी बाहो में बहुत बल हो । कृष्ण कहते हैं कि हमारी भुजा दुखी नहीं (क्योकि)
ग्वालो ने हमारी सहायता की । सब ने मिलकर लाठी की टेक लगा रखी थी और बाबा
नन्द ने भी (सहायता की थी) । मुझसे गोवर्द्धन कैसे रखा जाता क्योकि वह बहुत भारी
है । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने यह कहकर चकित माता को समझाया ॥७६॥
मातु पिता इनके नहिं कोइ ।
आपुहिं करता, आपुहिं हरता, त्रिगुन रहित हैं सोइ ।
कितिक वार अवतार लियौ ब्रज, ये हैं ऐसे ओइ ।
जल-थल, कीट-ब्रह्म के व्यापक, और न इन सरि होइ ।
बसुधा-भार-उतारन-काजैं, आपु रहत तनु गोइ ।
सूर स्याम माता-हित-कारन, भोजन माँगत रोइ ॥७७॥
अर्थ- इनके (कृष्ण के) माता-पिता कोई नहीं हैं। ये स्वंय कर्त्ता है, हर्त्ता हैं,
ये तीनों गुणो से रहित हैं। इन्होंने कितनी बार ब्रज मे अवतार लिया है, ये वही हैं।
जल और स्थल तथा कीट और ब्रह्म सर्वत्र ये व्याप्त हैं और कोई इनके समान नहीं
है। पृथ्वी के भार को उतारने के लिए अपने शरीर को छिपाकर रहते हैं। सूरदास
कहते हैं कि माता को प्रसन्न करने के लिए भोजन रोकर माँगते है ॥७७॥

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सूरसागर सार सटीक
सुरगन सहित इन्द्र ब्रज आवत ।
धवल बरन ऐरावत देख्यौ उतरि गगन तैँ धरनि धँसावत ।
अमरा-सिव-रबि-ससि चतुरानन, हय-गय बसह हंस-मृग जावत ।
धर्मराज, बनराज, अनल, दिव, सारद, नारद, सिव-सुत भावत ।
मेढ़ा, महिषि, मगर, गुदरारौ, मोर, आखुमन वाहन, गावत ।
ब्रज के लोग देखि डरपे मन, हरि आगैँ कहि कहि जु सुनावत ।
सात दिवस जल वरषि सिरान्यौ, आवत चल्यौ ब्रजहिं अतुरावत ।
घेरौ करत जहाँ तहँ ठाढे, ब्रजवासिनि कौं नाहिं बचावत ।
दूरहिं तैँ वाहन सौं, उतरचौ, देवनि सहित चल्यौ सिर नावत ।
आइ पर्यौ चरननि तर आतुर, सूरदास-प्रभु सीस उठावत ॥७८॥
अर्थ—देवता गण सहित इंद्र ब्रज की ओर आते है। सफेद रंग के ऐरावत
हाथी को देखो जिसे गगन से उतारकर पृथ्वी पर पैठा रहे (प्रवेश करा रहे) हैं।
देवतागण, शिव, सूर्य, चन्द्र, ब्रह्मा, हाथी, घोडे, बैल, हस, मृग जितने हैं (वे सब)
तथा धर्मराज, वनराज, अग्नि, दिव, नारद, सारद, गणेश आदि प्रार्थना करते हैं। भेड,
भैंसा, मगर, गुडुरी नाम की चिडिया, मोर, चूहा, आदि वाहन गाते है। ब्रज के लोग
इन सब को देखकर डर गये। कृष्ण के आगे कह कहकर सुनाते है। सात दिन तक जल
की वर्षा समाप्त करके ब्रज को आतुर मरता हुआ (इन्द्र) चला आ रहा है। घेर कर
(निंदा करते) खड़े हुए ब्रजवासियो से अपने को बचाता नही है। दूर से ही सवारी से
उतरकर (इन्द्र) देवताओ के साथ सिर झुकाते हुए चले। आकर चरणों के नीचे आतुर
होकर गिर पडे । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण सिर पकडकर उठाते हैं ॥७८॥
रास लीला
जबहिँ बन मुरली स्रवन परीँ ।
चकित भईँ गोप कन्या सब, काम-धाम बिसरीँ ।
कुल मर्याद वेद की आज्ञा, नैंकहुँ नहीं डरीँ ।
स्याम-सिंधु, सरिता-ललना-गन, जल की ढरनि ढरीँ ।
अंग-मरदन करिवे कौँ लागीँ, उबटन तेल धरीँ ।
जो जिहिँ भाँति चली सो तैसेंहिँ, निसि बन कौँ जुखरीँ ।
सुत पति-नेह, भवन-जन-सका, लज्जा नाहिं करीँ ।
सूरदास-प्रभु मन हरि लीन्हौ, नागर नवल हरीँ ॥७६॥
अर्थ—जैसे ही बन (मे बजती हुई) मुरली (की ध्वनि) कान में पडी। (तब) गोप
की कन्याये चकित हो गयी, और सभी काम-धंधा भूल गयी। कुल की मर्यादा तथा वेद
की आज्ञा को तनिक भी नही डरी। कृष्ण रूपी सागर की ओर ब्रज की स्त्री रूपी
नदियां जल की तरह ढल गयी। अग का मरदन करने मे लगी स्त्रियो ने उबटन तथा
तेल रख दिया। जो जैसी थी वैसे ही रात मे बन की ओर चल पड़ी। पुत्र तथा पति

के स्नेह, घर के लोगों की शंका से लज्जा नही की । सूरदास कहते है कि चतुर तथा
सुन्दर कृष्ण ने (गोपियों) के मन को हर लिया ॥७८॥
चली बन वेनु सुनत जब धाइ ।
मातु पिता-बाधव अति त्रासत, जाति कहाँ अकुलाइ ।
सकुच नहीं, संका कछु नाहीं, रैनि कहाँ तुम जाति ।
जननी कहति दई को घाली, काहे कौं इतराति ।
मानति नहीं और रिस पावति, निकसी नातौ तोरि ।
जैसैं जल-प्रवाह भादौं कौ, सो को सकै बहोरि ।
ज्यौं केंचचुरी भुअंगम त्यागत, मात पिता यौँ त्यागे ।
सूर स्याम कैं हाथ बिकानी, अलि अम्बुज अनुरागे ॥८०॥
अर्थ- वंशी सुनकर जब गोपियां वन की ओर दौड़कर चली, (तब) माता-पिता
तथा बंधु आदि भयभीत करते हुए (पूछते है) आकुल होकर तुम लोग कहां जा रही हो ।
तुम्हे संकोच नही और न कुछ शंका है, रात मे तुम लोग कहाँ जा रही हो । माताये
कहती हैं दैव की मारी क्यो इतराती हो । लेकिन (गोपियाँ) कहना नही मानती (जिससे)
माताये और क्रोधित होती है । वे सब नाता तोड़कर निकल पडी । जैसे भादो के जल
प्रवाह को कौन लौटा सकता है । जिस प्रकार सांप केंचुली त्याग देता है वैसे गोपियो ने
माता-पिता को त्याग दिया । सूरदास कहते है कि वे सब कृष्ण के हाथ बिक गयी
जिस प्रकार भौंरा कमल के अनुराग से (उसके हाथ बिक जाता है) ॥८०॥
मातु-पिता तुम्हरे धौं नाहीं ।
बारम्बार कमल-दल-लोचन, यह कहि-कहि पछिताहीं ।
उनकैं लाज नहीँ, बन तुमकौं आवन दीन्ही राति ।
सब सुंदर, सबै नवजोवन, निठुर अहिर की जाति ।
की तुम कहि आईं, की ऐसेहिं कीन्ही कैसी रीति ।
सूर तुमहिं यह नहीँ बूझियै, करो बड़ी विपरीति ॥८१॥
अर्थ - (कृष्ण गोपियो से पूछते हैं) सम्भवतः तुम्हारे माता-पिता नही है । बार-
बार यह कहकर कमल के दल के समान आंख वाले कृष्ण पछताते है । उन लोगो को
लाज नही जो तुम्हे रात मे वन आने दिया । सभी सुन्दरियां है तथा युवतियां है ।
अहीर की जाति बडी निठुर है । तुम लोग कहकर आयी हो या ऐसे ही चली आयी ।
(तुमने) कैसी रीति अपनायो। सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण पूछते हैं) तुम लोगो को
जान नही पड़ा तुमने बड़ा उलटा काम किया ॥८१॥
इहिं विधि बेद-मारग सुनौ ।
कपट तजि पति करी पूजा, कहा तुम जिय गुनौ ।
कंत मानहु भव तरौगी, और नाहिं उपाइ ।
ताहि तजि क्यौं विपिन आईं, कहा पायौ आइ ।