सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
राधाकृष्ण १८१
अर्थ—वृषभानु की दुलारी (राधा) परम चतुर है। कृष्ण से मिलने के लिए
उसने यह परम पवित्र युक्ति (चाल) रची। उधर कृष्ण को सुख दिया, इधर माता
को हर्ष दिया। हार ने इतना उपकार किया, इसलिए उसे कभी वक्षस्थल से नही
टालती। जो शिव, सनक तथा सनातन को दुर्लभ हैं उन्हे राधा ने वश में कर लिया
है। सूरदास कहते हैं कि प्रभु की कृपा अगोचर है तथा वेदो से भी न्यारी है ॥६०॥
प्रीति के बस्य ये हैं मुरारी।
प्रीति के बस्य नटवर सुभेषहिँ धरचौ, प्रीति बस करज गिरिराज
धारी।
प्रीति के बस्य ब्रज भए माखन चोर, प्रीति बस्य दाँवरि बँधाई।
प्रीति के बस्य गोपी-रमन नाम प्रिय, प्रीति बस्य जमल तरु
मोच्छदाई।
प्रीति-बस नंद-बंधन बरुन-गृह गए, प्रीति के वस्य वन-धाम कामी।
प्रीति के बस्य प्रभु सूर त्रिभुवन विदित, प्रीति बस सदा
राधिका स्वामी ॥६१॥
अर्थ—कृष्ण प्रेम के वश मे हैं। उन्होंने प्रेम के वश मे होकर नटवर वेष धारण
किया, प्रेम के वश होकर गोवर्द्धन पर्वत को धारण किया है। प्रेम के वश मे होकर
ब्रज मे माखन चोर हुए। प्रेम के वश होकर अपने को रस्सी में बँधाया। प्रेम के वश
मे होने के कारण गोपी-रमण नाम प्रिय हो गया है। प्रेम के वश मे होकर यमलार्जुन
को मोक्ष दिया। प्रीति के वश में होकर नन्द के बन्धन तथा वरुण के घर गये। प्रीति
वश वन ओर घर मे कामी बने। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण प्रेम के वश में हैं, यह तीन
लोक मे प्रसिद्ध है। राधिका के स्वामी सदा प्रेम के वश मे हैं ॥६१॥
भ्रम
आजु सखी अरुनोदय मेरे, नैननि कौं धोख भयौ।
की हरि आजु पंथ गहिं गवने, स्याम जलद की उनयौ।
की वग पाँति भाँति, उर पर की, मुकुत-माल बहु मोल।
कीधौँ मोर मुदित ह्वै नाचत, की बरह-मुकुट की डोल।
की घनघोर गम्भीर प्रात उठि, की ग्वालनि की टेरनि।
की दामिनी कौंधति चहुँ दिसि, की सुभग पीत पट फेरनि।
की बनमाल लाल-उर राजति, की, सुरपति-धनु चारु।
सूरदास-प्रभु-रस भरि उमंगी, राधा कहति बिचारु ॥६२॥
अर्थ—सखी आज सूर्य निकलने के समय मेरी आंखो को धोखा हो गया। मेरे
इस रास्ते से कृष्ण गुजरे कि श्याम बादल झुक गये। बगूले की पंक्ति की तरह कि वक्ष
पर बहुमूल्य मोती की माला है। पता नही प्रसन्न होकर मोर नाचते हैं कि मोर मुकुट
डोल रहा है। न जाने प्रातः घनघोर बादल की गरज उठती है कि ग्वालो की पुकार
१८२ सूरसागर सार सटीक
है। चारों ओर विजली कौंधती है कि सुन्दर पीताम्बर फहर रहा है। हृदय पर सुन्दर
वनमाला विराज रही है कि सुन्दर इन्द्र धनुष हैं। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के रस से
उमँगकर राधा विचार कर कहती है ॥६२॥
राधिका हृदय तै धोख टारौ।
नंद के लाल देखे प्रात-काल तैं, मेघ नहिं स्याम तनु-छवि बिचारी।
इंद्र-धनु नहीं बन दाम बहु सुमन के, नहीं बग पाँति बर मोति माला।
सिखी वह नहीं सिर मुकुट सीखंड पछ, तड़ित नहिं पीत पट-छवि
रसाला।
मंद गरजन नहीं चरन नूपुर-सबद, भोरही आजु हरि गबन कीन्हौ।
सूर-प्रभु भामिनी भवन करि गवन, मन रवन दुख के दवन जानि
लीन्हौ ॥६३॥
अर्थ—राधा हृदय से धोखा मिटा दो। तुमने प्रातःकाल कृष्ण को देखा था,
मेघ को नही। कृष्ण के शरीर की शोभा के विषय मे विचार तो करो। इन्द्र का
धनुष नही है बहुत से फूलो वाली वनमाला है। बगुलों की पंक्ति नही है बल्कि श्रेष्ठ
मोती की माला है। वह मोर नही बल्कि सिर पर मोर के पंखों का मुकुट है। बिजली
नही पीताम्बर की सुन्दर छवि है। मन्द गरजन नही चरण के नूपुरो का शब्द है।
आज प्रातः ही कृष्ण ने गमन किया। सूरदास कहते है कि भामिनी अपने घर जाओ,
तुमने मन को आकर्षित करने वाले, दुःख को दमन करने वाले कृष्ण को जान लिया
है ॥६३॥
एक निष्ठा
धन्य धन्य वृषभानु-कुमारी।
धनि माता, धनि पिता तिहारे, तोसी जाई बारी।
धन्य दिवस, धनि निसा तबहिं की, धन्य घरी, धनि जाम।
धन्य कान्ह तेरैं बस जे हैं, धनि कीन्हे बस स्याम।
धनि मति, धनि रति, धनि तेरी हित, धन्य भक्ति, धनि भाउ।
सूर स्याम पति धन्य नारि तू, धनि-धनि एक सुभाउ ॥६४॥
अर्थ—वृषभानु की बेटी (राधा) धन्य-धन्य है। तुम्हारे माता और पिता धन्य
है जिन्होने तुम्हारी जैसी बेटी पैदा की। वह दिन धन्य है, तब की रात धन्य है, घड़ी
पहर (सब) धन्य है (जब तेरा जन्म हुआ)। कृष्ण धन्य हैं जो तुम्हारे वश मे हैं। तुम
धन्य हो जिसने कि कृष्ण को वश मे किया है। तेरी बुद्धि, रति, हित, भक्ति भाव सब
धन्य हैं। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण पति तू नारी (दोनो) धन्य हो। एक स्वभाव
वाले (तुम दोनों) धन्य हो ॥६४॥
तोहिं स्याम हम कहाँ दिखावैं।
तुमतैं न्यारे रहत कहूँ न वै, नैकुं नहीं बिसरावैं।
राधाकृष्ण १८३
एक जीव देही द्वै राची, यह कहि कहि जु सुनावैं ।
उनकी पटतर तुमकौं दीजैं, तुम पटतर वै पावैं ।
अमृत कहा अमृत-गुन प्रगटै, सो हम कहा बतावैं ।
सूरदास गूंगे कौ गुर ज्यौं, बूझति कहा बुझावैं ॥६५॥
अर्थ—हम तुमको कृष्ण कहां दिखावें । वे कहीं भी तुमसे अलग नही रहते और
(तुम्हें) तनिक भी नही भुलाते । एक जीव तथा दो शरीर की रचना की है, यह कह-
कह कर सुनाते है । उनकी उपमा तुमको दी जाय तथा तुम्हारी उपमा उनको प्राप्त
हो । अमृत कैसे अमृत गुण प्रकट करता है, उसे हम कैसे बताये । सूरदास कहते हैं कि
गूंगे के गुड़ के समान पूछने पर कैसे समझाया जाय ॥६५॥
सुनि राधा यह कहा बिचारै ।
वै तेरैं तू उनकैं रंग, अपनो मुख क्यौं न निहारै ।
जो देखौ तौ छांह आपनी, स्याम-ह्रदै ह्याँ छाया ।
ऐसी दशा नंद-नंदन की, तुम दोउ निर्मल काया ।
नीलांबर स्यामल तनु की छबि, तुम छवि पीत सुबास ।
घन-भीतर दामिनी प्रकाशित, दामिनि घन-चहुँ पास ।
सुन री सखी बिलख कहौं तोसौँ, चाहति हरि कौ रूप ।
सूर सुनहु तुम दोउ सम जोरी, एक स्वरूप अनूप ॥६६॥
अर्थ —सुनो राधा यह विचार क्यों करती हो । वह तुम्हारे रंग मे तुम उनके
रंग में (रंग गयी हो), अपने मुख को क्यों नही निहारती हो । जो देखो तो अपनी
छाया (देखो), कृष्ण का हृदय यहाँ छाया है। ऐसी दशा श्रीकृष्ण की है। तुम दोनों
निर्मल शरीर (वाले) हो । नीले आकाश के समान श्यामल कृष्ण का शरीर है और
तुम्हारी पीली सुगन्धित छवि है । बादल के भीतर (जैसे) बिजली प्रकाशित हो या
बिजली वादल के चारों तरफ ( छायी ) हो । सुनो री सखी ताड़ करके तुमसे बात
कहती हूँ (तुम) कृष्ण के रूप को चाहती हो । सूरदास कहते है कि (सखी कहती है)
तुम दोनों समान जोड़ी तथा एक अनुपम स्वरूप वाले हो ॥६६॥
पिय तेरैं बस यौं री माई ।
ज्यौँ संगहिं संग छाँह देह-वस, प्रेम कह्यौ नहिँ जाई ।
ज्यौँ चकोर बस सरद चंद्र कैं, चक्रवात बस-भान ।
जैसेँ मधुकर कोमल कोस-बस, त्यौँ बस स्याम सुजान ।
ज्यौँ चातक बस स्वाँति बूँद कैँ, तन कैँ बस ज्यौँ जीय ।
सूरदास-प्रभु अति बस तेरैँ, समुझ देखि धौँ हीय ॥६७॥
अर्थ—सखी ! प्रिय कृष्ण यों तुम्हारे वश मे हैं जैसे साथ-ही-साथ रहने वाली
छाया शरीर के वश में रहती है । ( तुम दोनों का ) प्रेम कहा नही जा सकता ।
(अकथनीय है) । जैसे चकोर शरद ऋतु के चन्द्रमा के वश मे रहता है, चक्रवाक सूर्य
के वश में है और भ्रमर कमल के फूलों (बंधी हुई कली) के वश में रहता है वैसे ही
कृष्ण (तुम्हारे) वश मे हैं। जैसे चातक स्वांती नक्षत्र के (बादलो के) बूंद के वश मे
रहता है तथा शरीर के वश मे प्राण है। सूरदास कहते हैं कि (वैसे) कृष्ण तुम्हारे
अत्यधिक वश मे है, निश्चय ही यह हृदय को देखकर समझ लो ॥६७॥
लघुमान लीला
मैँ अपनैँ जिय गर्व कियौ।
वै अंतरजामी सब जानत, देखत ही उन चरचि लियौ।
कासौँ कहाँ मिलावै को अब, नैँकु न धीरज धरत जियौ।
वै तौ निठुर भये या बुधि सौँ, अहंकार फल यहै दियौ।
तब आपुन कौँ निठुर कराबति, प्रीति सुमिरि भरि लेति हियौ।
सूर स्याम प्रभु वै बहु नायक, मो सौँ उनकैँ कोटि तियौ ॥६८॥
अर्थ—मैने अपने मन मे गर्व किया। वे अन्तर्यामी सब जानते हैं, देखते ही
उन्होंने अनुमान कर लिया। किससे कहूँ अब कौन मिलाये, हृदय तनिक भी धैर्य नही
धरता। वे तो इस बुद्धि से निष्ठुर हो गये और अहंकार का यही फल दिया। तब
अपने को निष्ठुर कहती हूँ, जब उनका प्रेम से स्मरण करके हृदय भर आता है।
सूरदास कहते है (राधा कहती है) वे बहुत सी स्त्रियो के नायक हैं हमारे समान
उनकी हजारो स्त्रियां हैं ॥६८॥
महा बिरह-वन माँझ परी।
चकित भई ज्यौँ चित्र-पूतरी, हरि मारग बिसरी।
सँग बटपार गर्व जब देख्यौ, साथी छोड़ि पराने।
स्याम-सहर-अँग-अंग-माधुरी, तहँ वै जाइ लुकाने।
यह बन माँझ अकेली व्याकुल, सम्पति गर्व छँड़ायौ।
सूर स्याम-सुधि टरति न उर तैँ, यह मनु जीव बचायौ ॥६६॥
अर्थ—(मैं) महान विरह वन के बीच पड गयी। चित्र की पुतली के समान (मैं)
चकित हो गयी और कृष्ण रूपी मार्ग भूल गयी। संग मे वटपार रूपी गर्व को देखकर
साथी छोडकर भाग गये। श्याम रूपी शहर की अग-अंग की मधुरिमा मे वे जाकर छिप
गये। इस वन मे अकेली व्याकुल हूँ। गर्व ने सम्पत्ति को छीन लिया। सूरदास कहते है
कि (राधा कहती है) हृदय से स्मृति टलती नही, मानो इसी ने जीव बचा दिया ॥६६॥
राधा-भवन सखी मिलि आईँ।
अति ब्याकुल सुधि-बुधि कछु नाहीँ, देह दसा बिसराईँ।
बाँह गही तिहिँ बूझन लागीँ, कहा भयौ री माई।
ऐसी बिबस भई तू काहैँ, कहौ न हमहिँ सुनाई।
कालिहिँ और बरन तोहिँ देखी, आजु गई मुरझाई।
सूर स्याम देखे की बहुरौ, उनहिँ ठगौरी लायौ ॥१००॥
राधाकृष्ण १८५
अर्थ-राधा के घर सखियां मिलने आईं । (राधा) अत्यन्त व्याकुल है तथा
उसके होश-हवास कुछ नहीं है, (यहाँ तक कि) अपने शरीर की दशा (भी) भूल गयी
है । (सखियां) बांह पकड़ कर पूछने लगी—सखी तुम्हें क्या हुआ ? ऐसी विवश तुम
क्यों हो गयी हो ? मुझे सुनाकर कहो ! कल तेरा और ही रंग देखा था, आज (क्यो)
मुरझा गयी हो ? सूरदास कहते हैं कि (सखियां कहती है) क्या कृष्ण को देखा है, कि
फिर उन्होने जादू कर दिया ॥१००॥
अब मैं तोसों कहा दुराऊँ ।
अपनी कथा, स्याम की करनी, तो आगैं कहि प्रगट सुनाऊँ ।
मैं बैठी ही भवन आपनैं, आपुन द्वार दियौ दरसाऊँ ।
जानि लई मेरे जिय की उन, गर्व-प्रहारन उनकौँ नाऊँ ।
तबहीं तैं व्याकुल भई डोलति, चित्त न रहै कितनौ समुझाऊँ ।
सुनहु सूर ग्रह वन भयो मोकौँ, अब कैसे हरि दरसन पाऊँ ।.१०१॥
अर्थ - अब मैं तुमसे क्या छिपाऊँ । अपनी कथा और कृष्ण की करतूत तुम्हारे
आगे प्रत्यक्ष सुनाती हूँ। मैं अपने घर बैठी थी, वे स्वयं द्वार पर दिखाई दिये। उन्होने
मेरे मन की बात जान ली । 'गर्व के प्रहारक' उनका नाम (ही) है। तभी से व्याकुल
होकर फिरती हूँ, कितना ही मन को समझाती हूँ वह नही मानता (चैन नही मिलता) ।
सूरदास कहते हैं कि (राधा सखियो से कहती है) घर मेरे लिए वन हो गया है अब
कैसे कृष्ण का दर्शन प्राप्त करूँ ॥१०१॥
हमरी सुरति बिसारी बनवारी, हम सरबस दै हारी ।
पै न भए अपने सनेह बस, सपनेहूँ गिरधारी ।
वै मोहन मधुकर समान सखि, अनबन बेली-चारी ।
व्याकुल विरह व्यापी दिन-दिन हम, नीर जु नैननि ढारी ।
हम तन मन दै हाथ बिकानी, वै अति निठुर मुरारी ।
सूर स्याम बहु रवनि रमन, हम इक ब्रत, मदन-प्रजारी ॥१०२॥
अर्थ-हमारी स्मृति कृष्ण ने भुला दी । मैं सर्वस्व देकर हार गयी । तब भी
कृष्ण स्वप्न में भी अपने स्नेह के वश नहीं हुए । सखी वह मोहन भ्रमर के समान हैं
जो असंख्य लताओं पर विचरण करने वाले हैं। व्याकुल हो मैं दिन-प्रति-दिन विरह
से व्याप्त हो रही हूँ और आंखो से आँसू ढुलकाती हूँ। मैं तन-मन (उनके) हाथ देकर
बिक गयी । वे कृष्ण अत्यधिक निष्ठुर हैं। सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) कि वह
बहुत-सी स्त्रियो के साथ रमण करने वाले हैं, मैं एकव्रता काम की अग्नि से जली हुई
हूँ ॥१०२॥
मैं अपनी सी बहुत करी री ।
मोसों कहा कहति तू माई, मन कैं सँग मैं बहुत लरी री ।
राखौं हटकि, उतहिं कौ धावत, बाकी ऐसियै परनि परी री ।
मोसौँ वैर करै रति उनसौँ, मोकौँ राख्यो द्वार खरी री ।
अजहूँ मान करौं, मन पाऊँ, यह कहि इत-उत चितै डरी री।
सुनहु सूर पाँचनि मत एकै, मैं री मोही रही परी री ॥१०३॥
अर्थ—मैंने अपना सा बहुत (कुछ) किया। सखी मुझसे तू क्या कहती है, मन
के साथ मैंने बहुत लड़ाई लड़ी। हठ करके उसे रोकती हूँ, वह उधर ही दौड़ता है फिर
उसकी ऐसी आदत पड़ गयी है। मुझसे शत्रुता करता है उनसे प्रेम करता है, मुझे द्वार
पर खड़ी रखता है। अब भी मान करूँ यदि मन को पा जाऊँ। यह कहकर इधर-
उधर देखकर भयभीत हुई। सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) (सखियों) सुनो ये पाँचों
इन्द्रियाँ एक ही विचार रखती हैं। मैं ही मोह मे पड़ कर खड़ी रह गयी अथवा मोह
से आविर्भूत होकर पड़ी रहती हूँ ॥१०३॥
भूलि नहीं अब मान करौँ री।
जातैं होइ अकाज आपनौ, कहैं वृथा मरौँ री।
ऐसे तन मैं गर्व न राखौँ, चिंतामनि बिसरौँ री।
ऐसी बात कहै जो कोऊ, ताकै संग लरौँ री।
आरजपंथ चलैं कह सरिहै, स्यामहिं संग फिरौँ री।
सूर स्याम जउ आपु, स्वारथी, दरसन नैन भरौँ री ॥१०४॥
अर्थ—अब भूल कर भी मान नहीं करूँगी। जिससे अपना अनिष्ट होता है,
क्यो व्यर्थ मरूँ। ऐसे शरीर मे गर्व नही रखूँगी, (न तो) चिंतामणि को भूलूँगी। ऐसी
बात जो कोई करेगा उसके साथ लड़ूँगी। आर्य पथ (श्रेष्ठ मार्ग) पर चलने से क्या
कल्याण होगा ? (इससे) कृष्ण के साथ घूमूँगी। सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) कि
कृष्ण भले ही स्वयं स्वार्थी हों किन्तु उनका दर्शन करके नेत्रो को (रस से) भर
लूंगी ॥१०४॥
माई मेरौ मन पिय सौं यौँ लाग्यौ, ज्यौँ संग लागी छाँहि।
मेरौ मन पिय जीव वसत हैं, पिय जिय मो मैं नाहि।
ज्यौँ चकोर चंदा कौं निरखत, इत-उत दृष्टि न जाइ।
सूर स्याम बिनु छिन-छिन जुग सम, क्योँ करि रैन विहाइ ॥१०५॥
अर्थ—सखी, मेरा मन प्रिय (कृष्ण) से ऐसा लगा है जैसे साथ में छाया लगी
रहती है। मेरा मन प्रिय के प्राण में बसता है, लेकिन प्रियतम का जीव मुझमे नही
(बसता है)। जैसे चकोर चन्द्रमा को देखता है, उसकी इधर-उधर दृष्टि नही जाती।
सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) कृष्ण के बिना क्षण-क्षण युग के समान लगता
है फिर (वियोग) की रात कैसे बीते ॥१०५॥
अद्भुत एक अनूपम बाग।
जुगल कमल पर गज बर क्रीड़त, तापर सिंह करत अनुराग।
हरि पर सरवर, सर पर गिरिवर, गिर पर फूले कंज-पराग।
रुचिर कपोत बसत ता ऊपर, ता ऊपर अमृत फल लाग।
राधाकृष्ण १८७
फल पर पुहुप, पुहुप पर पल्लव, ता पर सुक, पिक, मृद मद काग ।
खंजन, धनुष, चंद्रमा ऊपर, ता ऊपर एक मनिधर नाग ।
अंग-अंग प्रति और-और छवि, उपमा ताकौँ करत न त्याग ।
सूरदास प्रभु पियौ सुधा-रस, मानौ अधरनिं के बड़ भाग ॥१७६॥
अर्थ - एक अद्भुत तथा अनुपम बाग है । दो कमलो (चरणों) के ऊपर श्रेष्ठ-
हाथी (जांघ) खेलते हैं। उस पर सिंह (कमर) अनुराग करता है। सिंह पर सरोवर
(नाभि प्रदेश) है, सरोवर के ऊपर पहाड (पयोधर) हैं, उस पर पराग युक्त कमल
(कंचुकी के बेल-बूटे) फूले हैं। उसके ऊपर रुचिकर कबूतर (गला) बसता है, उसमे
अमृत का फल (ठुड्डी) लगा है। फल के ऊपर फूल (तिल) है, फूल के ऊपर पल्लव
(अधर) हैं। उस पर तोता (नाक), कोयल (वाणी), मृग (कस्तूरी वेदी), कौआ
(वालो के पट्टे) (शोभित) है। खंजन (नेत्र), धनुष (भौंह), चन्द्रमा (मस्तक) उसके
ऊपर एक मणिधर सर्प (मणि जटित आभूषण सहित वेणी) है। प्रति अंग में अधिक-
से-अधिक शोभा है, उपमा उनका त्याग नही करती । सूरदास कहते है कि हे कृष्ण,
अमृत रस पान करो, मानो (तुम्हारे) ओठो का बड़ा सौभाग्य है ॥१७६॥
भुज भरि लई हिरदय लाइ ।
बिरह व्याकुल देखि बाला, नैन दोउ भरि आइ ।
रैनि बासर बीच मैँ, दोऊ गए मुरझाइ ।
मनौ वृच्छ तमाल बेली, कनक सुधा सिंचाइ ।
हरष डहडह मुसुक फूलै, प्रेम फलनि लगाइ ।
काम मुरझनि बेली तरु की, तुरत ही बिसराइ ।
देखि ललिता मिलन वह, आनंद उर न समाइ ।
सूर के प्रभु स्याम स्यामा, त्रिबिध ताप नसाइ ॥१७७॥
अर्थ-भुजा से भरकर हृदय से लगा लिया। विरह से व्याकुल स्त्री को देख-
कर दोनो नेत्र (आंसू से) भर आये। रात-दिन के बीच मे ही दोनो मुरझा गये।
मानों तमाल के वृक्ष की स्वर्ण लता अमृत से सिंचकर, हर्ष से हरी भरी होकर, मुस्करा
कर फूल गयी और उसमें प्रेम के फल लग गये। काम-पीड़ा से मुरझाई हुई तरु-लता
ने तुरन्त अपनी आकुलता (मुरझनि) को भुला दिया। उस मिलन को देखकर ललिता
के हृदय मे आनन्द नही समाता। सूरदास कहते हैं कृष्ण ने प्रिया के विविध ताप को
नष्ट कर दिया ॥१७७॥
ललित प्रेम-बिबस भई भारी ।
वह चितवनि, वह मिलनि परस्पर, अति सोभा वर नारी ।
इकटक अंग-अंग अवलोकति, उत बस भए बिहारी ।
वह आतुर छबि लेत देत वै, इक तैँ इक अधिकारी ।
१८८ सूरसागर सार सटीक
ललिता संग सखिनि सोँ भाषति, देखी छवि पिय-प्यारी ।
सुनहु सूर ज्यौँ होम अगिनि घृत, ताहूँ तैं यह न्यारी ॥१०८॥
अर्थ - ललिता अत्यधिक प्रेम से विवश हो गयी । वह दृष्टिपात, वह परस्पर
का मिलन, (वह) श्रेष्ठ नारी की अत्यधिक शोभा (सब सराहनीय है) । एक निगाह
से (कृष्ण के) अग-अंग को देखती है, उधर कृष्ण वश मे हो गये हैं । वे आतुर होकर
शोभा का आदान-प्रदान करते है। वे एक-से-एक बढकर हैं । ललिता सखियो के साथ
बातचीत करती है कि प्रिय और प्यारी की शोभा देखो । सूरदास कहते हैं कि
(ललिता कहती है) ज्यो होम की अग्नि मे घी हो, उससे भी यह निराली है ॥१०८॥
राधहिं मिलेहुँ प्रतीति न आवति ।
जदपि नाथ विधु वदन विलोकत, दरसन को सुख पावति ।
भरि-भरि लोचन रूप-परम-निधि, उरमैं आनि दुरावति ।
विरह-विकल मति दृष्टि दुहूँ दिसि, सँचि सरघा ज्यों धावति ।
चितवत चकित रहत चित अंतर, नैन निमेष न लावति ।
सपनौ आहि कि सत्य ईस यह, बुद्धि वितर्क बनावति ।
कबहूँक करति विचार कौन हौं, को हरि कैं हिय भावति ।
सूर प्रेम की बात अटपटी, मन तरंग उपजावति ॥१०६॥
अर्थ-राधा को (कृष्ण से) मिलने पर भी विश्वास नही आता है। यद्यपि
वह कृष्ण के चन्द्र वदन को देखकर दर्शन का सुख पाती है। आंखो से रूप की परम
निधि भरकर हृदय मे ले आकर छिपाती है। विरह से व्याकुल बुद्धि (वाली राधा)
की दृष्टि दोनों दिशाओ मे है, जैसे मधु इकट्ठा करके मधुमक्खी दौड़ती है। चकित
दृष्टि से चित्त के अन्तर मे देखती रहती है क्षण भर भी आंख नही लगाती । बुद्धि मे
तर्क-वितर्क करती है कि हे ईश्वर यह सत्य है या स्वप्न है। कभी विचार करती है
कि मैं कौन हूँ, और कौन कृष्ण के हृदय को भाती है। सूरदास कहते हैं कि प्रेम की
अटपटी बात मन मे तरंग उत्पन्न करती है ॥१०६॥
स्याम भए. राधा वस ऐसेँ ।
चातक स्वाँति, चकोर चंद ज्यौँ, चक्रवाक रवि जैसेँ ।
नाद कुरंग, मीन जल की गति, ज्यौँ तनु कैं वस छाया ।
इकटक नैन अंग-छवि मोहेँ, थकित भए पति जाया ।
उठैँ उठत बैठैँ बैठत हैं, चलैँ चलत सुधि नाहीँ ।
सूरदास बड़भागिनि राधा, समुझि मनहिं मुसुकाही ॥११०॥
अर्थ-कृष्ण ऐसे राधा के वश मे हो गये है जैसे चातक स्वांति (के बूंद) के
चकोर चन्द्रमा के, चक्रवाक सूर्य के वश मे रहता है । जैसे शब्द के वश में मृग, जल
की गति के वश मे मछली और शरीर के वश मे छाया रहती है। एकटक नेत्र अंग
की छवि पर मोहित हो गये हैं, वे पति (के नेत्र) पत्नी (की छवि) देखते-देखते थकित
हो गये । (राधा के) उठने पर उठते हैं, बैठने पर बैठते हैं, चलने पर चलते हैं, (उन्हें)
कुछ स्मरण नहीं रहता । सूरदास कहते हैं कि राधा बड़ी भाग्यवाली है, (यह) समझ
कर मन ही (मन) मुस्कराती है ॥११०॥
निरखि पिय-रूप तिय चकित भारी ।
किधौं वै पुरुष मैं नारि, की वै नारि मैं ही हौं तन सुधि
बिसारी ।
आपु तन चितै सिर मुकुट कुंडल स्त्रवन, अधर मुरली,
मालवन बिराजै ।
उतहिं पिय-रूप सिर माँग बेनी सुभग, भाल बेंदी-बिंदु
महा छाजै ।
नागरी हठ तजौ, कृपा मरि मोहिं भजौ; परी कह चूक सो
कहौ प्यारी ।
सूर नागरी प्रभु-बिरह-रस मगन भई, देखि छवि हँसत
गिरिराजधारी ॥१११॥
अर्थ-प्रिय के रूप को देखकर स्त्री (राधा) चकित हो गयी । (वह सोचती
है) वह पुरुष हैं, मैं नारी हूँ कि वे नारी हैं, मैं (पुरुष) हूँ; मैं अपने शरीर की स्मृति
भूल चुकी हूँ । अपने शरीर को देखकर उसे लगता है, उसके सिर पर मुकुट, कानो
में कुंडल, ओठ से मुरली, (उर पर) वनमाल विराजती है । उधर प्रिय इस रूप मे
दिखाई देते हैं—सिर पर मांग, सुन्दर वेणी, मस्तक पर बेंदी का बिन्दु बहुत सुशो-
भित है । (राधा कहती है) नागरी हठ छोड़ो, कृपा करके मुझको भजो, कहो प्यारी
किस चूक में पड गयी हो । सूरदास कहते हैं कि (राधा) प्रभु के विरह रस मे मग्न
हो गयी, (इस) छवि को देखकर कृष्ण हँसते है ॥१११॥
कृष्ण गोपिका
नंद-नंदन तिय-छवि तनु काछे ।
मनु गोरी साँवरी नारि दोउ, जाति सहज मै आछे ।
स्याम अंग कुसुमी नई सारी, फल गुंजा की भाँति ।
इत नागरि नीलांबर पहिरे, जनु दामिनी घन काँति ।
आतुर चले जात बन धामहिं, मन अति हरष बढ़ाए ।
सूर स्याम वा छवि कौं नागरि, निरखति नैन चुराए ॥११२॥
अर्थ-कृष्ण अपने शरीर पर स्त्री का रूप संवारे हैं । मानो गोरी और सांवली
दोनो स्त्रियां अच्छी तरह से सहजता से चली जा रही है । गुंजा फल की तरह कृष्ण
के शरीर पर कुसुमी रंग की साड़ी है । इधर राधा नीलाम्बर पहने है, जैसे बादलो
में बिजली की काँति हो । मन मे अत्यन्त हर्ष बढ़ाकर, आतुर होकर वन के कुंज-गृह
१८० सूरसागर सार सटीक
में चले जा रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि उस छवि को नागरि (राधा) नैन चुराकर
देखती जाती है ॥११२॥
स्याम स्यामा कुंज वन आवत ।
भुज भुज कण्ठ परस्पर दीन्हें, यह छवि उनहीं पावत ।
इततैं चन्द्रावली जाति ब्रज, उततैं ये दोउ आए ।
दूरिहिं तैं चितवति उनहीं तन, इक टक नैन लगाए ।
एक राधिका दूसरि को है, याकौं नहिं पहिचानौं ।
ब्रज-वृषभानु-पुरा-जुवतिनि कौं, इक-इक करि मैं जानौं ।
यह आई कहूँ और गाँव तैं, छवि साँवरी सलोनी ।
सूर आजु यह नई बतानी, एकौ अँग न विलोनी ॥११३॥
अर्थ-राधा ओर कृष्ण कुंज वन मे आते हैं। परस्पर भुजा एक दूसरे के कंठ
से लगाये हुए हैं। यह शोभा वे ही पाते हैं (अन्यत्र उपमा नही है)। इधर से चन्द्रावली
ब्रज को जा रही थी, उधर से ये दोनो आ गये। दूर ही से उन्ही की ओर एकटक
लगाकर नैनों से निहारती है। एक तो राधिका है दूसरी कौन है, इसे पहचानती नही
हूँ। (क्योकि) मैं तो ब्रज और वृषभानु नगर की एक-एक युवती को जानती हूँ। यह
सांवरी सलोनी छवि वाली किसी ओर गांव से आई है (क्या) ? सूरदास कहते हैं
(चन्द्रावली कहती है) यह नई (स्त्री) दिखलाई दी जिसका एक भी अंग लावण्यविहीन
नही है ॥११३॥
यह वृषभानु-सुता वह को है।
याकी सरि जुवती कोउ नाहीं, यह त्रिभुवन-मन मोहै ।
अति आतुर देखन कौं आवति, निकट जाइ पहिचानौं ।
ब्रज मैं रहति किधौं कहूँ औरै, बूझे तैं तब जानौं ।
यह मोहिनी कहाँ तैं आईं, परम सलोनी नारी ।
सूर स्याम देखत मुसुक्यानी, करी चतुरई भारी ॥११४॥
अर्थ - यह वृषभानु की बेटी (राधा) है, परन्तु वह कौन है। इसके समान
और कोई स्त्री नही है, यह तीनो लोक के मन को मोहने वाली है (त्रिभुवन मोहनी
है)। अत्यन्त आतुर होकर इसे देखने के लिए आ रही हूँ, निकट जाकर पहचानूं।
ब्रज में रहती है कि कही और पूछने पर जानूंगी। यह परम सलोनी मोहनी स्त्री
कहां से आ गई। सूरदास कहते हैं कि (राधा) कृष्ण को देखकर मुसकरायी ओर
(कहा) कि भारी चतुरता की है ॥११४॥
कहि राधा ये को है री।
अति सुंदरी साँवरी सलोनी, त्रिभुवन-जन-मन-मोहै री ।
ओर नारि इनकी सरि नाहीं, कहीं न हम-तन जोहै री ।
काकी सुता, वधू है काकी, जुवती धौं है री ।
राधाकृष्ण १८१
जैसी तुम तैसी है येऊ, भली बनी तुमसी री ।
सुनहु सूर अति चतुर राधिका, येइ चतुरनि की गौ है री ॥११५॥
अर्थ—कहो राधा यह कौन है। (यह) अत्यधिक सुन्दर, सांवली, सलोनी तीनों
लोक के मन को मोहती है और कोई स्त्री इसके समान नही है। इससे कह दो हमारी
ओर न देखे, (यह) किसकी पुत्री है, किसी की स्त्री है अथवा यह नवयुवती है। जैसी
तुम हो वैसे ही यह भी है। तुम्हारे समान अच्छी बनी हुई है। सूरदास कहते हैं कि
(सखी कहती है) राधिका अत्यधिक चतुर है, यही चतुरो की चाल है ॥११५॥
मथुरा तैं ये आई है।
कछु सम्बन्ध हमारौ इनसौँ, तातैं इनहिँ बुलाई है।
ललिता सग गई दधि वेँचन, उनहीँ इनहिँ चिन्हाई है।
उहै सनेह जानि री सजनी, आजु मिलन हम आई है।
तब ही की पहिचानि हमारी, ऐसी सहज सुभाई है।
सूरदास मोहिँ आवत देखी, आपु संग उठि धाई है ॥११६॥
अर्थ—(यह) मथुरा से आई है। हमारा इसका कुछ सम्बन्ध है, इसी से इसे
बुलाया है। ललिता के साथ दही बेचने गयी थी, उसने ही इसे पहचनवा दिया। उसी
स्नेह को जानकर सखी; यह हमसे मिलने आई है। तभी की हमारी इसकी पहचान
है। यह ऐसे ही सहज स्वभाव वाली है। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) मुझे
देखकर स्वयं उठकर साथ दौड़ी चली आई ॥११६॥
इनकोँ ब्रजहीँ क्यौँ न बुलावहु ।
की वृषभानु पुरा, की गोकुल, निकटहिँ आनि बसावहु ।
येऊ नवल नवल तुमहूँ हौ, मोहन कौँ दोउ भावहु ।
मोकौँ देखि कियौ अति घूँघट, काहैं न लाज छुड़ावहु ।
यह अचरज देख्यौ नहिँ कबहुँ, जुवतिहिँ जुहुति दुरावहू ।
सूर सखी राधा सौँ पुनि पुनि, कहति जु हमहिँ मिलावहु ॥११७॥
अर्थ—इनको ब्रज मे क्यों नही बुला लेती हो। वृषभानुपूर या गोकुल (कही)
निकट लाकर बसा लो। यह भी नवल है और तुम भी, दोनो मोहन (कृष्ण) को अच्छी
लगोगी। मुझे देखकर इसने अत्यधिक घूंघट कर लिया, इसकी लाज क्यो नही दूर करती
हो। यह आश्चर्य कभी नही देखा कि युवती ही युवती को छिपाये। सूरदास कहते हैं
कि सखी राधा से बार-बार कहती है कि हमे (इससे) मिलाओ ॥११७॥
मथुरा मैँ वस वास तुम्हारौ ?
राधा तैं उपकार भयौ यह, दुर्लभ दरसन भयौ तुम्हारौ ।
वार-वार कर गहि निरखति, घूँघट-ओट करौ किन न्यारौ ।
कवहूँक पर परसति कपोल छुइ, चुटकि लेति ह्या हमहिँ निहारी ।
१८६ सूरसागर सार सटीक
कछु मैं हूँ पहिचानति तुमकौं, तुमहिं मिलाऊँ नंद-दुलारी।
काहे कौं तुम सकुचति हौ जू, कहौ काह है नाम तुम्हारी।
ऐसो सखी मिली तोहिं राधा, तौ हमकौं काहै न बिसारी।
सूरदास दम्पति मन जान्यौ, यातैं कैसें होत उबारी ॥११८॥
अर्थ- बस मथुरा मे ही तुम्हारा निवास है। राधा के द्वारा यह उपकार हुआ
कि तुम्हारा दुर्लभ दर्शन हो गया। वार-वार हाथ पकड कर देखती है (ओर कहती
है) घूंघट की ओट को दूर क्यो नही करती हों। कभी कपोल (गाल) छूकर हाथ छूती
है फिर चुटकी लेती है कि मेरी तरफ देखो। मैं तुमको कुछ पहचान रही हूँ, तुम्हे
कृष्ण से मिला दूँगी। तुम क्यो संकोच करती हो, कहो तुम्हारा क्या नाम है ? राधा
तुम ऐसी सखी पाकर हम जैसी सखियो को क्यो न भूल जाओ। सूरदास कहते है कि
कृष्ण और राधा दोनों मन मे जान गये कि अब इससे कैसे उवार हो ॥११८॥
ऐसी कुंवरि कहाँ तुम पाई।
राधा हूँ तें नख-सिख सुंदरि, अब लौं कहाँ दुराई।
काकी नारि, कौन की बेटी, कौन गाउँ तैं आई।
देखी सुनी न ब्रज, वृन्दावन, सुधि-बुधि हरति पराई।
धन्य सुहाग भाग याकौ, यह जुवतिनि की मनभाई।
सूरदास-प्रभु हरषि मिले हँसि, लै उर कठ लगाई ॥११९॥
अर्थ-अर्थतुम ऐसी कुमारी (कुंवरि) कहाँ पा गई। राधा से भी इसके नख-
शिख सुन्दर है, (ऐसे अंगो को) अब तक कहाँ छिपाये थी। किसकी स्त्री है, किसकी
बेटी है और किस गाँव से आई है। ब्रज और वृन्दावन मे (तुम्हे) न तो देखा है न
सुना है। (तुम) दूसरे की स्मृति और बुद्धि दोनों हरती हो। इसका सुहाग और भाग्य
दोनो धन्य है जो कि इन युवतियो के मन को भा गयी। सूरदास कहते है कि कृष्ण
हँसकर गले से लगाकर मिल गये ॥११९॥
नँद-नंदन हँसे नागरी-मुख चितै, हरषि चंद्रावलि कंठ लाई।
बाम भुज रवनि, दच्छिन भुज सखी पर, चले बन धाम सुख
कहि न जाई।
मनौ बिबि दामिनि, बीच नव घन सुभग, देखि छवि काम रति-
सहित लाजै।
किधौं कंचन-लता, बीच सुतमाल तरु, भामिनिनि बीच
गिरिधर विराजै।
गए गृहकुंज, अलिगुंज, सुमननि पुंज, देखि आनंद भरे सूर स्वामी।
राधिका-रवन, जुवती-रवन, मन-रँवन निरखि छवि होत मन-
काम कामी ॥१२०॥
राधाकृष्ण . १८३
अर्थ - कृष्ण नागरि के मुख को देखकर हंसे और हर्षित होकर उन्होंने चंद्रावली
को गले से लगा लिया । बायी भुजा राधा पर और दाहिनी सखी पर रखकर वन की
ओर चले । (यह) शोभा कही नही जा सकती (अकथनीय है) । कृष्ण मानो दो
बिजलियों के बीच सुन्दर नवीन बादल हों । इस छवि को देखकर रति सहित काम
लज्जित होते हैं । मानो कंचन की लताओं के बीच सुन्दर तमाल का'वृक्ष हो, ऐसे ही
(दोनो) स्त्रियों के बीच कृष्ण शोभित हैं । वे कुंज-गृह मे गये और भ्रमर के गुंजार
तथा पुष्पों के पुंज को देखकर आनन्द से भर गये । सूरदास कहते हैं कि राधिका-
रमण, युवती-रमण, मनरमण (कृष्ण) की छवि को देखकर काम के मन में भी
कामेच्छा उत्पन्न हो गयी ॥१२०॥
मान लीला
मोहिं छुवौ जनि दूर रहौ जू ।
जाकौं हृदय लगाइ लयौ है, ताकीँ बाँह गहौ जू ।
तुम सर्वज्ञ और सब मूरख, सो रानी अरु दासी ।
मैंँ देखत हिरदय वह बैठी, हम तुमकौँ भइ हाँसी ।
बाँह गहत कछु सरम न आवति, सुख पावति मन माहींँ ।
सुनहु सूर मो तन यह इकटक, चितवति, डरपति नाहीँ ॥१२१॥
अर्थ - मुझे छुओ मत दूर रहो । जिसको हृदय से लगाया हो उसी की बांह
पकड़ो । तुम सर्वज्ञ हो और सब मूर्ख हैं ? वह रानी है और सब दासी हैं ? मैं देखती
हूँ कि वह हृदय में बैठी है, मैं तुम्हारे लिए हँसी की पात्री हूँ । बाँह पकड़ते कुछ लाज
नही आती, (ऊपर से) मन में सुख पाती है । सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है)
यह मेरी ओर एकटक देखती है और डरती नही ॥१२१॥
कहा भई धनि बाबरी, कहि तुमहिं सुनाऊँ ।
तुम तैं को है भावती, जिहिं हृदय बसाऊँ ।
तुमहिं स्रवन, तुम नैन हौ, तुम प्रान-अधारा ।
वृथा क्रोध तिय क्यों करौ, कहि बारम्बारा ।
भुज गहि ताहि बतावहु, जेहि हृदय बतावति ।
सूरज प्रभु कहै नागरी, तुम तैं को भावति ॥१२२॥
अर्थ - प्रिया तुम क्या पागल हो गयी हो, तुम्हे कैसे कहकर सुनाऊँ । तुमसे
अधिक प्रिय लगने वाली और कौन है जिसे (अपने) हृदय मे बसा लूं । तुम ही श्रवण
हो, तुम ही नेत्र हो और तुम ही प्राण की आधार हो । बार-बार कहकर, हे स्त्री,
क्रोध क्यो करती हो । भुजा पकड़कर उसे बताओ जिसे हृदय मे बताती हो । सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण नागरि (राधा) से कहते है कि तुमसे अधिक कौन मुझे अच्छी
लगती है ॥१२२॥
पियहिं निरखि प्यारी हँसि दीन्हौ ।
रीझे स्याम अंग-अंग निरखत, हँसि नागरि उर लीन्हौ ।
१३
१६४ सूरसागर सार सटीक
आलिंगन दै अधर दसत खंडि, कर गहि चिबुक उठावत ।
नासा सौं नासा लै जोरत, नैन नैन परसावत ।
इहिं अंतर प्यारी उर निरख्यौ, झझकि भई तब न्यारी ।
सूर स्याम मोकौं दिखरावत, उर ल्याए धरि प्यारी ॥१२३॥
अर्थ—प्रिय को देखकर प्यारी ने हँस दिया । कृष्ण अंग-अंग देखकर रीझ
गये, हँसकर उन्होने नागरि (राधा) को हृदय से लगा लिया । आलिंगन देकर,
अधरो पर दांतो के चिह्न देकर, हाथ से ठुड्डी पकड़कर उठाते हैं । नाक से नाक
जोड़ते हैं, नेत्र से नेत्र स्पर्श कराते हैं । इसी बीच प्यारी ने वक्ष-स्थल को देखा और
तब झिझककर अलग हो गयी । सूरदास कहते हैं कि मुझे दिखाते हुए कृष्ण ने प्यारी
को पकड़कर हृदय से लगा लिया ॥१२३॥
मान करौ तुम और सवाई ।
कोटि करौ एकै पुनि द्वै हौ, तुम अरु मोहन माई ।
मोहन सो सुनि नाम श्रवनहौँ, मगन भई सुकुमारी ।
मान गयौ, रिस गई तुरतहीँ, लज्जित भई मन भारी ।
धाइ मिली दूतिका कंठ सौं, धन्य-धन्य कहि बानी ।
सूर स्याम बन धाम जानिकै, दरसन कौँ अतुरानी ॥१२४॥
अर्थ—अब तुम सवाया (और अधिक) मान करो । हजारों यत्न करो, तुम और
मोहन अन्ततः एक ही होगे । मोहन का नाम कान से सुनकर सुकुमारी राधा प्रसन्न हो
गयी । मान समाप्त हो गया, तुरन्त ही क्रोध चला गया, मन मे अत्यधिक लज्जित हुई ।
धन्य-धन्य की वाणी कहकर, दौड़कर दूती के गले से लिपट गयी । सूरदास कहते हैं कि
कृष्ण को कुन्ज वन मे जानकर (राधा) दर्शन के लिए आतुर हो गयी ॥१२४॥
चलौ किन मानिनि कुंज-कुटीर ।
तुव बिनु कुँवर कोटि बनिता तजि, सहत मदन की पीर ।
गदगद स्वर संभ्रम अति आतुर, स्रवत सुलोचन नीर ।
क्वासि क्वासि वृषभानु नंदिनी, बिलपत बिपिन अधीर ।
बंसी बिसिष, माल ब्यालावलि, पंचानन पिक कीर ।
मलयज गरल, हुतासन मारुत, साखामृगरिपु चीर ।
हिय मैं हरषि प्रेम अति आतुर, चतुर चली पिय तीर ।
सुनि भयभीत बज्र के पिंजर, सूर सुरति-रनधीर ॥१२५॥
अर्थ—मानिनी कुन्ज-कुटीर क्यों नही चलती । तुम्हारे बिना कृष्ण हजारो स्त्रियो
को छोड़कर काम-पीड़ा सह रहे हैं। गद्गद स्वर तथा भ्रम के साथ आतुर होकर आंखो
से आंसू गिराते हैं । वृषभानु की बेटी (राधा) कहाँ है, कहां है (कहकर) वे वन में
विलाप कर रहे हैं ? (उनके लिए) वंशी वाण, माला सर्प, कोयल तथा तोता सिंह,
मलयज विष, वायु अग्नि, चोर शाखामृग (बन्दर) के शत्रु (कांटा) के समान हो गए
हैं। यह सुनकर काम क्रीडा में धैर्य धारण करने वाली राधा का कठोर मन भय
विह्वल हो गया और वे चतुर (राधा) हिय में हर्षित तथा प्रेम से आतुर होकर प्रिय
के पास चली ॥१२५॥
स्याम नारि कैँ बिरह भरे।
कबहुँक बैठन कुंज द्रुमनि तर, कबहुँक रहत खरे।
कबहुँक तनु की सुरति बिसारत, कबहुँक तनु सुधि आवत।
तब नागरि के गुनहिं बिचारत, तेई गुन गनि गावत।
कहूँ मुकुट, कहूँ मुरलि रही गिरि, कहूँ कटि पीत पिछौरी।
सूर स्याम ऐसी गति भीतर, आइ दूतिका दौरी ॥१२६॥
अर्थ—कृष्ण नारी (राधा) के विरह से आकुल हैं। कभी कुन्ज के वृक्षों के नीचे
बैठते हैं, कभी खड़े रहते हैं। कभी उन्हे शरीर की स्मृति भूल जाती है, कभी शरीर की
स्मृति आ जाती है। तब नागरि (राधा) के गुणो का विचार करते हैं, उसी के गुणों
का गुणगान करते हैं। कही मुकुट, कही मुरली तथा कही पीताम्बर तथा पिछौरी गिर
गयी है। सूरदास कहते हैं कि ऐसी अवस्था मे दूती दौडती हुई आई ॥१२६॥
धनि वृषभानु-सुता बड़ भागिनि।
कहा निहारति अंग-अंग-छवि, धन्य स्याम-अनुरागिनि।
और त्रिया नख-शिख सिंगार सजि, तेरैं सहज न पूरैँ।
रति, रम्भा, उरवसी, रमा सी, तोहिं निरखि मन झूरैँ।
ये सब कंत सुहागिनि नाहीं, तू है कंत-पियारी।
सूर धन्य तेरी सुन्दरता, तोसी और न नारी ॥१२७॥
अर्थ—बडे भाग्य वाली वृषभानु की बेटी (राधा) धन्य हो। अंग-अंग की
शोभा को क्या देखती हो। श्याम की अनुरागिनी (तुम) धन्य हो। अन्य स्त्रियां नख
से शिख तक श्रृंगार करके तुम्हारे सहज (सौंदर्य) की वरावरी नही कर सकती। तुम
रति, रंभा, उर्वशी के समान हो, तुम्हे देखकर मन झुलस जाता है। ये सब कंत
(कृष्ण) की सुहागिनी नही है तुम्ही कृष्ण को प्यारी हो। सूरदास कहते हैं कि
तुम्हारी सुन्दरता धन्य है, तुम्हारे समान और कोई नही है ॥१२७॥
सँग राजति वृषभानु कुमारी।
कुंज सदन कुसुमनि सेज्या पर, दम्पति सोभा भारी।
आलस भरे मगन रस दोऊ, अंग-अंग प्रति जोहत।
मनहुँ गौर स्यामल ससि नव तन, बैठे संमुख सोहत।
कुंज भवन राधा-मनमोहन, चहूँ पास ब्रजनारी।
सूर रहीँ लोचन इकटक करि, डारतिं तन मन वारी ॥१२८॥
अर्थ—कृष्ण के साथ राधा शोभित है। कुन्ज-सदन में कुसुम की शय्या पर
दम्पति की अत्यधिक शोभा है। आलस्य से भरे दोनो रस मग्न है, तथा एक-दूसरे के
१८६ सूरसागर सार सटीक
अंग की ओर देखते हैं। मानों गोरे और श्याम चन्द्रमा नवीन शरीर धारण कर
सम्मुख बैठे हैं। सूरदास कहते हैं कि वे निर्निमेष नेत्रो से उन पर अपना तन मन
न्योछावर कर डालती है ॥१२८॥
खण्डिता प्रकरण
काहे कौं कहि-गए आइहैं, काहैं झूठी सौंहैं खाए ।
ऐसे मैं नहिं जाने तुमकौं, जे गुन करि तुम प्रकट दिखाए ।
भली करी यह दरसन दीन्हे, जनम जनम के ताप नसाए ।
तब चितए हरि नैंकु तिया-तन, इतनैहिं सब अपराध छमाए ।
सूरदास सुन्दरी सयानी, हँसि लीन्हे पिय अंकम लाए ॥१२६॥
अर्थ-क्यो कहा था कि आयेगे और क्यो झूठी सौगंध खाई थी । मैं तुम्हे ऐसा
नही जानती थी, (मेरे लिए ये अपरिचित थे) जिन गुणो को तुमने प्रत्यक्ष दिखाया ।
अच्छा किया कि यह दर्शन दिया और जन्म-जन्म के ताप को नष्ट कर दिया । तब
कृष्ण ने तनिक प्रिया की ओर देखा, इतने मे ही सब अपराधो की क्षमा मांग ली ।
सूरदास कहते है कि सुन्दर सयानी राधा ने हँसकर प्रिय को अंक में ले लिया ॥१२६॥
धीर धरहु फल पावहुगे ।
अपनेहीँ सुख के पिय चाँड़े, कबहुँ तौ बस आवहुगे ।
हम सौं कहत और की औरै, इन बातनि मन भावहुगे ।
कबहुँ राधिका मान करैगी, अन्तर बिरह जनावहुगे ।
तब चरित्र हमहीँ देखैंगी, जैसैँ नाच नचावहुगे ।
सूर स्याम अति चतुर कहावत, चतुराई बिसरावहुगे ॥१३०॥
अर्थ-धीरज धरो, फल पाओगे । अपने ही सुख से प्रज्वल लालसा वाले कभी
तो वश मे आओगे । हमसे और का और कहते हो, इन्ही बातो से मन को अच्छे
लगोगे । कभी राधा मान करेगी तथा विरह का अन्तर जताओगे । तब जैसा नाच
नचाओगे उस चरित्र को हम ही देखेगी । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण तुम बहुत चतुर
हो, उस समय चतुरता भुला दोगे ॥१३०॥
मैं हरि सौं हो मान कियौ री ।
आवत देखि आन बनिता-रत्त, द्वार कपाट दियौ री ।
अपनैं हीँ कर साँकर सारी, संधिहिँ सन्धि सियौ री ।
जौ देखौं तो सेज सुमूरति, काँप्यौ रिसनि हियौ री ।
जब झुकि चली भवन तैँ बाहरि, तब हठि लौटि लियौ री ।
कहा कहौँ कछु कहत न आवै, तहँ गोविंद बियौ री ।
विसरि गई सब रोष, हरष मन, पुनि फिरि मदन जियौ री ।
सूरदास प्रभु अति रति नागर, छलि मुख अमृत पियौ री ॥१३१॥
अर्थ—मैंने कृष्ण से मान किया। दूसरी स्त्री मे रत कृष्ण को आते देखकर
द्वार के किवाड बन्द कर-दिये। अपने ही हाथ से सभी जंजीरों को तथा छिद्रों को बन्द
कर दिया। पर जब देखती हूँ तो सेज पर सुन्दर मूर्ति वाले कृष्ण दिखाई दिये। क्रोध
से मेरा हृदय काँप गया। जब क्रुद्ध होकर भवन से बाहर चली तब हठकर (अपने को)
लोटा लिया। क्या कहूँ कुछ कहा नही जाता। वहाँ दूसरे गोविन्द थे। सब क्रोध भूल
गयी, मन हर्षित हो गया। फिर काम की इच्छा जी गयी। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण
रति क्रीडा मे अत्यधिक चतुर हैं, छलकर उन्होने सुख का अमृत पी लिया ॥१३१॥
नंद-नंदन सुखदायक हैं।
नैन सैन दै हरत नारि मन, काम काम-तनु दायक हैं।
कबहुँ रैनि बसत काहू कैं, कबहुँ भोर उठि आवत हैं।
काहू कौ मन आपु चुरावत, काहू कैं मन भावत हैं।
काहू कै जागत सगरी निसि, काहूँ बिरह जगावत हैं।
सुनहु सूर जोइ जोइ मन भावै, सोइ सोइ रंग उपजावत हैं ॥१३२॥
अर्थ—कृष्ण सुख देने वाले है। नेत्रों का संकेत देकर स्त्रियो के मन को हर
लेते हैं। कामातुर शरीर मे (और) इच्छा पैदा करते है। कभी (किसी के यहाँ) रात
मे बसते है, कभी प्रातः उठकर आते है। किसी के मन को स्वयं चुराते है और किसी
के मन को स्वयं भा जाते हैं। किसी (के साथ) सारी रात जागते हैं, किसी के विरह
को जगा देते है। सूरदास कहते हैं कि जो मन को अच्छा लगता है वही रङ्ग उत्पन्न
करते हैं ॥१३२॥
नाना रंग उपजावत स्याम । कोउ रीझति कोउ खीझति बाम ॥
काहू कैं निसि बसत बनाइ । काहू मुख छुवै आवत जाइ ॥
बहु नायक ह्वै बिलसत आपु । जाकौ सिव पावत नहिं जापु ॥
ताकौं ब्रजनारी पति जानैं । कोउ आदरैं, कोउ अपमानैं ॥
काहू सौं कहि आवन साँझ । रहत और नागरि घर माँझ ॥
कबहुँ रैन सब सग बिहात । सुनहु सूर ऐसे नँद-तात ॥१३३॥
अर्थ—कृष्ण अनेक रंग उत्पन्न करते हैं, जिससे कोई स्त्री प्रसन्न होती है और
कोई खीझती है। किसी के यहां रात मे अच्छी तरह बसते हैं, आते-जाते किसी के मुख
को छूते हैं। बहुत से नायक का रूप धर के आप विलास करते हैं। जिसे शिव तप
करके नही पाते, उसे ब्रज की स्त्रियाँ पति रूप में जानती है। कोई (उनका) आदर
करती है कोई अपमान करती है। सन्ध्या समय किसी से आने के लिए कह आते हैं
और रहते है किसी और स्त्री के घर। कभी उनकी रात सबके साथ व्यतीत होती
है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ऐसे ही हैं ॥१३३॥
अब जुवतिनि सौं प्रगटे स्याम ।
अरस-परस सबहिनि यह जानी, हरि लुब्धे सबहिनि कैं धाम ।
१८८ सूरसागर सार सटीक
जा दिन जाकै भवन न आवत, सो मन मैं यह करति विचार ।
आजु गए औरहिं काहू कैं, रिस पावति, कहि बड़े लवार ।
यह लीला हरि कैं मन भावत, खंडित वचन कहत सुख होत ।
साँझ बोल दै जात सूर-प्रभु, ताकैं आवत होत उदोत ॥१३४॥
अर्थ—अब युवतियों के साथ कृष्ण प्रकट हुए । मिल-जुल कर सब ने यह जाना
कि कृष्ण सब ही के घर पर लुब्ध हैं । जिस दिन जिसके घर नही आते उस दिन वह
मन में यही विचार करती है कि आज कृष्ण (किसी) और के घर गये है । (वह)
क्रोधित होती है और कहती है कि वह बहुत धूर्त हैं। यह लीला कृष्ण के मन को अच्छी
लगने वाली है । खंडित वचन कहने पर उन्हे सुख मिलता है । सूरदास कहते है कि
सन्ध्या समय आने को कह जाते हैं पर आते-आते सबेरा हो जाता है ॥१३४॥
राधिका गेह हरि-देह-बासी । और तिय घरनि घर तनु-प्रकासी ॥
ब्रह्म पूरन द्वितीय नहिं कोऊ । राधिका सबै हरि सबै वोऊ ॥
दीप सौं दीप जैसैं उजारी । तैसैं हौ ब्रह्म घर-घर बिहारी ॥
खंडिता बचन हित यह उपाई । कबहुँ कहुँ जात, कहुँ नहिं कन्हाई ॥
जन्म कौ सुफल हरि यहै पावैं । नारि रस-वचन श्रवननि सुनावैं ॥
सूर-प्रभु अनतही मगन कीन्हौ । तहाँ नहिं गए जहाँ बचन दीन्हौ ॥१३५॥
अर्थ—राधिका का निवास-स्थान कृष्ण के शरीर मे स्थित उनका हृदय है,
जबकि और गोपियां अपने शरीर के घर-घर को प्रकाशित करती हैं । ब्रह्म पूर्ण रूप से
व्याप्त है, दूसरा कोई नही है । राधिका सब कुछ है वही कृष्ण की सब कुछ है । दीपक
से जैसे दीपक जलाया जाता है, वैसे ही ब्रह्म घर-घर विहार करने वाला है । खंडित
(खण्डिता नायिका के उपालम्भ) वचन (सुनने) के हित से कृष्ण (ऐसा) व्यवहार करते
है कि कभी कही जाते हैं (कभी) कही नही जाते । जन्म की सफलता कृष्ण को इसी
मे मिलती है कि स्त्रियां रस युक्त वचन कानो को सुनाये । सूरदास कहते हैं कि प्रभु
ने अन्यत्र गमन किया, वहां नही गये जहां के लिए वचन दिया था ॥१३५॥
मध्यम मान
स्याम पिया सन्मुख नहिं जोवत ।
कबहुँ नैन की कोर निहारत, कबहुँ बदन पुनि गोवत ।
मन-मन हँसत त्रसत तनु परगट, सुनत भावती बात ।
खंडित वचन सुनत प्यारी के, पुलक होत सब गात ।
यह सुख सूरदास कछु जानै, प्रभु अपने कौं भाव ।
श्री राधा रिस करति, निरखि मुख, तिहिं छवि पर ललचाव ॥१३६॥
अर्थ—कृष्ण प्रिया (राधा) के सम्मुख नही देखते । कभी नेत्रो की कोर को
देखते है, कभी फिर मुख छिपाते है । मन-ही-मन हँसते हैं, शरीर प्रकट करने से
डरते हैं । मन को अच्छी लगने वाली बात सुनते है । प्यारी (राधा) की खंडित वाणी
राधाकृष्ण १८४
सुनकर उनका समस्त शरीर पुलकित होता है। सूरदास प्रभु के भावों को अपनाकर
यह सुख कुछ-कुछ जानते है। श्रीराधा क्रोध करती है, उस (क्रोधित मुख) की छवि
(भक्त तथा कृष्ण को) ललचा देने वाली है ।।१३६।।
नैन चपलता कहाँ गँवाई।
मोसौँ कहा दुरावत नागर, नागरि रैन जगाई।
ताही कैँ रँग अरुन भए हैं, धनि यह सुन्दरताई।
मनौ अरुन अंबुज पर बैठे, मत्त भृंग रस पाई।
उड़ि न सकत ऐसे मतवारे, लागत पलक जम्हाई।
सुनहु सूर यह अंग माधुरी, आलस भरे कन्हाई ।।१३७।।
अर्थ-नेत्रों की चंचलता कहाँ गँवा दी। नागर कृष्ण मुझसे क्यों छिपाते
हो? रात में नागरि (अन्य स्त्री) ने (तुम्हें) जगाया है। उसी के रंग से (नेत्र) लाल
हो गये हैं। यह सुन्दरता धन्य है। मानों लाल कमल पर बैठे मतवाले भ्रमर रस पी
रहे हों। ऐसे मतवाले हो गये हैं कि उड़ नहीं सकते। पलकों में आलस (जम्हाई)
लग रहा है। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) यह आलस भरे कृष्ण के अंग
की मधुरिमा है ।।१३७।।
यह कहि कै तिय धाम गई।
रिसनि भरी नख-सिख लौँ प्यारी, जोबन-गर्व-भई।
सखी चलीँ गृह देखि दसा यह, हठ करि बैठी जाइ।
बोलति नहीं मान करि हरि सौँ, हरि अंतर रहे आइ।
इहिँ अंतर जुवती सब आईं, जहाँ स्याम घर-द्वारैँ।
प्रिया मान करि बैठि रही है, रिस करि क्रोध तुम्हारैँ।
तुम आवत अतिहीँ झहरानी, कहा करी चतुराई।
सुनत सूर यह बात चकित पिय, अतिहिँ गए मुरझाई ।।१३८।।
अर्थ-यह कहकर प्रिया (राधा) घर गयी। यौवन गर्व से युक्त प्यारी नख से
शिख तक क्रोध से भर गयी। सखियाँ इस दशा को देखकर अपने घर चलीं। राधा
हठ करके बैठ गयी, कृष्ण से मान करके किसी से बोलती नहीं, इसी बीच कृष्ण आ
गये। इसके बाद सभी युवतियाँ वहीं आईं (जहाँ) कृष्ण घर के द्वार पर खड़े थे।
(फिर कहने लगी) प्रिया तुम्हारे ऊपर क्रोध कर मान करके बैठी है। तुम्हारे आते
ही अत्यधिक झल्लाई, तुमने (इस समय) क्या चतुरता की। सूरदास कहते हैं यह
सुनते ही चकित प्रिय कृष्ण अत्यधिक मुरझा गये ।।१३८।।
नैंकु निकुंज कृपा करि आइये।
अति रिस कृस ह्वै रही किसोरी, करि मनुहार मनाइयै।
कर कपोल अन्तर नहिं पावत, अति उसास तन ताइयै।
छूटे चिहुर बदन कुम्हिलानी, सुहथ संवारि बनाइयै।
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२०० सूरसागर सार सटीक
इतनी कहा गाँठि कौ लागत, जी बातनि सुख पाइयै ।
रूठेहिं आदर देत सयाने, यहै सूर जस गाइयै ॥१३६॥
अर्थ—कृपा करके तनिक निकुंज मे आइये । अत्यधिक क्रोध से किशोरी
(राधा) दुर्बल हो रही है, उसे विनय पूर्वक मान लीजिए । हाथ और कपोल दोनों का-
अन्तर नही होता (अर्थात् हाथ पर कपोल रखे रहती है), अत्यधिक उच्छ्वास से
शरीर को तपाती है । अपने सुन्दर हाथों से सँवारे उसके बाल छूट गये है, मुख कुम्हला
गया है । जो बातों से ही सुख पाया जा सकता है, तो इसमे गाँठ का क्या लगता है
अर्थात् क्या खर्च होता है । रूठे हुए व्यक्ति को सज्जन (श्रेष्ठ लोग) आदर देते हैं ।
सूरदास इसका यश गाते है ॥१३८॥
बैठि मानिनी गहि मौन ।
मनौ सिद्ध समाधि सेवत, सुरनि साधे पौन ।
अचल आसन, पलक तारी, गुफा घूँघट-भौन ।
रोषही कौ ध्यान धारै, टेक टारै कौन ।
अबहिँ जाइ मनाइ लीजै, अबसि कीजै गौन ।
सूर के प्रभु जाइ देखौ, चित्त चौंधी जोन ॥१४०॥
अर्थ—मानिनी मौन धारण करके बैठी है । मानो सिद्ध समाधि का सेवन कर
रही है और देवता प्राण वायु सिद्ध (अवरुद्ध) किए हुए हैं । वह अचल आसन पर
बैठी है, पलक को लगातार रोके है (ध्यान लगाये है) । घूंघट के बीच का स्थान
गुफा के समान है । क्रोध पर ही ध्यान धारण किये हुए है, उसे हठ करके कौन टाल
सकता है । अभी जाकर उसे मना लीजिए । (उसके पास) अवश्य गमन कीजिए ।
सूरदास कहते हैं कि (सखी कहती है) कृष्ण जाकर उस चिन्ता से तिलमिलायी
(राधा) को अवश्य देखो ॥१४०॥
स्यामा तू अति स्यामहिं भावै ।
बैठत-उठत, चलत, गौ चारत, तेरौ लीला गावै ।
पीत बरन लखि पीत बसन उर, पीत धातु अंग लावै ।
चन्द्राननि सुनि, मोर चन्द्रिका, माथैँ मुकुट बनावै ।
अति अनुरागि सैनि संभ्रम मिलि, संग परम सुख पावै ।
बिछुरत तोहिँ क्वासि राधा कहि, कुज-कुंज प्रति धावै ।
तेरी चित्र लिखैँ, अरु निरखैँ, बासर-बिरह नसावै ।
सूरदास रस-रासि-रसिक सौं, अन्तर क्यौँ करि आवै ॥१४१॥
अर्थ—श्यामा (राधा) तू कृष्ण को अत्यधिक प्रिय है । बैठते, उठते, चलते,
गाय चराते तुम्हारी ही लीला गाते है । (तुम्हारे) पीले रंग को (शरीर को) देखकर
पीताम्बर हृदय से लगाते है, तथा पीली धातु का (शरीर पर) लेप करते है । (तुझे)
चन्द्रमा के समान मुख वाली जानकर मोर चन्द्रिका से मस्तक का मुकुट बनाते हैं ।