सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराधाकृष्ण १८३
एक जीव देही द्वै राची, यह कहि कहि जु सुनावैं ।
उनकी पटतर तुमकौं दीजैं, तुम पटतर वै पावैं ।
अमृत कहा अमृत-गुन प्रगटै, सो हम कहा बतावैं ।
सूरदास गूंगे कौ गुर ज्यौं, बूझति कहा बुझावैं ॥६५॥
अर्थ—हम तुमको कृष्ण कहां दिखावें । वे कहीं भी तुमसे अलग नही रहते और
(तुम्हें) तनिक भी नही भुलाते । एक जीव तथा दो शरीर की रचना की है, यह कह-
कह कर सुनाते है । उनकी उपमा तुमको दी जाय तथा तुम्हारी उपमा उनको प्राप्त
हो । अमृत कैसे अमृत गुण प्रकट करता है, उसे हम कैसे बताये । सूरदास कहते हैं कि
गूंगे के गुड़ के समान पूछने पर कैसे समझाया जाय ॥६५॥
सुनि राधा यह कहा बिचारै ।
वै तेरैं तू उनकैं रंग, अपनो मुख क्यौं न निहारै ।
जो देखौ तौ छांह आपनी, स्याम-ह्रदै ह्याँ छाया ।
ऐसी दशा नंद-नंदन की, तुम दोउ निर्मल काया ।
नीलांबर स्यामल तनु की छबि, तुम छवि पीत सुबास ।
घन-भीतर दामिनी प्रकाशित, दामिनि घन-चहुँ पास ।
सुन री सखी बिलख कहौं तोसौँ, चाहति हरि कौ रूप ।
सूर सुनहु तुम दोउ सम जोरी, एक स्वरूप अनूप ॥६६॥
अर्थ —सुनो राधा यह विचार क्यों करती हो । वह तुम्हारे रंग मे तुम उनके
रंग में (रंग गयी हो), अपने मुख को क्यों नही निहारती हो । जो देखो तो अपनी
छाया (देखो), कृष्ण का हृदय यहाँ छाया है। ऐसी दशा श्रीकृष्ण की है। तुम दोनों
निर्मल शरीर (वाले) हो । नीले आकाश के समान श्यामल कृष्ण का शरीर है और
तुम्हारी पीली सुगन्धित छवि है । बादल के भीतर (जैसे) बिजली प्रकाशित हो या
बिजली वादल के चारों तरफ ( छायी ) हो । सुनो री सखी ताड़ करके तुमसे बात
कहती हूँ (तुम) कृष्ण के रूप को चाहती हो । सूरदास कहते है कि (सखी कहती है)
तुम दोनों समान जोड़ी तथा एक अनुपम स्वरूप वाले हो ॥६६॥
पिय तेरैं बस यौं री माई ।
ज्यौँ संगहिं संग छाँह देह-वस, प्रेम कह्यौ नहिँ जाई ।
ज्यौँ चकोर बस सरद चंद्र कैं, चक्रवात बस-भान ।
जैसेँ मधुकर कोमल कोस-बस, त्यौँ बस स्याम सुजान ।
ज्यौँ चातक बस स्वाँति बूँद कैँ, तन कैँ बस ज्यौँ जीय ।
सूरदास-प्रभु अति बस तेरैँ, समुझ देखि धौँ हीय ॥६७॥
अर्थ—सखी ! प्रिय कृष्ण यों तुम्हारे वश मे हैं जैसे साथ-ही-साथ रहने वाली
छाया शरीर के वश में रहती है । ( तुम दोनों का ) प्रेम कहा नही जा सकता ।
(अकथनीय है) । जैसे चकोर शरद ऋतु के चन्द्रमा के वश मे रहता है, चक्रवाक सूर्य