सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 112, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ेंके स्नेह, घर के लोगों की शंका से लज्जा नही की । सूरदास कहते है कि चतुर तथा
सुन्दर कृष्ण ने (गोपियों) के मन को हर लिया ॥७८॥
चली बन वेनु सुनत जब धाइ ।
मातु पिता-बाधव अति त्रासत, जाति कहाँ अकुलाइ ।
सकुच नहीं, संका कछु नाहीं, रैनि कहाँ तुम जाति ।
जननी कहति दई को घाली, काहे कौं इतराति ।
मानति नहीं और रिस पावति, निकसी नातौ तोरि ।
जैसैं जल-प्रवाह भादौं कौ, सो को सकै बहोरि ।
ज्यौं केंचचुरी भुअंगम त्यागत, मात पिता यौँ त्यागे ।
सूर स्याम कैं हाथ बिकानी, अलि अम्बुज अनुरागे ॥८०॥
अर्थ- वंशी सुनकर जब गोपियां वन की ओर दौड़कर चली, (तब) माता-पिता
तथा बंधु आदि भयभीत करते हुए (पूछते है) आकुल होकर तुम लोग कहां जा रही हो ।
तुम्हे संकोच नही और न कुछ शंका है, रात मे तुम लोग कहाँ जा रही हो । माताये
कहती हैं दैव की मारी क्यो इतराती हो । लेकिन (गोपियाँ) कहना नही मानती (जिससे)
माताये और क्रोधित होती है । वे सब नाता तोड़कर निकल पडी । जैसे भादो के जल
प्रवाह को कौन लौटा सकता है । जिस प्रकार सांप केंचुली त्याग देता है वैसे गोपियो ने
माता-पिता को त्याग दिया । सूरदास कहते है कि वे सब कृष्ण के हाथ बिक गयी
जिस प्रकार भौंरा कमल के अनुराग से (उसके हाथ बिक जाता है) ॥८०॥
मातु-पिता तुम्हरे धौं नाहीं ।
बारम्बार कमल-दल-लोचन, यह कहि-कहि पछिताहीं ।
उनकैं लाज नहीँ, बन तुमकौं आवन दीन्ही राति ।
सब सुंदर, सबै नवजोवन, निठुर अहिर की जाति ।
की तुम कहि आईं, की ऐसेहिं कीन्ही कैसी रीति ।
सूर तुमहिं यह नहीँ बूझियै, करो बड़ी विपरीति ॥८१॥
अर्थ - (कृष्ण गोपियो से पूछते हैं) सम्भवतः तुम्हारे माता-पिता नही है । बार-
बार यह कहकर कमल के दल के समान आंख वाले कृष्ण पछताते है । उन लोगो को
लाज नही जो तुम्हे रात मे वन आने दिया । सभी सुन्दरियां है तथा युवतियां है ।
अहीर की जाति बडी निठुर है । तुम लोग कहकर आयी हो या ऐसे ही चली आयी ।
(तुमने) कैसी रीति अपनायो। सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण पूछते हैं) तुम लोगो को
जान नही पड़ा तुमने बड़ा उलटा काम किया ॥८१॥
इहिं विधि बेद-मारग सुनौ ।
कपट तजि पति करी पूजा, कहा तुम जिय गुनौ ।
कंत मानहु भव तरौगी, और नाहिं उपाइ ।
ताहि तजि क्यौं विपिन आईं, कहा पायौ आइ ।