सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिनहूँ कैँ घर माखन चोरत, किनहूँ कैँ संग दानी।
किनहूँ कैँ सँग धेनु चरावत, हरि की अकथ कहानी।
किनहूँ कैँ सँग जमुना कैँ तट, वंसी टेरि सुनावत।
सूरदास बलि-वलि चरननि की, यह सुख मोहिं नित भावत ॥१४६॥
अर्थ—मैं ब्रजवासियो की बलि जाता हूँ जिनके साथ गोवर्धनधारी कृष्ण सदा
खेलते है। (वह) किन्ही के साथ माखन चुराते है, किन्हीं के साथ दान (लीला) करते
हैं। किन्ही के साथ (वह कृष्ण) गाय चराते हैं। इस प्रकार कृष्ण की कहानो अकथ-
नीय है। किन्ही के साथ (कृष्ण) यमुना तट पर गाय चराते हैं तथा वंशी की टेर
सुनाते है। सूरदास कहते है (ऊधो कहते है) कृष्ण के चरणों पर बलिहारी हूँ तथा यह
सुख हमे सदैव भाता है ॥१४६॥
हौं इन मोरनि की बलिहारी।
जिनकी सुभग चंद्रिका माथै, धरति गोवरधनधारी।
वलिहारी वा बाँस-वंस की, बंसी सी सुकुमारी।
सदा रहति है कर जु स्याम कैँ, नैकहुँ होति न न्यारी।
वलिहारी वा गुंज-जाति की, उपजी जगत उज्यारी।
सुन्दर हृदय रहत मोहन कैँ, कवहूँ टरत न टारी।
वलिहारी कुल सैल सरित जिहिं, कहत कलिंद-दुलारी।
निसि-दिन कान्ह अंग आलिंगन, आपुनहूँ भई कारी।
वलिहारी वृन्दावन भूमिहिं, सुतौ भाग की सारी।
सूरदास प्रभु नाँगे पाइनि, दिन प्रति गैया चारी ॥१४७॥
अर्थ—मैं इन मोरो की बलिहारी (होता) हूँ जिनकी सुन्दर चन्द्रिका कृष्ण
मस्तक पर धारण करते है। बाँस के कुल की बलिहारी है, जिसकी सुकुमारी वंशी सदा
कृष्ण के हाथो मे रहती है तथा क्षण भर के लिए भी अलग नही होती। उस गुंज जाति
को बलिहारी है जो कि उज्जवल संसार में उत्पन्न हुई है। (वह) कृष्ण के सुन्दर हृदय
पर रहती तथा कभी टाले नही टलती। पर्वत समूह तथा 'सरिता' जिसे यमुना कहते
है, उसकी बलिहारी है। रात-दिन कृष्ण के अंग आलिंगन से स्वयं भी काली हो गयी।
वृन्दावन की भूमि को बलिहारी है क्योकि वह भाग्य की भरी पूरी है, जहां कृष्ण ने
नगे पांव प्रतिदिन गाय चराया ॥१४७॥
हम पर हेत किये रहिवौ।
या ब्रज कीं व्यौहार सखा तुम, हरि सौँ सब कहिवौ।
देखे जात आपनी अँखियनि, या तन को दहिवौ।
तन की बिथा कहा कहौं तुमसौँ, यह हमकौँ सहिवौ।
तब न कियौ प्रहार प्राननि कौ, फिरि फिरि क्यौं चहिवौ।
अब न देह जरि जाइ सूर इनि, नैननि कौ बहिवौ ॥१४८॥