सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराधाकृष्ण १५६
अतिहीँ सुंदर कहियत हैंँ वै, मोकौँ देहु वताई ।
सूरदास राधा की बानी, सुनत सखी भरमाई ॥३२॥
अर्थ-नंद के पुत्र कृष्ण कैसे है ? (उन्हें) आंख भरके कभी देखा नहीं,
(यद्यपि) वह ब्रज में सदा रहते है । तुमसे एक बात कहने में सकुचाती हूँ , उसे सुनाया
नही जाता । कैसे भी उनको हमे दिखाओ, यह (भावना) मेरे मन मे आ गयी है ।
वह अत्यधिक सुन्दर कहे जाते हैं, (उन्हे) मुझे बता दो । सूरदास कहते हैं कि राधा
की वाणी सुनकर सखी भ्रम मे पड़ गयी ॥३२॥
सुनहु सखी राधा की बानी ।
ब्रज बसि हरि देखे नहिँ कबहूँ, लोग कहत कछु अकथ कहानी ।
यह अब कहत दिखावहु हरि कौँ, देखहु री यह अचिरज मानी ।
जो हम सुनति रही सो नाहीँ, ऐसेँ ही यह वायु बहानी ।
ज्वाव न देत बनै काहू सौँ, मन मैँ यह काहू नहिँ मानी ।
सूर सबै तरुनी मुख चाहतिँ, चतुर-चतुर सौँ चतुरई ठानी ॥३३॥
अर्थ-सखी, राधा की बात तो सुनो । ब्रज मे बसकर इसने कृष्ण को कभी
नही देखा, और लोग तो बेसिर-पैर की बात करते हैं अथवा कुछ न कही जा सकने
वाली कहानी कहते हैं । यह अब कहती है कि कृष्ण को दिखाओ, यह श्रेष्ठ आश्चर्य
देखो । जो हम सुनती रही वह (ठीक) नही है, यह ऐसे ही हवा मे बह गयी इसकी
(चर्चा चल पड़ी) । किसी से जवाब नही देते बनता, मन मे कोई इसे मानेगा भी
नही । सूरदास कहते हैं कि सभी युवतियां (कृष्ण के) मुख (का दर्शन) चाहती है,
फिर (इसके लिए) चतुर-से-चतुर स्त्रियों ने चतुरता ठान ली ॥३३॥
सुनि राधे तोहिँ स्याम दिखैहैँ ।
जहाँ तहाँ ब्रज-गलिनि फिरत हैंँ, जब इहिँ मारग ऐहैँ ।
जबहीँ हम उनकौँ देखैँगी, तबहीँ तोहिँ बुलैहैँ ।
उनहूँ कैँ लालसा बहुत यह, तोहिँ देखि सुख पैहैँ ।
दरसन तैँ धीरज जब रैहै, तब हम तोहिँ पत्यैहैँ ।
तुमकौँ देखि स्याम सुन्दर घन, मुरली मधुर बजैहैँ ।
तनु त्रिभंग करि अंग अंग सौँ, नाना भाव जनैहैँ ।
सूरदास-प्रभु नवल कान्ह बर, पीतांबर फहरैहैँ ॥३४॥
अर्थ-सुनो राधा तुम्हे कृष्ण को दिखाऊँगी । वे जहाँ-तहाँ ब्रज की गलियो
मे घूमते रहते हैं । जब इस मार्ग से आयेंगे और जब उनको हम देखेगे तभी तुम्हे
बुलायेगे । उनकी भी बहुत अभिलाषा है, तुम्हे देखकर सुख पायेगे । दर्शन से जब तुम्हे
धीरज रहेगा तभी हम लोग तुम्हारा विश्वास करेंगे । तुमको देखकर श्यामसुन्दर कृष्ण
मधुर मुरली बजायेगे । शरीर को त्रिभंगी (तीन तरह) आकृति मे मोड़कर अग-अंग से