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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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उद्धव संदेश ३११
अर्थ - उद्धव ! तनिक (हमारी) बात तो सुनो ! अबलाओ को तुम योग सिखाते
हो (यह कहते) तुम पश्चात्ताप नही करते हो। जैसे चन्द्रमा के बिना कुमुदिनी और
सूर्य के बिना कमल वैसे ही हम कमल के समान नेत्र वाले कृष्ण को देखे बिना
तड़प-तड़प कर मुरझाती हैं। जिन कानो से मुरली के स्वर को सुना है (उन्ही कानो
से) मुद्रा सुनते डर लगती है। जिन अधरों से मधुर फल चखा है वे क्यों कड्ये फल को
खायें। कुंकुम, चन्दन को घिस कर शरीर में लगाती थी। (उस) शरीर को भस्म
नही सुहाती है। (गोपियां कहती हैं) हम कृष्ण के बिना वैसे ही हैं जैसे जीर्ण पत्तों
वाला वृक्ष ॥१२४॥
ऊधौ जोग जोग हम नाहीँ।
अबला सार-ज्ञान कह जानैँ, कैसेँ ध्यान धराहीँ।
तेई मूँदन नैन कहत हौ, हरि मूरति जिन माहीँ।
ऐसी कथा कपट की मधुकर, हमतैँ सुनी न जाहीँ।
श्रवन चीरि सिर जटा बँधावहु, ये दुख कौन समाहीँ।
चंदन तजि अँग भस्म बतावत, विरह-अनल अति दाहीँ।
जोगी भ्रमत जाहि लगि भूले, सो तौ है अप माहीँ।
सूरस्याम तैँ न्यारी न पल छिन, ज्यौं घट तैँ परछाहीँ ॥१२५॥
अर्थ-उद्धव, योग के योग्य हम नही है। अबलाएं तत्व ज्ञान क्या जाने तथा
कैसे ध्यान धरें। (तुम) उन्ही नेत्रो को मूंदने को कहते हो जिनमे कृष्ण की मूर्ति है।
मधुकर (ऊधो) ऐसी कपट कथा हमसे सुनी नही जाती। कानो को फाड़कर सिर पर
जटा बँधाते हो यह दुख कहां समाये। विरह की अग्नि से अत्यधिक दग्ध शरीर में
चन्दन को त्यागकर भस्म लगाने को कहते हो। योगी जिसके लिए भ्रमित है वह अपने
ही भीतर है। सूरदास कहते है (गोपियां कहती हैं) कृष्ण से हम क्षण भर भी अलग
नही है जैसे शरीर से परछायी अलग नही है ॥१२५॥
हम तौ नंद-घोष के बासी।
नाम गुपाल जाति कुल गोपक, गोप गुपाल उपासी।
गिरिवर धारी गोधन चारी, वृन्दावन अभिलाषी।
राजा नंद जसोदा रानी, सजल नदी जमुना सी।
मीत हमारे परम मनोहर, कमलनैन सुख रासी।
सूरदास-प्रभु कहाँ कहाँ लौँ, अष्ट महा-सिधि दासी ॥१२६॥
अर्थ-हम नन्द के गांव की रहने वाली हैं। हम गिरिवर धारी, गाय चराने
वाले, वृन्दावन के अभिलाषी ग्वाल जाति के गोपाल कृष्ण की उपासना करने वाली
है। राजा नन्द तथा रानी यशोदा तथा यमुना के समान जल युक्त सुन्दर नदी से (यह
स्थान शोभित है) सुख की राशि कमलवत् नेत्र वाले कृष्ण हमारे परम मनोहर मित्र