सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराधाकृष्ण १७१
मैँ इनकोँ घटि वढि नहिँ जानति, भेद करै सो को है।
सूर स्याम नागर, यह नागरि, एक प्रान तन दो है ॥६४॥
अर्थ—सुनो सखी राधा के समान कौन है। जो कृष्ण कामदेव के भी मन को
मोहित करने वाले हैं वह भी इसके मुख को देखते हैं। जैसे कृष्ण है, वैसे ही यह स्त्री
है। इन दोनो की सुंदर जोडी शोभित होती है। यह बारह (वर्ष) की है, वह भी बारह
(वर्ष) के ही हैं और ब्रज की युवतियो के मन मोहते हैं। मैं इनको कम ज्यादा नही
समझती, भेद करने वाला कौन है। सूरदास कहते है कि (सखियाँ कहती हैं) कृष्ण
नागर (हैं) और यह नागरी (है)। प्राण एक है, (केवल) शरीर दो है ॥६४॥
राधा नँद-नंदन अनुरागी। -
भय चिंता हिरदै नहिँ एकौ, स्याम रंग-रस पागी।
हरद चून रँग, पय पानी ज्यौँ, दुबिधा दुहुँ की भागी।
तन-मन-प्रान समर्पण कीन्हौ, अंग-अंग रति खागी।
ब्रज-बनिता अवलोकन करि-करि, प्रेम-बिबस तनु त्यागी।
सूरदास प्रभु सौँ चित्त लाग्यौ, सोवत तैँ मनु जागी ॥६५॥
अर्थ—राधा कृष्ण से अनुराग रखने वाली है। हृदय मे भय और चिन्ता एक
भी नहीं है, कृष्ण के रंग के रस मे (वह) पग गयी है। दोनों की द्वैतता दूर हो गयी,
जैसे हल्दी चूने से मिलकर तथा दूध पानी से मिलकर (एक हो जाते है) (वैसे ही वे
दोनों हो गये)। उसने अपने तन, मन, प्राण (सब) का समर्पण कर दिया है, और
उसके अंग-अंग मे रति व्याप्त (अड) हो गयी है। ब्रज की स्त्रियो ने उसे देख-देखकर
प्रेम के कारण विवश होकर शरीर त्याग दिया। सूरदास कहते हैं कि (राधा का)
चित्त कृष्ण से लग गया, (वह) मानो सोते से जग गयी है ॥६५॥
आँखिनि मैँ बसै, जिय मैँ बसै, हिय मैँ बसत निसि दिवस प्यारौ।
तन मैँ बसै, मन मैँ बसै, रसना हूँ मैँ बसै नंदवारौ।
सुधि मैँ बसै, बुधिहू मैँ बसै, अग-अंग बसै मुकुटवारौ।
सूर बन बसै, घरहु मैँ बसै, संग ज्यौँ तरंग जल न न्यारौ ॥६६॥
अर्थ—रात दिन प्यारे आंखो में बसते है, प्राण में बसते हैं, हृदय मे बसते हैं।
कृष्ण तन मे बसते हैं, मन मे बसते हैं और जीभ मे भी बसते हैं। मुकुट वाले (कृष्ण)
स्मृति, बुद्धि और अंग-अंग मे बसते हैं। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) वन मे
बसते हैं, घर मे बसते हैं। मेरे साथ से वे उसी तरह से अलग नही हैं जैसे जल से
तरंग (पृथक् नही है) ॥६६॥
उपहास
तुम कुल बधू निलज जनि ह्वैहौ।
यह करनी उनहीँ कौँ छाजै, उनकैँ संग न जैहौ।