सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
उद्धव संदेश ३०७
आछे सुन्दर स्याम हमारे, और जगत सब फीकौ ।
खाटे मही कहा रुचि मानै, सूर खवैया घी कौ ॥११४॥
अर्थ—जीवन (तुल्य कृष्ण का) सुन्दर मुख देखने के लिए है । प्यारे कृष्ण का
दर्शन तथा स्पर्श दिन रात पाती हूँ । सुनो योग लेकर क्या करूं जहां प्राण की भी
हानि है । नैन मूंद-मूंदकर क्या देखूं तथा ज्ञान की पोथी से कैसे बंधूं । हमारे कृष्ण
अच्छे तथा सुन्दर हैं और संसार में सभी फीके हैं । (गोपियां कहती हैं) घी के खाने
वाले को खट्टा मट्ठा कैसे रुचिकर होगा ॥११४॥
अपने सगुन गोपालहिं माई, इहिं विधि काहूँ देति ।
ऊधौ की इन मीठी बातनि, निर्गु न कैसैं लेति ।
धर्म, अर्थ, कामना सुनावत, सब सुख मुक्ति समेति ।
काकी भूख गई मन लाडू, सो देखहु चित चेति ।
जाकौ मोक्ष विचारत बरनत, निगम कहत हैं नेति ।
सूर स्याम तजि को भूस फटकै, मधुप तुम्हारे हेति ॥११५॥
अर्थ—सखी अपने सगुण गोपाल को इस प्रकार कैसे दूं । ऊधो की इन मीठी
बातों से निर्गुण को कैसे लूं ! धर्म, अर्थ तथा सब सुखो सहित मुक्ति की इच्छा
(की बात) सुनाते हैं । मन मे विचार करके देखो मन के लड्डू से किसकी भूख
जाती है । जिस मोक्ष को विचारते तथा वर्णन करते निगम उसे नेति-नेति कहते
हैं। सूरदास कहते हैं (गोपियाँ कहती हैं) कृष्ण को छोड़कर (उद्धव) तुम्हारे लिये
कौन भूसा फटके ॥११५॥
पांचवां सवाद
वे हरि सकल ठौर के बासी ।
पूरन ब्रह्म अखंडित मंडित, पंडित मुनिन बिलासी ।
सप्त पताल ऊरध अध पृथ्वी, तल नभ बरुन बयारी ।
अभ्यंतर दृष्टी देखन कौं, कारन रूप मुरारी ।
मन, बुधि, चित, अहँकार दसेद्रिय, प्रेरक थंभनकारी ।
ताकैं काज वियोग बिचारत, ये अबला-ब्रजनारी ।
जाकौं जैसौ रूप मन रुचै, सो अपबस करि लीजै ।
आसन बैसन ध्यान धारणा, मन आरोहन कीजै ।
षट दल अठ द्वादस दल निरमल, अजपा जाप जपाली ।
त्रिकुटी संगम ब्रह्म द्वार भिदि, यौं मिलिहैं बनमाली ।
एकादस गीता श्रुति साखी, जिहिं विधि मुनि समुझाए ।
ते संदेस श्रीमुख गोपिनि कौ, सूर सु मधुप सुनाए ॥११६॥
अर्थ—वे कृष्ण सब जगह के निवासी (सर्वव्यापी) है । पूर्ण ब्रह्म अखड रूप से
शोभित तथा पंडित तथा मुनि लोगों को विलसित करने वाला है । सात पाताल, पृथ्वी
३०८ सूरसागर सार सटीक
के उर्ध्व और अध (ऊपर और नीचे) नभ, तल तथा वरुण (जल) और वायु के कारण
रूप मुरारी (कृष्ण को) देखने के लिए अन्तर दृष्टि की आवश्यकता है। मन, बुद्धि,
चित्त, अहकार तथा दसो इन्द्रियो को प्रेरित तथा स्तम्भित करने वाले कृष्ण के लिये
ये अबला नारियां वियोग का विचार करती । जिसको जैसा रूप रुचिकर हो उसे ही
अपने बस मे कर लो । आसन पर बैठो तथा ध्यान धारण करो तथा मन का आरोहण
कीजिये । छः दल कमल, आठ दल कमल, निर्मल बारह दल (पर ध्यान) तथा अजपा
जाप करो । त्रिकुटी के संगम तथा ब्रह्म द्वार को भेदकर वनमाली (कृष्ण से) मिलो ।
जिस तरह से सब मुनियो ने समझाया है, उसके लिये ग्यारह गीता साक्षो है। श्रीमुख
(कृष्ण के) सदेश को ऊधो ने इस प्रकार गोपियो को सुनाया ॥११६॥
ऊधौ हमारी सौं तुम जाहु ।
यह गोकुल पूनौ कौ चंदा, तुम ह्वै आए राहु ।
ग्रह के ग्रसे गुसा परगास्यौ, अब लौं करि निरबाहु ।
सब रस लै नंदलाल सिधारे, तुम पठाए बड़·साहु ।
जोग बेचि कै तदुल लौजै, बीच बसेरे खाहु !
सूरदास जबहीं उठि जैहौ, मिटिहै मन कौ दाहु ॥११७॥
अर्थ—ऊधो हमारी कसम तुम चले जाओ । यह गोकुल पूर्णिमा की चन्द्रमा है
तुम राहु होकर आये हो । ग्रह ग्रसे हम गोपियों को क्रोध दिलाते हो, अब तक उसका
निर्वाह किया, सब रस लेकर कृष्ण चले गये फिर बड़े सज्जन ने तुमको भेजा । योग
बेचकर चावल खरीद लो जिसे रास्ते के बसाव (टिकाव) मे खाना । सूरदास कहते हैं
(गोपियां कहती हैं) जब तुम उठकर जाओगे तभी हृदय की दाह मिटेगी ॥११७॥
ऊधौ मौन साधि रहे ।
जोग कहि पछिताति मन-मन, बहुरि कछु न कहै ।
स्याम कौं यह नहीं बूझै, अतिहि रहे खिसाइ ।
कहा मैं कहि-कहि लजानी, नार रह्यौ नवाई ।
प्रथम ही कहि बचन एकै, रह्यौ गुरु करि मानि ।
सूर प्रभु मोकौं पठायौ, यहै कारन जानि ॥११८॥
अर्थ—उद्धव ने चुप्पी साध ली । योग कहकर मन-ही-मन मे पछताते हैं फिर
कुछ नही कहा । कृष्ण के लिये यह उचित नही था, यह सोचकर क्रुद्ध हुये । पहले तो
मैं व्यर्थ ही कह-कहकर लज्जित हुआ तथा (ऊधो) गर्दन झुका ली । सूरदास कहते है
पहले एक ही वचन (सिद्धान्त अद्वैत) कह कर तथा मुझे गुरुवत् सम्मान देकर प्रभु ने
मुझे भेजा, उसका यही कारण जान पडता है (मुझे मूर्ख बनाने के लिये ही इस प्रकार
से कृष्ण ने भेजा यही रहस्य की बात मालूम पड़ती है) ॥११८॥
मधुकर भली करी तुम आए ।
वै बातैं कहि कहि या दुख में, ब्रज के लोग हँसाए ।
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण लिप्यंतरण है:
उद्धव संदेश ३०८
मोर मुकुट मुरली पीतांबर, पठवहु सौंज हमारी ।
आपुन जटाजूट, मुद्रा धरि, लीजै भस्म अधारी ।
कौन काज बृन्दावन कौ सुख, दही भात की छाक ।
अब वै स्याम कूबरी दोऊ, बने एक ही ताक ।
वै प्रभु बड़े सखा तुम उनके, जिनकैं सुगम अनीति ।
या जमुना जल कौ सुभाव यह, सूर विरह की प्रीति ॥११९६॥
अर्थ—उद्धव, तुम अच्छा किये जो चले आये । इस दुख में उन बातो को कह-कह
कर ब्रज के लोगों को हँसाया । मोर पंख का मुकुट, मुरली पीतांबर आदि मेरे सामान को
भेज दो। अपने जटा, जूट, मुद्रा, भस्म, अधारी आदि को अपने पास ही रखो । (कृष्ण
को) वृन्दावन के सुख से तथा दही-भात के छाक से क्या मतलब है ! अब वे कृष्ण
तथा कुबरी दोनों एक समान है। वे स्वामी है तुम उनके बड़े मित्र हो जिनकी अनीति
सुगम ही है। विरह का प्रेम यमुना के जल के समान (गत्यात्मक-अस्थिर) है ॥११९६॥
काहे कौं रोकत मारग सूधौ ।
सुनहु मधुप निरगुन कंटक तैं, राजपंथ क्यों रुँधौ ।
कै तुम सिखि पठाए हौ कुबिजा, कह्यौ स्याम घनहूँ धौं ।
वेद पुरान सुमृति सब ढूँढ़ी, जुवतिनि जोग कहूँ धौं ।
ताकौ कहा परेखौ कीजै, जानै छाँछ न दूधौ ।
सूर मूर अक्रूर गयौ लै, व्याज निवेरत ऊधौ ॥११२०॥
अर्थ—सीधा मार्ग क्यो रोकते हो । उद्धव, सुनो निर्गुण काँटे से राजपथ क्यों
अवरुद्ध करते हो । क्या तुम कुबरी के द्वारा सिखाकर भेजे गये हो या कृष्ण ने भी कहा
है। वेद, पुराण, स्मृति सब कुछ ढूंढ डालो कही युवतियो के लिए योग (का विधान)
है । उनकी बातो को कैसे बुरा माना जाय जो दूध तथा मट्ठा जानता ही नही है (जो
इतना मूर्ख है कि दूध और मट्ठे का अन्तर नही जानता) । सूरदास कहते है (गोपियां
कहती हैं) अक्रूर (कृष्णधन) ले गये तथा उद्धव, तुम ब्याज वसूलने आये हो ॥११२०॥
ऊधौ कोउ नाहिंन अधिकारी ।
लै न जाहु यह जोग आपनौ, कत तुम होत दुखारी ।
यह तौ वेद उपनिषद मत है, महा पुरुष व्रतधारी ।
हम अबला अहीरि ब्रज-वासिनि, नाहीं परत सँभारी ।
को है सुनत कहत हौ कासौँ, कौन कथा विस्तारी ।
सूर स्याम कैं संग गयौ मन, अहि काँचुली उतारी ॥११२१॥
अर्थ—उद्धव ! यहाँ (योग) का कोई अधिकारी नही है। तुम अपने योग को
(क्यो) ले नही जाते तुम दुखी क्यों होते हो। यह तो वेद तथा उपनिषदो का मत है
तथा व्रतधारी महापुरुषो के लिए (उपयुक्त) है। हम ब्रजनिवासिनियो तथा अबला
अहीरिनो से (यह योग) सम्हाला नहीं जाता। किससे कहते हो तुम्हारे कथा के
३१० सूरसागर सार सटीक
विस्तार हो और मुड़ता है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) मन तो कृष्ण के साथ
चला गया और सांप के केंचुली की (तरह) इस शरीर को छोड़ गया ॥१२१॥
वै वातैं जमुना-तीर की।
कबहुँक सुरति करत हैं मधुकर, हरन हमारे चीर की।
लीन्हे वसन देखि ऊँचे द्रुम, रबकि चढ़न वलवोर की।
देखि-देखि सब सखी पुकारतिं, अधिक जुड़ाई नीर की।
दोऊ हाथ जोरि करि माँगैं, ध्वाई नंद अहीर की।
सूरदास प्रभु सब सुख दाता, जानत हैं पर पीर की ॥१२२॥
अर्थ—यमुना के किनारे की चीरहरण सम्बन्धी बातो की क्या कभी कृष्ण याद
करते हैं ? वस्त्र को लेकर कृष्ण उत्साहपूर्वक ऊंचे वृक्ष पर चढ गये । जल से शीतल
हुई सखियाँ (कृष्ण को) देख देखकर पुकारती थी । नन्द अहीर की दोहाई देकर तथा
दोनो हाथ जोडकर अपने वस्त्र मांगती हैं । सूर के प्रभु कृष्ण सब को सुख देने वाले है
तथा वे पराई पीडा को जानने वाले हैं ॥१२२॥
प्रेम न रुकंत हमारे बूतें।
किहिँ गयंद बाँध्यौ सुनि मधुकर, पदुम नाल के काँचे सूतैं ?
सोवत मनसिज आनि जगायौ, पठै संदेस स्याम के दूतैं ।
विरह-समुद्र सुखाइ कौन बिधि, रंचक जोग अगिनि के लूतैं ।
सुफलक सुत अरु तुम दोऊ मिलि, लीजै मुकुति हमारे हूतैं ।
चाहतिँ मिलन सूर के प्रभु कौं, क्यौँ पतियाहिं तुम्हारे धूतैं ॥१२३॥
अर्थ—हमारे बल से प्रेम रुक नही सकता । ऊधो कहो कमल नाल के कच्चे
धागे से किसने हाथी को बाँधा है। कृष्ण ने दूत भेजकर प्रसुप्त काम-व्यथा को जगा
दिया । हम लोगो का विरह समुद्र आपकी थोडी-सी योगाग्नि की लपट से कैसे सूख
सकता है ? अक्रूर तथा तुम दोनों मिलकर हमारी ओर से भी मुक्ति लीजिए । सूरदास
कहते हैं (गोपियां कहती है) हम कृष्ण से मिलना चाहती हैं तुम्हारे जैसे धूर्त पर कैसे
विश्वास करे ॥१२३॥
ऊधौ सुनहु नैकु जो बात ।
अबलनि कौँ तुम जोग सिखावत, कहत नहीँ पछितात्त ।
ज्यौँ ससि बिना मलीन कुमुदिनी, रवि बिनुहौँ जलजात ।
त्यौँ हम कमलनैन बिनु देखे, तलफि-तलफि मुरझात ।
जिन श्रवननि मुरली सुर आँचयौ, मुद्रा सुनत डरात ।
जिन अधरनि अमृत फल चाख्यौ, ते क्यौँ कटु फल खात ।
• कुंकुम चंदन घसि तन लावतिँ, तिहिँ न बिभूति जुहात ।
सूरदास प्रभु बिनु हम यौँ हैं, ज्यौँ तरु जीरन पात ॥१२४॥
उद्धव संदेश ३११
अर्थ - उद्धव ! तनिक (हमारी) बात तो सुनो ! अबलाओ को तुम योग सिखाते
हो (यह कहते) तुम पश्चात्ताप नही करते हो। जैसे चन्द्रमा के बिना कुमुदिनी और
सूर्य के बिना कमल वैसे ही हम कमल के समान नेत्र वाले कृष्ण को देखे बिना
तड़प-तड़प कर मुरझाती हैं। जिन कानो से मुरली के स्वर को सुना है (उन्ही कानो
से) मुद्रा सुनते डर लगती है। जिन अधरों से मधुर फल चखा है वे क्यों कड्ये फल को
खायें। कुंकुम, चन्दन को घिस कर शरीर में लगाती थी। (उस) शरीर को भस्म
नही सुहाती है। (गोपियां कहती हैं) हम कृष्ण के बिना वैसे ही हैं जैसे जीर्ण पत्तों
वाला वृक्ष ॥१२४॥
ऊधौ जोग जोग हम नाहीँ।
अबला सार-ज्ञान कह जानैँ, कैसेँ ध्यान धराहीँ।
तेई मूँदन नैन कहत हौ, हरि मूरति जिन माहीँ।
ऐसी कथा कपट की मधुकर, हमतैँ सुनी न जाहीँ।
श्रवन चीरि सिर जटा बँधावहु, ये दुख कौन समाहीँ।
चंदन तजि अँग भस्म बतावत, विरह-अनल अति दाहीँ।
जोगी भ्रमत जाहि लगि भूले, सो तौ है अप माहीँ।
सूरस्याम तैँ न्यारी न पल छिन, ज्यौं घट तैँ परछाहीँ ॥१२५॥
अर्थ-उद्धव, योग के योग्य हम नही है। अबलाएं तत्व ज्ञान क्या जाने तथा
कैसे ध्यान धरें। (तुम) उन्ही नेत्रो को मूंदने को कहते हो जिनमे कृष्ण की मूर्ति है।
मधुकर (ऊधो) ऐसी कपट कथा हमसे सुनी नही जाती। कानो को फाड़कर सिर पर
जटा बँधाते हो यह दुख कहां समाये। विरह की अग्नि से अत्यधिक दग्ध शरीर में
चन्दन को त्यागकर भस्म लगाने को कहते हो। योगी जिसके लिए भ्रमित है वह अपने
ही भीतर है। सूरदास कहते है (गोपियां कहती हैं) कृष्ण से हम क्षण भर भी अलग
नही है जैसे शरीर से परछायी अलग नही है ॥१२५॥
हम तौ नंद-घोष के बासी।
नाम गुपाल जाति कुल गोपक, गोप गुपाल उपासी।
गिरिवर धारी गोधन चारी, वृन्दावन अभिलाषी।
राजा नंद जसोदा रानी, सजल नदी जमुना सी।
मीत हमारे परम मनोहर, कमलनैन सुख रासी।
सूरदास-प्रभु कहाँ कहाँ लौँ, अष्ट महा-सिधि दासी ॥१२६॥
अर्थ-हम नन्द के गांव की रहने वाली हैं। हम गिरिवर धारी, गाय चराने
वाले, वृन्दावन के अभिलाषी ग्वाल जाति के गोपाल कृष्ण की उपासना करने वाली
है। राजा नन्द तथा रानी यशोदा तथा यमुना के समान जल युक्त सुन्दर नदी से (यह
स्थान शोभित है) सुख की राशि कमलवत् नेत्र वाले कृष्ण हमारे परम मनोहर मित्र
३१२ सूरसागर सार सटीक
है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कहां तक कहूँ (मैं अष्ट महासिद्ध (कृष्ण की)
दासी हूँ ॥१२६॥
यह गोकुल गोपाल उपासी ।
जे गाहक निर्गुन के ऊधौ, ते सब बसत ईस-पुर कासी ।
जद्यपि हरि हम तजि अनाथ करि, तदपि रहतिं चरननि रस रासी ।
अपंनी सीतलता नहिं छोड़त, जद्यपि बिधु भयौ राहु-गरासी ।
किहिं अपराध जोग लिखि पठवत, प्रेम भगत तैं करत उदासी ।
सूरदास ऐसी को बिरहिनि, माँगि मुक्ति छोड़ै गुन रासी ॥१२७॥
अर्थ-उद्धव, यह गोकुल गोपाल का भक्त है। जो निर्गुण के ग्राहक है वे शंकर
की पुरी काशी मे बसते हैं। यद्यपि कृष्ण ने हमें अनाथ करके छोड दिया तो भी चरणो
के रस मे अनुरक्त रहती हूँ। चन्द्रमा राहु से ग्रसित होने पर भी अपनी शीतलता को
नही छोडता । किस अपराध के कारण योग लिखकर भेजते है और प्रेम-भक्ति से उदा-
सीन करते हैं । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि ऐसी कौन विरहिणी है जो
मुक्ति मांग कर गुण-राशि (श्री कृष्ण चन्द्र) को त्याग दे ॥१२७॥
ऐसौँ सुनियत द्वै बैसाख ।
देखति नहीँ व्यौँत जीवे कौ, जतन करौ कोउ लाख ।
मृगमद मलय कपूर कुमकुमा, केसर मलियै साख ।
जरत अगिनि मैं ज्यौँ घृत नायौ, तन जरि ह्वैहै राख ।
ता ऊपर लिखि जोग पठावत, खाहु नीम, तजि दाख ।
सूरदास ऊधौ की बतियाँ, सब उड़ि बैठी ताख ॥१२८॥
अर्थ-ऐसा सुना जाता है कि इस बार दो वैशाख (अतिरिक्त मास) पड़ गया
है। जीने का कोई उपाय नही देखती हूं चाहे कोई लाख प्रयत्न करे। मृगमद (कस्तूरी),
मलय, कपूर तथा कुकुम और केशर जो मले गये वे सब इसके साक्षी है, लेकिन यह सब
जलती हुई अग्नि मे जैसे घी डाल दिया गया हो, शरीर जलकर भस्म हो गया। उसके
ऊपर योग लिख कर भेजते हैं और अंगूर को छोड़कर नीम खाने को (कहते हो) ।
सूरदास कहते है उद्धव की सभी बाते उड़कर ताख पर बैठ गयी ? ॥१२८॥
इहिं विधि पावस सदा हमारैं ।
पूरब पवन स्वास उर ऊरध, आनि मिले इकठारैँ ।
बादर स्याम सेत नैननि मैं, बरसि आँसु जल धारै ।
अरुन प्रकास पलक द्युति दामिनि,गरजनि नाम पियारैँ ।
चातक दादुर मोर प्रकट ब्रज, बसत निरंतर धारैँ ।
ऊधव ये तब तैँ अटके ब्रज, स्याम रहे हित टारैँ ।
कहिए काहि सुनै कत कोऊ, या ब्रज के व्यौहारैँ ।
तुमही सौं कहि-कहि पछितानी, सूर बिरह के धारैँ ॥१२९॥
उद्धव संदेश ३१३
अर्थ—इस प्रकार सदा हमारे (साथ) वर्षा ऋतु है। हृदय के ऊपर सांस रूपी
पुरवा हवा आकर एक स्थान पर मिलती है। आंखों की काली तथा सफेद पुतलियो
रूपी बादल आंसू जल बरसाते हैं । (आंखो की) ललाई का प्रकाश तथा पलक रूपी
बिजली की चमक है तथा कृष्ण के नाम की गर्जना है। चातक, मेढक, मोर, ब्रज मे
आकर निरन्तर बसते हैं। ऊधो, ये सब तभी से ब्रज मे अड़ गए है, किससे कहा जाय
तथा ब्रज के इस व्यवहार को सुनता ही कौन है। सूरदास कहते है (गोपियां कहती
हैं) कि तुम्ही से कहकर पछतायी (रूप) विरह को कौन धारण करे ॥१२६॥
ऊधौ कोकिल कूजत कानन।
तुम हमकौँ उपदेश करत हौ, भस्म लगावन आनन ।
औरौ सिखी सखा सँग लै लै, टेरत चढ़े पखानन ।
बहुरौ आइ पपीहा कैँ मिस, मदन हनत निज बानन ।
हमतौ निपट अहीरि बावरी, जोग दीजिएै जानन ।
कहा कथत मौसी के आगेँ, जानत नानी नानन ।
तुम तौ हमैँ सिखावन आए, जोग होइ निरवानन ।
सूर मुक्ति कैसैँ पूजति है, वा मुरली के तानन ॥१३०॥
अर्थ—उद्धव, जंगल में कोयल कूकती है। तुम हमको मुख पर भस्म लगाने का
उपदेश करते हो। मोर अपने मित्रों को लेकर पहाड़ों पर चढ़कर टेरते हैं। फिर पपीहा
के बहाने आकर कामदेव अपने बाणों से हनता है। हम तो विल्कुल बावली अहीर की
लड़कियां हैं अतः योग की शिक्षा ज्ञानियों को दीजिये। मौसी के आगे नानी-नाना की
क्या बात करते हो (वह तो उन्हें जानती ही है)। तुम तो हमे सिखाने आये हो कि योग
से निर्वाण होगा किन्तु मुक्ति मुरली की तानो से कैसे बराबरी कर सकती है ॥१३०॥
हमतैँ हरि कबहूँ न उदास ।
रास खिलाइ पिलाइ अधर रस, क्योंँ बिसरत ब्रज बास ।
तुमसौँ प्रेम कथा कौँ कहिबौ, मनौ काटिबौ घास ।
बहिरौ तान-स्वाद कह जानै, गूँगौ बात मिठास ।
सुनि री सखी बहुरि हरि ऐहैँ, वह सुख वहै बिलास ।
सूरदास ऊधौ अब हमकौँ, भए तेरहौँ मास ॥१३१॥
अर्थ—कृष्ण हमसे कभी भी उदास नही थे। रास खेला कर तथा ओठों का
रस पिलाकर ब्रज का निवास क्यों भूलते हैं। तुमसे प्रेम कथा कहना मानो घास
काटना है। बहरा तान के आस्वाद को क्या जाने तथा गूंगा बात की मिठास क्या
जाने । सखी सुनो, कृष्ण फिर आयेगे; फिर वही सुख तथा विलास होगा। सूरदास
कहते हैं (गोपियां कहती हैं) अब हमको (कृष्ण को देखते-देखते) तेरह महीने हो गये।
(कृष्ण के आने की अवधि बीत गई) ॥१३१॥
३१४ सूरसागर सार सटीक
आयौ घोष बड़ी ब्यौपारी ।
खेप लादि गुरु ज्ञान जोग की, ब्रज मैं आनि उतारी ।
फाटक दै कै हाटक माँगत, भोरी निपट सुधारी ।
धुरही तैं खोटो खायौ है, लिये फिरत सिर भारी ।
इनके कहे कौन डहकावै, ऐसी कौन अनारी ।
अपनी दूध छोड़ि को पीवै, खारे कूप को बारी ।
ऊधौ जाहु सबारैं ह्याँ तैं, वेगि गहरु जनि लावहु ।
मुख माँगी पैहौ सूर प्रभु, साहुहिं आनि दिखावहु ॥१३२॥
अर्थ—गाँव मे एक बढा व्यापारी आया है। भारो ज्ञान रूपी खेप (सामान)
लादकर ब्रज मे लाकर उतारा है। फटकन देकर सोना मांगता है, वह सीधा और
भोला है। शुरू से ही व्यापार मे घाटा हुआ है। अतः वह सिर पर भारी बोझ लेकर
घूम रहा है। इसके कहने से कौन बहकेगा ऐसा कौन मूर्ख है। अपने दूध को छोडकर
खारे कुये का पानी कौन पियेगा। ऊधो यहाँ से शीघ्र ही चले जाओ, विलम्ब मत
करो। कृष्ण रूपी साहू को ले आकर दिखा दो, मुंह मांगा मिलेगा ॥१३२॥
ऊधौ जोग कहा है कीजतु ।
ओढ़ियत है, कि बिछैयत है, किधौँ खैयत है किधौँ पीजत ।
कीधौँ कछू खिलौना सुंदर, की कछु भूषन नीकौ ।
हमरे नंद-नंदन जो चहियतु, मोहन जीवन जी कौ ।
तुम जु कहत हरि निगुन निरंतर, निगम नेति है रीति ।
प्रकट रूप की रासि मनोहर, क्यों छोड़ै परतीति ।
गाइ चरावन गए घोष तैं, अबहीं हैं फिरि आवत ।
सोई सूर सहाइ हमारे, बेनु रसाल बजावत ॥१३३॥
अर्थ—उद्धव, योग का क्या किया जाय। ओढ़ा जाय, या बिछाया जाय;
खाया जाय कि पिया जाय। क्या यह कोई सुन्दर खिलौना है कि कोई सुन्दर आभूषण
है ? हम कृष्ण को चाहती हैं तथा मोहन प्राणो को जीवित रखने वाले हैं। तुम जो
कहते हो कि ब्रह्म (कृष्ण) निर्गुण है तथा निगम उसके विषय मे नेति की रीति का
(प्रतिपादन करते हैं) । (हमने) प्रत्यक्ष कृष्ण के रूप राशि को देखा है, इससे हमारा
मन विश्वास क्यो छोडे। गांव (वह) गाय चराने गए है तथा अभी आते होगे।
सूरदास कहते है (गोपियां कहती है) वही हमारे सहायक है, (वह) रसयुक्त बंशी
बजाने वाले है ॥१३३॥
अपने स्वारथ के सब कोऊ ।
चुप करि रही मधुप रस-लंपट, तुम देखे अरु ओऊ ।
जो कछु कह्यौ कह्यौ चाहत हौ, कहि निरवारौ सोऊ ।
अब मेरैँ मन ऐसियै षटपद, होनी होउ सु होऊ ।
उद्धव संदेश ३१५
तब कत रास रच्यौ वृन्दावन, जौ पै ज्ञान हुतोऊ ।
लीन्हे जोग फिरत जुवतिनि मैं°, बड़े सुपत तुम दोऊ ।
छुटि गयौ मान परेखौ रे अलि, हृदै हुतौ वह जोऊ ।
सूरदास प्रभु गोकुल विसरयौ, चित चिंतामनि खोऊ ॥१३४॥
अर्थ - सब कोई अपने स्वार्थ के (साथी) हैं। रस के लंपट मधुप (भ्रमर) चुप
रहो । तुम्हें और उन्हे (दोनो को) देख लिया। जो कुछ कहा तथा कहना चाहते हो
उसे भी कहकर छुट्टी लो । भ्रमर (उधो) मेरे मन मे ऐसा है, जो होना हो, हो जाय ।
जब ज्ञान (की बात करना था) तो वृन्दावन मे रास क्यों रचाया ? युवतियो में योग
लिये फिरते हो तुम दोनों बडे बुद्धिमान (प्रतिष्ठा सम्पन्न) हो । हृदय में जो भरोसा
था, वह भी छूट गया। चित्त की कामना पूर्ति करने वाली मणि को खोकर कृष्ण ने
गोकुल को भुला दिया ॥१३४॥
मधुकर प्रीति किये पछितानी ।
हम जानी ऐसेहिं निबहैगी, उन कछु औरै ठानी ।
वा मोहन कौं कौन पतीजै, बोलत मधुरी वानी ।
हमकौं लिखि लिखि जोग पठावत, आपु करत रजधानी ।
सूनी सेज सुहाइ न हरि बिनु, जागति रैनि बिहानी ।
जब तैं गवन कियौ मधुबन कौं°, नैननि बरषत पानी ।
कहियौ जाइ स्याम सुंदर कौं, अन्तरगत की जानी ।
सूरदास प्रभु मिलि कै बिछुरे, तातैं भईं दिवानी ॥१३५॥
अर्थ-मधुकर, प्रेम करके हमने पश्चात्ताप किया। हमने समझा कि ऐसे निर्वाह
होगा लेकिन कृष्ण ने मन मे कुछ और ही ठान रखा था । उस कृष्ण का कौन विश्वास
करे जो मधुर वाणी बोलने वाले है, हमको लिख लिखकर योग भेजते है तथा स्वयं
राजधानी (का भोग) करते हैं। कृष्ण के बिना सूनी सेज अच्छी नहीं लगती तथा
जागते हुए रात बीतती है। जब से कृष्ण मधुवन को गये, नेत्रो से जल बरसता रहता
है। अन्तरगत की बात जाकर कृष्ण से कहना । सूरदास कहते है (गोपियाँ कहती हैं)
कृष्ण से मिलकर बिछुड़ गयी, उसी से दीवानी हो गयी ॥१३५॥
हमारैं हरि हारिल की लकरी ।
मनक्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी ।
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जकरी ।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी ।
सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी ।
यह तौ सूर तिनहिं लै सौपों, जिनके मन चकरी ॥१३६॥
अर्थ- कृष्ण हमारे लिए हारिल की लकड़ी से समान हैं। मन, कर्म, वचन
तथा हृदय से मैंने कृष्ण को दृढ़तापूर्वक पकड़ा है। जागते, सोते, स्वप्न मे तथा दिन
६. भ्रमरगीत (उद्धव-गोपी संवाद)
३१६ सूरसागर सार सटीक
रात कृष्ण-कृष्ण की रट (धुन) लगी रहती है। योग सुनते हुए ऐसा लगता है जैसे
कड़वी ककड़ी है। तुम ऐसी व्याधि ले आये जिसे हमने न तो देखा है, न सुना है, न
किया है। सूरदास कहते है (गोपियां कहती हैं) यह तो उन्हें सौंपो जिनके मन चंचल
हैं ॥१३६॥
कहा होत जो हरि हित चित धरि, एक बार ब्रज आवते ।
तरसत ब्रज के लोग दरस कौं, निरखि निरखि सुख पावते ।
मुरली सब्द सुनावत सबहिनि, हरते तन की पीर ।
मधुरे बचन बोलि अमृत मुख, विरहिनि देते धीर ।
सब मिलि जग जस गावत उनकौ, हरष मानि उर आनत ।
नासत चिन्ता ब्रज वनितनि की, जनम सुफल करि जानत ।
दुरी दुरा कौ खेल न कोऊ, खेलत हैं ब्रज महियाँ ।
बाल दसा लपटाइ गहत हे, हंसि-हँसि हमरी बहियाँ ।
हम दासी बिनु मोल की उनकी, हमहिं जु चित्त बिसारी ।
इत तैं उन हरि रमि रहे अव तौ, कुविजा भई पियारी ।
हिय मैं बातैं समुझि-समुझि कै, लोचन भरि-भरि आए ।
सूर सनेही स्याम प्रीति के, ते अब भए पराए ॥१३७॥
अर्थ—यदि कृष्ण स्नेह को चित्त मे धरकर ब्रज मे एक बार आ जाते तो क्या
होता । ब्रज के लोग दर्शन के लिए तरसते हैं, (वे) उनके मुख को देख-देखकर सुख
पाते । (कृष्ण) सब को मुरली का शब्द सुनाते तथा सभी की पीड़ा हरते । (कृष्ण
आकर) मुख से अमृत तुल्य मधुर वचन बोलकर विरहिनियों को धीरज देते । सब
संसार मिल कर उनका यश गाता तथा हर्षित होकर हृदय से लगाते । (कृष्ण आकर)
ब्रज की स्त्रियो की चिन्ता का नाश करते (तो) वे अपने जन्म को सफल करके
जानती। ब्रज के वीच कोई छिपा-छिपी का खेल नही खेलता । बालकपन मे हँस-हँस
कर हमारी बांह पकड़ते थे । हम उनकी बिना मूल्य की दासी हैं हमें क्यों भुला दिया ।
यहाँ से कृष्ण वहां रम रहे (अब) तो कुबरी प्यारी हो गयी । हृदय मे बाते समझ-
समझकर आंख मे पानी भर-भर आता है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण
प्रेम के स्नेही थे, वे अब पराये हो गये ॥१३७॥
मधुकर आपुन होहिं बिराने ।
बाहर हेतु हितू कहवावत, भीतर काज सयाने ।
ज्यौं सुक पिंजर माहिं उचारत, ज्यौं ज्यौं कहत वखाने ।
छूटत ही उड़ि मिलै अपुन कुल, प्रीति न पल ठहराने ।
जद्यपि मन नहिं तजत मनोहर, तद्यपि कपटी जाने ।
सूरदास प्रभु कौन काज कौं, माखी मधु लपटाने ॥१३८॥
उद्धव संदेश ३१७
अर्थ—मधुकर, (वे) अपने विराने हैं। बाहर से तो हितैषी कहलाते हैं किन्तु
भीतर से (अपने कार्य) के लिए (काफी चतुर) श्रेष्ठ हैं। जैसे तोता जब पिंजड़े मे रहता
है तो वही उच्चारण करता है, जो-जो कहने वाला (जिलाने वाला) कहता है, किन्तु
वह छूटते ही उड़कर अपने परिवार मे मिल जाता है, उसमे (पुरानी) प्रीति पल भर
भी नही ठहरती । यद्यपि मन उन मनोहर (कृष्ण को) नही त्यागता फिर भी जान
गयी वे कपटी हैं। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) मक्खी मधु से किसलिए
लिपटी रहती हैं ।।१३८।।
हरि तैं भली सुपति सीता कौ ।
जाकैं बिरह जतन ए कीन्हे, सिंधु कियौ बीता कौ ।
लंका जारि सकल रिपु मारे, देख्यौ मुख पुनि ताकौ ।
दूत हाथ उन लिखि जु पठायौ, ज्ञान कह्यौ गीता कौ ।
तिनकौ कहा परेखौ कीजै, कुबिजा के मीता कौ ।
चढे सेज सातौं सुधि बिसरी, ज्यौं पीता चीता कौ ।
करि अति कृपा जोग लिखि पठयौ, देखि डराईं ताकौ ।
सूरजदास प्रीति कह जानैं, लोभी नवनीता कौ ।।१३६।।
अर्थ—कृष्ण से अच्छे तो सीता के सुन्दर पति (राम) थे । जिन्होने (सीता के
विरह मे) ऐसा यत्न किया कि सिन्धु को एक बीता के अन्दर (शीघ्र ही नाप) कर
डाला । उन्होने लंका को जलाकर समस्त शत्रुओ को मार डाला तथा फिर (सीता)
उनके मुख को देखा । दूत के हाथ में जो (कृष्ण ने) गीता का ज्ञान लिखकर भेजा है,
कुब्जा के मित्र कृष्ण का कैसे विश्वास किया जाय । सेज पर चढते ही शराबी (पीता)
के चित्त (चीता) के समान सभी स्मृतियां भूल गयीं । अत्यधिक कृपा करके योग लिख
कर भेजा है कि उसे देखकर मैं डर गयी ! सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) मक्खन
के लोभी (श्री कृष्ण) प्रेम को क्या जानें ।।१३६।।
ऊधौ क्यौँ बिसरत वह नेह ।
हमरैं हृदय आनि नंद-नंदन, रचि रचि कीन्हे गेह ।
एक दिवस गई गाइ दुहावन, वहाँ जु बरष्यौ मेह ।
लिए उढ़ाइ कामरी मोहन, निज करि मानी देह ।
जब हमकौँ लिखि-लिखि पठवत हैं, जोग जुगुति तुम लेहु ।
सूरदास बिरहिनि क्यौँ जीवैं, कौन सयानप एहु ।।१४०।।
अर्थ—उद्धव, वह स्नेह कैसे भूले । कृष्ण ने हमारे हृदय मे आकर रच-रचकर
(उसे अपना) घर बनाया । एक दिन गाय दुहाने गयी वहाँ जब बादल बरसा तो कृष्ण
ने कमरी ओढ़ा दी तथा (हमारे) शरीरे को अपना करके जाना । अब हमें लिख लिख
कर भेजते है कि तुम योग की युक्ति लो । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) इससे
विरहिणी कैसे जिये तथा यह कौन सा सयानापन है ।।१४०।।
३१८ सूरसागर सार सटीक
ऊधौ मन माने की बात।
दाख छुहारा छांड़ि अमृत-फल, विषकीरा विष खात।
ज्यौं चकोर कौं देइ कपूर कोउ, तजि अंगार अघात।
मधुप करत घर कोरि काठ मैं, बँधत कमल के पात।
ज्यौँ पतंग हित जानि आपनी, दीपक सौँ लपटात।
सूरदास जाकौ मन जासौँ, सोई ताहि सुहात ॥१४१॥
अर्थ-ऊधो मन की रुचि की बात है। विष खाने वाला (सांप) अंगूर तथा
छोहारा छोड़कर विष खाता है। (जैसे) चकोर को यदि कोई कपूर दे तो उसे त्याग
कर वह अंगार से ही तृप्त होता है। भ्रमर काठ में छेद करता है तथा कमल के पंखु-
डियों में बँधता है। जैसे पतंग अपना हित जानकर ही दीपक से लिपटता है। सूरदास
कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि जिसका मन जिससे (लग गया है) वही उसको अच्छा
लगता है ॥१४१॥
इहिँ डर बहुरि न गोकुल आए।
सुनि री सखी हमारो करनी, समुझि मधुपुरी छाए।
अधरातक तैं उठि सब बालक, मोहिं टेरेंगे आइ।
मातु पिता मोकौं पठवैंगे, बनहिँ चरावन गाइ।
सूने भवन आइ रोकैंगी, दधि चोरत नवनीत।
पकरि जसोदा पै लै जैहैं, नाचहु गावहु गीत।
ग्वारिनि मोहिं बहुरि बांधैंगी, कै तव वचन सुनाइ।
वै दुख सूर सुमिरि मन ही मन, बहुरि सहै को जाइ ॥१४२॥
अर्थ-इस डर से फिर गोकुल नही आये। सखी सुनो हमारी करनी समझकर
(कृष्ण) मधुपुरी मे छा गये। आधी रात के लगभग उठकर सभी बालक आकर मुझे
पुकारेंगे। माता-पिता मुझे गाय चराने भेजेंगे। खाली घर मे मक्खन चुराते हुए मुझे
स्त्रियां रोकेगी। वे पकड़कर यशोदा के पास ले जायंगी तथा (कहेगी) कि नाचो तथा
गीत गाओ। छल के वचन सुनाकर ग्वालिनियां मुझे फिर बांधेगी। सूरदास कहते हैं
(गोपियां कहती हैं) उन दुखो को मन-ही-मन स्मरण कर (कृष्ण सोचते हैं) फिर उन्हे
सहने कौन जाय ॥१४२॥
जौ कोउ विरहिनि कौ दुख जानै।
तौ तजि सगुन साँवरी मूरति, कत उपदेसै ज्ञानै।
कुमुद चकोर मुदित विधु निरखत, कहा करै लै भानै।
चातक सदा स्वांति कौं सेवक, दुखित होत बिनु पानै।
भौंर, कुरंग, काग, कोइल कौं, कविजन कपट वखानैँ।
सूरदास जौ सरबस दीजै, कारे कृतहि न मानैं ॥१४३॥
उद्धव संदेश ३१६
अर्थ—यदि कोई विरहिणी के दुख को समझे तो वह सगुण साँवली मूर्ति को
छोड़कर ज्ञान का उपदेश कैसे देगा। कमलिनी और चकोर चन्द्रमा को देखकर प्रसन्न
होते हैं, वे सूर्य को लेकर क्या करे। चातक सदैव स्वाति के बूंद का सेवक है, वह
(उसके) पान के बिना दुखी होता है। भौर, मृग, कौआ, कोयल आदि को कवि लोग
कपटी कहते है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) यदि काले लोगों को सर्वस्व दे
दिया जाय तो भी वे उपकार को नही मानते ॥१४३॥
ऊधौ सुधि नाहीँ या तन की।
जाइ कहौ तुम कित हौ भूले, हमज्ब भईँ बन-बन की।
इक बन ढूँढ़ि सकल बन ढूंढ़े, बन बेली मधुबन की।
हारि परीँ बृन्दावन ढूँढ़त, सुधि न मिली मोहन की।
किए विचार उपचार न लागत, कठिन बिथा भई मन की।
सूरदास कोउ कहै स्याम सौँ, सुरति करैँ गोपिनि की ॥१४४॥
अर्थ—उद्धव, (हमें) इस शरीर का स्मरण नही है। तुम क्यों भूले हो, जाकर
कृष्ण से कहो कि हम वन-वन की (ढूंढ़ने वाली) हो गयी है। इन समस्त वनों को
ढूंढ़ा तथा मधुवन की (समस्त) वन लताओं को ढूंढ़ा। वृन्दावन में ढूंढ़ते (ढूंढ़ते) हार
गयी किन्तु कृष्ण की कोई खबर नही मिली। विचार करने पर (भी) कुछ उपचार नही
सूझता, जिससे मन मे कठिन पीड़ा हो गयी है। सूरदास कहते है (गोपियां कहती है)
कोई कृष्ण से कहे कि (वह) गोपियों का ख्याल करे ॥१४४॥
लरिकाईँ कौ प्रेम कहौ अलि कैसैँ छूटत।
कहा कहौँ ब्रजनाथ चरित, अंतरगति लूटत।
वह चितवनि वह चाल मनोहर, वह मुसकानि मंद-धुनि गावनि।
नटवर-भेष नंद-नंदन कौ, वह विनोद, वह बन तैँ आवनि।
चरन कमल की सौहँ करति हौँ, यह संदेस मोहिं विषसौँ लागत।
सूरदास पल मोहिं न बिसरति, मोहन मूरति सोवत जागत ॥१४५॥
अर्थ—अलि (उद्धव) कहो बचपन की प्रीति कैसे छूटे। ब्रजनाथ (कृष्ण) के
चरित्र को कैसे कहूँ वह (चरित्र) अन्तर को लूटने वाला है। वह दृष्टि, वह मनोहर
चाल, वह मुस्कान, वह मंद ध्वनि से गाया जाने वाला गान, नटवर वेष, वह कृष्ण
का विनोद तथा वन से वह आगमन (ये सब हृदयहारी हैं)। कृष्ण के चरण कमलों की
कसम लेकर कहती हूँ यह संदेश मुझे विष जैसा लगता है। सूरदास कहते हैं (गोपियां
कहती हैं) (वह) मोहनी मूर्ति हमे सोते-जागते कभी नही भूलती ॥१४५॥
उद्धव हृदय परिवर्तन तथा गोपी संदेश
मैं ब्रजबासिन की बलिहारी।
जिनके सग सदा क्रीड़त हैं, श्री गोवरधन-धारी।
किनहूँ कैँ घर माखन चोरत, किनहूँ कैँ संग दानी।
किनहूँ कैँ सँग धेनु चरावत, हरि की अकथ कहानी।
किनहूँ कैँ सँग जमुना कैँ तट, वंसी टेरि सुनावत।
सूरदास बलि-वलि चरननि की, यह सुख मोहिं नित भावत ॥१४६॥
अर्थ—मैं ब्रजवासियो की बलि जाता हूँ जिनके साथ गोवर्धनधारी कृष्ण सदा
खेलते है। (वह) किन्ही के साथ माखन चुराते है, किन्हीं के साथ दान (लीला) करते
हैं। किन्ही के साथ (वह कृष्ण) गाय चराते हैं। इस प्रकार कृष्ण की कहानो अकथ-
नीय है। किन्ही के साथ (कृष्ण) यमुना तट पर गाय चराते हैं तथा वंशी की टेर
सुनाते है। सूरदास कहते है (ऊधो कहते है) कृष्ण के चरणों पर बलिहारी हूँ तथा यह
सुख हमे सदैव भाता है ॥१४६॥
हौं इन मोरनि की बलिहारी।
जिनकी सुभग चंद्रिका माथै, धरति गोवरधनधारी।
वलिहारी वा बाँस-वंस की, बंसी सी सुकुमारी।
सदा रहति है कर जु स्याम कैँ, नैकहुँ होति न न्यारी।
वलिहारी वा गुंज-जाति की, उपजी जगत उज्यारी।
सुन्दर हृदय रहत मोहन कैँ, कवहूँ टरत न टारी।
वलिहारी कुल सैल सरित जिहिं, कहत कलिंद-दुलारी।
निसि-दिन कान्ह अंग आलिंगन, आपुनहूँ भई कारी।
वलिहारी वृन्दावन भूमिहिं, सुतौ भाग की सारी।
सूरदास प्रभु नाँगे पाइनि, दिन प्रति गैया चारी ॥१४७॥
अर्थ—मैं इन मोरो की बलिहारी (होता) हूँ जिनकी सुन्दर चन्द्रिका कृष्ण
मस्तक पर धारण करते है। बाँस के कुल की बलिहारी है, जिसकी सुकुमारी वंशी सदा
कृष्ण के हाथो मे रहती है तथा क्षण भर के लिए भी अलग नही होती। उस गुंज जाति
को बलिहारी है जो कि उज्जवल संसार में उत्पन्न हुई है। (वह) कृष्ण के सुन्दर हृदय
पर रहती तथा कभी टाले नही टलती। पर्वत समूह तथा 'सरिता' जिसे यमुना कहते
है, उसकी बलिहारी है। रात-दिन कृष्ण के अंग आलिंगन से स्वयं भी काली हो गयी।
वृन्दावन की भूमि को बलिहारी है क्योकि वह भाग्य की भरी पूरी है, जहां कृष्ण ने
नगे पांव प्रतिदिन गाय चराया ॥१४७॥
हम पर हेत किये रहिवौ।
या ब्रज कीं व्यौहार सखा तुम, हरि सौँ सब कहिवौ।
देखे जात आपनी अँखियनि, या तन को दहिवौ।
तन की बिथा कहा कहौं तुमसौँ, यह हमकौँ सहिवौ।
तब न कियौ प्रहार प्राननि कौ, फिरि फिरि क्यौं चहिवौ।
अब न देह जरि जाइ सूर इनि, नैननि कौ बहिवौ ॥१४८॥
उद्धव संदेश ३२१
अर्थ—हम पर स्नेह किए रहना । सखा तुम इस ब्रज के सब व्यवहार को कृष्ण
से कहना । (तुम) अपनी आंख से इस शरीर का जलना देखे जा रहे हो । तुमसे शरीर
व्यथा क्या कहूँ यह हमको सहना होगा । तब तो प्राणों का प्रहार (त्याग) नही
किया, अब बार-बार चाहने से क्या होता है । " सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती है)
अब तो इन नेत्रों के बहते रहने से शरीर भी नही जल जाता ॥१४८॥
स्वामी पहिलौ प्रेम सँभारौ ।
ऊधो जाइ चरन गहि कहियैं, जी तैं हित न उतारौ ।
जो तुम मधुबन राज काज भए, गोकुल हम न अधारौ ।
कमल नयन सो चैन न देखौ, नित उठि गोधन चारौ ।
ये ब्रज लोग मया के सेवक, तिनसौँ क्यौं न बिहारौ ।
सूरदास प्रभु एक बार मिलि, सकल बिरह दुख टारौ ॥१४६॥
अर्थ—स्वामी (कृष्ण) पूर्व प्रेम (की प्रतिष्ठा) सम्हालो । उद्धव, जाकर चरण
पकड़कर कहना कि हृदय से स्नेह दूर न करें । जो तुम मधुबन के राजकार्य को (धारण
कर लिए) (अब) गोकुल में हमारे लिए (कोई) आश्रय नही है । कमल नयन को देखे
बिना चैन नही है, (निवेदन है) नित उठकर गाय चराओ । ये ब्रज के लोग प्रेम के
सेवक हैं उनके साथ विहार क्यों नही करते । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं)
एक बार मिलकर विरह के दुख को टाल दो ॥१४६॥
इतनी बात अलि कहियौ हरि सौं, कब लगि यह मन दुख मैं गारैं ।
पथ जोहत तन कोकिल बरन भइँ, निसि नीँद पिय पियहिँ पुकारैं ।
जा दिन तैं बिछुरे नंद-नंदन, अति दुख दारुन क्यौं निरबारैं ।
सूरदास प्रभु बिनु यह बिपदा, काकौ दरसन देखि बिसारैं ॥१५०॥
अर्थ—अलि (उद्धव) कृष्ण से इतना कहना कि कब तक इस शरीर को विरह मे
गलाऊँ (नष्ट करूँ) । पथ देखते (देखते) शरीर कोयल के रंग का हो गया । पिय-
पिय पुकारते हुए हमें रात मे नीद नही आती । जिस दिन से कृष्ण बिछुड़े तभी से
अत्यन्त दारुण दुख का निवारण नही होता । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती है)
प्रभु के बिना यह विपत्ति किसके दर्शन से दूर करूँ ॥१५०॥
ऊधौ जू, कहियौ तुम हरि सौं, जाइ हमारे हिय कौ दरद ।
दिन नहिं चैन, रैनि नहिं सोवति, पावक भई जुन्हाई सरद ।
जबलैं लै अक्रूर गए हैं, भई बिरह तन बाइ छरद ।
काम प्रबल जाके अति ऊधौ, सोचत भइ जस पीत-हरद ।
सखा प्रबीन निरतर हरि के, तातैं कहति हैं खोलि परद ।
ध्यावतिँ रूप दरस तजि हरि कौ, सूर मूरि बिनु होतिँ मुरद ॥१५१॥
अर्थ—उद्धव, तुम जाकर कृष्ण से हमारे हृदय के दर्द को कहना । दिन मे चैन
नही है तथा रात मे नीद नही आती । शरद की ज्योत्स्ना अग्नि की तरह हो गयी ।
२१
३२२ सूरसागर सार सटीक
जब से अक्रूर गये हैं, विरह की तप्त वायु से शरीर क्षरित हो गया है। उद्धव जिसके
(शरीर मे) प्रबल काम (व्याप्त) है, सोचते हुए शरीर पीली हल्दी के समान हो गया
है। आप कृष्ण के सदा के प्रवीण मित्र है इसलिए परदा खोलकर (बिना किसी रोक
टोक के) कहती हूँ। कृष्ण के रूप के दर्शन को त्यागकर (पुनः उसी का) ध्यान करती
हूँ अब, (कृष्ण रूपी) संजीवनी (जड़ी) के बिना हम मुर्दा हो गयी है ॥१५१॥
ऊधौ इक पतिया हमरौ लीजै।
चरन लागि गोविंद सौं कहियौ, लिखो हमारी दीजै।
हम तौ कौन रूप गुन आगरि, जिहिं गुपाल जू रीझैं।
निरखत नैन-नीर भरि आए, अरु कंचुकि पट भीजै।
तलफत रहतिं मीन चातक ज्यौं, जल बिनु तृषा न छीजै।
अति व्याकुल अकुलातिं विरहिनी, सुरति हमारी कीजै।
अँखियाँ खरी निहारतिं मधुबन, हरि-बिनु ब्रज विष पीजै।
सूरदास-प्रभु कबहिं मिलैंगे, देखि देखि मुख जीजै ॥१५२॥
अर्थ—उद्धव हमारा एक पत्र लीजिए। (कृष्ण के) चरण लगाकर कहना और
हमारा लिखा हुआ देना। हम कौन रूप गुण मे अग्रणी है जो कि कृष्ण रीझे। देखते
ही गोपियों के नेत्र मे आंसू भर आये और कंचुक का वस्त्र भीगता है। हम (गोपियाँ)
मछली तथा चातक की तरह तलफती रहती हैं, जल के बिना (कृष्ण के रूप रस के
बिना) प्यास नही बुझती। (हम) विरहिणियां व्याकुल होकर अकुलाती है (कृष्ण)
हमारी स्मृति कीजिए। आंखे खड़ी (एकटक) मधुवन को निहारती हैं। कृष्ण के बिना
(हम) ब्रज मे विष पी लूंगी। सूरदास कहते है (गोपियां कहती हैं) कृष्ण कब मिलेंगे
जिनके मुख को देख-देख कर जिऊंगी ॥१५२॥
हम मति हीन कहा कछु जानैं, ब्रजवासिनी अहीर।
वै जु किसोर नवल नागर तन, बहुत भूप की भीर।
बचन की लाज सुरति करि राखो, तुम अलि इतनी कहियौ।
भली भई जौ दूत पठायौ, इतनी बोल निवहायौ।
एक बार तौ मिलौ कृपा करि, जौ अपनौ ब्रज जानौ।
यहै रीति ससार सबनि की, कहा रंक कह रानी।
हम अनाथ तुम नाथ गुसाईं, राखौ, क्यौं नहिं सोई।
षट रितु ब्रज पै आनि पुकारैं, सूरदास अब कोई ॥१५३॥
अर्थ—हम अहीर (जाति की) ब्रजवासिनियां हीन बुद्धि की होने के कारण कैसे
कुछ समझे। वे तो किशोर तथा नवल सभ्य नागर (नागरिक हैं) तथा राजा के रूप
मे बड़ी जिम्मेदारी को वहन करने वाले हैं, इसलिए हे भ्रमर (उद्धव) उनसे कहना कि
वचन की लाज को स्मरण रखेगे। अच्छा हुआ जो कि आपने दूत भेजा (कम से कम)
इतनी प्रतिज्ञा तो निभायी। यदि ब्रज को अपना समझो तो कम से कम एक बार तो
उद्धव संदेश ६२९
कृपा करके मिल जाओ । चाहे गरीब हो चाहे धनी सारी दुनियां की यही रीति है । हम
अनाथ हैं तथा कृष्ण तुम नाथ हो इसलिए आप उस यश की रक्षा क्यों नही करते ।
छहो ऋतुये ब्रज में आकर पुकारती है कि अब कोई (विरहिणियो को सहारा देने
वाला) है ॥१५३॥
नंद-नंदन सौं इतनी कहियौ ।
जद्यपि ब्रज अनाथ करि डार्यौ, तद्यपि सुरति किये चित रहियौ ।
तिनका तोर करहु जनि हम सौं, एक बास की लाज निबहियौ ।
गुन औगुननि दोष नहिं कीजतु, हम दासिनि की इतनी सहियौ ।
तुम बिनु प्रान कहा हम करिहैं, यह अवलंब न सुपनेहु लहियौ ।
सूरदास पाती लिखि पठई, जहाँ प्रीति तहँ ओर निबहियौ ॥१५४॥
अर्थ—कृष्ण से इतना कहना यद्यपि ब्रज को अनाथ कर डाले तब भी चित्त मे
स्मरण रखिएगा । हमसे सम्बन्ध विच्छेद मत कीजिए । एक (साथ) निवास की लाज
का निर्वाह करिए । गुण तथा अवगुण का दोष (ग्रहण न) करना, हम दासियों (के
इतने अपराध को) सहना । तुम्हारे बिना हम प्राण को क्या करेगी यदि स्वप्न मे भी
यह (प्राण) आपका अवलम्ब नही प्राप्त करेगा । सूरदास कहते हैं कि (गोपियो ने)
पत्र लिखकर भेजा (तथा निवेदन किया) जहाँ प्रीति है (वहाँ) उसका अन्त तक
निर्वाह भी होना चाहिए ॥१५४॥
बिनु गुपाल बैरिन भईं कुँजैं ।
तब वै लता लगति तन सीतल, अब भईं विषम ज्वाल की पुंजैं ।
वृथा बहति जमुना, खग बोलत, वृथा कमल-फूलनि अलि गुंजैं ।
पवन, पान, घनसार, सजीवन, दधि-सुत किरनि भानु भईं भुंजैं ।
यह ऊधौ कहियौ माधौ सौं, मदन मारि कीन्ही हम लुंजैं ।
सूरदास प्रभु तुम्हारे दरस कौं, मग-जोवत अँखियाँ भईं घुंजैं ॥१५५॥
अर्थ—कृष्ण के बिना सभी कुंज (वन) शत्रु हो गये । तब ये लताये अत्यधिक
शीतल लगती थी अब विषम ज्वाला पुंज (के समान्) हो गयी है। यमुना व्यर्थ बहती
हैं, पक्षी (व्यर्थ) बोलते है तथा भ्रमर का गूंजना और कमल का खिलना सब व्यर्थ
है । पवन, पानी, कपूर, सजीवन (सब दुखकर हो गये) तथा चन्द्रमा की किरणे सूर्य की
किरणों के समान (तप्त होकर) भूनती हैं । हे उद्धव कृष्ण से कहना कि काम ने मार
कर हमें लुंज कर दिया है । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि कृष्ण तुम्हारे
दर्शन के लिए रास्ता देखते-देखते आंखे घुंघची की भांति रक्त हो गयी हैं ॥१५५॥
ऊधौ इतनी कहियौ बात ।
मदन गुपाल बिना या ब्रज मैं, होन लगे उतपात ।
तृनावर्त, बक, बकी, अघासुर, धैनुक फिरि-फिर जात ।
व्योम, प्रलंब, कंस केसी इत, करत जिअनि की घात ।
काली काल-रूप दिखियत है, जमुना जलहिँ अन्हात ।
बरुन फाँस फाँस्यौ चाहत है, सुनियत अति मुरझात ।
इंद्र आपने परिहँस कारन, बार-बार अनखात ।
गोपी, गाइ, गोप, गोसुत सब; थर-थर काँपत गात ।
अंचल फारति जननि जसोदा, पाग लिये कर तात ।
लागौ बेगि गुहारि सूर प्रभु, गोकुल बैरिनि घात ॥१५६॥
अर्थ—उद्धव, इतनी बात कहना कि मदन गोपाल (कृष्ण) के बिना ब्रज मे
उत्पात होने लगा। तृणावर्त, बक बकी, अघासुर तथा धेनुक (आदि राक्षस) घूम-घूम
कर लौट जाते हैं। व्योमासुर, प्रलम्बन तथा कंस, केसी यहाँ जीने की घात लगाये
है। यमुना के जल मे स्नान करते समय काली मृत्यु के समान दिखाई देता है। वरुण
अपने पाश मे फँसाना चाहता है, सुनकर हम अत्यन्त मुरझाती हैं। इन्द्र अपने परिहास
के कारण बार-बार क्रुद्ध होता है। गोपी, गाय, गोप, सभी बछडे शरीर से थर-थर
कांपते हैं। माता यशोदा अंचल फाड़ती है तथा पिता हाथ मे पाग लेकर (तुम्हारी
आशा देखते हैं) गोकुल मे शत्रुओ का आघात हो रहा है इसलिए हे कृष्ण शीघ्र ही
पुकार सुनो ॥१५६॥
ऊधौ इतनी कहियौ जाइ ।
अति कृसगात भईँ ये तुम बिनु, परम दुखारी गाइ ।
जल समूह बरषतिँ दोउ अँखियाँ, हूँकति लीन्हें नाउँ ।
जहाँ जहाँ गो दोहन कीन्हो, सूँघतिँ सोई ठाउँ ।
परतिँ पछार खाइ छिन ही छिन, अति आतुर ह्वै दीन ।
मानहु सूर काढ़ि डारी हैं, बारि मध्य तैँ मीन ॥१५७॥
अर्थ—उद्धव, जाकर इतना कहना कि परम दुखी गाये तुम्हारे बिना अत्यधिक
दुर्बल शरीर वाली हो गयी हैं। इनकी आंखो से बहुत जल बरसता रहता है तथा तुम्हारा
नाम लेते हुंकारती हैं। (आपने) जहां-जहां गोदोहन किया था उन-उन स्थानो को सूंघती
है। अत्यधिक आतुर तथा दीन होकर क्षण-क्षण वे (मूर्छा से) पछाड़ खा जाती हैं।
(उनकी दशा ऐसी है) मानो जल के बीच से मछली निकाल ली गयी हो ॥१५७॥
अति मलीन बृषभानु-कुमारी ।
हरि स्रम-जल भीँज्यौ उर-अंचल, तिहिँ लालच न धुवावति सारी ।
अध मुख रहति अनत नहिँ चितवति, ज्यौँ गथ हारे थकित जुवारी ।
छूटे चिकुर बदन कुम्हिलाने, ज्यौँ नलिनी हिमकर की मारी ।
हरि संदेस सुनि सहज मृतक भइ, इक बिरहिनि, दूजे अलि जारी ।
सूरदास कैसेँ करि जीवैँ, ब्रज बनिता बिन स्याम दुखारी ॥१५८॥
अर्थ—राधा अत्यधिक मलिन हो गयी है। कृष्ण के सात्विक प्रेम जनित श्रम
जल (पसीना) से हृदय स्थल का अंचल भीग गया था (उसे सुरक्षित रखने की) लालच
से साडी को धुलाती नही हैं। वह सदैव मुख नीचे किये रहती हैं तथा दांव मे हारे हुये
उद्धव संदेश ३२५
जुवारी की तरह अन्यत्र नही देखती हैं। उनके बाल छूट कर (बिखर) गये है शरीर
हिम से आहत कमलिनी की तरह कुम्हला गया है। कृष्ण के संदेश को सुनकर वह
सहज ही मृतक (तुल्य) हो गयी क्योंकि एक तो वह विरहिणी थी तथा दूसरे भ्रमर
(उद्धव के) द्वारा जला दी गयी। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि दुखी ब्रज
बनितायें कृष्ण के बिना कैसे जीवित रहें ॥१५८॥
ऊधौ तिहारे पा लागति हौँ, बहुरिहुँ इहिँ ब्रज करबी भाँवरी ।
निसि न नीँद भोजन नहिं भावै, चितवत मग भइ दृष्टि झाँवरी ।
वहै वृन्दावन, वहै कुंज-घन, वहै जमुना, वहै सुभग साँवरी ।
एक स्याम बिनु कछू न भावै, रटति फिरतिँ ज्यौँ बकति बावरी ।
चलि न सकति मग डुलत धरत-पग, आवति बैठत उठत ताँवरी ।
सूरदास-प्रभु आनि मिलावहु, जग मैँ कीरति होइ रावरी ॥१५६॥
अर्थ—उद्धव, तुम्हारे पैर लगती हूँ, पुनः (कृष्ण का समाचार लेकर) इस ब्रज
मे चक्कर लगाइएगा क्योकि उनके बिना रात मे नीद नही आती, खाना अच्छा नही
लगता; रास्ता निहारते दृष्टि झुलस गयी। वही वृन्दावन है, वही घना कुंज, वही
यमुना तथा वही सुन्दर राधा है किन्तु कृष्ण के बिना कुछ भी अच्छा नही लगता।
बावली की तरह (कृष्ण का नाम) रटती फिरती हूँ। रास्ता नही चल पाती, कदम
रखते पैर हिलता है। उठते बैठते चक्कर आता है। सूरदास कहते है (गोपियाँ कहती
है) उद्धव कृष्ण को लाकर मिला दो, संसार मे तुम्हारा यश होगा ॥१५६॥
पूर्ण परिवर्तन तथा यशोदा संदेश
अब अति चकितवंत मन मेरौ ।
आयौ हौँ निरगुन उपदेसन, भयौ सगुन कौ चेरौ ।
जो मैँ ज्ञान कह्यौ गीता कौ, तुमहिँ न परस्यौ नेरौ ।
अति अज्ञान कछु कहत न आवै, दूत भयौ हरि केरौ ।
निज जन जानि मानि जतननि तुम, कीन्हौ नेह घनेरौ ।
सूर मधुप उठि चले मधुपुरी, बोरि जोग कौ बेरौ ॥१६०॥
अर्थ—अब मेरा मन अत्यधिक चकितवान् हो गया। निर्गुण का उपदेश देने
आये थे किन्तु सगुण के सेवक हो गये। मैंने गीता का जो ज्ञान कहा उसने तुम्हे निकट
से स्पर्श नही किया। कृष्ण के दूत होते हुए अत्यधिक अज्ञान के कारण मुझसे कुछ
कहते नही बनता ! अपना आदमी (स्वजन) जानकर तथा सयत्न आदर देकर तुम
लोगो ने घना स्नेह किया। सूरदास कहते हैं कि योग का वेड़ा डुबाकर उद्धव मधुपुरी
के लिए रवाना हुए ॥१६०॥
ऊधौ पा लागति हौँ कहियौ, स्यामहिँ इतनी बात ।
इतनी दूर बसत क्यौँ बिसरे, अपने जननी-तात ।
३२६ सूरसागर सार सटीक
जा दिन तैँ मधुपुरी सिधारे, स्याम मनोहर गात ।
ता दिन तैँ मेरे नैन पपीहा, दरस प्यास अकुलात ।
जहं खेलन के ठौर तुम्हारे, नन्द देखि मुरझात ।
जौ कबहुँ उठि जात खरिक लौं, गाइ दुहावन प्रात ।
दुहत देखि औरनि के लरिका, प्रान निकसि नहिं जात ।
सूरदास बहुरो कब देखौँ, कोमल कर दधि-खात ॥१६१॥
अर्थ—उद्धव, तुम्हारे पैरों पर पडती हूँ कृष्ण से इतनी बात कहना । इतनी
(ही) दूर पर रहते हुए अपने माता-पिता को क्यो भुला दिया । जिस दिन से साँवले
मनोहर शरीर वाले कृष्ण ने मथुरा के लिए प्रस्थान किया उसी दिन से मेरे नेत्र रूपी
पपीहा दर्शन की प्यास से अकुलाते है । तुम्हारे खेलने के जो स्थान हैं उन्हे देखकर
नंद मुरझाते हैं । जब कभी उठकर प्रातः बाडे मे गाय दुहाने जाती हूँ तब दूसरो के
लडको को गाय दुहाते हुए देखकर (सोचती हैं कि) मेरे प्राण निकल क्यो नही जाते ।
सूरदास कहते है (यशोदा कहती है) कोमल हाथो से दही खाते हुए फिर कब
देखूंगी ॥१६१॥
तब तुम मेरैं काहे कौं आए ।
मथुरा क्यों न रहे जदुनंदन, जौ पै कान्ह देवकी जाए ।
दूध, दही काहे कौं चोरयौ, काहे कौं बन बच्छ चराए ।
अघ अरिष्ट, काली फनि काढ़यौ, बिष जलतैं सब सखा जिवाए ।
पय पीवत हरे प्रान पूतना, सदा किए जसुमति के भाए ।
सूरदास लोगनि के भुरएं, काहैं कान्ह, अब होत पराए ॥१६२॥
अर्थ—तब तुम मेरे यहाँ क्यो आये । यदि तुम देवकी से उत्पन्न हुए (पुत्र) थे
तो मथुरा ही मे क्यों नही रहे । (तुमने) दूध दही क्यों चुराया तथा वन मे बछड़ों को
क्यो चराया । तुमने क्यो अघासुर, अरिष्ट और काली सर्प को निकालकर विषाक्त
जल से सखाओ को जिलाया । दूध पीते हुए पूतना के प्राणो को हर लिया तथा सदैव
यशोदा को भाने वाले (अभीष्ट) कार्यों को किया । सूरदास कहते हैं कि (यशोदा
कहती है) लोगो के बहकाने से कृष्ण अब क्यों पराये हो रहे हो ॥१६२॥
(मोहन) अपनी गैयाँ घेरि लै ।
बिडरी जातिं काहु नहिं मानतिं, नँकु मुरलि की टेर दै ।
धौरी, धूमरि, पीरी, काजरि, बन-बन फिरती पीय ।
अपनी जानि कै आनि संभारहु, धरौ चेत अब जीय ।
तुम हौ जग जीवनि प्रतिपालक, निठुराई नहिं कीजै ।
ग्वालऽरु बाल बच्छ गो बिलखत, सूर सु दरसन दीजै ॥१६३॥
अर्थ—मोहन अपनी गायो को घेर (एकत्रित कर) लो । सब बिखरी जा रही
हैं कोई मानती नही, जरा मुरली की आवाज (टेर) तो करो । प्रिय कृष्ण धवली,