सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० सूरसागर सार सटीक
में चले जा रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि उस छवि को नागरि (राधा) नैन चुराकर
देखती जाती है ॥११२॥
स्याम स्यामा कुंज वन आवत ।
भुज भुज कण्ठ परस्पर दीन्हें, यह छवि उनहीं पावत ।
इततैं चन्द्रावली जाति ब्रज, उततैं ये दोउ आए ।
दूरिहिं तैं चितवति उनहीं तन, इक टक नैन लगाए ।
एक राधिका दूसरि को है, याकौं नहिं पहिचानौं ।
ब्रज-वृषभानु-पुरा-जुवतिनि कौं, इक-इक करि मैं जानौं ।
यह आई कहूँ और गाँव तैं, छवि साँवरी सलोनी ।
सूर आजु यह नई बतानी, एकौ अँग न विलोनी ॥११३॥
अर्थ-राधा ओर कृष्ण कुंज वन मे आते हैं। परस्पर भुजा एक दूसरे के कंठ
से लगाये हुए हैं। यह शोभा वे ही पाते हैं (अन्यत्र उपमा नही है)। इधर से चन्द्रावली
ब्रज को जा रही थी, उधर से ये दोनो आ गये। दूर ही से उन्ही की ओर एकटक
लगाकर नैनों से निहारती है। एक तो राधिका है दूसरी कौन है, इसे पहचानती नही
हूँ। (क्योकि) मैं तो ब्रज और वृषभानु नगर की एक-एक युवती को जानती हूँ। यह
सांवरी सलोनी छवि वाली किसी ओर गांव से आई है (क्या) ? सूरदास कहते हैं
(चन्द्रावली कहती है) यह नई (स्त्री) दिखलाई दी जिसका एक भी अंग लावण्यविहीन
नही है ॥११३॥
यह वृषभानु-सुता वह को है।
याकी सरि जुवती कोउ नाहीं, यह त्रिभुवन-मन मोहै ।
अति आतुर देखन कौं आवति, निकट जाइ पहिचानौं ।
ब्रज मैं रहति किधौं कहूँ औरै, बूझे तैं तब जानौं ।
यह मोहिनी कहाँ तैं आईं, परम सलोनी नारी ।
सूर स्याम देखत मुसुक्यानी, करी चतुरई भारी ॥११४॥
अर्थ - यह वृषभानु की बेटी (राधा) है, परन्तु वह कौन है। इसके समान
और कोई स्त्री नही है, यह तीनो लोक के मन को मोहने वाली है (त्रिभुवन मोहनी
है)। अत्यन्त आतुर होकर इसे देखने के लिए आ रही हूँ, निकट जाकर पहचानूं।
ब्रज में रहती है कि कही और पूछने पर जानूंगी। यह परम सलोनी मोहनी स्त्री
कहां से आ गई। सूरदास कहते हैं कि (राधा) कृष्ण को देखकर मुसकरायी ओर
(कहा) कि भारी चतुरता की है ॥११४॥
कहि राधा ये को है री।
अति सुंदरी साँवरी सलोनी, त्रिभुवन-जन-मन-मोहै री ।
ओर नारि इनकी सरि नाहीं, कहीं न हम-तन जोहै री ।
काकी सुता, वधू है काकी, जुवती धौं है री ।