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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 281

उद्धव संदेश ३२१
अर्थ—हम पर स्नेह किए रहना । सखा तुम इस ब्रज के सब व्यवहार को कृष्ण
से कहना । (तुम) अपनी आंख से इस शरीर का जलना देखे जा रहे हो । तुमसे शरीर
व्यथा क्या कहूँ यह हमको सहना होगा । तब तो प्राणों का प्रहार (त्याग) नही
किया, अब बार-बार चाहने से क्या होता है । " सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती है)
अब तो इन नेत्रों के बहते रहने से शरीर भी नही जल जाता ॥१४८॥
स्वामी पहिलौ प्रेम सँभारौ ।
ऊधो जाइ चरन गहि कहियैं, जी तैं हित न उतारौ ।
जो तुम मधुबन राज काज भए, गोकुल हम न अधारौ ।
कमल नयन सो चैन न देखौ, नित उठि गोधन चारौ ।
ये ब्रज लोग मया के सेवक, तिनसौँ क्यौं न बिहारौ ।
सूरदास प्रभु एक बार मिलि, सकल बिरह दुख टारौ ॥१४६॥
अर्थ—स्वामी (कृष्ण) पूर्व प्रेम (की प्रतिष्ठा) सम्हालो । उद्धव, जाकर चरण
पकड़कर कहना कि हृदय से स्नेह दूर न करें । जो तुम मधुबन के राजकार्य को (धारण
कर लिए) (अब) गोकुल में हमारे लिए (कोई) आश्रय नही है । कमल नयन को देखे
बिना चैन नही है, (निवेदन है) नित उठकर गाय चराओ । ये ब्रज के लोग प्रेम के
सेवक हैं उनके साथ विहार क्यों नही करते । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं)
एक बार मिलकर विरह के दुख को टाल दो ॥१४६॥
इतनी बात अलि कहियौ हरि सौं, कब लगि यह मन दुख मैं गारैं ।
पथ जोहत तन कोकिल बरन भइँ, निसि नीँद पिय पियहिँ पुकारैं ।
जा दिन तैं बिछुरे नंद-नंदन, अति दुख दारुन क्यौं निरबारैं ।
सूरदास प्रभु बिनु यह बिपदा, काकौ दरसन देखि बिसारैं ॥१५०॥
अर्थ—अलि (उद्धव) कृष्ण से इतना कहना कि कब तक इस शरीर को विरह मे
गलाऊँ (नष्ट करूँ) । पथ देखते (देखते) शरीर कोयल के रंग का हो गया । पिय-
पिय पुकारते हुए हमें रात मे नीद नही आती । जिस दिन से कृष्ण बिछुड़े तभी से
अत्यन्त दारुण दुख का निवारण नही होता । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती है)
प्रभु के बिना यह विपत्ति किसके दर्शन से दूर करूँ ॥१५०॥
ऊधौ जू, कहियौ तुम हरि सौं, जाइ हमारे हिय कौ दरद ।
दिन नहिं चैन, रैनि नहिं सोवति, पावक भई जुन्हाई सरद ।
जबलैं लै अक्रूर गए हैं, भई बिरह तन बाइ छरद ।
काम प्रबल जाके अति ऊधौ, सोचत भइ जस पीत-हरद ।
सखा प्रबीन निरतर हरि के, तातैं कहति हैं खोलि परद ।
ध्यावतिँ रूप दरस तजि हरि कौ, सूर मूरि बिनु होतिँ मुरद ॥१५१॥
अर्थ—उद्धव, तुम जाकर कृष्ण से हमारे हृदय के दर्द को कहना । दिन मे चैन
नही है तथा रात मे नीद नही आती । शरद की ज्योत्स्ना अग्नि की तरह हो गयी ।
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