सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७० सूरसागर सार सटीक
अर्थ—सखी, कृष्ण के नाम को जब से मैंने इन कानो से सुना है, तभी से भूली
हुई, घर मे वावली-सी हो गई हूँ। आंखे भर-भर आती हैं, चित्त मे चैन नही रहता,
वाणी शुद्ध नही है, (शरीर की) दशा कुछ और ही हो गयी है। कौन माता, कौन
पिता, कौन वहन, कौन भाई, कैसा ज्ञान, कैसा ध्यान, (सब भूल गया) है और काम-
देव से घायल हो गयी हूँ। कृष्ण जब से मेरी दृष्टि मे पढे है, स्त्री-धर्म, काम-काज,
घर-गृहस्थी, लोक-लाज, कुल-मर्यादा सब कुछ मैंने भुला दिया है ॥६१॥
राधा तैं हरि कैं रँग राँची ।
तो तैं चतुर और नहिं कोऊ, बात कहौं मैं साँची ।
तैं उनकौ मन नहीं चुरायौ, ऐसी है तू काँची ।
हरि तेरौ मन अवहिं चुरायौ, प्रथम तुहीँ है नाँची ।
तुम अरु स्याम एक ही दोऊ, बाकी नाहीँ बाँची ।
सूर स्याम तेरैं बस, राधा, कहति लीक मैं खाँची ॥६२॥
अर्थ—राधा तू कृष्ण के रंग मे रंग गयी। तुमसे चतुर और कोई नही है, मैं
सच्ची बात कहती हूँ। तुमने उनका मन नही चुराया, तू ऐसी कच्ची है। कृष्ण ने
तुम्हारा मन अभी चुराया है, तुम पहले ही खुशी के मारे स्थिर न रही। तुम और
कृष्ण एक हो इसमे कुछ शेष नही है। सखी कहती है—हे राधा मै लकीर खींच कर
कहती हूँ कि कृष्ण तुम्हारे वश मे हैं ॥६२॥
तुम जानति राधा है छोटी ।
चतुराई अंग-अंग धरी है, पूरन-ज्ञान, न बुद्धि की मोटी ।
हमसौँ सदा दुराव कियी इहिँ, बात कहै मुख चोटी-पोटी ।
कबहुँ स्याम तैं नैंकु न विछुरति, किये रहति हमसौँ हठ ओटी ।
नंद नंदन याही कैं बस हैं, विवस देखि बेँदी छवि-चोटी ।
सूरदास-प्रभु वै अति खोटे, यह उनहूँ तैं अतिहीँ खोटी ॥६३॥
अर्थ—तुम जानती हो कि राधा छोटी है, किन्तु इसके अंग-अंग मे चतुरता
भरी है; यह पूर्ण ज्ञानी है, बुद्धि की मोटी नही। चिकनी चुपड़ी वातें करके इसने हमसे
छिपाव किया है। यह कभी भी कृष्ण से तनिक भी नही बिछुडती, हम से हठ पूर्वक
छिपाव किये रहती है। कृष्ण इसी के वश में हैं, बेंदी और चोटी की छवि देखकर
(कृष्ण) विवश हैं। सूरदास कहते हैं (सखियां कहती हैं) कि कृष्ण बहुत खोटे हैं, यह
(राधा) उनसे भी खोटी है ॥६३॥
सुनहु सखी राधा सरि को है ।
जो हरि हैं रतिपति मनमोहन, याकौँ मुख सो जोहै ।
जैसे स्याम नारि यह तैसी, सुंदर जोरी सोहै ।
यह द्वादस वहऊ दस द्वै कौ, ब्रज-जुवतिनि मन मोहै ।