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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

राधाकृष्ण १५६
अतिहीँ सुंदर कहियत हैंँ वै, मोकौँ देहु वताई ।
सूरदास राधा की बानी, सुनत सखी भरमाई ॥३२॥
अर्थ-नंद के पुत्र कृष्ण कैसे है ? (उन्हें) आंख भरके कभी देखा नहीं,
(यद्यपि) वह ब्रज में सदा रहते है । तुमसे एक बात कहने में सकुचाती हूँ , उसे सुनाया
नही जाता । कैसे भी उनको हमे दिखाओ, यह (भावना) मेरे मन मे आ गयी है ।
वह अत्यधिक सुन्दर कहे जाते हैं, (उन्हे) मुझे बता दो । सूरदास कहते हैं कि राधा
की वाणी सुनकर सखी भ्रम मे पड़ गयी ॥३२॥
सुनहु सखी राधा की बानी ।
ब्रज बसि हरि देखे नहिँ कबहूँ, लोग कहत कछु अकथ कहानी ।
यह अब कहत दिखावहु हरि कौँ, देखहु री यह अचिरज मानी ।
जो हम सुनति रही सो नाहीँ, ऐसेँ ही यह वायु बहानी ।
ज्वाव न देत बनै काहू सौँ, मन मैँ यह काहू नहिँ मानी ।
सूर सबै तरुनी मुख चाहतिँ, चतुर-चतुर सौँ चतुरई ठानी ॥३३॥
अर्थ-सखी, राधा की बात तो सुनो । ब्रज मे बसकर इसने कृष्ण को कभी
नही देखा, और लोग तो बेसिर-पैर की बात करते हैं अथवा कुछ न कही जा सकने
वाली कहानी कहते हैं । यह अब कहती है कि कृष्ण को दिखाओ, यह श्रेष्ठ आश्चर्य
देखो । जो हम सुनती रही वह (ठीक) नही है, यह ऐसे ही हवा मे बह गयी इसकी
(चर्चा चल पड़ी) । किसी से जवाब नही देते बनता, मन मे कोई इसे मानेगा भी
नही । सूरदास कहते हैं कि सभी युवतियां (कृष्ण के) मुख (का दर्शन) चाहती है,
फिर (इसके लिए) चतुर-से-चतुर स्त्रियों ने चतुरता ठान ली ॥३३॥
सुनि राधे तोहिँ स्याम दिखैहैँ ।
जहाँ तहाँ ब्रज-गलिनि फिरत हैंँ, जब इहिँ मारग ऐहैँ ।
जबहीँ हम उनकौँ देखैँगी, तबहीँ तोहिँ बुलैहैँ ।
उनहूँ कैँ लालसा बहुत यह, तोहिँ देखि सुख पैहैँ ।
दरसन तैँ धीरज जब रैहै, तब हम तोहिँ पत्यैहैँ ।
तुमकौँ देखि स्याम सुन्दर घन, मुरली मधुर बजैहैँ ।
तनु त्रिभंग करि अंग अंग सौँ, नाना भाव जनैहैँ ।
सूरदास-प्रभु नवल कान्ह बर, पीतांबर फहरैहैँ ॥३४॥
अर्थ-सुनो राधा तुम्हे कृष्ण को दिखाऊँगी । वे जहाँ-तहाँ ब्रज की गलियो
मे घूमते रहते हैं । जब इस मार्ग से आयेंगे और जब उनको हम देखेगे तभी तुम्हे
बुलायेगे । उनकी भी बहुत अभिलाषा है, तुम्हे देखकर सुख पायेगे । दर्शन से जब तुम्हे
धीरज रहेगा तभी हम लोग तुम्हारा विश्वास करेंगे । तुमको देखकर श्यामसुन्दर कृष्ण
मधुर मुरली बजायेगे । शरीर को त्रिभंगी (तीन तरह) आकृति मे मोड़कर अग-अंग से

१६० सूरसागर सार सटीक
अनेक भाव दिखायेगे । सूरदास कहते हैं (गोपी कहती है) नवल तथा श्रेष्ठ कृष्ण
पीताम्बर फहरायेगे ॥३४॥
माता की सीख
काहे कौं पर-घर छिनु-छिनु जाति ।
घर मैं डांटि देति सिख जननी, नाहिंन नैंकु डराति ।
राधा-कान्ह कान्ह राधा व्रज, ह्वै रह्यौ अतिहि लजाति ।
अब गोकुल की जैबौ छाँड़ौ, अपजस हू न अघाति ।
तू वृषभानु बड़े की बेटी, उनकैं जाति न पांति ।
सूर सुता समझावति जननी, सकुचति नहिँ मुसुकाति ॥३५॥
अर्थ—दूसरे के घर क्षण-क्षण क्यो जाती हो । घर मे माता फटकार कर सीख
देती है कि तुम तनिक भी नही डरती हो । राधा-कृष्ण और कृष्ण-राधा यही चर्चा
व्रज मे व्याप्त हो गयी है, इससे (मुझे) अत्यधिक लाज लगती है । अब गोकुल का
जाना छोड़ दो, अपयश से (तुम) नही अघाती हो । तुम श्रेष्ठ वृषभानु की बेटी हो,
उन (कृष्ण) की जाति-पांति का कुछ ठीक नही है । सूरदास कहते हैं कि माता पुत्री को
समझाती हैं । इससे राधा सकुचाती नही (बल्कि) मुसकाती है ॥३५॥
खेलन कौं मैं जाउं नहीं ?
और लरिकिनी घर घर खेलति, मोहीँ कौं पै कहति तुहीँ ।
उनकैं मातु पिता नहिं कोई, खेलत डोलतिँ जहाँ तहीँ ।
तोसी महतारी वहि जाइ न, मैं रहौँ तुमहीँ बिनुहीँ ।
कबहूँ मोकौं कछू लगावति, कबहूँ कहति जनि जाहु कही ।
सूरदास बातैँ अनखौहीँ, नाहिंन मो पै जाति सही ॥३६॥
अर्थ—(राधा कहती है) मैं खेलने न जाऊँ ?-और लड़कियां घर-घर खेलती
हैं; किन्तु तुम मुझे ही कहती हो । (क्या) उनके माता-पिता नही है, जहां-तहां खेलती
डोलती हैं । तुम्हारी जैसी मां मर जाय, मैं तुम्हारे बिना ही रहूँगी । कभी मुझे कुछ
लगाती हो, कभी कहती हो कही खेलने मत जाओ । सूरदास कहते हैं (राधा कहती है)
यह क्रोध दिलाने वाली बात मुझसे सही नही जाती ॥३६॥
मनहौँ मन रीझति महतारी ।
कहा भई जौ बाढ़ि तनक गई, अबहौँ तौ मेरी है वारी ।
झूठैँ हीँ यह बात उड़ी है, राधा-कान्ह कहत नर नारी ।
रिस की बात सुता के मुख की, सुनत हँसति मनहीँ मन भारी ।
अब लौँ नहीँ कछू इहिँ जान्यौ, खेलत देखि लगावैँ गारी ।
सूरदास जननी उर लावति, मुख चूमति पोँछति रिस टारी ॥३७॥
अर्थ—मन-ही-मन माता रीझती है । क्या हुआ जो तनिक बढ़ गयी, अभी तो
मेरी लड़की का बचपन ही है । यह बात झूठ ही उड़ गयी है और नर और नारी राधा

राधाकृष्ण १६१
और कृष्ण का नाम व्यर्थ ही लगाते है। वे पुत्री के मुख की क्रोध की बाते सुनकर मन-
ही-मन बहुत हंसती है। अब तक इसके विषय मे लोगो ने कुछ नही जाना, केवल
खेलते देखकर आरोप लगाते है। सूरदास कहते हैं कि माता (राधा को) हृदय से
लगाती है और क्रोध दूर कर पोछती तथा मुख चूमती है ॥३७॥
सुता लए जननी समुझावति।
संग बिटिनियनि कैँ मिलि खेलौ, स्याम-साथ सुनि-सुनि रिस पावति।
जातैँ निंदा होइ आपनी, जातैँ कुल कौँ गारी आवति।
सुनि लाड़ली कहति यह तोसैं, तोकौँ यातैँ रिस करि धावति।
अब समुझी मैं बात सबनि की, झूठैं ही यह बात उड़ावति।
सूरदास सुनि सुनि ये बातैँ, राधा मन अति हरष बढ़ावति ॥३८॥
अर्थ—बेटी को लेकर माता समझाती है कि लडकियो के साथ मिलकर खेलो ।
कृष्ण के साथ (खेलने की बात) सुनकर क्रोध आता है। जिससे अपनी निंदा हो
और कुल को गाली आती हो (उसे नही करना चाहिए)। सुनो प्यारी बेटी यह तुमसे
कहती हूँ, तेरी ओर इसी से क्रोध करके दौड़ती हूँ। अब मैं सबकी बात समझ गयी ।
(सब) लोग झूठ ही (कृष्ण और तुम्हारे बारे में) बात उडाते है । सूरदास कहते हैं कि
ये बाते सुन-सुनकर राधा अपने मन में हर्षित होती है ॥३८॥
राधा विनय करत मनहौँ मन, सुनहु स्याम अंतर के जामी।
मातु-पिता कुल-कानिहिं मानत, तुमहिँ न जानत हैं जग स्वामी।
तुम्हारौ नाउ लेत सकुचत हैं, ऐसैं ठौर रही हौं आनी।
गुरु परिजन की कानि मानियौ, बारंबार कही मुख बानी।
कैसे संग रहौं विमुखनि कैँ, यह कहि-कहि नागरि पछितानी।
सूरदास-प्रभु कैँ हिरदै धरि, गृह-जन देखि-देखि मुसुकानी ॥३६॥
अर्थ—राधा मन-ही-मन निवेदन करती है कि हे अंतर की बात जानने वाले
कृष्ण सुनो !—माता और पिता तो कुल की मर्यादा को मानते है, (इसी से) संसार के
स्वामी तुमको (जानकर भी) नही जानते (अर्थात् भुला देते हैं)। मैं ऐसे स्थान पर रह
रही हूँ जहाँ तुम्हारा नाम लेते सकुचाती हूँ। (तुमने) बार-बार अपने मुख से यह बात
कही कि गुरुजन की मर्यादा मानो। (लेकिन) भगवान् से विमुख (लोगो) के साथ कैसे
रहूँ; यह कहकर नागरि राधा पछताती है। सूरदास कहते है कि प्रभु को हृदय मे घर-
कर घर के लोगो को देख-देखकर (राधा) मुसकायी ॥३६॥
कृष्ण-दर्शन
राधा जल बिहरति सखियन संग।
ग्रीव-प्रजत नीर मैं ठाढीँ, छिरकति जल अपनैं अपनैं रंग।
११

१६२ सूरसागर सार सटीक
मुख भरि नीर परसपर डारतिं, सोभा अतिहिं अनूप बढ़ी तब।
मनहु चंद-गन सुधा गंडूषनि, डारति हैं आनंद भरे सब।
आईं निकसि जानु कटि लौं सब, अंजुरिन तैं लै लै जल डारतिं।
मानहु सूर कनक-वल्ली जुरि, अमृत-बूँद पवन-मिस झारतिं ॥४०॥
अर्थ—राधा सखियों के साथ जल में विहार करती हैं। गले तक पानी में खड़ी
अपने आप में मगन पानी छिड़कती है। मुँह में भरकर आपस में पानी डालती हैं तब
अत्यधिक अनुपम शोभा बढ़ जाती है, मानो चन्द्रमा के समूह आनन्द से भरकर अपने
मुख से अमृत के कुल्ले डाल रहे हों (इसी प्रकार गोपियां आनन्द से भरकर जल डालती
हैं)। पुनः जाँघ तथा कमर तक पानी में सब निकलकर अंजुलियों से जल डालने
लगीं। सूरदास कहते हैं मानो सोने की लतायें झुंडकर हवा के बहाने अमृत के बूंदों की
झड़ी लगाती हैं ॥४०॥
जमुना-जल बिहरति ब्रज-नारी।
तट ठाढ़े देखत नंद-नंदन, मधुरि मुरलि कर धारी।
मोर-मुकुट, स्रवननि मनि कुंडल, जलज-माल उर भाजत।
सुंदर सुभग स्याम तन नव घन, विच वग पाँति विराजत।
उर बनमाल सुमन बहु भांतिनि, सेत, लाल, सित पीत।
मनहुँ सुरसरी तट बैठे सुक, वरन वरन तजि भीत।
पीतांबर कटि तट छुद्रावलि, बाजति परम रसाल।
सूरदास मनु कनकभूमि ढिग, बोलत रुचिर मराल ॥४१॥
अर्थ—यमुना के जल में ब्रज की स्त्रियां विहार करती हैं। तट पर खड़े कृष्ण
हाथ में मधुर मुरली लिए हुए देखते हैं। (सिर पर) मोर मुकुट, कानों में मणि का
कुंडल और वक्षस्थल पर मोती की माला शोभित है। (माला ऐसे शोभित है जैसे)
सुन्दर तथा सुभग कृष्ण के शरीर रूपी नये बादल के बीच बगुलों की पंक्ति शोभित हो।
वक्षस्थल की वनमाला में सफेद, लाल, पीले तथा उज्ज्वल अनेक तरह के फूल हैं, मानो
गंगा के किनारे भय छोड़कर तरह-तरह के रंगों के तोते बैठे हों। कमर पर पीताम्बर
है तथा करधनी अत्यन्त आनन्ददायक ध्वनि करती है। सूरदास कहते हैं कि मानो सोने
की भूमि के पास रुचिपूर्वक हंस बोल रहे हैं ॥४१॥
चितवनि रोके हूँ न रही।
स्याम सुंदर सिंधु-सनमुख, सरित उमंगि बही।
प्रेम-सलिल-प्रवाह भँवरनि, मिति, न कबहूँ लही।
लोभ-लहर-कटाच्छ, घूँघट-पट-करार ढही।
थके पल पथि, नाव धोरज परति नहिंन गही।
मिली सूर सुभाव स्यामहिं, फेरिहू न चही ॥४२॥

राधाकृष्ण १६३
अर्थ-(गोपी की) दृष्टि रोकने पर भी न रुकी। श्याम सुन्दर रूपी समुद्र की
ओर (दृष्टि रूपी) नदी उमगकर वह चली। प्रेम रूपी जल के प्रवाह की भँवरो (आंख
की भौंहो) (कृष्ण से) की गहराई का अनुमान कभी (सुख) नही मिला। (मिलन) के
लोभ तथा (आंख की) कटाक्ष रूपी लहर से घूंघट रूपी किनारा ढह गया। पलक रूपी
पथिक थक गये। धीरज की नाव सम्हाली नही जाती। सूरदास कहते हैं कि यह दृष्टि
स्वभावतः कृष्ण मे मिल गयी, फिर वापस हो कर भी नही देखा (मुडकर भी नही
देखा) ॥४२॥
' हमहिं कह्यौ हौँ स्याम दिखावहु ।
देखहु दरस नैन भरि नीकैं, पुनि-पुनि दरस न पावहु ।
बहुत लालसा करति रही तुम, वे तुम कारन आए ।
पूरी साध मिली तुम उनकौँ, यातैँ हमहिं भुलाए ।
नीकैँ सगुन आजु ह्याँ आईं, भयौ तुम्हारौ काज ।
सुनहु सूर हमकौँ कछु दैहौ, तुमहिँ मिले ब्रजराज ॥४३॥
अर्थ-हमसे (तुमने) कहा कि (हमे) कृष्ण को दिखाओ। अब सुन्दर (कृष्ण)
को आंख भरकर देखो। वार-बार दर्शन नही पाओगी। तुम बहुत अभिलाषा करती
रही। तुम्हारे ही कारण वह (यहाँ) आये हैं। तुम उनको मिल गयी जिससे तुम्हारी
इच्छा पूरी हो गयी, इसी से तुमने हम लोगो को भुला दिया। आज शुभ अवसर
(सगुन) था कि यहाँ आ गई जिससे तुम्हारा काम हो गया। सूरदास कहते हैं कि सखी
राधा से कहती है, तुमको कृष्ण मिल गये अब हमको भी कुछ दोगी ? ॥४३॥
राधा चलहु भवनहिँ जाहिँ ।
कबहिँ की हम जमुना आईं, कहहिँ अरु पछिताहिँ ।
कियौ दरसन स्याम कौ तुम, चलौगी की नाहिं ।
बहुरि मिलिहौ चीन्हि राखहु, कहत, सब मुसुकाहिँ ।
हम चलीँ घर तुमहुँ आवहु, सोच भयौ मन माहिँ ।
सूर राधा सहित गोपी, चलीँ ब्रज-समुहाहिँ ॥४४॥
अर्थ-राधा चलो घर चले। हम लोग कब की यमुना आई है। सखियां
(ऐसा) कहती और पछताती हैं। तुमने कृष्ण का दर्शन कर लिया (अब) चलोगी कि
नही। फिर मिलोगी, पहचान रखो (ऐसा) कहकर सब सखियां हंसती है। हम घर
चलती हैं तुम भी आओ (यह सुनकर राधा को) मन मे सोच हो गया। सूरदास कहते
हैं कि राधा सहित गोपियां ब्रज की ओर (सम्मुख) चली ॥४४॥
कहि राधा हरि कैसे हैं।
तेरैँ मन भए की नाहीँ, की सुदर, को नैंसे हैं।
कौ पुनि हमहिँ दुराव करौगी, की कैहौँ वै जैसे हैं।
की हम तुमसौँ कहति रहीँ ज्योँ, साँच कहौ की तैसे हैं।

१६४ सूरसागर सार सटीक
नटवर-वेष काछनी काछे, अंगनि रति-पति-सै से हैं।
सूर स्याम तुम नीकैं देखे, हम जानत हरि ऐसे हैं ॥४५॥
अर्थ--कहो राधा कृष्ण कैसे हैं ? तुम्हारे मन को अच्छे लगे कि नही । सुन्दर हैं
कि बुरे हैं । फिर हमसे छिपाव करोगी, कि कहोगी कि वह जैसे हैं (होंगे) । या हम तुमसे
जैसा कहती थी, सच्ची कहो वैसे हैं (कि नही) । नटवर वेष पर काछनी पहने (कृष्ण के)
अंग सैकडो कामदेव के समान हैं; सूरदास कहते हैं कि (सखियां कहती हैं) तुमने अच्छी
तरह से देखा (या नही) हम तो जानती ही हैं कि कृष्ण इस तरह (सुन्दर) हैं ॥४५॥
स्याम सखि नीकैं देखे नाहिं।
चितवत ही लोचन भरि आए, वार-वार पछिताहिं ।
कैसेहुँ करि इकटक मैं राखति, नैकहिं मैं अकुलाहिं ।
निमिष मनौ छवि पर रखवारे, तातैं अतिहिं डराहिं ।
कहा करूँ इनकौ कह दूषन, इन अपनी सी कीन्ही ।
सूर स्याम-छवि पर मन अटक्यौ, उन सब सोभा लोन्ही ॥४६॥
अर्थ-हे सखी कृष्ण को अच्छी तरह देखा नही, देखते ही आंखें भर आयी
और (मैं) वार-वार पछताने लगी । किसी तरह मैं (आंखों को) एकटक रखती लेकिन
वे जल्दी ही आकुल हो जाती थी । मानो निमिष शोभा की रखवाली कर रहे हों, उसी
से अत्यधिक डरते हों । इनको दोष देकर क्या करे, इन्होने तो अपना सा किया । सूर-
दास कहते हैं कि (राधा कहती है) मन कृष्ण की छवि पर अटक गया किन्तु उन (नेत्रो
ही) ने सब शोभा ले ली ॥४६॥
राधा का अनुराग
पुनि-पुनि कहति हैं ब्रज नारि ।
धन्य बड़ भागिनी राधा, तेरैं वस गिरिधारि ।
धन्य नंद-कुमार धनि तुम, धन्य तेरी प्रीति ।
धन्य दोउ तुम नवल जोरी, काम कलानि जीति ।
हम विमुख, तुम कृष्ण संगिनी, प्रान इक, द्वै देह ।
एक मन, इक बुद्धि, इक चित, दुहुँनि एक सनेह ।
एक छिनु विनु तुम्हहिं देखैं, स्याम धरत न धीर ।
मुरलि मैं तुम नाम पुनि पुनि, कहत हैं बलवीर ।
स्याम मनि तैं परखि लीन्हौं, महा चतुर सुजान ।
सूर के प्रभु प्रेमही बस, कौन तो सरि आन ॥४७॥
अर्थ--बार-बार ब्रज की स्त्रियां कहती हैं कि बड़े भाग्यवाली राधा तू धन्य है,
क्योकि कृष्ण तुम्हारे वश मे हैं । कृष्ण धन्य हैं, तुम धन्य हो तथा तुम्हारी प्रीति धन्य
है । काम की कलाओ को जीतने वाली तुम दोनों की नयी जोड़ी धन्य है । हम (कृष्ण
से) विमुख हैं, तुम कृष्ण की संगिनी हो, (तुम दोनों का) प्राण एक है और शरीर दो

हैं। एक ही मन, एक ही बुद्धि, एक चित् तथा दोनो का एक ही स्नेह है। बिना
तुम्हे देखे कृष्ण एक भी क्षण धैर्य नही धरते है। कृष्ण मुरली में तुम्हारा नाम बार-बार
कहते है। महा चतुर, सुजान कृष्ण ने मन से परख लिया। सूरदास कहते है कि कृष्ण
प्रेम ही के वश मे हैं। (राधा) तुम्हारे समान और कौन है ? ॥४७॥
राधा परम निर्मल नारि ।
कहति हौँ मन कर्मना करि, हृदय-दुविधा टारि ।
स्याम कौँ इक तुहीँ जान्यौ, दुराचारिनि और ।
जैसेँ घट पूरन न डोलै, अध भरी डगडौर ।
धनी धन कबहूँ न प्रगटै, धरै ताहि छपाइ ।
तैँ महानग स्याम पायौ, प्रगटि कैसैँ जाइ ।
कहति हौँ यह बात तोसौँ, प्रगट करिहौँ नाहिं ।
सूर सखी सुजान राधा, परस्पर मुसुकाहिँ ॥४८॥
अर्थ—राधा परम स्वच्छ स्त्री है। मैं मन और कर्म से दुविधा टालकर कहती
हूँ। कृष्ण को केवल तुम्ही ने जाना और (स्त्रियां तो) दुराचारिणी हैं। जैसे भरा हुआ
घड़ा हिलता-डुलता नही, किन्तु आधा भरा (घड़ा) डगमगाता रहता है। धनी धन को
कभी प्रकट नही करता, उसे छिपाकर रखता है, उसी तरह तुमने महामणि कृष्ण को
पाया है, उसे प्रकट कैसे किया जाय। मैं तुमसे यह बात कहती हूँ कि (तुम) इसे प्रकट
नही करोगी। सूरदास कहते हैं कि सखी तथा सुजान राधा आपस में मुसकाती हैं ॥४८॥
तैँ ही स्याम भले पहिचाने ।
साँची प्रीति जानि मनमोहन, तेरेहिँ हाथ बिकाने ।
हम अपराध कियौ कहि तुमसौँ, हमहीँ कुलटा नारि ।
तुमसौँ उनसौँ बीच नहीं कछु, तुम दोऊ बर-नारि ।
धन्य सुहाग भाग है तेरौँ, धनि बड़भागी स्याम ।
सूरदास-प्रभु से पति जाकैँ, तोसी जाकैँ बाम ॥४९॥
अर्थ--तुमने ही कृष्ण को भली-भांति पहचाना। कृष्ण सच्चा प्रेम जानकर तेरे
ही हाथ बिक गये। हमने तुमसे कहकर अपराध किया क्योकि हम कुलटा स्त्री हैं। तुममें
और उन (कृष्ण) मे कुछ अन्तर नही है, तुम दोनो पति-पत्नी हो। तुम्हारा सुहाग
तथा भाग्य धन्य है, तथा बड़े भाग्य वाले कृष्ण धन्य हैं। सूरदास कहते हैं कि (सखी
कहती है) कृष्ण जैसे जिसके पति है और तुम जैसी जिनकी पत्नी है (उसका भाग्य)
निश्चय ही सराहनीय है ॥४९॥
राधा स्याम की प्यारी ।
कृष्ण पति सर्वदा तेरे, तू सदा नारी ।
सुनत बानी सखी-मुख की, जिय भयौ अनुराग ।
प्रेम-गदगद, रोम पुलकित, समुझि अपनौ भाग ।

१६६ सूरसागर सार सटीक

प्रीति परगट कियौ चाहैं, बचन बोलि न जाइ ।
नंद-नंदन काम-नायक, रहे नैननि छाइ ।
हृदय तैं कहूँ टरत नाहीं, कियौ निहचल बास ।
सूर प्रभु-रस भरी राधा, दुरत नहीं प्रकास ॥५०॥
अर्थ—राधा कृष्ण की प्यारी हैं। कृष्ण सदा तुम्हारे पति हैं तथा तू सदा
उनकी स्त्री है। सखी के मुँह से वाणी सुनकर हृदय मे प्रेम हुआ। अपने भाग्य को
समझकर (वह) प्रेम से गद्गद हो गयी तथा (उसके) रोम पुलकित हो गये। प्रेम प्रकट
करना चाहती है लेकिन कुछ कहा ही नही जाता । काम के नायक कृष्ण आंखो मे
छा गये। हृदय से कही टलते नही वहीं निश्चित रूप से बस गये। सूरदास कहते हैं
कि कृष्ण के प्रेम से भरी राधा के हृदय का उल्लास छिपता नही ॥५०॥
जौ बिधना अपबस करि पाऊँ ।
तो सखि कह्यौ होइ कछु तेरौ, अपनी साध पुराऊँ ।
लोचन रोम-रोम-प्रति माँगौँ, पुनि-पुनि त्रास दिखाऊँ ।
इकटक रहैँ पलक नहिँ लागैँ, पद्धति नई चलाऊँ ।
कहा करौँ छवि-रासि स्यामघन, लोचन द्वै नहिँ ठाऊँ ।
एते पर ये निमिष सूर सुनि, यह दुख काहि सुनाऊँ ॥५१॥
अर्थ—यदि ब्रह्मा को अपने वश मे कर पाऊँ तो सखी तुम्हारा कहना कुछ
होगा और मैं अपनी इच्छा पूरी कर पाऊँ । प्रत्येक रोम मे, लोचन मे मांगू ओर उन
आंखो को बार-बार भयभीत करूँ कि वे एकटक देखती रहें तथा पलक न भाँजे । इस
तरह नयी परिपाटी चला दूँ । क्या करूँ कृष्ण रूप की राशि है और इन दोनो आंखो
मे स्थान कहाँ है। सूरदास कहते है कि (राधा सखी से कहती है) सुनो (सखी) इतने
पर इन आंखों मे पलक झपकने से निमिष होता है, इसका दुःख किससे कहूँ ॥५१॥
कहि राधिका बात अब साँची।
तुम अब प्रगट कही मो आगैँ, स्याम-प्रेम-रस माँची।
तुमकौँ कहाँ मिले, नंद-नंदन, जब उनकैँ रंग राँची।
खरिक मिले, की गोरस बेचत, की जब बिषहर वांची।
कहै बनै छाँड़ौ चतुराई, बात नहीं यह काँची ।
सूरदास राधिका सयानी, रूप-रासि-रस-खाँची ॥५२॥
अर्थ—राधा अब सच्ची बात कहो। अब तुमने मेरे आगे प्रकट रूप से कहा कि
तुम कृष्ण के प्रेम रस मे डूबी हो । तुमको कृष्ण कहाँ मिले, जब से उनके रंग मे रंग
गयी । गायो के बाँधे जाने के स्थान पर मिले थे, कि गोरस बेचते समय, या जब सांप
(के काटने) से (उनके बचाने पर) बची थी । अब कहते ही के बनेगा चतुराई छोड़िये,
यह बात कच्ची नही है। सूरदास कहते हैं कि सयानी राधा (कृष्ण के) (रूप की राशि
के रस के खिची है) अनन्त रूप सौन्दर्य के आनन्द से आकर्षित हुई है ॥५२॥

कब री मिले स्याम नहिँ जानौँ ।
तेरी सौँ करि कहति सखी री, अजहूँ नहिँ पहिचानौँ ।
खरिक मिले, की गोरस बेँचत, की अबहीँ, की कालि ।
नैननि अंतर होत न कवहूँ, कहति कहा री आलि ।
एकौ पल हरि होत न न्यारैँ, नीकैँ देखे नाहिँ ।
सूरदास-प्रभु टरत न टारैँ, नैननि सदा बसाहिँ ॥५३॥
अर्थ-कृष्ण कब मिले थे, मैं नही जानती। सखी, तुम्हारी सौगन्ध लेकर
कहती हूँ कि अब भी नही पहचानती हूँ। पशुओ के बाड़े मे मिले थे, कि गोरस बेंचते
समय, कि अभी मिले या कल। निगाह से अलग कभी होते ही नही, सखी तू क्या
कहती है। एक भी पल कृष्ण अलग नही हो रहे है, (क्योकि उनको) अच्छी तरह से
देख ही नही पाई। सूरदास कहते है कि (राधा कहती है) कृष्ण नैनो मे बस गये हैं,
टालने से टलते नही ॥५३॥
स्याम मिले मोहिं ऐसैँ माई। मैं जल कौँ जमुना तट आई ॥
औचक आए तहाँ कन्हाई । देखत ही मोहिनी लगाई ॥
तबहीँ तैँ तन-सुरति गँवाई। सूधैँ मारग गई भुलाई ॥
बिनु देखेँ कल परै न माई। सूर स्याम मोहिनी लगाई ॥५४॥
अर्थ-सखी मुझे कृष्ण ऐसे मिले। मैं यमुना के किनारे जल भरने के लिए
गयी थी। वहां अचानक कृष्ण आ गये। देखते ही मोहनी लगा दी। तभी से शरीर की
सुध खो दी। (मैं) सीधे मार्ग मे भूल गयी। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) हे
सखी तब से बिना देखे चैन नही पड़ती। (क्योकि) कृष्ण ने मोहिनी लगा दी है ॥५४॥
तबहीँ तैँ हरि हाथ बिकानी। देह-गेह-सुधि सबै भुलानी ॥
अंग सिथिल भए जैसैँ पानी। ज्यौँ-त्यौँ करि गृह पहुँची आनी ॥
बोले तहाँ अचानक बानी। द्वारैँ देखे स्याम बिनानी ॥
कहा कहौँ सुनि सखी सयानी। सूर स्याम ऐसी मति ठानी ॥५५॥
अर्थ-तभी से मैं कृष्ण के हाथ बिक गयी। शरीर और घर सब कुछ भूल
गयी। शरीर पानी की तरह शिथिल हो गया। जैसे-तैसे घर पहुँच पायी। वहाँ से
अचानक (कृष्ण) वाणी बोले। (तब) मैने द्वार पर विज्ञानी कृष्ण को देखा। सुनो
सयानी सखी क्या कहूँ, कृष्ण ने बुद्धि से ऐसा दृढ सकल्प किया ॥५५॥
जा दिन तैँ हरि दृष्टि परे री।
ता दिन तैँ मेरैँ इन नैननि, दुख सुख सब बिसरे री।
मोहन अंग गुपाल लाल के, प्रेम-पियूष भरे री।
बसे उहाँ मुसुकानि-बाँह लैँ, रचि रुचि भवन करे री।
पठवति हौँ मन, तिनहिँ मनावन, निसदिन रहत अरे री।
ज्यौँ ज्यौँ जतन, करति उलटावति, त्यौँ त्यौँ उठत खरे री।

१६८ सूरसागर सार सटीक
पचिहारी समुझाइ नीच-ऊंच, पुनि-पुनि पाँइ परे री।
सो सुख सूर कहाँ लौँ बरनौँ, इक टक तैं न टरे री ॥५६॥
अर्थ—जिस दिन से कृष्ण दिखाई पड़े, उसी दिन से मेरी इन आँखो का दुःख-
सुख सब भूल गया। गोपाल कृष्ण के मोहने वाले अङ्गो के प्रेम का अमृत इन आँखो मे
भर गया है। इन नेत्रों ने कृष्ण की मुस्कान का आश्रय लेकर वहाँ रुचिपूर्वक बना-
सँवार कर अपना घर कर लिया है। मन को उन्हे मनाने के लिए भेजती हूँ, (क्योकि)
वे (वहाँ) रात-दिन अडे रहते हैं। ज्यो-ज्यो यत्न करके वापस करवाती हूँ, त्यो-त्यो वे
ओर तेज हो जाते थे। बार-बार पैर पकड़कर, बार-बार ऊँचा-नीचा समझाकर हार
गयी। सूरदास कहते है (राधा कहती है) उस सुख का वर्णन कहाँ तक करूँ, (वे
आँखें) एक टक से (कभी) टली नही ॥५६॥
जब तैं प्रीति स्याम सौँ कीन्हीँ ।
ता दिन तैं मेरैं इन नैननि, नैंकहुँ नीँद न लीन्ही ।
सदा रहै मन चाक चढ़्यौ, सो और न कछू सुहाइ ।
करत उपाइ बहुत मिलिवे कौँ, यहै विचारत जाइ ।
सूर सकल लागति ऐसीयै, सो दुख कासौं कहियै ।
ज्यौँ अचेत बालक कौ वेदन, अपनैं ही तन सहियै ॥५७॥
अर्थ—जिस दिन से कृष्ण से प्रेम किया, उसी दिन से मेरी इन आँखो ने
किंचित नीद नही ली। मन सदा चाक पर चढा रहता है, इसी से और कुछ अच्छा
नही लगता। सदा मिलने का उपाय करती हूँ, यह विचारती जाती हूँ। सूरदास कहते
है कि (राधा कहती है) यह सब कुछ ऐसा लगता है कि इस दुःख को किससे कहा
जाय। अचेत बालक के दुःख की तरह इसे अपने ही शरीर मे सहते रहना है ॥५७॥
ना जानौँ तबहीँ तैं मोकीँ, स्याम कहा धौँ कीन्हौ री।
मेरी दृष्टि परी जा दिन तैं, ज्ञान ध्यान हरि लीन्हौ री ।
द्वारैँ आइ गए औचक हीँ, मैं आँगन ही ठाढ़ी री ।
मनमोहन-मुख देखि रही तब, काम-विथा तनु बाढ़ी री ।
नैन-सैन दै दै हरि मो तन, कछु इक भाव बतायौ री ।
पीतांबर उपरैना कर गहि, अपनैं सीस फिरायौ री ।
लोक-लाज, गुरुजन की संका, कहत न आवै बानी री ।
सूर स्याम मेरैं आँगन आए, जात बहुत पछितानी री ॥५८॥
अर्थ—मालूम नही तभी से कृष्ण ने मुझे क्या कर दिया। मेरी निगाह जिस
दिन से पड़ी उसी दिन से इन्होने (मेरा) ज्ञान, ध्यान सब कुछ हर लिया। वे अचानक
ही द्वार पर आ गये, मैं आँगन मे खड़ी थी। मनमोहन के मुख को देखकर शरीर मे
काम की पीड़ा बढ गयी। उन्होने आँखों से इशारा करके मेरी ओर कुछ एक भाव प्रकट
किया। पीताम्बर के उत्तरीय को हाथ से पकड़कर अपने सिर के चारो ओर फिरा

लिया (मानो घूंघट निकाल लिया)। लोक की लाज तथा गुरुजनो की शंका से वाणी
कही नही जाती। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) कृष्ण मेरे आँगन आये,
(उनको) जाते हुए जानकर मैं बहुत पछतायी ॥५८॥
मैँ अपनौ मन हरत न जान्यौ।
कीधौँ गयौ संग हरि कैँ वह, कीधौँ पंथ भुलान्यौ।
कीधौँ स्याम हटकि है राख्योँ, कीधौँ आपु रतान्यौ।
काहे तैँ सुधि करी न मेरी, मोपै कहा रिसान्यौ।
जबहीँ तैँ हरि ह्वाँ ह्रै निकसे, बैरु तबहिँ तैँ ठान्यौ।
सूर स्याम संग चलन कह्यौ मोहिँ, कह्यौ नहीँ तब मान्यौ ॥५९॥
अर्थ—मैंने अपने मन को हरते हुए नही जाना। वह कृष्ण के साथ गया कि
(कही) रास्ते मे भूल गया। उसे कृष्ण ने रोक रखा है या वह कृष्ण पर स्वयं रत हो
गया है। उसने मेरा ख्याल किस कारण से नही किया, मुझ पर क्यो नाराज हो
गया। जब से कृष्ण यहाँ से निकले तभी से इनसे शत्रुता ठान ली। सूरदास कहते है
कि (राधा कहती है) (मन ने) कृष्ण के साथ चलने के लिए मुझसे कहा, तब मैने
(उसका) कहना नही माना ॥५९॥
स्याम करत हैं मन की चोरी।
कैसैँ मिलत आनि पहलैँ हीँ, कहि-कहि बतियाँ भोरी।
लोक-लाज की कानि गँवाई, फिरति गुड़ी बस डोरी।
ऐसैँ ढंग स्याम अब सीख्यौ, चोर भयौ चित कौ री।
माखन की चोरी सहि लीन्हीँ, बात रही वह थोरी।
सूर स्याम भयौ निडर तबहिँ तैँ, गोरस लेत अँजोरी ॥६०॥
अर्थ—कृष्ण मन की चोरी करते है। पहले ही आकर कैसे भोली बातें कह-कह
कर मिलते हैं। लोक-लाज की मर्यादा गँवाकर, डोरी के वश में हुई पतंग की तरह
फिरती हूँ। अब कृष्ण ने ऐसा ढंग सीख लिया है कि वे चित्त के चोर हो गये हैं।
माखन की चोरी सह ली क्योंकि वह थोड़ी-सी बात थी। सूरदास कहते हैं कि (राधा
कहती है) कृष्ण तभी से ढीठ हो गये, जब से वे गोरस छीन-झपटकर ले लेते थे ॥६०॥
माई कृष्ण-नाम जब तैँ श्रवन सुन्यौ है री, तब तैँ भूली
री मौन बावरी सी भई री।
भरि भरि आवैँ नैन, चित न रहत चैन वैन नहिँ सूधौ
दसा औरहिँ ह्रै गई री।
कौन माता, कौन पिता, कौन भैनी, कौन भ्राता, कौन ज्ञान,
कौन ध्यान, मनमथ हुई री।
सूर स्याम जब तैँ परै री मेरी डीठि, वाम, काम, धाम,
लोक-लाज, कुल-कानि नई री ॥६१॥

४. मुरली माधुरी एवं रासलीला

१७० सूरसागर सार सटीक
अर्थ—सखी, कृष्ण के नाम को जब से मैंने इन कानो से सुना है, तभी से भूली
हुई, घर मे वावली-सी हो गई हूँ। आंखे भर-भर आती हैं, चित्त मे चैन नही रहता,
वाणी शुद्ध नही है, (शरीर की) दशा कुछ और ही हो गयी है। कौन माता, कौन
पिता, कौन वहन, कौन भाई, कैसा ज्ञान, कैसा ध्यान, (सब भूल गया) है और काम-
देव से घायल हो गयी हूँ। कृष्ण जब से मेरी दृष्टि मे पढे है, स्त्री-धर्म, काम-काज,
घर-गृहस्थी, लोक-लाज, कुल-मर्यादा सब कुछ मैंने भुला दिया है ॥६१॥
राधा तैं हरि कैं रँग राँची ।
तो तैं चतुर और नहिं कोऊ, बात कहौं मैं साँची ।
तैं उनकौ मन नहीं चुरायौ, ऐसी है तू काँची ।
हरि तेरौ मन अवहिं चुरायौ, प्रथम तुहीँ है नाँची ।
तुम अरु स्याम एक ही दोऊ, बाकी नाहीँ बाँची ।
सूर स्याम तेरैं बस, राधा, कहति लीक मैं खाँची ॥६२॥
अर्थ—राधा तू कृष्ण के रंग मे रंग गयी। तुमसे चतुर और कोई नही है, मैं
सच्ची बात कहती हूँ। तुमने उनका मन नही चुराया, तू ऐसी कच्ची है। कृष्ण ने
तुम्हारा मन अभी चुराया है, तुम पहले ही खुशी के मारे स्थिर न रही। तुम और
कृष्ण एक हो इसमे कुछ शेष नही है। सखी कहती है—हे राधा मै लकीर खींच कर
कहती हूँ कि कृष्ण तुम्हारे वश मे हैं ॥६२॥
तुम जानति राधा है छोटी ।
चतुराई अंग-अंग धरी है, पूरन-ज्ञान, न बुद्धि की मोटी ।
हमसौँ सदा दुराव कियी इहिँ, बात कहै मुख चोटी-पोटी ।
कबहुँ स्याम तैं नैंकु न विछुरति, किये रहति हमसौँ हठ ओटी ।
नंद नंदन याही कैं बस हैं, विवस देखि बेँदी छवि-चोटी ।
सूरदास-प्रभु वै अति खोटे, यह उनहूँ तैं अतिहीँ खोटी ॥६३॥
अर्थ—तुम जानती हो कि राधा छोटी है, किन्तु इसके अंग-अंग मे चतुरता
भरी है; यह पूर्ण ज्ञानी है, बुद्धि की मोटी नही। चिकनी चुपड़ी वातें करके इसने हमसे
छिपाव किया है। यह कभी भी कृष्ण से तनिक भी नही बिछुडती, हम से हठ पूर्वक
छिपाव किये रहती है। कृष्ण इसी के वश में हैं, बेंदी और चोटी की छवि देखकर
(कृष्ण) विवश हैं। सूरदास कहते हैं (सखियां कहती हैं) कि कृष्ण बहुत खोटे हैं, यह
(राधा) उनसे भी खोटी है ॥६३॥
सुनहु सखी राधा सरि को है ।
जो हरि हैं रतिपति मनमोहन, याकौँ मुख सो जोहै ।
जैसे स्याम नारि यह तैसी, सुंदर जोरी सोहै ।
यह द्वादस वहऊ दस द्वै कौ, ब्रज-जुवतिनि मन मोहै ।

राधाकृष्ण १७१
मैँ इनकोँ घटि वढि नहिँ जानति, भेद करै सो को है।
सूर स्याम नागर, यह नागरि, एक प्रान तन दो है ॥६४॥
अर्थ—सुनो सखी राधा के समान कौन है। जो कृष्ण कामदेव के भी मन को
मोहित करने वाले हैं वह भी इसके मुख को देखते हैं। जैसे कृष्ण है, वैसे ही यह स्त्री
है। इन दोनो की सुंदर जोडी शोभित होती है। यह बारह (वर्ष) की है, वह भी बारह
(वर्ष) के ही हैं और ब्रज की युवतियो के मन मोहते हैं। मैं इनको कम ज्यादा नही
समझती, भेद करने वाला कौन है। सूरदास कहते है कि (सखियाँ कहती हैं) कृष्ण
नागर (हैं) और यह नागरी (है)। प्राण एक है, (केवल) शरीर दो है ॥६४॥
राधा नँद-नंदन अनुरागी। -
भय चिंता हिरदै नहिँ एकौ, स्याम रंग-रस पागी।
हरद चून रँग, पय पानी ज्यौँ, दुबिधा दुहुँ की भागी।
तन-मन-प्रान समर्पण कीन्हौ, अंग-अंग रति खागी।
ब्रज-बनिता अवलोकन करि-करि, प्रेम-बिबस तनु त्यागी।
सूरदास प्रभु सौँ चित्त लाग्यौ, सोवत तैँ मनु जागी ॥६५॥
अर्थ—राधा कृष्ण से अनुराग रखने वाली है। हृदय मे भय और चिन्ता एक
भी नहीं है, कृष्ण के रंग के रस मे (वह) पग गयी है। दोनों की द्वैतता दूर हो गयी,
जैसे हल्दी चूने से मिलकर तथा दूध पानी से मिलकर (एक हो जाते है) (वैसे ही वे
दोनों हो गये)। उसने अपने तन, मन, प्राण (सब) का समर्पण कर दिया है, और
उसके अंग-अंग मे रति व्याप्त (अड) हो गयी है। ब्रज की स्त्रियो ने उसे देख-देखकर
प्रेम के कारण विवश होकर शरीर त्याग दिया। सूरदास कहते हैं कि (राधा का)
चित्त कृष्ण से लग गया, (वह) मानो सोते से जग गयी है ॥६५॥
आँखिनि मैँ बसै, जिय मैँ बसै, हिय मैँ बसत निसि दिवस प्यारौ।
तन मैँ बसै, मन मैँ बसै, रसना हूँ मैँ बसै नंदवारौ।
सुधि मैँ बसै, बुधिहू मैँ बसै, अग-अंग बसै मुकुटवारौ।
सूर बन बसै, घरहु मैँ बसै, संग ज्यौँ तरंग जल न न्यारौ ॥६६॥
अर्थ—रात दिन प्यारे आंखो में बसते है, प्राण में बसते हैं, हृदय मे बसते हैं।
कृष्ण तन मे बसते हैं, मन मे बसते हैं और जीभ मे भी बसते हैं। मुकुट वाले (कृष्ण)
स्मृति, बुद्धि और अंग-अंग मे बसते हैं। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) वन मे
बसते हैं, घर मे बसते हैं। मेरे साथ से वे उसी तरह से अलग नही हैं जैसे जल से
तरंग (पृथक् नही है) ॥६६॥
उपहास
तुम कुल बधू निलज जनि ह्वैहौ।
यह करनी उनहीँ कौँ छाजै, उनकैँ संग न जैहौ।

१७२ सूरसागर सार सटीक
राधा-कान्ह-कथा ब्रज-घर-घर, ऐसें जनि कहवैही।
यह करनी उन नई चलाई, तुम जनि हमहिँ हँसैही।
तुम ही बडे महर की बेटी, कुल जनि नाउँ धरैहौ।
सूर स्याम राधा की महिमा, यहै जानि सरमैहौ ॥६७॥
अर्थ—तुम कुल वधू होकर निर्लज्ज मत होना। यह कार्य उन्ही (कृष्ण) के
उपयुक्त है, (तुम) उनके साथ मत जाना। राधा और कृष्ण की कथा ब्रज के घर-घर
मे इस प्रकार मत चलवाओ। उन्होने यह नयी करतूत चलायी है, तुम हमारी हँसी
मत कराओ। तुम बड़े महर की बेटी हो, कुल का नाम मत घराओ। सूरदास कहते
हैं कि (सखियाँ कहती हैं) कृष्ण और राधा (इन दोनो के नाम) की महिमा जानकर
ही शर्म करो ॥६७॥
यह सुनि कै हँसि मौन रही री।
ब्रज उपहास कान्ह-राधा की, यह महिमा जानी उनहीँ री।
जैसी बुद्धि हृदय है इनकैँ, तैसीयै मुख बात कहीँ री।
रवि की तेज उलूक न जानै, तरनि सदा पूरन नभहीँ री।
विष को कीट विषहिँ रुचि मानै, कहा सुधा रसहीँ री।
सूरदास तिल-तेल-सवादी, स्वाद कहा जानै घृतहीँ री ॥६८॥
अर्थ—यह सुनकर (राधा) हँसकर मौन रह गयी। ब्रज मे कृष्ण और राधा के
उपहास की महिमा वे ही जानते हैं। उनकी जैसी बुद्धि है और जैसा हृदय है, वैसे ही
मुख से बात कहते हैं। सूर्य के तेज को उल्लू नही जानता, लेकिन सूर्य (की किरणे)
सदा आकाश मे व्याप्त हैं। विष के कीडो को विष ही रुचिकर होता है, अमृत के रस
से उनका क्या प्रयोजन। सूरदास कहते हैं कि तिल के स्वादी घी के स्वाद को
क्या जाने ॥६८॥
सहसा भेंट
इततैं राधा जाति जमुन-तट, उततैं हरि आवत घर कौँ।
कटि काछनी, वेष नटवर कौ, बीच मिली मुरलीधर कौँ।
चितै रही मुख-इंदु मनोहर, वा छवि पर वारति तन कौँ।
दूरिहु तैं देखत ही जाने, प्राननाथ सुंदर घन कौँ।
रोम पुलक, गदगद बानी कहि, कहाँ जात चोरे मन कौँ।
सूरदास-प्रभु चोरन सीखे, माखन तैं चित-वित्त-धन कौँ ॥६९॥
अर्थ—इधर से राधा यमुना के तट पर जाती है उधर से कृष्ण घर की तरफ
आते हैं। कमर मे काछनी पहने हुए नटवर के वेष वाले मुरलीधर कृष्ण को वह बीच
मे मिल गयी। वह चंद्रमा के समान मुख को देखकर उसकी मनोहर छवि पर शरीर को
न्योछावर कर देती है। दूर से देखते ही (राधा) प्राणनाथ सुन्दर कृष्ण को जान गयी।
पुलकित रोम से (राधा) गद्गद वाणी बोली कि (हे कृष्ण) मन को चुराकर कहाँ

राधाकृष्ण १७३
जा रहे हो। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) माखन को चुराने से तुम चित्त
रूपी धन-सम्पदा को चुराना सीख गये ॥६६॥
भुजा पकरि ठाढे हरि कीन्हे।
बाँह मरोरि जाहुगे कैसेँ, मैं, तुम नीकैँ चीन्हे।
माखन-चोरी करत रहे तुम, अब भए मन के चोर।
सुनत रही मन चोरत हैं हरि, प्रगट लियौ मन मोर।
ऐसे ढीठ भए तुम डोलत, निदरे ब्रज की नारि।
सूर स्याम मोहूँ निदरौगे, देहुँ प्रेम की गारि ॥७०॥
अर्थ—भुजा पकड़कर (कृष्ण को राधा ने) खड़ा कर दिया। (और कहा) बाँह
मरोड़ कर (तुम) कैसे जाओगे। मैंने तुम्हें अच्छी तरह पहचान लिया है। (पहले)
तुम माखन की चोरी करते रहे, (अब) मन के चोर हो गये हो। (मैं) सुनती रही कि
कृष्ण मन चुराते हैं, (आज) प्रकट हो तुमने मेरा मन चुरा लिया। तुम ऐसे धृष्ट हो
कि ब्रज की स्त्रियो का निरादर करते डोलते हो। सूरदास कहते है (राधा कहती है)
यदि हमारा निरादर करोगे तो मैं प्रेम की गाली दूँगी ॥७०॥
यह बल केतिक जादौ राइ।
तुम जु तमकि कै मो अबला सौँ, चले बाहँ छुटक़ाइ।
कहियत हो अति चतुर सकल अंग, आवत बहुत उपाइ।
तो जानौँ जौ अब एकौ छन, सकौ हृदय तैँ जाइ।
सूरदास स्वामी श्रीपति कौँ, भावत अंतर भाइ।
सहि न सके रति-वचन, उलटि हँसि लीन्ही कंठ लगाइ ॥७१॥
अर्थ—हे यादवो के राजा यह कितना बल है जो तुम मुझ अबला (नारी) की
बांह छुड़ाकरे चल पड़े। (तुम) कहते हो मैं समस्त अंगों से बहुत चतुर हूँ और (मुझे)
बहुत से उपाय आते है। हम इसे तब जानेगी जब एक भी क्षण मे लिए मेरे हृदय से
चले जाओ। सूरदास कहते है कि लक्ष्मीपति कृष्ण को अन्तर का भाव (बहुत) भाता
है। वे रति के वचन को सह न सके और लौटकर उन्होने (कृष्ण ने) हंसकर (राधा
को) गले से लगा लिया ॥७१॥
कुल की लाज अकाज कियौ।
तुम बिनु स्याम सुहात नहीं कछु, कहा करों अति जरत हियौ।
आपु गुप्त करि राखी मोकौँ, मैं आयसु सिर मानि लियौ।
देह-गेह सुधि रहति बिसारे, तुम तैँ हितु नहिं और बियौ।
अब मोकौँ चरननि तर राखौ, हँसि नंद-नंदन अंग छियौ।
सूर स्याम श्रीमुख की बानी, तुम पैँ प्यारी बसत जियौ ॥७२॥
अर्थ—कुल की लाज ने कार्य में (काफी) विघ्न डाला। कृष्ण तुम्हारे बिना
मुझे कुछ अच्छा नही लगता। क्या करूँ (मेरा) हृदय अत्यधिक जलता रहा है। आपने

१७४ सूरसागर सार सटीक
मुझे गुप्त करके रखा और मैंने आपकी आज्ञा मान ली। मैं शरीर तथा घर का ख्याल
भुलाये रहती हूँ। तुमसे भिन्न (मेरा) और दूसरा कोई हितैषी नही है। अब मुझे चरणो
के नीचे रखो। (इसके बाद) कृष्ण ने हँसकर (राधा के) अंग को छुआ। सूरदास
कहते है कि कृष्ण ने सुन्दर मुख से कहा, प्यारी तुम्ही पर मेरे प्राण बसते हैं ॥७२॥
मातु-पिता अति त्रास दिखावति ।
भ्राता मोहिं मारन कौं घिरवै, देखैं मोहिं न भावति ।
जननी कहति बड़े की बेटी, तोकौं लाज न आवति ।
पिता कहैं कैसी कुल उपजी, मनहीं मन रिस पावति ।
भगिनी देख देति मोहिं गारी, काहैं कुलहिं लजावति ।
सूरदास-प्रभु सौं यह कहि-कहि, अपनी विपत्ति जनावति ॥७३॥
अर्थ--माता-पिता अत्यधिक भय दिखाते हैं। भाई मुझे मारने की धमकी देते
हैं, यह देखकर मुझे (कुछ) भाता नही। माता कहती हैं बड़े की बेटी होकर तुम्हे
लाज नही आती। पिता कहते हैं कि कैसी (लड़की) कुल में पैदा हो गयी। इससे
मन-ही-मन क्रोध आता है। बहन देखकर मुझे गाली देती है कि क्यों कुल को
लजावती हो। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण से यह कह-कहकर (राधा) अपनी विपत्ति
प्रकट करती है ॥७३॥
सुंदर स्याम कमल-दल-लोचन ।
विमुख जननि की संगति कौं दुख, कब धौं करिहौ मोचन ।
भवन मोहिं भट्ठी सौं लागत, मरति सोचहीँ सोचन ।
ऐसी गति मेरी तुम आगेँ, करत कहा जिय दोचन ।
धिक वे मातु-पिता, धिक भ्राता, देत रहत मोहिं खोचन ।
सूर स्याम मन तुम्हहिँ लगान्यौ, हृदय-चून-रंग-रोचन ॥७४॥
अर्थ-कमल के दल के समान आँख वाले सुन्दर कृष्ण विमुख माताओ की
संगति के दुःख से मुझे कब छुड़ाओगे । घर मुझे भट्ठा के समान लगता है, (मैं) सोच-
सोचकर ही मरती हूँ। तुम्हारे आगे मेरा ऐसा हाल है, (तुम) जी मे दुविधा क्यो
करते हो। उन माता-पिता को धिक्कार है तथा (उस) भाई को धिक्कार है जो
(सदैव) हमे कोसते रहते हैं। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) हे कृष्ण हमारा
तुम्हीं से मन लग गया है, (हम तुम्हारे रंग मे) हल्दी और चूने के (रंग की तरह
रंग गये है) मिल जाने से रोचना (लाल) के रंग में रंजित हो गये हैं ॥७४॥
कुल की कानि कहाँ लगि करिहौँ ।
तुम आगैँ मैं कहौँ जु साँची, अब काहू नहिँ डरिहौँ ।
लोग कुटुंब जग के जे कहियत, पेला सबहिँ निदरिहौँ ।
अब यह दुख सहि जात न मोपैँ, विमुख बचन सुनि मरिहौँ ।
आपु सुखी तौ सब नीके हैं, उनके सुख कह सरिहौँ ।
सूरदास प्रभु चतुरसिरोमनि, अबकें हौं कछु लरिहौँ ॥७५॥

राधाकृष्ण १७५
अर्थ-कुल की मर्यादा (का ध्यान) कहां तक करूंगी। तुम्हारे आगे सच्ची
वात कहती हूँ कि अब किसी को नही डरूँगी। घर, संसार के लोग जो (कुछ) कहते
हैं उन्हे बलाव (हठपूर्वक) निरादर कर दूंगी। अब यह दुःख मुझसे नही सहा जाता ।
विमुख बचन सुन-सुनकर मर जाऊँगी। अगर आप सुखी है तो सब ठीक (ही) है।
उनके सुख को पूरा कर डालूंगी। सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) कि अबकी बार
मैं (भी) कुछ लडूंगो ॥७५॥
प्राननाथ हो मेरी सुरति किन करौ ।
मैं जु दुख पावति हौं, दीनदयाल, कृपा करौ, मेरी कामदंद-दुख
औ बिरह हरौ ।
तुम बहु रमनी रमन सो जानति हौं, याही के जु धौखैँ
हौ मौसों काहैँ लरी ।
सूरदास-स्वामी तुम हौ अंतरजामी सुनो मनसा बाचा मैंँ
ध्यान तुम्हरौई धरौ ॥७६॥
अर्थ-हे प्राणनाथ मेरी याद क्यो नही करते जो मैं दुःख पाती हूँ । दीनदयाल
(मुझपर) कृपा करो, मेरी काम-पीडा दुःख तथा विरह को हरो । यह समझ कर कि
मै जानती हूँ कि तुम अनेक रमणियो के साथ रमण करने 'वाले हो, मुझसे झगड़ा क्या
करते हो। सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) कृष्ण तुम अन्तर्यामी हो। (ऐसा मैने)
सुना है। (इसलिए) मन और वाणी से मै तुम्हारा ही ध्यान करती हूँ ॥७६॥
हौँ या माया ही लाँगी तुम कत तोरत ।
मेरी तौ जिय तिहारे चरननि ही मैं लाग्यौ, धीरज क्यों रहै रावरे
मुख मोरत ।
कोऊ लै बनाइ बातैं, मिलवति तुम आगैं, सोई किन आइ
मोसौँ अब है जोरत ।
सूरदास-पिय, मेरे तौ तुमहिँ हो जु जिय, तुम बिनु देखैँ मेरौ
हिय ककोरत ॥७७॥
अर्थ-मैं तो आपकी इस माया (प्रेम) में ही लग गई (पग गई) हूँ, उसे आप
क्यो तोडते है (नष्ट करते है) । मेरा तो हृदय तुम्हारे चरणो में ही लग गया है ।
तुम्हारे मुख मोड़ लेने पर मुझे धीरज किस प्रकार रहे। कोई वाते बनाकर तुम्हारे
आगे (इधर-उधर) जोड़कर कहती है वही (लोग) आकर अब हमसे जोड़ती है।
सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) कि मेरे तो प्राण तुम ही हो तुम्हें बिना देखे मेरा
हृदय कुरेदता है ॥७७॥
बिहँसि राधा कृष्न अंक लीन्ही ।
अधर सौं अधर जुरि, नैन सौं नैन मिलि, हृदय सौं हृदय
लगि, हरष कीन्ही ।

१७६ सूरसागर सार सटीक
कंठ भुज-भुज जोरि, उछंग लीन्ही नारि, भुवन-दुख टारि,
सुख दियौ भारी।
हरषि बोले स्याम, कुन्ज-बन धन-धाम, तहाँ हम तुम सग
मिलैं प्यारी।
जाहु गृह परम धन, हमहुँ जैहैं सदन, आइ कहूँ पास मोहिं
सैन दैहौ।
सूर यह भाव दै, तुरतहीँ गवन करि, कुज-गृह सदन तुम जाइ रैहौ ॥७८॥
अर्थ--हँस कर कृष्ण ने राधा को गोद मे ले लिया। ओंठ से ओठ आंख से
आंख मिलाकर, हृदय से हृदय लगाकर हर्षित किया। कंठ से भुजा जोडकर नागरि
(राधा) को गोद मे ले लिया। घर के दुखो को टालकर बहुत सुख दिया। खुश
होकर कृष्ण बोले कि घने कुज वन के कुटीर मे हम तुम प्यारी साथ मिले। हे परमधन
(राधा) घर जाओ, हम भी घर जायेगे, पास मे आकर मुझे कोई इशारा दे देना।
सूरदास कहते है कि यह भाव देकर उन्होने तुरन्त ही गमन किया और कहा कि तुम
कुज-गृह रूपी घर मे आकर रहना ॥७८॥
व्याज मिलन
सुनि री मैया काल्हिही, मोतिसरी गंवाई।
सखिनि मिलै जमुना गई, धौं उनहिं चुराई।
कीधौं जलही मैं गई, यह सुधि नहिं मेरैं।
तब तैं मैं पछिताति हौं, कहति न डर तेरैं।
पलक नहीं निसि कहूँ लगी, मोहिं सपथ तिहारी।
इहि डर तैं मैं आजुहीँ, अति उठी सवारी।
महरि सुनत चकित भई, मुख ज्वाब न आवै।
सूर राधिका गुन भरी, कोउ पार न पावै ॥७६॥
अर्थ—सुनो री माता ! कल मैंने मोतियो की माला गंवा दी। मैं सखियो से
मिलने के लिए यमुना गयी थी, शायद उन्होने ही चुरा लिया। न जाने जल ही मे
डूब गयी, मुझे याद नही है। तभी से मैं पछताती हूँ, तुम्हारे डर से तुमसे कहती नही
हूँ। रात मे तनिक भी पलक नही लगी, मुझे तुम्हारी कसम है। इसी डर से आज मैं
सबेरे ही उठ पडी। महरि यह सुनकर चकित हो गयी। उनके मुख से उत्तर नही
निकला। सूरदास कहते है कि राधा गुण से भरी है, (इसका) कोई पार नही
पाता ॥७६॥
सुनि राधा अब तोहिँ न पत्यैहौँ।
ओर हार चौकी हमेल अब, तेरैं कंठ न नैहौँ।
लाख टकटकी हानि करी तैं, सो जब तोसौँ लैहौँ।
हार बिन्ना ल्याएँ लड़बौरी, घर नहिं पैठन दैहौँ।

राधाकृष्ण १७७
जब देखौँगी वहै मोतिसरि, तबहीं तौ सचु पैहौँ।
नातरु सूर जन्म भरि तेरो, नाउँ नहीं मुख लैहौँ ॥८०॥
अर्थ—सुनो राधा अब तुम पर विश्वास नही करूंगी। हार, चौकी, हमेल
(कुछ भी) तेरे गले मे नही डालूंगी। तुमने लाख टका को हानि की है, वह जब तुमसे
लूंगी (तभी और आभूषण पहनने को दूंगी)। हे अनाड़ी, हार बिना लाए (तुम्हे) घर
में नही बैठने दूंगी। जब वही मोती का हार देखूंगी तभी सत्य मानूंगी। सूरदास कहते
हैं कि (माता कहती है) नही तो जन्म भर तुमसे मुँह से नही बोलूंगी ॥८०॥
जैहै कहाँ मोतिसरि मोरी।
अब सुधि भई लई वाही नैं, हँसति चली बृषभानु-किसोरी।
अबहीं मैं लीन्हे आवति हौं, मेरैं सँग आवै जानि को री।
देखौँ धौँ कहा करिहौँ वाकौ, बड़े लोग सीखत हैं चोरी।
मौकौँ आजु अवेर लागि है, ढूढौँगी घर-घर ब्रज खोरी।
सूर चली निधरक ह्वै सब सौं, चतुर राधिका बातनि भोरी ॥८१॥
अर्थ—मेरी मोती की माला कहाँ जायेगी। अब ख्याल हो गया, उसी ने ले
लिया है। (यह कहकर) हंसती हुई राधा चली। अभी मैं लिये आती हूँ; मेरे साथ
कोई मत आये। देखो (पकड़ने पर) उसका क्या करूँगी, बडे लोग (भी) चोरी सीखते
हैं। आज मुझे देर लगेगी, (क्योकि) ब्रज की गलियो मे घर-घर (उसे) ढूंढूंगी। सूर-
दास कहते हैं चतुर राधिका बातों से भुलाकर सबसे निधड़क होकर चली ॥८१॥
नंद-महर घर कें पिछवारैं राधा आइ बतानी।
मनौ अंब-दल-मौर देखि कें, कुहुकी कोकिल बानी।
झूठेहिं नाम लेति ललिता कौँ, काहैं जाहु परानी।
वृन्दावन-मग जाति अकेली, सिर लै दही-मथानी।
मैं बैठी परखति ह्वाँ रैहौँ, स्याम तबहिं तिहिं जानी।
कोक-कला-गुन आगरि नागरि, सूर चतुरई ठानी ॥८२॥
अर्थ—नंद महर के घर के पीछे राधा ने आकर बाते की, मानो आम के
कोमल पत्ते और बौर को देखकर कोयल कुहकी हो। झूठे ही ललिता का नाम लेती है
कि क्यो भागी जा रही हो। वृन्दावन के मार्ग पर सिर पर दही और मथानी लिये
अकेली चली जा रही है। मैं बैठकर यहां परखती रहूँगी। कृष्ण तभी उसे जान गये।
सूरदास कहते हैं कि काम-कला के गुणों मे श्रेष्ठ राधा ने चतुराई ठानी ॥८२॥
सैन दै नागरी गई बन कौँ।
तबहिं कर-कौर दियौ डारि, नहिं रहि सकै, ग्वाल जेँवत तजे,
मोह्यौ उनकौँ।
१२

५७८ सूरसागर सार सटीक
चले अकुलाइ बन धाइ, ब्याई गाइ देखिहौँ जाइ, मन हरष
कीन्हौ।
प्रिया निरखति पंथ, मिलैँ कब हरि कंत, गए इहिँ अंत, हँसि
अंक लीन्हो।
अतिहिँ सुख पाइ, अतुराइ मिले धाइ, दोउ मनी अति रंक, नव-
निधहिँ पाई।
सूर प्रभु की प्रिया, राधिका अति नवल, नवल नँदलाल के, मनहिँ
भाई ॥८३॥
अर्थ—इशारा देकर नागरि राधा वन को गयी। तभी उसने (कृष्ण ने)
हाथ का कौर रख दिया। अब उनके लिये रुकना सम्भव नही था। कृष्ण ने ग्वालों
को भी मोह लिया और उन्हें भोजन करते छोड़ दिया। मन मे हर्ष करके, आकुल
होकर वन को दौड़े कि ब्याई गाय देखूँगा। प्रिया रास्ता निहारती थी कि कंत कृष्ण
(कब) मिलेंगे, इसी बीच वे पहुँचे और उन्होंने हँसकर उसे गोद मे ले लिया। अत्यधिक
सुख पाकर दोनो आतुर होकर दौड़कर मिले जैसे दरिद्र को खजाना मिल गया हो।
सूरदास कहते है कि कृष्ण की प्रिया राधा अत्यधिक सुन्दर है और सुन्दर कृष्ण के मन
भा गयी है ॥८३॥
दीजै कान्ह काँधे कौ कंवर।
नान्हीं नान्हीँ बूँदनि वरषन लाग्यौ, भीजत कुसुंभी अंबर।
वार-वार अकुलाइ राधिका, देखि मेघ-आडंवर।
हँसि हँसि रीझि बैठि रहे दोऊ, ओढ़ि सुभग पीतांबर।
सिव सनकादिक नारद-सारद, अत न पावै तुंवर।
सूर स्याम-गति लखि न परति कछु, खात ग्याल संग संवर ॥८४॥
अर्थ—हे कृष्ण कन्धे का कम्बल दीजिए। नन्ही-नन्ही बूंदे वरसने लगी, जिससे
कुसुमी रंग का वस्त्र भीगता है। बादलों की उमड़-घुमड़ देखकर राधा बार-बार
आकुल हो गयी। हँस-हँस कर तथा रीझकर दोनों (एक साथ) पीतांबर ओढ़कर बैठ
गये। शिव, सनकादि, नारद, शारद, और तुंवर (कृष्ण का) अंत नही पाते। सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण की गति कुछ भी दिखाई नही देती जो कि ग्वालो के साथ रास्ते
का भोजन खा रहे हैं ॥८४॥
कान्ह कह्यौ वन रैनि न कीजै, सुनहु राधिका प्यारी।
अति हित सौं उर लाइ कह्यौ, अब भवन अपनैं जा री।
मातु-पिता जिय जानै न कोऊ, गुप्त-प्रीति रस भारी।
कर तैं कौर डारि मैं आयौ, देखत दोउ महतारी।
तुम जैसी मोहिं प्यारी लागति, चंद चकोर कहा री।
सूरदास स्वामी इन बातनि, नागरि रिझई भारी ॥८५॥