सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंके वश में है और भ्रमर कमल के फूलों (बंधी हुई कली) के वश में रहता है वैसे ही
कृष्ण (तुम्हारे) वश मे हैं। जैसे चातक स्वांती नक्षत्र के (बादलो के) बूंद के वश मे
रहता है तथा शरीर के वश मे प्राण है। सूरदास कहते हैं कि (वैसे) कृष्ण तुम्हारे
अत्यधिक वश मे है, निश्चय ही यह हृदय को देखकर समझ लो ॥६७॥
लघुमान लीला
मैँ अपनैँ जिय गर्व कियौ।
वै अंतरजामी सब जानत, देखत ही उन चरचि लियौ।
कासौँ कहाँ मिलावै को अब, नैँकु न धीरज धरत जियौ।
वै तौ निठुर भये या बुधि सौँ, अहंकार फल यहै दियौ।
तब आपुन कौँ निठुर कराबति, प्रीति सुमिरि भरि लेति हियौ।
सूर स्याम प्रभु वै बहु नायक, मो सौँ उनकैँ कोटि तियौ ॥६८॥
अर्थ—मैने अपने मन मे गर्व किया। वे अन्तर्यामी सब जानते हैं, देखते ही
उन्होंने अनुमान कर लिया। किससे कहूँ अब कौन मिलाये, हृदय तनिक भी धैर्य नही
धरता। वे तो इस बुद्धि से निष्ठुर हो गये और अहंकार का यही फल दिया। तब
अपने को निष्ठुर कहती हूँ, जब उनका प्रेम से स्मरण करके हृदय भर आता है।
सूरदास कहते है (राधा कहती है) वे बहुत सी स्त्रियो के नायक हैं हमारे समान
उनकी हजारो स्त्रियां हैं ॥६८॥
महा बिरह-वन माँझ परी।
चकित भई ज्यौँ चित्र-पूतरी, हरि मारग बिसरी।
सँग बटपार गर्व जब देख्यौ, साथी छोड़ि पराने।
स्याम-सहर-अँग-अंग-माधुरी, तहँ वै जाइ लुकाने।
यह बन माँझ अकेली व्याकुल, सम्पति गर्व छँड़ायौ।
सूर स्याम-सुधि टरति न उर तैँ, यह मनु जीव बचायौ ॥६६॥
अर्थ—(मैं) महान विरह वन के बीच पड गयी। चित्र की पुतली के समान (मैं)
चकित हो गयी और कृष्ण रूपी मार्ग भूल गयी। संग मे वटपार रूपी गर्व को देखकर
साथी छोडकर भाग गये। श्याम रूपी शहर की अग-अंग की मधुरिमा मे वे जाकर छिप
गये। इस वन मे अकेली व्याकुल हूँ। गर्व ने सम्पत्ति को छीन लिया। सूरदास कहते है
कि (राधा कहती है) हृदय से स्मृति टलती नही, मानो इसी ने जीव बचा दिया ॥६६॥
राधा-भवन सखी मिलि आईँ।
अति ब्याकुल सुधि-बुधि कछु नाहीँ, देह दसा बिसराईँ।
बाँह गही तिहिँ बूझन लागीँ, कहा भयौ री माई।
ऐसी बिबस भई तू काहैँ, कहौ न हमहिँ सुनाई।
कालिहिँ और बरन तोहिँ देखी, आजु गई मुरझाई।
सूर स्याम देखे की बहुरौ, उनहिँ ठगौरी लायौ ॥१००॥