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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

उद्धव संदेश २८५
करे तथा बहरी स्त्री पति से यदि परामर्श करे तो उसे उत्तर भी उसी प्रकार मिलेगा
(उसे निराश होना पड़ेगा)। उसकी ये सभी गतियां होंगी जो ग्वालिनो को योग
सिखाता है। (तुम) कृष्ण की सिखायी बात कर रहे हो इसलिए तुम्हे दोष नही है।
(कृष्ण तुमसे) राज्य-कार्य नही चलेगा, अपने शरीर का पालन करो। सूरदास कहते है
(गोपियां कहती हैं) (कृष्ण) मार्ग में सब कुछ भूल जाते, यहां आकर क्या कहते !
अच्छा ही हुआ ख्याल बना रहा नही तो मोह की धारा में वह जाते ॥६१॥
अँखियाँ हरि दरसन की प्यासी।
देखी चाहतिं कमलनैन कौं, निसि-दिन रहतिं उदासी।
आए ऊधौ फिरि गए आँगन, डारि गए गर फाँसी।
केसरि तिलक मोतिनि की माला, वृन्दावन के वासी।
काहू के मन की कोउ जानत, लोगनि के मन हाँसी।
सूरदास-प्रभु तुम्हरे दरस कौं, करवट लैहौँ कासी ॥६२॥
अर्थ—आंखे कृष्ण के दर्शन के लिए प्यासी हैं। कमल नयन (कृष्ण को)
देखना चाहती हैं इसीलिए दिन-रात उदास रहती हैं। हे उद्धव, वृन्दावन के वासो
(श्री कृष्ण) केसर का तिलक लगाए हुए और मोतियों की माला पहने हुए एक दिन
हमारे आंगन मे आए और गले मे फांसी देकर (वियोग की असह्य पीड़ा देकर) चले
गये। किसी के मन को कोई जानता है ? लोगों के मन मे हंसी ही रहती है।, सूरदास
कहते हैं कि (गोपियाँ कहती हैं) कृष्ण तुम्हारे दर्शन के लिए काशी मे करवट (व्रत)
ले लूंगी ॥६२॥
जब तैं सुंदर बदन निहार्यौ।
ता दिन तैं मधुकर मन अटक्यौ, बहुत करी निकरै न निकार्यौ।
मातु, पिता, पति, बंधु, सुजन नहिं, तिनहूँ की कहिबौ सिर धार्यौ।
रही न लोक लाज मुख निरखत, दुसह क्रोध फीकौ करि डार्यौ।
ह्वै बौ होइ सु होइ कर्मबस, अब जी कौ सब सोच निवार्यौ।
दासी भई जु सूरदास प्रभु, भलौ पोच अपनौ न विचार्यौ ॥६३॥
अर्थ—जब से सुन्दर मुख को निहारा, उसी दिन से (हे) भ्रमर मन उलझ
गया, निकालने का बहुत प्रयास किया, लेकिन निकला नही। माता, पिता, भाई
तथा स्वजनों का भी कहना स्वीकार नही किया। कृष्ण का मुख देखते ही लोक-लज्जा
नही रही (नष्ट हो गई), दुःसह क्रोध ने फीका कर डाला। कर्म के अनुसार जो
होना होगा होगा, अब मन की सभी चिन्ताएँ दूर कर दी क्योकि कृष्ण की जो दासी
हो गयी उसने अपना अच्छा-बुरा कुछ भी विचार नही किया ॥६३॥
और सकल अंगनि तैं ऊधौ, अँखियाँ अधिक दुखारी।
अतिहिं पिरातिं सिरातिं न कबहूँ. बहुत जतन करि हारी।
मग जोवत पलकौं नहिं लावतिं, विरह विकल भई भारी।
भरि गइ विरह बयारि दरस बिनु, निसि दिन रहतिं उघारी।

२८६ सूरसागर सार सटीक
ते अलि अब ये ज्ञान सलाकैँ, क्योंँ सहि सकतिँ तिहारी।
सूर सु अंजन आँजि रूप रस, आरति हरहु हमारी ॥६४॥
अर्थ—उद्धव समस्त अगों की अपेक्षा आंखे अधिक दुखी हैं। वे अत्यधिक पीडा
करती है। बहुत यत्न करके हार गयो लेकिन वे शीतल नही होती। रास्ता देखते हुए
पलके भी नही लगती तथा विरह से अत्यधिक व्याकुल हो गई । दर्शन के बिना
उनमें विरह की हवा भर गयी है इसलिए रात-दिन खुली रहती हैं। हे भ्रमर ! (उद्धव)
अब तुम्हारे ज्ञान की शलाका ये कैसे सह सकती है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती
हैं) सुन्दर रूप रस के अंजन को इनमें आंजकर हमारे दुख को दूर करो ॥६४॥
उपमा नैन एक न रही ।
कवि जन कहत कहत सब आये, सुधि कर नाहि कही ।
कहि चकोर बिधु मुख बिनु जीवत, भ्रमर नहीँ उड़ि जात ।
हरि-मुख कमल कोष बिछुरे तैँ, ठाले कत ठहरात ।
ऊधौ बधिक व्याध ह्वै आए, मृग सम क्योंँ न पलात ।
भागि जाहिँ बन सघन स्याम मैँ, जहाँ न कोऊ घात ।
खंजन मन-रंजन न होहिँ ये, कवहूँ नहीँ अकुलात।
पंख पसारि न होत चपल गति, हरि समीप मुकुलात ।
प्रेम न होइ कौन निधि कहियै, झूठँ हीँ तन आड़त ।
सूरदास मीनता कछू इक, जल भरि कबहूँ न छाँड़त ॥६५॥
अर्थ—आंखो की किसी से समानता नही रह गयी । कवि लोग कहते आये
लेकिन (किसी ने) सोच कर नही कहा । (इन्हे) चकोर कहा जाय (किन्तु यह भी
उचित नही है (क्योकि ये) कृष्ण मुख रूपी चन्द्रमा को देखे बिना जीवित रहती हैं ।
भ्रमर भी नही है नही तो उड़ जाते क्योकि कृष्ण रूपी कमल कोश के बिछुड़ जाने
पर व्यर्थ क्यो ठहरे रहते ? उद्धव वधिक तथा व्याध के समान आये हैं, ये मृग के
समान भाग क्यों नही जाते ? श्याम रूपी सघन वन मे भाग जांय, जहाँ कोई भय
नही है। ये मन के अच्छे लगने वाले खंजन पक्षी भी नही हैं क्योकि ये कभी आकुल
नही होते तथा पंख पसार कर ये चंचल गति नही होते, और न ही कृष्ण के आगे
मुकुलित ही होते हैं। किस तरह कहा जाय इन्हे प्रेम नही है, ये व्यर्थ शरीर को रोके
हैं। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) इनमे मछली के गुण कुछ मात्रा मे हैं।
क्योकि जल-भरना कभी नही छोड़ते ॥६५॥
ऊधौ अँखियाँ अति अनुरागी ।
इकटक मग जोवतिं अरु रोवतिं, भूलेहुँ पलक न लागी ।
बिनु पावस पावस करि राखी, देखत हौ बिदमान ।
अब धौं कहा कियौ चाहत हौ, छाँड़ी निरगुन ज्ञान ।

उद्धव संदेश २८७
तुम हौ सखा स्याम सुंदर के, जानत सकल सुभाइ ।
जैसे मिलैं सूर के स्वामी, सोई करहु उपाइ ॥६६॥
अर्थ—उद्धव, आंखें अत्यन्त अनुरक्त हैं। टकटकी लगाकर रास्ता देखती हैं,
भूल से भी पलक नही लगती । पावस ऋतु के बिना ही (आंसू की वर्षा करके) पावस
बना दिया है (तुम) इसे प्रत्यक्ष देख रहे हो । अब क्या करना चाहते हो । निर्गुण ज्ञान
को छोड़ दो । तुम श्याम सुन्दर के मित्र हो, समस्त स्वभाव को जानते हो । सूरदास
कहते हैं (गोपी कहती है) कि कृष्ण जैसे भी मिल जायें, वैसा उपाय करो ॥६६॥
सब खोटे मधुबन के लोग ।
जिनके संग स्याम सुंदर सखि, सीखे हैं अपजोग ।
आए हैं ब्रज के हित ऊधौ, जुवतिनि कौ लै जोग ।
आसन, ध्यान नैन मूंदे सखि, कैसें कढ़ौ बियोग ।
हम अहीरि इतनी का जानैं, कुबिजा सौं संजोग ।
सूर सुवैद कहा लै कीजै, कहैं न जानै रोग ॥६७॥
अर्थ—मधुबन के सभी लोग खोटे (बुरे, दुष्ट) है, सखी जिनके साथ कृष्ण ने बुरा
योग (दुखद योग शास्त्र की बाते) सीखा है। उद्धव ब्रज मे युवतियो को योग लेकर
आए हैं। आसन, ध्यान तथा आंखे बन्द करने से वियोग कैसे दूर हो (निकल) सकता
है। हम अहीर की लड़कियां इतना क्या जाने कि (कृष्ण का) कुबरी से संयोग हुआ
है। सूरदास कहते हैं ( गोपियां कहती हैं ) सुन्दर वैद्य कहां तक (प्रयास करे) बिना
कहे रोग को नही जानता ॥६७॥
मधुबन लोगनि को पतियाइ ।
मुख औरै अंतरगति औरै, पतियाँ लिखि पठवत जु बनाइ ।
ज्यौँ कोइल सुत-काग जियावै, भाव भगति भोजन जु खवाइ ।
कुहूकि कुहूकि आएँ बसत रितु, अंत मिलै अपने कुल जाइ ।
ज्यौँ मधुकुर अंबुज-रस चाख्यौ, बहुरि न बूझे बातैं आइ ।
सूर जहाँ लगि स्याम गात हैं, तिनसौँ कीजै कहा सगाइ ॥६८॥
अर्थ--मधुबन के लोगों पर कौन विश्वास करे ? मुख में (कुछ) और है, हृदय
मे कुछ और तथा पत्र मे कुछ और (बनाकर) लिखकर भेजते है। जैसे कोयल के पुत्र
को भाव, भक्ति तथा भोजन कराके कौआ जिलाता है, किन्तु बसन्त ऋतु आने पर
अन्त मे कुहूक-कुहूक कर जाकर अपने कुल से मिल जाता है। जैसे भ्रमर कमल रस
को चखकर फिर आकर बाते नही पूछता है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं)
जहाँ तक सांवले शरीर वाले हैं, उनसे कैसे सम्बन्ध किया जाय ॥६८॥
आए जोग सिख
परमारथी पुराननि लाने

२८८ सूरसागर सार सटीक
हमरे गति-पति कमल-नयन की, जोग सिखैं ते रांड़े।
कहौ मधुप कैसे समाहिँगे, एक म्यान दो खांड़े।
कहु षट्पद कैसें खैयतु है, हाथिन कै संग गांड़े।
काकी भूख गई बयारि भषि, बिना दूध घृत मांड़े।
काहै कौं झाला लै मिलवत, कौन चोर तुम डांड़े।
सूरदास तीनौ नहिं उपजत, धनिया, धान कुम्हांड़े ॥६६॥
अर्थ—आज पाण्डेय (पंडित) योग सिखाने आये है। (व्यावसायिक) सामग्रियों
से लदे हुए बैल की तरह परामर्श तथा पुराणो को लादे हैं। हमारी गति (सम्बन्ध)
कमल-नेत्र (कृष्ण) पति से है योग सीखने वाली (कुब्जा जैसी कोई अन्य पतिहीन)
वेश्याये ही है। मधुप कहो, एक म्यान मे दो तलवार कैसे समा सकती है। हे भ्रमर,
बताओ, हाथियो के साथ ईख के टुकडे कैसे खाये जा सकते हैं ? दूध-घृत और मीठी
रोटी के बिना किसकी भूख हवा खाकर पूरी हुई है। क्यो अनर्गल बकवास करते हो,
तुम कौन ऐसे चोर हो जिसे (झूठ बोलने के कारण) दण्डित किया जायेगा। सूरदास
कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि धनिया, धान और कुम्हडा तीनों एक समान भूमि
पर नही उत्पन्न होते ॥६६॥
तीसरा संवाद
ज्ञान बिना कहुँवै सुख नाहीँ ।
घट घट व्यापक दारु अगिनि ज्यों, सदा बसै उर माहीँ ।
निरगुन छांड़ि सगुन कौं दौरतिँ, मुधौं कहो किहिं पाहीँ ।
तत्व भजौ जो निकट न छूटै, ज्यौँ तनु तैं परछाई ।
तिहि तैं कहौ कौन सुख पायौ, जिहिं अव लौँ अवगाहीँ ।
सूरदास ऐसैं करि लागत, ज्यौँ कृषि कीन्हे पाहीँ ॥७०॥
अर्थ—ज्ञान के बिना कही भी सुख नही है। काठ मे गुप्त अग्नि की भांति
वह घट-घट मे व्याप्त है तथा हृदय में सदा निवास करता है। निर्गुण को छोड़कर
सगुण की ओर दोडती हो वह तो, कहो किसके पास है। शरीर से निकट परछाईं की
भांति उस निकटतम (आत्मब्रह्म) की उपासना करो, वह (सन्निकट) छूटने (योग्य)
नही है। उनसे क्या-क्या सुख पाया जिनका (जिन कृष्ण का) अब तक अवगाहन
(अनुगमन) किया। सूरदास कहते है कि (उद्धव कहते हैं) यह ऐसे ही लगता है, जैसे
पाहो (जोत से दूर बाहर की हुई खेती) मे की गई खेती ॥७०॥
ऊधौ कही सु फेरि न कहिए।
जौ तुम हमें जिवायौ चाहत, अनबोले ह्वै रहिए।
प्रान हमारे घात होत है, तुम्हरे भाऐं हाँसी।
या जीवन तैं मरन भलो है, करवट लैहैं कासी।

उद्धव संदेश २८६
पूरब प्रीति सँभारि हमारी, तुमकों कहन पठायौ।
हम तौ जरि बरि भस्म भईं तुम, आनि मसान जगायौ।
कै हरि हमकौं आनि मिलावहु, कै लै चलिये साथैं।
सूर स्याम बिनु प्रान तजति हैं, दोष तुम्हारे माथैं ॥७१॥
अर्थ—उद्धव, (जो तुमने) कहा (उसे) फिर न कहिए। यदि हमे जिलाना
चाहते हो तो बिना बोले ही रहिए। हमारे प्राण पर आघात हो रहा है, तुम्हारे लिये
परिहास है। इस जीवन से मरना ही अच्छा है (अतः) काशी मे करवट व्रत ले लेंगो।
हमारी पूर्व प्रीति को सम्हालकर तुम्हे (कृष्ण ने) कहने भेजा है। हम तो जल बलकर
भस्म हो गयी और तुम श्मशान (पर बैठकर मृत व्यक्ति की) सिद्धि कर रहे हो। या
तो कृष्ण को हमसे मिला दीजिए या हमे साथ ले चलिए। सूरदास कहते हैं (गोपियाँ
कहती हैं) कृष्ण के बिना प्राण छोड़ती हूँ, दोष तुम्हारे मस्तक पर है ॥७१॥
घर ही के बाढ़े रावरे।
नाहिन मीत-वियोग बस परे, अनब्यौंगे अलि बाबरे।
बरु मरि जाइ चरैं नहिं तिनुका, सिंह को यहै स्वभाव रे।
श्रवन सुधा-मुरली के पोपे, जोग जहर व खवाब रे।
ऊधौ हमहिं सीख कह दैहौ, हरि बिनु अनत न ठाँव रे।
सूरदास कहा लै कीजै, थाही नदिया नाव रे॥७२॥
अर्थ—आप घर ही में शेखी मारने वाले हैं। मित्रता और वियोग के वश मे
नही पडे हो अतः मूर्ख अलि (उद्धव) अभी अनुभवहीन हो। चाहे मर जाय, लेकिन
तिनका नही चरता, सिंह का यही स्वभाव है। मुरली के अमृत रस से पोषित कानों को
योग का जहर न खिलाओ। उद्धव ! हमे क्या शिक्षा दोगे, कृष्ण के बिना अन्यत्र स्थान
नही है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि थाही हुई नदी (ऐसी नदी पैदल
पार किया जा सकता है) के लिये नाव लेकर क्या किया जाय ॥७२॥
हमकौं हरि की कथा सुनाउ ।
ये आपनी ज्ञान गाथा अलि, मथुरा ही लै जाउ ।
नागरि नारि भलेँ समझैँगी, तेरौ वचन बनाउ।
पा लागौँ ऐसी इन बातनि, उनही जाइ रिझाउ ।
जौ सुचि सखा स्याम सुदर कौ, अरु जिय मैं सति भाउ ।
तौ बारक आतुर इन नैननि, हरि मुख आनि दिखाउ ।
जौ कोउ कोटि करै कैसिहुँ विधि, बल विद्या व्यवसाउ ।
तउ सुनि सूर मीन कौं जल बिनु, नाहिं न और उपाउ ॥७३॥
अर्थ—हमको कृष्ण की कथा सुनाओ। अलि (उद्धव) ये अपनी ज्ञान गाथा
मथुरा ही ले जाओ। सभ्य स्त्रियां तुम्हारे वचन की बनावट (भंगिमा) को अच्छी
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२६० सूरसागर सार सटीक
तरह समझेंगी। (हम) तुम्हारे चरण लगती हैं, इस प्रकार की बातों से उन्हें ही
रिझाओ। यदि कृष्ण के पवित्र मित्र हो तथा मन मे सत्य भाव है तो बेचारे इन
आतुर नेत्रों को कृष्ण का मुख लाकर दिखाओ । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती
हैं) बल, विधि, विधा तथा व्यवसाय से कोई हजार प्रयत्न करे तब भी मछली के
लिए जल के अलावा कोई अन्य उपाय नही है॥७३॥
ऊधौ बानी कौन ढरैगौ, तोसौँ उत्तर कौन करैगौ ।
या पाती के देखत हीं अब, जल सावन कौ नैन ढरैगौ ।
बिरह-अगिनि तन जरत निसा-दिन, करहिँ छुवत तुव जोग जरैगौ ।
नैन हमारे सजल हैं तारे, निरखत ही तेरौ ज्ञान गरैगौ ।
हमहिँ वियोगऽरु सोग स्याम कौ, जोग रोग सीँ कौन अरैगौ ।
दिन दस रहौ जु गोकुल महियाँ, तब तेरौ सब ज्ञान मरैगौ ।
सिंगी सेल्ही भसमऽरु कंथा, कहि अलि काके गरैं परैगौ ।
जे ये लट हरि सुमननि गूँधी, सीस जटा अब कौन धरैगौ ।
जोग सगुन लै जाहु मधुपुरी, ऐसे निरगुन कौन तरैगौ ।
हमहिं ध्यान पल छिन मोहन कौं, बिन दरसन कछुवै न सरैगौ ।
निसि दिन सुमिरन रहत स्याम कौ, जोग अगिनि मैं कौन जरैगौ ।
कैसहूँ प्रेम नेम मोहन कौं, हित चित तैं हमरैं न टरैगौ ।
नित उठि आवत जोग सिखावन, ऐसी बातनि कौन भरैगौ ।
कथा तुम्हारी सुनत न कोऊ, ठाढे ही अब आप ररैगौ ।
बादिहिं रटत उठत अपने जिय, को तोसौँ बेकाज लरैगौ ।
हम अंग अंग स्याम रंग भीनी, को इन बातनि सूर डरैगौ ॥७४॥
अर्थ-उद्धव ! (तुम्हारी) बात से कौन ढलेगा तथा तुमसे उत्तर (प्रत्युत्तर) कौन
करेगा । इस पत्री को देखते ही नेत्र सावन के जल (की तरह पर्याप्त आंसू) बहायेंगे ।
रात-दिन विरह की अग्नि से शरीर जल रहा है, हाथ से छूते ही तुम्हारा योग जल
जायेगा । हमारे नेत्र के तारे जल से भरे हैं, देखते ही तुम्हारा ज्ञान गल जायेगा । हमें
वियोग तथा कृष्ण के विछोह का दुख है, योग रोग मे कौन अडेगा । यदि दस दिन (कुछ
दिन) गोकुल मे रहो तो तुम्हारा सारा ज्ञान मृत हो जायेगा। श्रृङ्गी, योगी की माला,
भस्म, कथरी (गुदड़ी) ये सब किसके गले लगेगा । जिनके इन बालो को कृष्ण ने फूलों
से गूंथा था, वे अब सिर पर जटा कैसे घरेगी। अपने सुन्दर (गुण से भरे) योग को
मथुरा ले जाओ, ऐसे निर्गुण से कौन तरेगा । हमे हमेशा कृष्ण का ध्यान रहता है,
बिना दर्शन के कुछ भी सिद्ध नही होगा । रात दिन कृष्ण का स्मरण रहता है, योग
अग्नि में कौन जलेगा । किसी भी प्रकार से कृष्ण का प्रेम, नियम तथा स्नेह मेरे चित्त
से नही टलेगा । नित्य उठकर योग सिखाने आते हो, ऐसी बातो से कौन प्रसन्न होगा ।
तुम्हारी कथा को कोई सुनता नहीं, खड़े (खडे) आप व्यर्थ बकेंगे। अपने मन से तुम

उद्धव संदेश २८१
व्यर्थ ही रटते हो, बिना कार्य तुमसे कौन लड़ेगा । हम अंग-अंग से कृष्ण रङ्ग मे डूबी
हैं, सूरदास (कहते हैं) तुम्हारी इन बातो से कौन डरेगा ॥७४॥
ऊधौ तुम ब्रज की दसा बिचारौ ।
ता पाछैं यह सिद्ध आपनी, जोग कथा बिस्तारौ ।
जा कारण तुम पठाए माधौ, सो सोचौ जिय माहीं ।
केतिक बीच विरह परमारथ, जानत हौ किधौं नाहीं ।
तुम परवीन चतुर कहियत हौ, सतत निकट रहत हौ ।
जल बूडत अवलंब फेन कौ, फिरि फिर कहा गहत हौ ।
वह मुसकान मनोहर चितवनि, कैसैं उर तैं टारौं ।
जोग जुक्ति अरु मुक्ति परम निधि, वा मुरली पर वारौं ।
जिहिं उर कमल-नयन जु बसत हैं, तिहिं निरगुन क्यौं आवै ।
सूरदास सो भजन बहाऊँ, जाहि दूसरौ भावै ॥७५॥
अर्थ—उद्धव, तुम ब्रज की दशा का विचार करो । उसके बाद अपनी इस
सिद्ध योग कथा का विस्तार करो जिसलिए कृष्ण ने तुमको, भेजा है उसे मन में सोचो ।
विरह और परमार्थ मे कितना अन्तर है शायद उसे तुम नही जानते । तुम प्रवीण
तथा चतुर कहलाते हो, संतो के निकट रहते हो । जल मे डूबते हुए फेन का सहारा
कैसे लिया जा सकता है। वह मुस्कान तथा मनोहर चितवन हृदय से कैसे टालूं।
योग की युक्ति तथा मुक्ति की परम निधि को उस मुरली पर न्योछावर करती हूँ ।
जिसके हृदय मे कमल के समान नेत्र वाले (कृष्ण) बसते हैं उसे निर्गुण क्यो आये ।
सूरदास कहते है (गोपियाँ कहती हैं) उस भजन को बहा दूँ (नष्ट कर दूँ), जिसे
दूसरा अच्छा लगता (जिस भजन मे दूसरे का गुण-गान हो) है ॥७५॥
ऊधौ हरि काहे के अंतरजामी ।
अजहुँ न आइ मिलत इहिं अवसर, अवधि बतावत लामी ।
अपनी चोप आइ उड़ि बैठत, अलि ज्यौं रस के कामी ।
तिनकौ कौन परेखौ कीजै, जे हैं गरुड़ के गामी ।
आई उघरि प्रीति कलई सी, जैसी खाटी आमी ।
सूर इते पर अनखनि मरियत, ऊधौ पीवत मामी ॥७६॥
अर्थ—उद्धव ! कृष्ण किसलिए अन्तर्यामी है । आज भी इस अवसर पर आकर
नही मिलते और लम्बी अवधि बताते है । अपनी इच्छा से रस का लोभी भ्रमर उड़कर
आ बैठता है, वैसे ही कृष्ण का क्या भरोसा किया जाय जो गरुड पर चलने वाले हैं ।
जैसे खट्टी अमिया के संसर्ग से कलई उघर आती है, उसी प्रकार (तुम्हारे संदेश भिजवाने
से) कृष्ण की प्रीति का रङ्ग उद्घाटित हो गया है । सूरदास कहते है कि इतने पर
भी हम दुख से मरती हैं और उद्धव तुम इसे स्वीकार नही करते हो ! ॥७६॥

२८२ सूरसागर सार सटीक
निरगुन कौन देस कौ बासी ?
मधुकर कहि समुझाइ सौंह दै, बूझतिं साँचि न हाँसी ।
को है जनक, कौन है जननी, कौन नारि, को दासी ?
कैसौ बरन भेष है कैसौ, किहिं रस मैं अभिलाषी ?
पावैगौ पुनि कियौ आपनौ, जो रे करैगौ गाँसी ।
सुनत मौन ह्वै रह्यौ बावरौ, सूर सब्रै मति नासी ॥७७॥
अर्थ—निर्गुण किस देश का निवासी है ? मधुकर (उद्धव) सौगंध देकर कहकर
समझाओ, मैं सच्चाई से पूछती हूँ, हंसी नही है । (उसका) कौन पिता है; कौन माता
है; कौन स्त्री है तथा कौन दासी है । कैसा रङ्ग है, कैसा वेष है, किस रस की अभि-
लाषा करता है । यदि छल-छंद करते हो तो अपने किये का फल पाओगे । सूरदास कहते
हैं, बावले से उद्धव सुनते ही चुप रह गये, उनकी सभी बुद्धि नष्ट हो गयी ॥७७॥
कहियौ ठकुराइति हम जानी ।
अब दिन चारि चलहु गोकुल मैं, सेवहु आइ बहुरि रजधानी ।
हमकौँ हौंस बहुत देखन की, संग लियें कुबिजा पटरानी ।
पहुनाई ब्रज कौ दधि माखन, बड़ौ पलँग अरु तातौ पानी ।
तुम जनि डरौ उखल तौ तोरचौ, दाँवरिहू अब भई पुरानी ।
वह बल कहाँ जसोमति कैं कर, देह रावरैं सोच बुढ़ानी ।
सुरभी बाँटि दई ग्व़ालनि कौं, मोर-चन्द्रिका सब्रै उड़ानी ।
सूर नद जू के पालागौँ, देखहु आइ राधिका स्यानी ॥७८॥
अर्थ—(उद्धव उनसे) कहना कि हमने (तुम्हारा) प्रभुत्व जान लिया । अब
(दो) चार दिन के लिए गोकुल चलो फिर आकर राजधानी का सेवन करना । हमको
साथ मे कुब्जा रानी को लिए हुए (कृष्ण को) देखने की बड़ी इच्छो है । ब्रज के दही-
मक्खन का आतिथ्य, बड़ा पलंग और गर्म पानी (तुम्हें प्राप्त होगा) । तुम डरना मत
ऊखल तो तोड़ दिया और उसकी रस्सी भी पुरानी हो गयी है । यशोदा के शरीर में वह
बल कहाँ है और साथ ही, (क्योकि) तुम्हारे सोच मे बुड्ढी भी हो गयी हैं । गायो को
ग्वालो को बाट दिया तथा सभी मोर चन्द्रिकाएँ उड़ गयी । सूरदास कहते हैं (गोपियां
कहती हैं) (कृष्ण आकर) नद के चरण लगे तथा आकर सयानी राधा को देखे ॥७८॥
सुनि सुनि ऊधौ आवति हाँसी ।
कहँ वै ब्रह्मादिक के ठाकुर, कहँा कस की दासी ।
इंद्रादिक की कौन चलावै, संकर करत खवासी ।
निगम आदि बंदीजन जाके, सेष सीस के बासी ।
जाकैँ रमा रहति चरननि तर, कौन गनै 'कुबिजा सी ।
सूरदास-प्रभु दृढ़ करि बाँधे, प्रेम-पुज की पासी ॥७६॥
अर्थ—उद्धव ! सुन सुनकर हंसी आती है । कहां वे (कृष्ण) ब्रह्मादि के स्वामी

उद्धव संदेश २८३
कहाँ वह कंस की दासी (कुब्जा) । इन्द्रादि की कौन चलाये शंकर भी (कृष्ण की)
चाकरी करते हैं । निगम आदि जिसके वन्दीजन हैं तथा शेष के सिर के नीचे निवास
है । लक्ष्मी जिनके चरणों के नीचे रहती हैं, कुब्जा जैसी (स्त्री) की गणना कौन करे ?
सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) प्रेम पुज के पाश में उसने (कृष्ण को) दृढ़ता से
बांध लिया ॥७६॥
काहे कौं गोपीनाथ कहावत ।
जौ मधुकर वै स्याम हमारे, क्यों न इहाँ लौं आवत ।
सपने कौ पहिचानि मानि जिय, हमहिं कलंक लगावत ।
जो पै कृष्ण कूबरी रीझे, सोइ किन बिरद बुलावत ।
ज्यों गजराज काज के औरै, औरै दसन दिखावत ।
ऐसे हम कहिबे सुनिबे कौं, सूर अनत विरमावत ॥८०॥
अर्थ—(कृष्ण) क्यों गोपीनाथ कहलाते हैं ? यदि वे कृष्ण हमारे हैं तो उद्धव
उन्हे यहाँ क्यों नही ले आते । मन मे स्वप्न का परिचय मानकर हमे कलंक लगाते हैं ।
(यदि) कृष्ण कुबरी से रीझ गये हैं, तो उन्हे इस विरद से क्यो बुलाया जाता है ? जैसे
हाथी के दांत काम के लिए और होते हैं, दिखाने के लिए ओर, वैसे ही हम कहने-सुनने
के लिए हैं (कृष्ण तो) अन्यत्र (कुब्जादि के पास) रमते हैं ॥८०॥
साँवरौ सांवरी रैनि कौ जायौ ।
आधी राति कंस के त्रासन, वसुद्यौ गोकुल ल्यायो ।
नंद पिता अरु मातु जसोदा, माखन नही खवायौ ।
हाथ लकुट कामरि काँधे पर, बछरुन साथ डुलायौ ।
कहा भयौ मधुपुरी अवतरे, गोपीनाथ कहायौ ।
ब्रज बधुअनि मिलि साँट कटीली, कपि ज्यों नाच नचायौ ।
अब लौं कहाँ रहे हो ऊधौ, लिखि-लिखि जोग पठायौ ।
सूरदास हम यहै परेखौ, कुवरी हाथ बिकायौ ॥८१॥
अर्थ—श्याम काली रात के पैदा हैं । कंस के भय से आधी रात मे वसुदेव के
द्वारा गोकुल ले आये गये । पिता नन्द तथा माता यशोदा ने माखन तथा मट्ठा खिलाया ।
उन्होंने हाथ मे लाठी तथा कंधे पर कमरी रखकर वछड़ो के साथ घुमाया । मधुपुरी मे
जन्म लेने से तथा गोपीनाथ कहलाने से क्या होता है ? ब्रज की वधुओं ने कँटीली
साँटी लेकर (कृष्ण को) बंदर की तरह नाच नचाया । अब तक उद्धव तुम कहाँ थे
(जो आज कृष्ण ने) लिख-लिखकर योग भेजा है । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती
है) अब तो हमे यही पश्चात्ताप है कि (कृष्ण) कुवरी के हाथ बिक गये ॥८१॥
जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै ।
मूरी के पालनि के बदलैं, को मुक्ताहल दैहै ।

२८४ सूरसागर सार, सटीक
यह ब्यौपार तुम्हारौ ऊधौ, ऐसैं ही धरचौ रैहै।
जिन पै तैं लै आए ऊधौ, तिनहिं के पेट समैहै।
दाख छांड़ि कै कटुक निबौरी, को अपने मुख खैहै।
गुन करि मोहि सूर साँवरैं, को निरगुन निरवैहै॥८२॥
अर्थ—योग की ठगमाया यहां नही बिकेगी। मूली के पत्तो के बदले, मुक्ताहल
कौन देगा। उद्धव ! तुम्हारी यह व्यापार (की सामग्री) ऐसे ही रखी रह जायेगी।
जिनसे लाये हो उन्ही के पेट मे यह समायेगी। द्राक्ष (अंगूर) छोडकर कटु निम्ब फल
कौन अपने मुख मे डालेगा। सूरदास कहते है (गोपियां कहती है) हम कृष्ण के गुणो
को समझ कर उन पर मोहित हुई हैं अतः हम निर्गुण से निर्वाह कैसे कर सकती
हैं? ॥८२॥
मीठी बातनि मैं कहा लीजै।
जौ पै वै हरि होहिं हमारे, करन कहैं सोइ कीजै।
जिन मोहन अपनैं कर काननि, करनफूल पहिराए।
तिन मोहन माटी के मुद्रा, मधुकर हाथ पठाए।
एक दिवस बेनी बृन्दावन, रचि पचि बिबिध बनाइ।
ते अब कहत जटा माथे पर, बदलौ नाम कन्हाइ।
लाइ सुगन्ध बनाइ आभूषण, अरु कीन्ही अरधंग।
सो वै अब कहि-कहि पठवत हैं, भसम चढ़ावन अंग।
हम कहा करैं दूरि नँद-नंदन, तुम जु मधुप मधुपाती।
सूर न होहिं स्याम के मुख की, जाहु न जारहु छाती ॥८३॥
अर्थ—मीठी बातों मे क्या (मजा) लिया जाय। जो यदि वे कृष्ण हमारे (ही)
हैं तो (जो) करने के लिए कहते है वही कीजिये। जिन मोहन ने अपने हाथो से कान
मे कर्णफूल पहनाये, उन्ही मोहन ने उद्धव के हाथ से मिट्टी की मुद्रा भेजी है। जिन्होंने
एक दिन वृन्दावन में विविध प्रकार से रच-रचकर वेणी गूंथी, वही अब मस्तक पर
जटा धारण करने को कहते हैं, (इस तरह) उनका 'कन्हाइ' नाम बदल दो। कृष्ण
सुगंधित (पुष्प) लाकर, आभूषण बनाकर (हमे) अर्धांगिनी (पत्नी) बनाया। वही अब
अंगो पर भस्म चढ़ाने के लिए कह-कह भेजते हैं। हम क्या करे कृष्ण दूर हैं तुम मधु
पर गिरने (पतित होने) वाले भ्रमर ठहरे ! ये बाते कृष्ण के मुख की नही हैं, जाओ
(हमारी) छाती न जलाओ ॥८३॥
ऊधौ तुम हौ निकट के बासी।
यह निरगुन लै तिनहिं सुनावहु, जे मुड़िया बसैं कासी।
मुरलीधरन सकल अंग सुन्दर, रूप सिंधु की रासी।
जोग बटोरे लिए फिरत हौ, ब्रजवासिन की फाँसी।

उद्धव संदेश २६५
राजकुमार भलेँ हम जाने, घर मैँ कंस की दासी।
सूरदास जदुकुलहिँ लजावत, ब्रज मैं होति है हाँसी ॥८४॥
अर्थ--उद्धव, तुम पास के रहने वाले हो। यह निर्गुण लेकर उन्हें सुनाओ जो
सिर मुड़ाये हुए (संन्यासी) काशी में बसते हैं। मुरली धरने वाले (कृष्ण के) समस्त
अंग सुन्दर है (वह) रूप-सिंधु की राशि है। (तुम) योग बटोरकर लिए फिरते हो,
(जो) ब्रजवासियों के लिए फांसी के समान है। राजकुमार (कृष्ण) को हम भली-भाँति
जानती हैं, (तथा उनके) घर में (जो) कंस की दासी (कुबरी) है (वह भी ज्ञात है)।
सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) (कृष्ण) यदुकुल को लज्जित करते हैं, तथा ब्रज
में हँसी होती है ॥८४॥
जा दिन तैँ गोपाल चले ।
ता दिन तैँ ऊधौ या ब्रज के, सब स्वभाव बदले ।
घटे अहार बिहार हरष हित, सुख सोभा गुन गान ।
ओज तेज सब रहित सकल बिधि, आरति असम समान ।
बाढ़ी निसा, बलय आभूषन, उर-कंचुकी उसास ।
नैननि जल अंजन अंचल प्रति, आवन अवधि की आस ।
अब यह दसा प्रगट या तन की, कहियौ जाइ सुनाइ ।
सूरदास प्रभु सो कीजौ जिहिँ, बेगि मिलहिँ अब आइ ॥८५॥
अर्थ—जिस दिन से गोपाल गये, उसी दिन से उद्धव, इस ब्रज का सब स्वभाव
बदल गया। आहार, विहार, हर्ष, स्नेह, सुख, शोभा, गुणगान (सब कुछ) घट गया।
सब तरह से ओज-तेज सबसे रहित हो गये तथा सभी समान रूप से आर्त्त तथा अन्य-
वस्थित है। रात बढ़ गयी, केयूर-कंकण आदि तथा अन्य आभूषण (बढ़े पड गये)।
वक्ष पर कंचुकियां और उसासें बढ़ गई। नेत्रो का जल अंजन को आंचल की ओर (बहा
ले जाता है) केवल आने की अवधि की आशा है। प्रत्यक्ष ही इस शरीर की दशा को
जाकर सुनाकर कहना। सूरदास कहते हैं (गोपियां ऊधो से कहती हैं) कृष्ण से कुछ
ऐसा उपाय कीजिएगा ताकि अब तो शीघ्र आकर मिल जाएं ॥८५॥
हम तौ कान्ह केलि की भूखी।
कहा करैँ लै निगुर्न तुम्हरौ, बिरहिनि बिरह बिदूषी ।
कहियै कहा यहै नहिं जानत, कही जोग किहि जोग ।
पालगौँ तुमहीँ सेवा पुर, बसत बावरे लोग ।
चंदन, अभरन, चीर चारु बर, नेकु आप तन कीजै ।
दंड, कमंडल, भसम, अधारी, तब जुवतिनि कौँ दीजै ।
सूर देखि दृढ़ता गोपिन की, ऊधौ दृढ़ व्रत पायौ ।
करी कृपा जदुनाथ मधुप कौँ, प्रेमहिँ पढ़न पठायौ ॥८६॥

२८६ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—हम तो कृष्ण के (साथ) क्रीडा (करने) की भूखी हैं। (हम) विरहिणियां
विरह से दुखी होकर तुम्हारे निर्गुण को लेकर क्या करे ? क्या कहे हम यही नहीं
जानती; बताइए योग किस योग्य है। तुम्हारे पैर पकडकर कहती हूँ, कि तुम्हारे ही
समान उस पुरी में बावरे लोग बसते है। यदि आप तनिक चन्दन, आभूषण, श्रेष्ठ
सुन्दर चीर अपने शरीर पर धारण करे तो, तब युवतियो को दंड-कमंडल, भस्म तथा
अधारी (काठ के डंडे मे लगे हाथ टेकने की हत्थी) आदि दीजिये । सूरदास कहते है
गोंपियों की दृढ़ता देखकर उद्धव ने दृढ़ व्रत प्राप्त किया। कृष्ण ने कृपा की जो कि
मधुप (उद्धव) को प्रेम (का पाठ) पढ़ने को भेजा ॥८६॥
चौथा संवाद
गोपी सुनहु हरि संदेस ।
कह्यौ पूरन ब्रह्म ध्यावहु, त्रिगुन मिथ्या भेष ।
मैं कहौं सो सत्य मानहु, सगुन डारहु नाखि ।
पंच त्रय-गुन सकल देही, जगत ऐसौ भाषि ।
ज्ञान बिनु नर-मुक्ति नाहीं, यह विषय संसार ।
रूप-रेख, न नाम जल-थल, वरन अवरन सार ।
मातु-पितु कोउ नाहिं नारी, जगत मिथ्या लाइ ।
सूर सुख-दुख नहीं जाकैं, भजौ ताकौं जाइ ॥८७॥
अर्थ—गोपी कृष्ण का संदेश सुनो ! (उन्होने) कहा है, पूर्ण ब्रह्म का ध्यान
करो, त्रिगुणात्मक सृष्टि का रूप मिथ्या है। मैं जो कहता हूँ उसे सत्य मानो, सगुण
को नष्ट कर डालो । समस्त जीव पांच तत्व तथा तीन गुण (से बने है), संसार को
ऐसा कहो । ज्ञान के बिना मनुष्य की इस विषय युक्त संसार से मुक्ति नहीं है । जिसकी
रूप-रेखा नहीं है तथा जल-थल मे न तो नाम है, वर्ण-अवर्ण ही सार तत्व है (उसके)
माता, पिता तथा कोई स्त्री नहीं (वह) संसार को मिथ्या बनाया है । सूरदास कहते है
(ऊधो कहते है) जिसके सुख-दुःख दोनो नहीं है उसे जाकर भजो ॥८७॥
ऐसी बात कहौ जनि ऊधौ ।
कमलनैन की कानि करति हैं, आवत बचन न सूधौ ।
बातनि ही उड़ि जाहिं और ज्यों, त्यौ' नाहीं हम काँची ।
मन, बच, कर्म सोधि एकै मत, नंद-नंदन रंग राँची ।
सो कछु जतन करौ पालागौँ, मिटै हियै की सूल ।
मुरलीधरहिं आनि दिखरावहु, ओढ़े पीत दुकूल ।
इनहीं बातनि भए स्याम तनु, मिलवत हौ गढ़ी छोलि ।
सूर बचन सुनि रह्यौ ठगौसौ, बहुरि न आयौ बोलि ॥८८॥
अर्थ—ऊद्धव, ऐसी बात मत कहो । कमल नेत्र कृष्ण की मर्यादा रखती हूँ, नही
तो मुँह से सीधी बात न निकलती (गाली आती) । बातों से जो उड़ जाते है, वैसे हम

उद्धव संदेश / २६७
कच्चो नहीं हैं । मन-वचन, कर्म से शोधकर (जांचकर) एक मत से कृष्ण के रंग मे
रंगी हैं । पैर पडती हैं, तुम कुछ ऐसा यत्न करो जिससे हृदय का दुःख मिट जाय ।
पीताम्बर ओढ़े हुए कृष्ण को लाकर दिखा दो । इन्ही बातो से (उद्धव तुम) साँवले
शरीर वाले हो गये जो बना संवारकर झूठी बात मिलाते हो । सूरदास कहते हैं उद्धव,
इन वचनो को सुनकर ठगे से रह गये फिर बात नही फूटी ॥८८॥
फिरि फिरि कहा बनावत वात ।
प्रातकाल उठि खेलत ऊधौ, घर-घर माखन खात ।
जिनकी बात कहत तुम हमसौँ, सो है हमसौँ दूरि ।
ह्याँ हैं निकट जसोदा-नंदन, प्रान सजीवन मूरि ।
बालक संग लिएँ दधि चोरत, खात खवावत डोलत ।
सूर सीस नीचौ कत नावत, अब काहैँ नहिं बोलत ॥८६॥
अर्थ—बार-बार क्यो बात बनाते हो । हे उद्धव ! (कृष्ण) (हमारी समझ से
वोही है) जो प्रातःकाल उठकर खेलते है तथा घर-घर माखन खाते है। जिन (निर्गुण)
की बात हमसे कहते हो, वे हमसे बहुत दूर है। यहां तो प्राणो की संजीवनी मूल
यशोदा-नंदन निकट हैं। वे बालको को साथ लिए दही चुराते है, खाते-खिलाते घूमते
हैं। सूरदास कहते है (गोपियां कहती है) उद्धव, सिर नीचे क्यों नमित करते हो, अब
क्यो बोलते नही ? ॥८६॥
फिरि-फिरि कहां सिखावत मौन ।
बचन दुसह लागत अलि तेरे, ज्यों पजरे पर लौन ।
सृंगी, मुद्रा, भस्म, त्वचा-मृग, अरु अवराधन पौन ।
हम अबला अहीरि सठ मधुकर, धरि जानहिं कहि कौन ।
यह मतं जाइ तिनहिं तुम सिखवहु, जिनहिं आजु सब सोहत ।
सूरदास कहूँ सुनी न देखी, पोत सूतरी पोहत ॥६०॥
अर्थ—वार-वार क्यो मौन (साधने की) शिक्षा देते हो । भ्रमर (उद्धव) तुम्हारे
वचन दुसह लगते हैं जैसे जले पर नमक । श्रृंगी, मुद्रा, भस्म, मृग-छाला और प्राणायाम
की आराधना हम अहीर की निर्बुद्ध अबलाये इसे धारण करना क्या जाने, तुम्ही बताओ ।
यह मत तुम उन्हें सिखाओ, जिन्हें आज सब अच्छा लगता है। सूरदास कहते है (गोपियां
कहती है) सुतली से मोती पिरोते हुए, न तो हमने कही सुना है, न देखा है ॥६०॥
ऊधौ हमहिं न जोग सिखैयै ।
जिहिं उपदेस मिलैं हरि हमकोँ, सो ब्रत नेम बतैयै ।
मुक्ति रहौ घर बैठि आपने, निर्गुन सुनि दुख पैयै ।
जिहिं सिर केस कुसुम भरि गूँदे, कैसेँ भस्म चढ़ैयै ।

२६८ सूरसागर सार सटीक
जानि जानि सब मगन भई हैं, आपुन आपु लखैयै ।
सूरदास-प्रभु सुनहु नधौ निधि, बहुरि कि इहिं ब्रज अइयै ॥६१॥
अर्थ—उद्धव ! हमें योग न सिखाइये । जिस उपदेश से कृष्ण हमको मिलें,वही
व्रत तथा नियम बताइए । मुक्ति अपने घर बैठी रहे तथा निर्गुण को सुनकर दुःख पाती
हूँ । जिस सिर पर के बालो को फूलो से गूंथा उसमें भस्म कैसे चढ़ाया जाय । जान-
जानकर सब मग्न हुई है, (कृष्ण) अपने आप को दिखाइए । सूरदास कहते हैं (गोपियां
कहती है) हे नवों निधि (कृष्ण) सुनो, लौटकर फिर क्या इस ब्रज में आइयेगा ॥६१॥
मधुकर स्याम हमारे ईस ।
तिनकौ ध्यान धरैं निसि बासर, औरहिं नवै न सीस ।
जोगिनि जाइ जोग उपदेसहु, जिनके मन दस-बीस ।
एकै चित एकै वह मूरति, तिन चितवतिं दिन तीस ।
काहैं निरगुन ग्यान आपनौ, जित कित डारत खीस ।
सूरदास प्रभु नंद-नँदन बिनु, हमरे को जगदीस ॥६२॥
अर्थ—भ्रमर (उद्धव) ! कृष्ण हमारे ईश्वर हैं । उनका रात-दिन ध्यान करती
हूँ अन्य के आगे सिर नही झुकाती । जाकर योगिनियो को उपदेश दीजिए, जिनके दस-
बीस मन हैं । हमारे एक ही चित्त है वह कृष्ण की (अद्वितीय) एक मूर्ति है, उसे ही
तीसो दिन (सदा) (मन) देखता रहता है । तुम अपने निर्गुण ज्ञान को इधर-उधर
क्यो नष्ट किये देते हो । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण के बिना हमारे
कौन जगदीश हैं ॥६२॥
सतगुरु चरन भजे बिनु विद्या, कह कैसैँ कोउ पावै ।
उपदेसक हरि दूरि रहे तैं, क्यों हमरे मन आवै ।
जो हित कियौ तौ अधिक करहिं किन, आपुन आनि सिखावैं ।
जोग बोझ तैं चलि न सकैं तौ, हमहीं क्यौं न बुलावैं ।
जोग ज्ञान मुनि नगर तजे बरु, सघन गहन बन धावैं ।
आसन मौन नेम मन सजम, बिपिन मध्य बनि आवैं ।
आपुन कहैं करैं कछु औरै, हम सबहिनि डहकावैं ।
सूरदास ऊधौ सौं स्यामा, अति संकेत जनावैं ॥६३॥
अर्थ—सतगुरु के चरण की सेवा के बिना कहो, कोई कैसे विद्या प्राप्त करता है ।
उपदेशक कृष्ण के दूर रहने से उपदेश क्यों कर (उपदेश) मेरे मन मे आवे । जैसा हित
(उन्होने) किया वैसा कौन करेगा, (किन्तु यदि वास्तव मे सीख देना ही हो तो) स्वयं
आकर सिखा दे । योग के बोझ से यदि चल नही सकते तो हमें ही क्यो नही बुला लेते ।
योग के ज्ञान के लिए मुनियो द्वारा नगर छोड़कर वनो मे ध्यान किया जाता है । आसन,
मौन, नियम, मन का संयम वन के बीच ही सिद्ध होते है । आप (कृष्ण) की कथनी-करनी

उद्धव संदेश २९९
में भिन्नता है, वे हम सबको बहका रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि राधा उद्धव को (यह
तथ्य) अत्यधिक संकेत से समझाती है ॥६३॥
ऊधौ मन नहिं हाथ हमारे ।
रथ चढ़ाइ हरि संग गए लै, मधुरा जबहिं सिधारे ।
नातरु कहा जोग हम छाँड़हिं, अति रुचि कै तुम ल्याए ।
हम तौ झँखति स्याम की करनी, मन लै जोग पठाए ।
अजहूँ मन अपनौ हम पावैं, तुम तैं होइ तो होइ ।
सूर सपथ हमैं कोटि तिहारी, कही करैंगी सोइ ॥६४॥
अर्थ—उद्धव ! मन हमारे (हाथ) वश में नहीं है । कृष्ण ने जब मथुरा के लिए
प्रस्थान किया तो रथ पर चढ़ाकर उसे भी (मन को भी) साथ लेते गये, नही तो हम
योग को कैसे छोड़ती, जिसे तुम अत्यधिक चाव से लाये हो । हम तो कृष्ण की करनी
पर झुंझलाती हैं जो कि मन को लेकर बदले में योग भेज दिया । अब भी यदि हम
अपना मन पा जायें, यदि आपसे कुछ सम्भव हो सके तो सूरदास कहते है (गोपियाँ
कहती हैं) हमें तुम्हारी हजारों सोगन्ध है, (उसके बाद) जो कहोगे वही करूँगी ॥६४॥
ऊधौ मन न भए दस बीस ।
एक हुतौ सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस ।
इंद्री सिथिल भई केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस ।
आसा लागि रहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस ।
तुम तौ सखा स्याम सुंदर के, सकल जोग के ईस ।
सूर हमारैं नंद-नँदन बिनु, और नहीं जगदीस ॥६५॥
अर्थ—उद्धव ! हमारे दस बीस (अनेक) मन नहीं हुए । एक था वह कृष्ण के
साथ चला गया, अब (निर्गुण) ईश्वर की आराधना कौन करे । कृष्ण के बिना इन्द्रियां
शिथिल हो गयी, जैसे बिना सिर के देह । आशा से ही शरीर मे श्वास आती जाती है
(सांस लगी है), (आशा में ही) सैकड़ों वर्ष जीवित रहूँगी । तुम तो कृष्ण के मित्र हो
तथा समस्त योग के स्वामी हो । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि कृष्ण के
सिवाय हमारे कोई जगदीश (आराध्य) नहीं हैं ॥६५॥
इहिं उर माखन चोर गड़े ।
अब कैसैं निकसत सुनि ऊधो, तिरछे ह्वै जु अडे ।
जदपि अहीर जसोदा-नंदन, कैसैं जात छँड़े ।
ह्वाँ जादौपति प्रभु कहियत हैं, हमैं न लगत बड़े ।
को बसुदेव देवकी नंदन, को जानै को बूझै ।
सूर नंद-नंदन के देखत, और न कोऊ सूझै ॥६६॥
अर्थ—यहां हृदय में माखन चोर कृष्ण गढ़े हैं । ऊधो, अब वे कैसे निकल सकते
है क्योंकि (वे) तिरछे होकर अड़ गये है । यद्यपि कृष्ण अहीर हैं (फिर भी) कैसे छोड़े

३०० सूरसागर सार सटीक
जा सकते है। वहाँ वे यादव पति स्वामी कहलाते हैं लेकिन हमे वटे नही लगते ।
कौन देवकी वसुदेव ( की बात करे ), फोन जाने तथा कौन समझे । सूरदास कहते हैं
(गोपियाँ कहती है) कृष्ण को देखते और मुझे अन्य कोई नही सूझता ॥६६॥
मन मैं रह्यौ नाहिंन ठौर ।
नंद-नंदन अछत कैसैं, आनियै उर और ।
चलत चितवत दिवस जागत, स्वप्न सोवत राति ।
हृदय तैं वह मदन मूरति, छिन न इत उत जाति ।
कहत कथा अनेक ऊधौ, लोग लोभ दिखाइ ।
कह करौं मन प्रेम पूरन, घट न सिंधु समाइ ।
स्याम गात सरोज आनन, ललित मृदु मुख हास ।
सूर इनकेँ दरस कारन, मरत लोचन प्यास ॥६७॥
अर्थ—मन मे स्थान अवशिष्ट (बचा) नही है । कृष्ण के रहते हुए हृदय मे
किसी और को कैसे लाया जाय ? चलते, देखते, दिन मे जागते, स्वप्न तथा रात मे
सोते हृदय से वह कामदेव तुल्य (कृष्ण की) मूर्ति क्षण भर भी इधर-उधर नही जाती ।
उद्धव ! लोग लालच दिखाकर अनेक कथाये कहते है लेकिन क्या करूँ, मन प्रेम से पूर्ण
है और घडे मे सागर समा (भी) नही सकता । श्याम शरीर, कमलमुख, ललित तथा
मधुर हंसी के दर्शन के लिए नेत्र प्यासे मरते हैं ॥६७॥
मधुकर स्याम हमारे चोर ।
मन हरि लियौ तनक चितवनि मैं, चपल नैन की कोर ।
पकरे हुते हृदय उर अंतर, प्रेम प्रीत कैं जोर ।
गए छँड़ाइ तोरि सब बंधन, दै गए हँसनि अंकोर ।
चौंकि परीं जागत निसि बीती, दूत मिल्यौ इक भौंर ।
सूरदास प्रभु सरबस लुट्यौ, नागर नवल-किसोर ॥६८॥
अर्थ—मधुकर (उद्धव) ! कृष्ण हमारे (मन) को चुराने वाले हैं । चंचल नयनो
के कोर से, क्षणिक निगाह से मेरे मन को चुरा लिया । हृदय के अन्दर प्रेम के बल से
उन्हे पकड रखा था । हँसी का घूस ( अस्थायी सुख ) देकर, सारे वधनों को छुड़ाकर
तथा (बधनो को) तोड़कर मुक्त हो गए । इसके बाद चौक कर जग पडी तथा रात
जागते ही बीत गयी, बाद मे दूर पर एक भ्रमर (उद्धव) मिला । सूरदास कहते हैं
(गोपियाँ कहती हैं) चतुर नवल किशोर कृष्ण सर्वस्व लूट ले गये ॥६८॥
सब दिन एकहिं से नहिं होतैं ।
तब अलि ससि सीरी अब ताती, भयो बिरह जरि मोतैं ।
तब षट मास रास-रस-अंतर, एकहु निमिष न जाने ।
अब औरै गति भई कान्ह बिनु, पल पूरन जुग माने ।

उद्धव संदेश ३०१
कह मति जोग ज्ञान साखा श्रुति, ते किन कहे घनेरे ।
अब कछु और सुहाइ सूर नहिं, सुमिरि स्याम गुनि केरे ॥६६॥
अर्थ- 'सभी दिन एक से नहीं होते । उद्धव ! तब चन्द्रमा शीतल लगता था,
अब विरह-ज्वर में तप्त हो गया है। छह महीना रास रस के बीच (साथ) एक क्षण के
समान भी नहीं लगता था, अब कृष्ण के बिना और ही दशा हो गयी। एक पल पूर्ण
युग के समान मानती हूँ। (इस समय) योग, ज्ञान, वेद की शाखाओं में बुद्धि लगाने से
क्या होता है तथा उनका घना उपदेश भी व्यर्थ है । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती
हैं) कृष्ण के गुणों का स्मरण करने के सिवाय कुछ सुहाता नहीं है ॥६६॥
सखी री स्याम सबै इक सार ।
मीठे बचन सुहाए बोलत, अंतर जारनहार ।
भँवर कुरंग काक अरु कोकिल, कपटिन की चटसार ।
कमलनैन मधुपूरी सिधारे, मिटि गयौ मङ्गलचार ।
सुनहु सखी री दोष न काहू, जो बिधि लिख्यौ लिलार ।
यह करतूति उनहिँ की नाहीं, पूरब बिबिध बिचार ।
कारी घटा देखि बादर की, सोभा देति अपार ।
सूरदास सरिता सर पोषत, चातक करत पुकार ॥१००॥
अर्थ-सखी सभी सांवले (लोग) एक समान हैं। (ऊपर से) सुहाने वाला मीठा
बचन बोलते हैं, किन्तु अंतर में जलाने वाले होते हैं। भँवर, कुरंग (मृग), कौवा और
कोयल, सब कपटियों की पाठशाला (के सदस्य) हैं । कमल के समान आंख वाले कृष्ण
मथुरा चले गये, सारे मंगलाचार मिट गये । सखी सुनो ! किसी का दोष नहीं है जो
भाग्य में लिखा होता है (वही होता है) । यह कार्य उन्हीं का ही नहीं है, विविध प्रकार
से पूर्व निर्धारित विचार है। बादल की काली घटा देखो तो वह अपार शोभा देती
है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि वह घटा नदी तथा तालाब को तो (जल
से) पोषित (पूर्ण) करती है। लेकिन पपीहा पुकार ही करता रह जाता है ॥१००॥
बिलग जनि मानौ ऊधौ कारे ।
वह मथुरा काजर की ओबरि, जे आवैं ते कारे ।
तुम कारे सुफलक सुत कारे, कारे कुटिल सँवारे ।
कमलनैन को कौन चलावैं, सबहिनि मैँ मनियारे ।
मानौ नील माट तैँ काढे, जमुना आइ पखारे ।
तातैँ स्याम भई कालिंदी, सूर स्याम गुन न्यारे ॥१०१॥
अर्थ - उद्धव ! काले लोगों को अलग मत मानो। वह मथुरा काजल की
कोठरी है, (वहाँ) से जो आता है वही काला होता है। तुम काले हो, सुफलक के पुत्र
अक्रूर काले थे तथा कुटिल सांवले (कृष्ण काले हैं)। कमल नेत्र (कृष्ण) के लिए क्या
कहा जाय, सभी में चमकीले हैं (बढकर हैं)। मानों वे (कृष्ण) नील के घडे से काढ़े

३०२ सूरसागर सार सटीक

गये हैं तथा यमुना में आकर (शरीर) को धो लिया, इसी से यमुना काली हो गयी ।
सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण के गुण अनोखे हैं ॥१०१॥
ऊधौ भली भई ब्रज आए ।
विधि कुलाल कीन्हे काँचे घट, ते तुम आनि पकाए ।
रँग दीन्हौ हो कान्ह साँवरैँ, अँग-अँग चित्र बनाए ।
यातैँ गरे न नैन नेहु तैँ, अवधि अटा पर छाए ।
ब्रज करि आँवा जोग ईंधन करि, सुरति आनि सुलगाए ।
फूंक उसास विरह प्रजरनि संग, ध्यान दरस सियराए ।
भरे संपूरन सकल प्रेम-जल, छुवन न काहू पाए ।
राज काज तैँ गए सूर प्रभु, नंद-नंदन कर लाए ॥१०२॥
अर्थ—अच्छा हुआ उद्धव ! ब्रज चले आये । तुमने ब्रह्मा रूपी कुम्हार से बनाये
गये कच्चे (शरीर रूपी) घडे को आकर पका दिया तथा कृष्ण के साँवले रंग मे रंग
दिया तथा अंग-अंग से चित्र (कृष्ण के रूप चित्र) का निर्माण कर दिया । अवधि-रूपी
अटारी के छाये हुए होने के कारण नेत्राश्रुओं के प्रवाह से गलने नही पाते । ब्रज को
आंवा बनाकर, योग का ईंधन लगाकर स्मृति की आग सुलगा दी । विरह की
ज्वालाओं के साथ उच्छ्वास (रूपी) हवा से फूंक दिया तथा दर्शन के ध्यान से शीतल
कर दिया । सब (सम्पूर्ण घट) प्रेम के जल से भर गया है उसे कोई छूने नही पाता ।
सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण राज्य कार्य से चले गये । उद्धव ने कृष्ण
के समान हाथ लगाकर (सँवार) दिया ॥१०२॥
जौ पै हिरदै माँझ हरी ।
तौ कहि इती अवज्ञा उनपै, कैसैं सही परी ।
तब दावानल दहन न पायौ, अब इहिँ विरह जरी ।
तब तैँ निकसि नंद-नंदन हम, सीतल क्यौं न करी ।
दिन प्रति नैन इंद्र जल बरषत, घटत न एक घरी ।
अति ही सीत भीत तन भींजत, गिरि अंचल न धरी ।
कर-कंकन दरपन लै देखी, इहिँ अति अनख मरी ।
क्यौं अब जियहिँ जोग सुनि सूरज,बिरहिनि विरह भरी ॥१०३॥
अर्थ – जो (यदि) कृष्ण हृदय के अन्दर हैं, तो कहो उन पर इतनी अवज्ञा कैसे
सही जाती । तब दावानल से नही जलने पाए, अब विरह से जली (जा रही हूँ), हृदय
से निकल कर कृष्ण ने हमे शीतल क्यो नही किया । दिन प्रति दिन नेत्र रूपी इन्द्र
जल बरसाते हैं, एक भी घडी घटते नही; अत्यधिक शीतलता से भय युक्त शरीर भीगता
है लेकिन (कृष्ण) अचल रूपी पर्वत को धारण नही करते । हाथ के कंकण को दर्पण
लेकर देखा, यह शरीर झुंझलाहट से मृत हो गया है । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती
हैं) विरह से भरी विरहिणियां योग को सुनकर कैसे जीवित रहे ॥१०३॥

उद्धव संदेश ३०३
ऐसौ जोग न हम पै होइ ।
आँखि मूंदि कह पावैं ढूंढे, अँधरे ज्यौं टकटोइ ।
भसम लगावन कहत जु हमको, अंग कुकमा धोइ ।
सुनि कै बचन तुम्हारे ऊधौ, नैना आवत रोइ ।
कुंतल कुटिल मुकुट कुंडल छबि, रही जु चित मैं पोइ ।
सूर प्रभू बिनु प्रान रहें नहिं, कोटि करौ किन कोइ ॥१०४॥
अर्थ-हमसे ऐसा योग नहीं हो सकता। आँख मूंदकर अन्धे की तरह टटोल
कर किसे ढूंढकर प्राप्त करूं। अंग के कुंकुम को धोकर जो हमको भस्म लगाने को
कहते हो तो उद्धव तुम्हारे बचन को सुनकर हमारे नेत्र रो-रोकर रक्तिम हो गए है ।
कृष्ण के घुंघराले बालो की लट तथा मुकुट और कुंडल की शोभा चित्त में पिरोयी है ।
सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण के बिना प्राण नहीं रह सकते चाहे कोई
सैकड़ो उपाय करे ॥१०४॥
हमसौँ उनसौँ कौन सगाई ।
हम अहीर अबला ब्रजवासी, वें जदुपति जदुराई ।
कहा भयौ जु भए जदुनंदन, अब यह पदवी पाई ।
सकुच न आवत घोष बसत की, तजि ब्रज गए पराई ।
ऐसे भए उहाँ जादौपति, गए गोप बिसराई ।
सूरदास यह ब्रज कौ नातौ, भूलि गए बलभाई ॥१०५॥
अर्थ-हमसे और उन (कृष्ण) से क्या सम्बन्ध है ? हम अहीर की लडकी ब्रज-
वासी अबला है वे यदुराय तथा यदुपति है । यदुनंदन होने से क्या होता है, (उन्हें)
यह पदवी (अभी हाल में) मिली है । उन्हे ब्रज छोडकर पराये गांव में बसते संकोच
नहीं आता । ऐसे ही वहाँ यादव पति हो गये और गोपों को भुलाकर चले गये ।
सूरदास कहते हैं कि (गोपियां कहती हैं) इस ब्रज के नाते को कृष्ण भूल गये ॥१०५॥
तौ हम मानैँ बात तुम्हारी ।
अपनौ ब्रह्म दिखावहु ऊधौ, मुकुट पितांबर धारी ।
मनिहैं तब ताकौ सब गोपी, सहि रहिहैं बरु गारी ।
भूत समान बतावत हमकौँ, डारहु स्याम बिसारी ।
जे मुख सदा सुधा अँचवत हैं, ते विष क्यौं अधिकारी ।
सूरदास-प्रभु एक अंग पर, रीझि रहीँ ब्रजनारी ॥१०६॥
अर्थ-उद्धव ! हम तुम्हारी बात तभी मान सकती है, जब मुकुट तथा पीताम्बर
को धारण किये हुये अपने ब्रह्म को दिखा दो । तब सभी गोपियां उसी के सम्बन्ध मे
कहेगी बल्कि यहाँ तक कि गाली भी सह लेगी। भूत की तरह हमे ब्रह्म की बात बताते
हो और कहते हो कि कृष्ण को भूल जाओ । जो मुंह सदा अमृत का पान करता है वह

३०४ सूरसागर सार सटीक
विष का अधिकारी कैसे हो सकता है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण के
एक ही अंग पर ब्रज की स्त्रियां रीझ गयी हैं ॥१०६॥
ऊधौ जोग बिसरि जनि जाहु ।
बाँधौ गाँठि छूटि परिहै कहूँ, फिरि पाछैं पछिताहु ।
ऐसौ बहुत अनूपम मधुकर, मरम न जानै और ।
ब्रज बनितनि के नहीं काम कौ, है तुम्हारेई ठौर ।
जौ हित करि पठयौ मनमोहन, सो हम तुमकौं दीनौं ।
सूरदास ज्यौं विप्र नारियर, करहीं वंदन कीनौ ॥१०७॥
अर्थ- उद्धव ! योग को भूल न जाओ । (योग की) बँधी हुई गांठ कही छूट न
पड़े, जिससे फिर पीछे पछताना पडे । मधुकर (यह योग) ऐसा अनुपम है, जिसका मर्म
कोई और नही जानता । यह ब्रज की स्त्रियों के लायक नही है इसके लिए तुम्हारे
ही पास स्थान है। जिसे स्नेह-पूर्वक कृष्ण ने भेजा है उसे हमने तुमको दे दिया ।
सूरदास कहते है ( गोपियां कहती हैं) ब्राह्मण के द्वारा दिये गये नारियल की तरह
उसकी वन्दना मैंने हाथ से ही कर ली ॥१०७॥
ऊधौ काहे कौं भक्त कहावत ।
जु पै जोग लिखि पठयौ हमकौ, तुम्हहुँ न भस्म चढ़ावत ।
शृङ्गी मुद्रा भस्म अधारी, हमहीं कहा सिखावत ।
कुबिजा अधिक स्याम की प्यारी, ताहिँ नहीं पहिरावत ।
यह तौ हमकौँ तबहिँ न सिखयौ जब तैं गाइ चरावत ।
सूरदास प्रभु कौं कहियौ अब, लिखि-लिखि कहा पठावत ॥१०८॥
अर्थ--ऊधो ! तुम किसलिए (कृष्ण के) भक्त कहलाते हो, जो (कृष्ण ने) हमको
योग लिखकर भेजा है तथा तुम भी भस्म चढाते हो (भस्म चढाने की बात करते हो) ।
शृंगी, मुद्रा, भस्म तथा अधारी हम ही को क्यो सिखाते हो । कुबरी कृष्ण को अधिक
प्यारी है उसे क्यो नही पहनाते हो (सिखाते हो) । यह बात कृष्ण ने हमे उस समय
नही सिखायो जब गाय चराते थे । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कृष्ण से
कहना (अब) लिख-लिखकर (योग) क्यो भेजते है ॥१०८॥
(ऊधो) ना हम बिरहिनि ना तुम दास ।
कहत सुनत घट प्रान रहत हैं, हरि तजि भजहु अकास ।
बिरही मीन मरै जल बिछुरैं, छांड़ि जियन की आस ।
दास भाव नहिँ तजत पपीहा, बरषत मरत पियास ।
पंकज परम कमल मैं विहरत, बिधि कियौ नीर निरास ।
राजिव रवि कौ दोष न मानत, ससि सौं सहज उदास ।
प्रगट प्रीति दसरथ प्रतिपाली, प्रीतम कैं बनवास ।
सूर स्याम सौं दृढ़ ब्रत राख्यौ, मेटि जगत उपहास ॥१०६॥