सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराधाकृष्ण १६१
और कृष्ण का नाम व्यर्थ ही लगाते है। वे पुत्री के मुख की क्रोध की बाते सुनकर मन-
ही-मन बहुत हंसती है। अब तक इसके विषय मे लोगो ने कुछ नही जाना, केवल
खेलते देखकर आरोप लगाते है। सूरदास कहते हैं कि माता (राधा को) हृदय से
लगाती है और क्रोध दूर कर पोछती तथा मुख चूमती है ॥३७॥
सुता लए जननी समुझावति।
संग बिटिनियनि कैँ मिलि खेलौ, स्याम-साथ सुनि-सुनि रिस पावति।
जातैँ निंदा होइ आपनी, जातैँ कुल कौँ गारी आवति।
सुनि लाड़ली कहति यह तोसैं, तोकौँ यातैँ रिस करि धावति।
अब समुझी मैं बात सबनि की, झूठैं ही यह बात उड़ावति।
सूरदास सुनि सुनि ये बातैँ, राधा मन अति हरष बढ़ावति ॥३८॥
अर्थ—बेटी को लेकर माता समझाती है कि लडकियो के साथ मिलकर खेलो ।
कृष्ण के साथ (खेलने की बात) सुनकर क्रोध आता है। जिससे अपनी निंदा हो
और कुल को गाली आती हो (उसे नही करना चाहिए)। सुनो प्यारी बेटी यह तुमसे
कहती हूँ, तेरी ओर इसी से क्रोध करके दौड़ती हूँ। अब मैं सबकी बात समझ गयी ।
(सब) लोग झूठ ही (कृष्ण और तुम्हारे बारे में) बात उडाते है । सूरदास कहते हैं कि
ये बाते सुन-सुनकर राधा अपने मन में हर्षित होती है ॥३८॥
राधा विनय करत मनहौँ मन, सुनहु स्याम अंतर के जामी।
मातु-पिता कुल-कानिहिं मानत, तुमहिँ न जानत हैं जग स्वामी।
तुम्हारौ नाउ लेत सकुचत हैं, ऐसैं ठौर रही हौं आनी।
गुरु परिजन की कानि मानियौ, बारंबार कही मुख बानी।
कैसे संग रहौं विमुखनि कैँ, यह कहि-कहि नागरि पछितानी।
सूरदास-प्रभु कैँ हिरदै धरि, गृह-जन देखि-देखि मुसुकानी ॥३६॥
अर्थ—राधा मन-ही-मन निवेदन करती है कि हे अंतर की बात जानने वाले
कृष्ण सुनो !—माता और पिता तो कुल की मर्यादा को मानते है, (इसी से) संसार के
स्वामी तुमको (जानकर भी) नही जानते (अर्थात् भुला देते हैं)। मैं ऐसे स्थान पर रह
रही हूँ जहाँ तुम्हारा नाम लेते सकुचाती हूँ। (तुमने) बार-बार अपने मुख से यह बात
कही कि गुरुजन की मर्यादा मानो। (लेकिन) भगवान् से विमुख (लोगो) के साथ कैसे
रहूँ; यह कहकर नागरि राधा पछताती है। सूरदास कहते है कि प्रभु को हृदय मे घर-
कर घर के लोगो को देख-देखकर (राधा) मुसकायी ॥३६॥
कृष्ण-दर्शन
राधा जल बिहरति सखियन संग।
ग्रीव-प्रजत नीर मैं ठाढीँ, छिरकति जल अपनैं अपनैं रंग।
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