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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 177

१७६ सूरसागर सार सटीक
कंठ भुज-भुज जोरि, उछंग लीन्ही नारि, भुवन-दुख टारि,
सुख दियौ भारी।
हरषि बोले स्याम, कुन्ज-बन धन-धाम, तहाँ हम तुम सग
मिलैं प्यारी।
जाहु गृह परम धन, हमहुँ जैहैं सदन, आइ कहूँ पास मोहिं
सैन दैहौ।
सूर यह भाव दै, तुरतहीँ गवन करि, कुज-गृह सदन तुम जाइ रैहौ ॥७८॥
अर्थ--हँस कर कृष्ण ने राधा को गोद मे ले लिया। ओंठ से ओठ आंख से
आंख मिलाकर, हृदय से हृदय लगाकर हर्षित किया। कंठ से भुजा जोडकर नागरि
(राधा) को गोद मे ले लिया। घर के दुखो को टालकर बहुत सुख दिया। खुश
होकर कृष्ण बोले कि घने कुज वन के कुटीर मे हम तुम प्यारी साथ मिले। हे परमधन
(राधा) घर जाओ, हम भी घर जायेगे, पास मे आकर मुझे कोई इशारा दे देना।
सूरदास कहते है कि यह भाव देकर उन्होने तुरन्त ही गमन किया और कहा कि तुम
कुज-गृह रूपी घर मे आकर रहना ॥७८॥
व्याज मिलन
सुनि री मैया काल्हिही, मोतिसरी गंवाई।
सखिनि मिलै जमुना गई, धौं उनहिं चुराई।
कीधौं जलही मैं गई, यह सुधि नहिं मेरैं।
तब तैं मैं पछिताति हौं, कहति न डर तेरैं।
पलक नहीं निसि कहूँ लगी, मोहिं सपथ तिहारी।
इहि डर तैं मैं आजुहीँ, अति उठी सवारी।
महरि सुनत चकित भई, मुख ज्वाब न आवै।
सूर राधिका गुन भरी, कोउ पार न पावै ॥७६॥
अर्थ—सुनो री माता ! कल मैंने मोतियो की माला गंवा दी। मैं सखियो से
मिलने के लिए यमुना गयी थी, शायद उन्होने ही चुरा लिया। न जाने जल ही मे
डूब गयी, मुझे याद नही है। तभी से मैं पछताती हूँ, तुम्हारे डर से तुमसे कहती नही
हूँ। रात मे तनिक भी पलक नही लगी, मुझे तुम्हारी कसम है। इसी डर से आज मैं
सबेरे ही उठ पडी। महरि यह सुनकर चकित हो गयी। उनके मुख से उत्तर नही
निकला। सूरदास कहते है कि राधा गुण से भरी है, (इसका) कोई पार नही
पाता ॥७६॥
सुनि राधा अब तोहिँ न पत्यैहौँ।
ओर हार चौकी हमेल अब, तेरैं कंठ न नैहौँ।
लाख टकटकी हानि करी तैं, सो जब तोसौँ लैहौँ।
हार बिन्ना ल्याएँ लड़बौरी, घर नहिं पैठन दैहौँ।