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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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उद्धव संदेश २८६
पूरब प्रीति सँभारि हमारी, तुमकों कहन पठायौ।
हम तौ जरि बरि भस्म भईं तुम, आनि मसान जगायौ।
कै हरि हमकौं आनि मिलावहु, कै लै चलिये साथैं।
सूर स्याम बिनु प्रान तजति हैं, दोष तुम्हारे माथैं ॥७१॥
अर्थ—उद्धव, (जो तुमने) कहा (उसे) फिर न कहिए। यदि हमे जिलाना
चाहते हो तो बिना बोले ही रहिए। हमारे प्राण पर आघात हो रहा है, तुम्हारे लिये
परिहास है। इस जीवन से मरना ही अच्छा है (अतः) काशी मे करवट व्रत ले लेंगो।
हमारी पूर्व प्रीति को सम्हालकर तुम्हे (कृष्ण ने) कहने भेजा है। हम तो जल बलकर
भस्म हो गयी और तुम श्मशान (पर बैठकर मृत व्यक्ति की) सिद्धि कर रहे हो। या
तो कृष्ण को हमसे मिला दीजिए या हमे साथ ले चलिए। सूरदास कहते हैं (गोपियाँ
कहती हैं) कृष्ण के बिना प्राण छोड़ती हूँ, दोष तुम्हारे मस्तक पर है ॥७१॥
घर ही के बाढ़े रावरे।
नाहिन मीत-वियोग बस परे, अनब्यौंगे अलि बाबरे।
बरु मरि जाइ चरैं नहिं तिनुका, सिंह को यहै स्वभाव रे।
श्रवन सुधा-मुरली के पोपे, जोग जहर व खवाब रे।
ऊधौ हमहिं सीख कह दैहौ, हरि बिनु अनत न ठाँव रे।
सूरदास कहा लै कीजै, थाही नदिया नाव रे॥७२॥
अर्थ—आप घर ही में शेखी मारने वाले हैं। मित्रता और वियोग के वश मे
नही पडे हो अतः मूर्ख अलि (उद्धव) अभी अनुभवहीन हो। चाहे मर जाय, लेकिन
तिनका नही चरता, सिंह का यही स्वभाव है। मुरली के अमृत रस से पोषित कानों को
योग का जहर न खिलाओ। उद्धव ! हमे क्या शिक्षा दोगे, कृष्ण के बिना अन्यत्र स्थान
नही है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) कि थाही हुई नदी (ऐसी नदी पैदल
पार किया जा सकता है) के लिये नाव लेकर क्या किया जाय ॥७२॥
हमकौं हरि की कथा सुनाउ ।
ये आपनी ज्ञान गाथा अलि, मथुरा ही लै जाउ ।
नागरि नारि भलेँ समझैँगी, तेरौ वचन बनाउ।
पा लागौँ ऐसी इन बातनि, उनही जाइ रिझाउ ।
जौ सुचि सखा स्याम सुदर कौ, अरु जिय मैं सति भाउ ।
तौ बारक आतुर इन नैननि, हरि मुख आनि दिखाउ ।
जौ कोउ कोटि करै कैसिहुँ विधि, बल विद्या व्यवसाउ ।
तउ सुनि सूर मीन कौं जल बिनु, नाहिं न और उपाउ ॥७३॥
अर्थ—हमको कृष्ण की कथा सुनाओ। अलि (उद्धव) ये अपनी ज्ञान गाथा
मथुरा ही ले जाओ। सभ्य स्त्रियां तुम्हारे वचन की बनावट (भंगिमा) को अच्छी
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