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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

वृन्दावन लीला १०५
जानकर कृष्ण आतुर होकर वहाँ आये । बार-बार कृष्ण नंद से पूँछते है कि किस देवता
की पूजा कर रहे हो । (नंद उत्तर देते हैं) इंद्र हमारे बड़े कुल देवता हैं उन्ही से इतनी
बड़ाई होती है । कृष्ण तुम्हारे ही हित के लिए, यह पूजा हम सदा करते है ॥५४॥
मेरौ कह्यौ सत्य करि जानौ ।
जौ चाहौ ब्रज की कुसलाई, तौ गोबर्धन मानौ ।
दूध दही तुम कितनी लैहौ, गोसुत बढ़ें अनेक ।
कहा पूजि सुरपति सैं पायौ, छांड़ि देहु यह टेक ।
मुँह माँगे फल जौ तुम पावहु, तौ तुम मानहु मोहिं ।
सूरदास प्रभु कहत ग्वाल सौं, सत्य बचन करि दोहिं ॥६५॥
अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) मेरी बात सत्य करके जानो । यदि ब्रज की कुशलता
चाहते हो तो गोवर्धन को (देवता की तरह) मानो । दूध, दही तुम कितना (भी)
लो, गायों के बछड़े अनेक प्रकार से बढ़ेंगे । इंद्र की पूजा से तुम लोगो ने क्या पाया,
यह टेक छोड़ दो । मुँह मांगा फल यदि तुम पाओ तो मेरा कहना सही मानो । सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण ग्वालो को सौगन्ध खाकर समझाते है कि बात सत्य है ॥६५॥
बिप्र बुलाइ लिए नँदराइ ।
प्रथमारम्भ-जज्ञ कौ कीन्हौ, उठे बेद-धुनि गाइ ।
गोबर्धन सिर तिलक चढ़ायौ, मेटि इंद्र ठकुराइ ।
अन्नकूट ऐसौ रुचि राख्यो, गिरि की उपमा पाइ ।
भाँति-भाँति व्यंजन परसाएँ, कापैं बरन्यो जाइ ।
सूर स्याम सौं कहत ग्वाल गिरि जेवहिं कहौ बुझाइ ॥६६॥
अर्थ—नन्द ने ब्राह्मणो को बुला लिया । पहले यज्ञ का आरम्भ किया, (सब)
वेद की ध्वनि गा उठे । इंद्र के स्वामित्व को मिटाकर गोवर्धन के सिर पर तिलक
लगाया । अन्न के पिण्ड को इस प्रकार बनाया जो पर्वत की उपमा पाए । तरह-तरह के
भोजन को परोसा जिसका वर्णन किससे किया जा सकता है। सूरदास कहते हैं कि ग्वाल,
कृष्ण से कह रहे है कि पर्वत को समझा कर कहो कि वह जेए (खाना खाए) ॥६६॥
गिरिबर स्याम की अनुहारि ।
करत भोजन अधिक रुचि यह, सहस भुजा पसारि ।
नंद कौ कर गहें ठाढ़े, यहै गिरि कौ रूप ।
सखी ललिता राधिका सौं, कहति देखि स्वरूप ।
यहै कुंडल, यहै माला, यहै पीत पिछौरि ।
सिखर सोभा स्याम की छवि, स्याम-छवि गिरि जोरि ।
नारि बदरौला रही, वृषभानु-घर रखवारि ।
तहाँ तैं उहिं भोग अर्प्यौ, लियौ भुजा पसारि ।

१०६ सूरसागर सार सटीक
राधिका-छवि देखि भूली, स्याम, निरखैँ ताहि ।
सूर प्रभु-बस भई प्यारी, कोर-लोचन चाहि ॥६७॥
अर्थ - श्रेष्ठ पर्वत (गोवर्द्धन) कृष्ण के ही समरूप है। यह अपनी हजारो भुजा
पसार कर भोजन करता है । नन्द का हाथ पकड़े खडे यही गिरि का रूप है । सखी
ललिता राधा से इस रूप को देखकर कहती है । यही कुण्डल, यही माला, यही
पीताम्बर पर्वत की शोभा है जो कृष्ण की भी है । बदरीला नाम की नारी वृषभानु
के घर की रखवाली करती थी उसने वही से भोग चढ़ाया उसे भुजा पसार कर ले
लिया । राधिका इस छवि को देखकर भूल गयी, कृष्ण उन्हे देख रहे हैं । सूरदास
कहते है कि प्यारी (राधा) नेत्र के कटाक्ष से देखकर कृष्ण के वश मे हो गयी ॥६७॥
ब्रज बासिनि मोकौँ विसरायो ।
भली करी बलि मेरी जो कछु, सो सब लै परबतहिं चढ़ायौ ।
मोसौँ गर्व कियौ लघु प्रानी, ना जानियै कहा मन आयौ ।
तैँतिस कोटि सुरनि कौ नायक, जानि-बूझि इन मोहिँ भुलायौ ।
अब गोपनि भूतल नहिँ राखौँ, मेरो बलि मोहिँ नहिँ पहुँचायौ ।
सुनहु सूर मेरैँ मारत धौँ, परबत कैसेँ होत सहायौ ॥६८॥
अर्थ--ब्रज वासियो ने मुझे (इंद्र को) भुला दिया । अच्छा किया जो मेरी
बलि थी उसे लेकर सब पर्वत को चढा दिया । छोटे प्राणियों ने मुझसे गर्व किया ।
उनके मन मे न जाने क्या (भावना) आयी । तैंतीस करोड देवताओ के नायक को
जान-बूझकर इन लोगों ने भुला दिया । अब गोपो को धरती पर नही रहने दूंगा
क्योकि उन्होने हमारी बलि हमारे पास नही पहुँचायी । सूरदास कहते है (इन्द्र कहते
हैं) मेरे मारते समय देखता हूँ पर्वत कैसे सहायक होता है ॥६८॥
गिरि पर वरषन लागे बादर ।
मेघवर्त्त, जलवर्त्त, सैन सजि, आए लै लै आदर ।
सलिल अखड धार धर टूटत, किये इद्र मन सादर ।
मेघ परस्पर यहै कहत हैं, धोइ करहु गिरि खादर ।
देखि देखि डरपत ब्रजवासी, अतिहिँ भए मन कादर ।
यहै कहत ब्रज कौन उबारै, सुरपति कियैँ निरादर ।
सूर स्याम देखैँ गिरि अरनैँ, मेघनि कीन्ही दादर ।
देव आपनौ नहीं सम्हारत, करत इद्र सौ ठादर ॥६६॥
अर्थ--पर्वत पर बादल बरसने लगे । मेघवर्त्त तथा जलवर्त्त नामक प्रलयकालीन
मेघ अपनी सेना सजाकर आदर पूर्वक लाये । अखंड पानी की धारा से पृथ्वी टूटने
लगी । (इससे) बादलो ने आदरपूर्वक इंद्र के मन की बात पूरी की। मेघ आपस मे यही
कहते है कि पर्वत को धोकर नीची जमीन मे बदल दो । देख-देखकर ब्रज के निवासी
डरने लगे तथा वे मन से बहुत अधीर हो गये । (वे) यही कहते है कि देवराज का

वृन्दावन लीला १०७
अनादर करने पर ब्रज की रक्षा कौन करेगा ? सूरदास कहते हैं कि कृष्ण अपने गिरि
को देखे । बादलो ने निर्णय कर लिया है। (तुम लोग) अपने देवता को नही
सम्हालते और इन्द्र से झगड़ा करते हो ॥६६॥
ब्रज के लोग फिरत बितताने ।
गयनि लै बन ग्वाल गए, ते धाए आवत ब्रजहिँ पराने ।
कोउ चितवत नभ-तन चक्रित ह्वै, कोउ गिरि परत धरनि अकुलाने ।
कोउ लै रहत ओट वृच्छि की, अंध-धुध दिसि बिदिस भुलाने ।
कोउ पहुँचे जैसेँ तैसेँ गृह, कोउ ढूँढ़त गृह नहिँ पहिचाने ।
सूरदास गोबर्धन-पूजा, कीन्हे कौ फल लेहु बिहाने ॥७०॥
अर्थ— ब्रज के लोग व्याकुल होकर घूम रहे है। गायो को लेकर जो ग्वाल
वन में गये थे वे ब्रज को दौड़ते हुए चले आ रहे है। कोई चकित होकर नभ की ओर
देखता है, कोई धरती पर आकुल होकर गिर पड़ता है। कोई वृक्षों की ओट लेता है,
अँधेरे के धुंध मे दिशाये भूल गईं। कोई जैसे-तैसे घर पहुँचा और कोई ढूंढता हुआ
(अपना) घर ही नही पहचान पा रहा है। सूरदास कहते हैं कि गोवर्द्धन पूजा का फल
(तुम लोग) शीघ्र लो ॥७०॥
राखि लेहु अब नंदकिसोर ।
तुम जौ इंद्र की मेटी पूजा, बरसत है अति जोर ।
ब्रजवासी तुम तन चितवत हैं, ज्यौँ करि चंद चकोर ।
जनि जिय डरौँ नैन जनि मूंदौ, धरिहौँ नख की कोर ।
करि अभिमान इंद्र झरि लायौ, करत घटा घनघोर ।
सूर स्याम कह्यौ तुम कौँ राखौँ, बूँद न आवै छोर ॥७१॥
अर्थ (ब्रजवासी कृष्ण से निवेदन करते हैं) कृष्ण अब रक्षा करो । तुमने जो
इंद्र की पूजा मिटायी (इसी से) बहुत जोर से बरस रहा है। ब्रजवासी तुम्हारी ओर
उसी तरह से देखते हैं जैसे चकोर चन्द्रमा की तरफ (देखता है) । (कृष्ण ने कहा)
मन मे डरो मत, न तो आंख मूंदो । नाखून की कोर से (पर्वत को) धारण करुँगा ।
इन्द्र अभिमान करके लगातार वर्षा कर रहा है और घनघोर घटा कर रहा है। पर
मैं तुम्हारी रक्षा करुँगा और एक बूंद भी न आएगी ॥७१॥
स्याम लियौ गिरिराज उठाइ ।
धीर धरौ हरि कहत सबनि सौँ, गिरि गोबर्धन करत सहाइ ।
नन्द गोप ग्वालनि के आगैँ, देव कह्यौ यह प्रगट सुनाइ ।
काहे कौँ व्याकुल भएँ डोलत, रच्छा करै देवता आइ ।
सत्य बचन गिरि-देव कहत हैं, कान्ह लेहि मोहिँ कर उचकाइ ।
सूरदास नारी-नर ब्रज के, कहत धन्य तुम कुँवर कन्हाइ ॥७२॥

१०८ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—कृष्ण ने पर्वतराज गोवर्द्धन को उठा लिया। कृष्ण सबसे कहते हैं कि
धैर्य धरो, गोवर्द्धन पर्वत सहायता कर रहा है। नंद, गोप तथा ग्वालो के सामने देव
ने यह प्रत्यक्ष सुनाकर कहा। (तुम लोग) व्याकुल होकर क्यो घूमते हो देवता आकर
रक्षा करता है। गिरि देवता सत्य वचन कहते हैं कि कृष्ण मुझे हाथ से उठाकर ऊँचा
कर दे। सूरदास कहते है कि ब्रज के नर और नारी कृष्ण से कहते हैं कि तुम धन्य
हो ॥७२॥
गिरि जनि गिरै स्याम के कर तैं।
करत विचार सबै ब्रजवासी, भय उपजत अति उर तैं।
लै-लै लकुट ग्वाल सब धाए, करत सहाय जु तुरतैं।
यह अति प्रबल, स्याम अति कोमल, रबकि रबकि हरबर तैं।
सप्त दिवस कर पर गिरि धारयौ, वरसि थक्यो अम्बर तैं।
गोपी ग्वाल नंद-सुत राख्यो, मेघ-धार जलधर तैं।
जमलाजुन दोउ सुत कुवेर के, तेउ उखारे जर तैं।
सूरदास प्रभु इन्द्र-गर्व हरि, ब्रज राख्यो करबर तैं ॥७३॥
अर्थ—पर्वत कृष्ण के हाथ से गिर न जाय। सभी ब्रजवासी (ऐसा) विचार
करते हैं और हृदय मे अत्यधिक भय पैदा हो रहा है। लाठी ले लेकर सभी ग्वाल दौडे
और तुरन्त सहायता करने लगे। यह (पर्वत) अत्यन्त प्रबल है, और कृष्ण अत्यन्त
कोमल हैं, हड़बड़ मे यह कंपता है। सात दिन तक पर्वत को (कृष्ण ने) हाथ पर रखा।
(बादल) आकाश से बरसते-बरसते थक गये। कृष्ण ने गोपी, ग्वाल आदि को बादल की
जलधारा से बचाया। जमल तथा अर्जुन कुवेर के दोनो पुत्रों को जड़ से उखाड़ दिया।
सूरदास कहते हैं कि प्रभु ने इंद्र के गर्व को हर कर संकट से ब्रज की रक्षा की ॥७३॥
मेघनि जाइ कही पुकारि ।
दीन ह्वै सुरराज आगैं, अस्त्र दीन्हे डारि।
सात दिन भरि बरसि ब्रज पर, गई नैकूँ न झारि ।
अखंड धारा सलिल निर्झरचौ, मिटी नहिं लगारि ।
धरनि नैंकु न बूँद पहुँची, हरषे ब्रज-नर-नारि ।
सूर घन सब इन्द्र आगैं, करत यहै गुहारि ॥७४॥
अर्थ—बादलो ने जाकर पुकार कर कहा और दीन होकर इन्द्र के आगे अस्त्र
डाल दिये। सात दिन तक (हमने) ब्रज पर वर्षा की (ब्रज पर) कोई आंच नही
आयी। अखंड धारा से पानी बरसाया, उसका क्रम टूटा नही। (लेकिन) धरती पर
तनिक (भी) बूंद नही पहुँची, (इससे) ब्रज के नर-नारी प्रसन्न हो गये। सूरदास कहते
हैं कि इन्द्र के आगे बादेल यही गोहार करते हैं ॥७४॥

वृन्दावन लीला १०६
घरनि घरनि ब्रज होति बधाई ।
सात वरष को कुँवर कन्हैया, गिरिवर धरि जीत्यौ सुरराई ।
गर्व सहित आयौ ब्रज बोरन, वह कहि मेरी भक्ति घंटाई ।
सात दिवस जल वरषि सिरान्यौ, तव आयौ पाइनि तर धाई ।
कहाँ कहाँ नहिं संकट मेटत, नर-नारी सब करत बड़ाई ।
सूर स्याम अव कैं ब्रज राख्यो, ग्वाल करत सब नंद दोहाई ॥७५॥
अर्थ - ब्रज के घर-घर में बधाई हो रही है । सात वर्ष के कृष्ण ने गोवर्द्धन को
धारण करके इन्द्र को जीत लिया । गर्व के साथ (इन्द्र के बादल) ब्रज को डुबाने के लिए
आये थे । उसने (इन्द्र ने) कहा कि मेरी भक्ति को घटा दिया । सात दिन तक जल
बरसा कर निराश हो गये तब दौड़कर पैरों के नीचे आये । कहाँ-कहाँ (कृष्ण)
संकट नहीं मिटाते, नर-नारी सब बड़ाई करते हैं । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने अब
की बार ब्रज को रख लिया, (इससे) सभी ग्वाल नन्द की दुहाई दे रहे हैं ॥७५॥
(तेरैं) भुजनि बहुत बल होइ कन्हैया ।
बार-बार भुज देखि तनक सें, कहति जसोदा मैया ।
स्याम कहत नहिं भुजा पिरानी, ग्वालिन कियौ सहैया ।
लकुटिनि टेक सबनि मिलि राख्यो, अरु बाबा नँदरैया ।
मोसौँ क्यों रहतौ गोवरधन, अतिहिं बड़ौ यह भारी ।
सूर स्याम यह कहि परवोध्र्यौ, चकित देखि महतारी ॥७६॥
अर्थ- बार-बार छोटी-छोटी भुजाओ को देखकर यशोदा माता कहती है कन्हैया
तुम्हारी बाहो में बहुत बल हो । कृष्ण कहते हैं कि हमारी भुजा दुखी नहीं (क्योकि)
ग्वालो ने हमारी सहायता की । सब ने मिलकर लाठी की टेक लगा रखी थी और बाबा
नन्द ने भी (सहायता की थी) । मुझसे गोवर्द्धन कैसे रखा जाता क्योकि वह बहुत भारी
है । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने यह कहकर चकित माता को समझाया ॥७६॥
मातु पिता इनके नहिं कोइ ।
आपुहिं करता, आपुहिं हरता, त्रिगुन रहित हैं सोइ ।
कितिक वार अवतार लियौ ब्रज, ये हैं ऐसे ओइ ।
जल-थल, कीट-ब्रह्म के व्यापक, और न इन सरि होइ ।
बसुधा-भार-उतारन-काजैं, आपु रहत तनु गोइ ।
सूर स्याम माता-हित-कारन, भोजन माँगत रोइ ॥७७॥
अर्थ- इनके (कृष्ण के) माता-पिता कोई नहीं हैं। ये स्वंय कर्त्ता है, हर्त्ता हैं,
ये तीनों गुणो से रहित हैं। इन्होंने कितनी बार ब्रज मे अवतार लिया है, ये वही हैं।
जल और स्थल तथा कीट और ब्रह्म सर्वत्र ये व्याप्त हैं और कोई इनके समान नहीं
है। पृथ्वी के भार को उतारने के लिए अपने शरीर को छिपाकर रहते हैं। सूरदास
कहते हैं कि माता को प्रसन्न करने के लिए भोजन रोकर माँगते है ॥७७॥

११०
सूरसागर सार सटीक
सुरगन सहित इन्द्र ब्रज आवत ।
धवल बरन ऐरावत देख्यौ उतरि गगन तैँ धरनि धँसावत ।
अमरा-सिव-रबि-ससि चतुरानन, हय-गय बसह हंस-मृग जावत ।
धर्मराज, बनराज, अनल, दिव, सारद, नारद, सिव-सुत भावत ।
मेढ़ा, महिषि, मगर, गुदरारौ, मोर, आखुमन वाहन, गावत ।
ब्रज के लोग देखि डरपे मन, हरि आगैँ कहि कहि जु सुनावत ।
सात दिवस जल वरषि सिरान्यौ, आवत चल्यौ ब्रजहिं अतुरावत ।
घेरौ करत जहाँ तहँ ठाढे, ब्रजवासिनि कौं नाहिं बचावत ।
दूरहिं तैँ वाहन सौं, उतरचौ, देवनि सहित चल्यौ सिर नावत ।
आइ पर्यौ चरननि तर आतुर, सूरदास-प्रभु सीस उठावत ॥७८॥
अर्थ—देवता गण सहित इंद्र ब्रज की ओर आते है। सफेद रंग के ऐरावत
हाथी को देखो जिसे गगन से उतारकर पृथ्वी पर पैठा रहे (प्रवेश करा रहे) हैं।
देवतागण, शिव, सूर्य, चन्द्र, ब्रह्मा, हाथी, घोडे, बैल, हस, मृग जितने हैं (वे सब)
तथा धर्मराज, वनराज, अग्नि, दिव, नारद, सारद, गणेश आदि प्रार्थना करते हैं। भेड,
भैंसा, मगर, गुडुरी नाम की चिडिया, मोर, चूहा, आदि वाहन गाते है। ब्रज के लोग
इन सब को देखकर डर गये। कृष्ण के आगे कह कहकर सुनाते है। सात दिन तक जल
की वर्षा समाप्त करके ब्रज को आतुर मरता हुआ (इन्द्र) चला आ रहा है। घेर कर
(निंदा करते) खड़े हुए ब्रजवासियो से अपने को बचाता नही है। दूर से ही सवारी से
उतरकर (इन्द्र) देवताओ के साथ सिर झुकाते हुए चले। आकर चरणों के नीचे आतुर
होकर गिर पडे । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण सिर पकडकर उठाते हैं ॥७८॥
रास लीला
जबहिँ बन मुरली स्रवन परीँ ।
चकित भईँ गोप कन्या सब, काम-धाम बिसरीँ ।
कुल मर्याद वेद की आज्ञा, नैंकहुँ नहीं डरीँ ।
स्याम-सिंधु, सरिता-ललना-गन, जल की ढरनि ढरीँ ।
अंग-मरदन करिवे कौँ लागीँ, उबटन तेल धरीँ ।
जो जिहिँ भाँति चली सो तैसेंहिँ, निसि बन कौँ जुखरीँ ।
सुत पति-नेह, भवन-जन-सका, लज्जा नाहिं करीँ ।
सूरदास-प्रभु मन हरि लीन्हौ, नागर नवल हरीँ ॥७६॥
अर्थ—जैसे ही बन (मे बजती हुई) मुरली (की ध्वनि) कान में पडी। (तब) गोप
की कन्याये चकित हो गयी, और सभी काम-धंधा भूल गयी। कुल की मर्यादा तथा वेद
की आज्ञा को तनिक भी नही डरी। कृष्ण रूपी सागर की ओर ब्रज की स्त्री रूपी
नदियां जल की तरह ढल गयी। अग का मरदन करने मे लगी स्त्रियो ने उबटन तथा
तेल रख दिया। जो जैसी थी वैसे ही रात मे बन की ओर चल पड़ी। पुत्र तथा पति

के स्नेह, घर के लोगों की शंका से लज्जा नही की । सूरदास कहते है कि चतुर तथा
सुन्दर कृष्ण ने (गोपियों) के मन को हर लिया ॥७८॥
चली बन वेनु सुनत जब धाइ ।
मातु पिता-बाधव अति त्रासत, जाति कहाँ अकुलाइ ।
सकुच नहीं, संका कछु नाहीं, रैनि कहाँ तुम जाति ।
जननी कहति दई को घाली, काहे कौं इतराति ।
मानति नहीं और रिस पावति, निकसी नातौ तोरि ।
जैसैं जल-प्रवाह भादौं कौ, सो को सकै बहोरि ।
ज्यौं केंचचुरी भुअंगम त्यागत, मात पिता यौँ त्यागे ।
सूर स्याम कैं हाथ बिकानी, अलि अम्बुज अनुरागे ॥८०॥
अर्थ- वंशी सुनकर जब गोपियां वन की ओर दौड़कर चली, (तब) माता-पिता
तथा बंधु आदि भयभीत करते हुए (पूछते है) आकुल होकर तुम लोग कहां जा रही हो ।
तुम्हे संकोच नही और न कुछ शंका है, रात मे तुम लोग कहाँ जा रही हो । माताये
कहती हैं दैव की मारी क्यो इतराती हो । लेकिन (गोपियाँ) कहना नही मानती (जिससे)
माताये और क्रोधित होती है । वे सब नाता तोड़कर निकल पडी । जैसे भादो के जल
प्रवाह को कौन लौटा सकता है । जिस प्रकार सांप केंचुली त्याग देता है वैसे गोपियो ने
माता-पिता को त्याग दिया । सूरदास कहते है कि वे सब कृष्ण के हाथ बिक गयी
जिस प्रकार भौंरा कमल के अनुराग से (उसके हाथ बिक जाता है) ॥८०॥
मातु-पिता तुम्हरे धौं नाहीं ।
बारम्बार कमल-दल-लोचन, यह कहि-कहि पछिताहीं ।
उनकैं लाज नहीँ, बन तुमकौं आवन दीन्ही राति ।
सब सुंदर, सबै नवजोवन, निठुर अहिर की जाति ।
की तुम कहि आईं, की ऐसेहिं कीन्ही कैसी रीति ।
सूर तुमहिं यह नहीँ बूझियै, करो बड़ी विपरीति ॥८१॥
अर्थ - (कृष्ण गोपियो से पूछते हैं) सम्भवतः तुम्हारे माता-पिता नही है । बार-
बार यह कहकर कमल के दल के समान आंख वाले कृष्ण पछताते है । उन लोगो को
लाज नही जो तुम्हे रात मे वन आने दिया । सभी सुन्दरियां है तथा युवतियां है ।
अहीर की जाति बडी निठुर है । तुम लोग कहकर आयी हो या ऐसे ही चली आयी ।
(तुमने) कैसी रीति अपनायो। सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण पूछते हैं) तुम लोगो को
जान नही पड़ा तुमने बड़ा उलटा काम किया ॥८१॥
इहिं विधि बेद-मारग सुनौ ।
कपट तजि पति करी पूजा, कहा तुम जिय गुनौ ।
कंत मानहु भव तरौगी, और नाहिं उपाइ ।
ताहि तजि क्यौं विपिन आईं, कहा पायौ आइ ।

११२ सूरसागर सार सटीक
विरध अरु बिन भागहूँ कौ, पतित जौ पति होइ ।
जऊ मूरख होइ रोगी, तजै नाहीं जोइ ।
यहै मैं पुनि कहत तुम सौं, जगत मैं यह सार ।
सूर पति-सेवा बिना, क्यों तरौगी ससार ॥८२॥
अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) इस प्रकार वेद की रीति सुनो । कपट त्यागकर पति
की पूजा करो (और) क्या तुम मन मे गुनती हो । पति मान करके भवसागर तर
जाओगी और कोई उपाय नही है । उसे छोड़कर वन मे क्यों आई और यहाँ आने पर
क्या मिला । बुड्ढा, अभागा, पतित, मूर्ख तथा रोगी कैसा भी पति हो उसको भी
पत्नी के द्वारा नही छोड़ा जाना चाहिए । यही मैं तुमसे फिर कहता हूँ कि संसार मे
यही सार है । सूरदास कहते हैं (कृष्ण समझाते है) पति की सेवा के बिना संसार को
क्योकर पार करोगी ॥८२॥
तुम पावत हम घोष न जाहिँ ।
कहा जाइ लैहैं हम व्रज यह दरसन त्रिभुवन नाहिं ।
तुमहूँ तैं ब्रज हितू न कोऊ, कोटि कहौ नहिं मानैं ।
काके पिता, मातु हैं काकी, काहूँ हम नहिं जानैं ।
काके पति, सुत-मोह कौन कौ, घरही कहा पठावत ।
कैसौ धर्म, पाप है कैसो, आप निरास करावत ।
हम जानैं केवल तुमहीं कौं, और बृथा ससार ।
सूर स्याम निठुराई तजियै, तजियै वचन-विकार ॥८३॥
अर्थ—गोपियां उत्तर देती है कि तुम को पाते हुए हम अहीरो की वस्ती मे
(वापस) नही जायेगी । ब्रज मे जाकर हम क्या पायेगी, यह (आपका) दर्शन संसार मे
कही नही है । तुमसे अधिक हितकारक ब्रज मे ओर कोई नही है । आप हजारो बार कहे
लेकिन हम मानती नही । किसके पिता (है) किसकी माता है । हम किसी को नही
जानती । किसके पति, किसे पुत्र का स्नेह है और आप किसके घर भेजते है । कैसा
धर्म, कैसा पाप, आप हमे निराश करते है । हम केवल आप ही को जानती है और
संसार व्यर्थ है । हे कृष्ण निठुराई तथा उल्टी बातो को छोड़ दीजिए ॥८३॥
कहत स्याम श्रीमुख यह वानी ।
धन्य-धन्य दृढ़ नेम तुम्हारौ, बिनु दामनि मो हाथ बिकानी ।
निरदय बचन कपट के भाखे, तुम अपने जिय नैंकु न आनी ।
भजीं निसक आइ तुम मोकौं, गुरुजन की संका नहिं मानी ।
सिंह रहै जंबुक सरनागत, देखो सुनी न अकथ कहानी ।
सूर स्याम अंकन भरि लीन्हीँ, विरह अगिन-झर तुरत बुझानी ॥८४॥
अर्थ—कृष्ण अपने सुन्दर मुख से यह वाणी कहते है । तुम लोगो के नियम
दृढ है (इसलिए) तुम धन्य हो । बिना दाम के मेरे हाथ बिक गयी । कपट से भरे निर्दय

वृन्दावन लीला १५३
वचन हमने कहे लेकिन उसे मन में तनिक भी न लायी । गुरुजनों की शंका न मानकर
तुम लोगों ने निशंक होकर मेरे पास आकर मुझे भजा । सिंह सियार की शरण में
आये, ऐसी अकथ कहानी मैंने नहीं सुनी । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने गोपियों को
गोद मे भर लिया जिससे तुरन्त विरह अग्नि की ज्वाला बुझ गयी ॥८४॥
कियौ जिहिँ काज तप गोप नारी ।
देहु फल हौं तुरत लेहु तुम अब घरी, हरष चित करहु दुख देहु डारी ।
रास रस रचौं, मिलि संग बिलसौ, सर्वै वस्त्र हरि कहि जो निगम बानी ।
हँसत मुख मुख निरखि, बचन अमृत बरषि, कृपा-रस भरे सारंग पानी ।
ब्रज-जुवति चहुँ पास, मध्य सुदर स्याम राधिका बाम अति छवि बिराजै ।
सूर नव-जलद-तनु, सुभग स्यामल कांति, इंदु-बहु-पाँति-बिच अधिक छाजै॥८५॥
अर्थ—जिस कार्य के लिए अहीर की नारियों ने तप किया, मैं उसका फल देता
हूँ उसे तुम लोग इस अवसर पर लो। मन प्रसन्न करो तथा दुःखों को छोड़ दो। रास
के रस को रचूँगा, मेरे साथ मिलकर विलास करो, वस्त्र हरते समय जो वेद-वाणी
कही थी । कृपा के रस मे भरे हुए कमलपाणि कृष्ण वचन-रुपी अमृत की वर्षा करके
प्रत्येक गोपी के मुख को देख-देखकर हँसते हैं । चारों ओर ब्रज की युवतियां है, बीच
मे कृष्ण है, बायी ओर राधिका है। (इस प्रकार) अत्यधिक छवि विराज रही है।
सूरदास कहते हैं कि नये बादल के समान शरीर की सुन्दर साँवली कांति (कृष्ण)
चन्द्रमा की बहुत सी पंक्तियों (गोपियो) के बीच अधिक शोभा दे रही है ॥८५॥
मानो माई घन घन अंतर, दामिनि ।
घन दामिनि दामिनि घन अंतर, शोभित हरि-ब्रज भामिनि ।
जमुन पुलिन मल्लिका मनोहर, सरद-सुहाई-जामिनि ।
सुदर ससि गुन रूप-राग-निधि, अंग-अंग अभिरामिनि ।
रच्यौ रास मिलि रसिक राइ सौं, मुदित भईं गुन ग्रामिनि ।
रूप-निधान स्याम सुंदर घन, आनँद मन बिश्रामिनि ।
खंजन-मीन-मयूर-हंस-पिक, भाइ-भेद गज-गामिनि ।
को गति गनै सूर मोहन सँग, काम विमोह्यौ कामिनि ॥८६॥
अर्थ-मानो बादल के बीच बिजली और बिजली के बीच बादल हो, इसी प्रकार
कृष्ण ब्रज की स्त्रियों के बीच शोभा देते हैं। यमुना का किनारा, मनोहर मल्लिका,
शरद की सुहावनी रात, सुन्दर चन्द्रमा एवं गुणरूप तथा प्रेम की राशि और अग अंग को
आनंद देने वाली गोपियो ने कृष्ण के साथ रास रचाया और इससे गुण के समूहों से युक्त
युवतियां प्रसन्न हो गयी। रूप के निधान अत्यन्त सुंदर कृष्ण के मन को (गोपियां) आनंद
एवं विश्राम देने वाली है। खंजन, मछली, मोर, हंस, कोयल इन उपमानो को भुलाकर
इस समय गोपियां गज गामिनी हैं। सूरदास कहते हैं कि मोहन के साथ होने वाली
गति को कौन गिन सकता है ? कामिनियो को कामदेव ने मोहित कर लिया ॥८६॥
८

११४ सूरसागर सार सटीक
गरव भयौ ब्रजनारि कौं, तबहीँ हरि जाना ।
राधा प्यारी संग लिये, भए अंतर्धाना ।
गोपिनि हरि देख्यौ नहीं, तब सब अकुलाई ।
चकित होइ पूछन लगीं, कहँ गए कन्हाई ।
कोउ मर्म जानैँ नहीं, व्याकुल सब बाला ।
सूर स्याम ढूँढ़ति फिरैं, जित-तित ब्रज-बाला ॥८७॥
अर्थ—(जब) ब्रज की नारियो को गर्व हो गया तभी कृष्ण ने जान लिया ।
राधा प्यारी को साथ लेकर वे अन्तर्ध्यान हो गये । गोपियाँ हरि को न देखकर व्याकुल
हो गयी । चकित होकर पूछने लगी कि कृष्ण कहां गये । कोई मर्म को नही जानती हैं,
(इससे) सभी गोपियाँ व्याकुल है । सूरदास कहते है कि गोपियां जहां-तहां (कृष्ण) को
खोजती फिरती हैं ॥८७॥
तुम कहूँ देखे स्याम बिसासी ।
तनक बजाइ बाँस की मुरली, लै गए प्रान निकाशी ।
कबहुँक आगैं, कबहुँक पाछैं, पग-पग भरति उसासी ।
सूर स्याम-दरसन के कारन, निकसीँ चंद-कला सी ॥८८॥
अर्थ—तुमने कही धोखेवाज कृष्ण को देखा है । तनिक बांस की वंशी बजाकर
वे प्राणो को निकाल ले गये । कभी आगे कभी पीछे (गोपियां) लम्बी सांस भरती हैं ।
सूरदास कहते हैं कि श्याम कृष्ण के दर्शन के लिए चन्द्रमा की कला के समान वे निकल
पडी ॥८८॥
कहि धौँ री बन वेलि कहूँ तैं, देखे हैं नंद-नंदन ।
बूझहु धौँ मालती कहूँ तैं, पाए हैं तन-चंदन ।
कहि धौँ कुंद, कदब, बकुल, बट, चंपक, ताल, तमाल ।
कहि धौँ कमल कहाँ कमलापति, सुन्दर नैन बिसाल ।
कहि धौँ री कुमुदिनि, कदली कछु, कहि बदरी करबीर ।
कहि तुलसी तुम सब जानति हौ, कहँ घनस्याम सरीर ।
कहि धौँ मृगी मया करि हमसौँ, कहि धौँ मधुप मराल ।
सूरदास-प्रभु के तुम सगी, हैं कहँ परम कृपाल ॥८६॥
अर्थ—वन की लताओं, निश्चय ही बताओ कि तुमने कृष्ण को कही देखा है ।
मालती तुम (तनिक) बूझो कि शरीर के लिए चन्दन के समान (कृष्ण) को तुमने
कही पाया है। कुद, कदम्ब, बकुल, वट, चम्पा, ताल, तमाल तुम लोग (कृष्ण को)
बताओ कहाँ है । कमल कहो लक्ष्मी के पति सुन्दर विशाल नयनो वाले कृष्ण कहाँ हैं।
कुमुदिनी, कदली, बेर, कनैेर (तुम लोग) कुछ कहो । तुलसी तुम सब कुछ जानती हो,
घन के समान साँवले शरीर वाले कृष्ण कहाँ है। हिरणी हमसे प्रेम करके बताओ तथा

वृन्दावन लीला ५१५
हे भ्रमर और मराल कहो कि कृष्ण कहां है। सूरदास तुम कृष्ण के साथी हो परम
कृपाल कृष्ण कहां है ॥८८॥
स्याम सबनि कौं देखही, वै देखतिं नाहीँ ।
जहाँ तहाँ व्याकुल फिरैं, धोर न तनु माहीँ ।
कोउ बंसीबट कौं चली, कोउ बन घन जाहीँ ।
देखि भूमि वह रास की, जहँ-तहँ पग-छाहीँ ।
सदा हठीली, लाड़िली, कहि-कहि पछिताहीँ ।
नैन सजल जल ढारहीँ, व्याकुल मन माहीँ ।
एक-एक ह्वै ढूँढहीँ, तरुनी बिकलाहीँ ।
सूरज प्रभु कहुँ नहिँ मिले, ढूँढ़ति द्रुम पाहीँ ॥६०॥
अर्थ—कृष्ण सबको देखते है, लेकिन वे (गोपियां) नही देखती। जहाँ तहाँ
व्याकुल होकर घूमती है, शरीर में धीरज नही है। कोई वंशीवट की ओर चली कोई
घने वन में जाती हैं। वे रास की भूमि देखकर जहां तहां पग की छाया देखती हैं ।
(हम) सदा हठ करने वाली तथा दुलारी हैं यह कह कहकर पछताती है। नयनो से जल
ढुलकाती हैं और मन से व्याकुल हैं। एक-एक करके ढूंढती है और (न पाने पर)
युवतियां विकल हो जाती है। सूरदास कहते हैं कि गोपियां वृक्षों के बीच ढूंढती हैं
लेकिन कृष्ण मिलते नही ॥६०॥
तब नागरि जिय गर्ब बढ़ायौ ।
मो समान तिय और नहीँ कोउ, गिरिधर मैँ हीँ बस करि पायौ ।
जोइ-जोइ कहति करत पिय सोइ सोइ, मेरैँ ही हित रास उपायौ ।
सुन्दर, चतुर और नहिँ मोसी, देह धरै कौ भाव जनायौ ।
कबहुँक बैठि जाति हरि कर धरि, कबहुँ कहति मैँ अति श्रम पायौ ।
सूर स्याम गहि कंठ रहो तिय, कंध चढ़ी यह बचन सुनायौ ॥६१॥
अर्थ—तब राधा के मन मे (कृष्ण) ने गर्व बढ़ा दिया। वे समझती है मेरे
समान कोई और स्त्री नही है। गिरिधर कृष्ण को मैंने ही वश मे किया है। जो-जो
कहती हूँ कृष्ण वही-वही करते है। मेरे ही लिए (उन्होने) रास रचाया। मुझसे सुन्दर
और चतुर और कोई नही है, क्योकि कृष्ण ने हमे शरीर धारण करने का भाव बता
दिया। कभी कृष्ण के हाथ पकड़ कर बैठ जाती है, कभी कहती है मैंने अत्यधिक श्रम
किया है। सूरदास कहते हैं कि राधा ने कृष्ण के गले से लिपट कर कहा कि मैं कन्धे
पर चढ़ जाऊं ॥६१॥
कहै भामिनी कंत सौं, मोहिँ कध चढ़ावहु ।
नृत्य करत अति श्रम भयो, ता श्रमहिँ मिटावहु ।
धरनी धरत बनै नहीँ, पग अतिहिँ पिराने ।
तिया-बचन सुनि गर्व के, पिय मन मुसुकाने ।

११६ सूरसागर सार सटीक
मैँ अविगत, अज, अकल हौँ, यह मरम न पायौ ।
भाव बस्य सब पैँ रहौँ, निगमनि यह गायौ ।
एक प्रान द्वै देह हैं, द्विविधा नहिँ यामैँ ।
गर्व कियौ नरदेह तैँ, मैँ रहौँ न तामैँ ।
सूरज-प्रभु अंतर भए, संग तैँ तजि प्यारी ।
जहाँ की तहँ ठाड़ी रही, वह घोष-कुमारी ॥६२॥
अर्थ—स्त्री (राधा) पति से कहती है कि मुझे कन्धे पर चढ़ाओ । नाच करते-
करते अत्यधिक परिश्रम हुआ उस थकावट को मिटाओ । पैर बहुत दर्द कर रहे है
(जिससे) पृथ्वी पर धरते नही बनता । स्त्री के बचन सुनकर (पति) कृष्ण मन मे
मुसकाये । मैं अज्ञात, अजन्मा, तथा अकल हूँ यह मर्म (गोपियो) ने नही पाया । भाव
के वश सबके साथ रहता हूँ । वेदो ने यही गाया है । (हमारे बीच) प्राण एक है तथा
शरीर दो है, इसमे कोई शंका नही है । (पर) मनुष्य के शरीर से जो गर्व करते हैं मैं
उसमे नही रहता । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण प्यारी राधा का साथ छोड़कर अंतर्ध्यान
हो गये । वह अहीर की लड़की राधा जहाँ की तहाँ खड़ी रह गई ॥६२॥
जो देखैँ द्रुम के तरैँ, मुरझी सुकुमारी ।
चकित भईँ सब सुन्दरी, वह तौ राधा री ।
याही कौँ खोजति सबै, यह रही कहाँ री ।
धाइ परीँ सब सुंदरी, जो जहाँ-तहाँ री ।
तन की तनकहुँ सुधि नहीँ, व्याकुल भईँ बाला ।
यह तौ अतिँ बेहाल है, कहुँ गए गोपाला ।
बार-बार बूझतिँ सबै, नहिँ बोलति बानी ।
सूर स्याम काहैँ तजी, कहि सब पछितानी ॥६३॥
अर्थ—जब (गोपियों ने) वृक्ष के नीचे देखा तो (उन्हे) मुरझायी हुई सुकुमारी
(राधा) दिखाई पडी । सब सुन्दरियां चकित हो गयीं कि यह तो राधा है । इसे ही
सब खोजते हे, यह कहां थी । जो जहां थी वहां से सब सुन्दरियां दौड पडी । शरीर की
तनिक भी याद नही, बालाये व्याकुल हो गयी । यह (राधा) तो अत्यधिक बेहाल है
गोपाल कही चले गये । बार वार सभी पूछती हैं लेकिन वह नही बोलती । सूरदास
कहते हैं (कि गोपियां सोचती है) कृष्ण ने इसे क्यो छोड़ दिया, यह कहकर सभी
पछताती है ॥६३॥
केहिँ मारग मैँ जाउँ सखी री, मारग मोहिँ बिसरचौ ।
ना जानौँ कित ह्वै गए मोहन, जात न जानि परचौ ।
अपनी पिय ढूँढ़ति फिरौँ, मोहिँ मिलिबे कौ चाव ।
काँटो लाग्यौ प्रेम कौ, पिय यह पायी दाव ।
बन डोंगर ढंढत फिरी, घर-मारग तजि गाउँ ।

वृन्दावन लीला ११७
बूझौं द्रुम, प्रति वेलि कोउ, कहै न पिय कौ नाउँ ।
चकित भई, चितवत फिरी, व्याकुल अतिहिं अनाथ ।
अब कैं जो कैसेहु मिलौं, पन्नक न त्यागौं साथ ।
हृदय माँझ पिय-घर करौं, नैननि बैठकि देउँ ।
सूरदास प्रभु सँग मिलीं, बहुरि रास-रस लेउँ ॥६४॥
अर्थ—सखी मैं किस रास्ते से जाऊँ, मुझे मार्ग भूल गया है । (मैं) नही जानती
कि मोहन किधर गये, जाते समय (मुझे) जान नही पडा । मैं अपने प्रिय को ढूंढती
फिरती हूँ । मुझे मिलने की इच्छा है। मुझे प्रेम का कांटा गड़ गया, ओर प्रिय को यह
मोका मिला । मैं गाँव को छोड़कर वन, पहाड़ी, तथा घर के रास्ते मे ढूंढती फिरी ।
(मैंने) वृक्षों से पूछा, प्रत्येक लता से पूछा, लेकिन कोई प्रिय के नाम को नही कहता ।
इसके बाद मैं) चकित हो गयी, (मेरी) निगाह फिर गयी ओर अत्यधिक असहाय
होकर व्याकुल हो गयी । अबकी वार यदि कैसे (भी) मिलेगे तो पलभर भी साथ नही
छोड़ूंगी । हृदय के बीच प्रिय के लिए घर बनाऊँगी और नयनों में बैठकि दूंगी ।
सूरदास कहते हैं कि प्रभु के साथ मिलने पर फिर से रास का रस लूंगी ॥६४॥
कृपा सिंधु हरि कृपा करौ हो ।
अनजानैं मन गर्व बढ़ायौ, सो जिनि हृदय धरौ हो ।
सोरह सहस पीर तनु एकै, राधा जिव, सब देह ।
ऐसी दसा देखि करुनामय, प्रगटौ हृदय-सनेह ।
गर्व-हत्यौ तनु विरह प्रकास्यौ, प्यारी व्याकुल जानि ।
सुनहु सूर अब दरसन दीजै, चूक लई इनि मानि ॥६५॥
अर्थ - कृपा के सागर कृष्ण कृपा करो । अज्ञान वश मन मे गर्व बढाया उसे
हृदय में धारण मत करो । सोलह सहस गोपियां, पर सबके शरीर मे पीडा एक ही ।
और सब शरीर हैं, राधा ही मानो उनका प्राण है। ऐसी दशा देखकर करुणामय कृष्ण
के हृदय मे स्नेह प्रकट हुआ । (कृष्ण ने गोपियों के) गर्व को समाप्त कर दिया और
प्यारी को व्याकुल जानकर शरीर मे विरह प्रकाशित किया । सूरदास कहते हैं कि
कृष्ण सुनो, अब दर्शन दीजिए। इन लोगो ने अपनी भूल मान ली ॥६५॥
अंतर तैं हरि प्रगट भए ।
रहत प्रेम के वस्य कन्हाई, जुवतिनि कौं मिलि हर्ष दए ।
वैसोइ सुख सबकौं फिरि दीन्हीं, वहै भाव सब मानि लियौ ।
वै जानति हरि सग तवहिं तैं, वहै बुद्धि सब, वहै हियौ ।
वहै रास-मंडल-रस जानतिं, विच गोपी, विच स्याम धनी ।
सूर स्याम श्यामा मधि नायक, वहै परस्पर प्रीति वनी ॥६६॥
अर्थ-ओट से कृष्ण प्रकट हो गये । कृष्ण प्रेम के वश रहते हैं । (उन्होने फिर
युवतियों से मिलकर) (उन्हे) आनन्द दिया । सबको वैसा ही सुख फिर से दिया और

११६ सूरसागर सार सटीक
उसी भाव से सबको (अपनाकर) मान लिया। वे (गोपियाँ) हरि को पहले से ही साथ
जानने लगीं। सबकी वही बुद्धि और वही हृदय (हो गया)। फिर उसी रास मण्डल
के रस को समझने लगी जिसमे (श्याम के) बीच मे गोपी और (गोपी के) बीच में
श्याम (थे)। सूरदास कहते हैं कि श्याम और श्यामा के मध्य नायक कृष्ण का फिर
वही परस्पर प्रेम बन गया ॥६६॥
आजु हरि अद्भुत रास उपायौ।
एकहिँ सुर सब मोहित कीन्हे, मुरली नाद सुनायौ।
अचल चले, थकित भए, सब मुनिजन ध्यान भुलायौँ।
चंचल पवन थक्यौ नहिँ डोलत, जमुना उलटि बहायौ।
थकित भयौ चंद्रमा सहित-मृग, सुधा-समुद्र बढ़ायौ।
सूर स्याम गोपिनि सुखदायक, लायक दरस दिखायौ ॥६७॥
अर्थ—आज कृष्ण ने अद्भुत रास रचाया। एक ही स्वर से सबको मोहित
करके मुरली की ध्वनि सुनायी। (जिससे) न चलने वाले (जड) चलने लगे, चलने वाले
थक गये और सब मुनि जनो का ध्यान भूल गया। चंचल पवन थककर (अब) नही
डोलता है। जमुना को उल्टा वहा दिया। हिरण सहित चन्द्रमा थक गया और अमृत
के समुद्र को बढ़ा दिया। सूरदास कहते है गोपियो को सुख देने वाले कृष्ण ने सत्पात्र
को दर्शन दिया ॥६७॥
बनावत रास मंडल प्यारौ।
मुकुट की लटक, झलक कुंडल की, निरतत नंद दुलारो।
उर वनमाल सोह सुंदर वर, गोपिनि कैँ सँग गावै।
लेत उपज नागर नागरि सँग, बिच-बिच तान सुनावै।
वंसीबट-तट रास रच्यौ है, सब गोपिनि सुखकारौ।
सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन सौँ, भक्तनि प्रान अधारौ ॥६८॥
अर्थ—कृष्ण प्यारे रास मण्डल को बनाते हैं। मुकुट को झुकाते हुए, कुण्डल
को झलकाते हुए, नन्द के दुलारे (कृष्ण) नाचते हैं। वक्ष स्थल पर श्रेष्ठ सुन्दर बनमाल
सुशोभित है, (और कृष्ण) गोपियो के साथ गाते हैं। कृष्ण राधा के साथ नया स्वर
भरते है, और बीच-बीच मे तान सुनाते है। सब गोपियो को सुख देने वाला रास
(कृष्ण ने) वंसीवट के निकट रचा है। सूरदास कहते हैं कि प्रभु, तुमसे मिलने की
आशा ही भक्तो के प्राण का आधार है ॥६८॥
रास रस स्रमित भईँ ब्रजवाल।
निसि सुख दै यमुना-तट लै गए, भोर भयौ तिहिँ काल।
मनकामना भई परिपूरन, रही न एकौ साधि।
षोड़स सहस नारि सँग मोहन, कीन्हौ सुख अवगाधि।

वृन्दावन लीला ११६
जमुना-जल बिहरत नँद-नंदन, संग मिलीँ सुकुमारि ।
सूर धन्य धरनी वृन्दावन, रबि तनया सुखकारि ॥६६॥
अर्थ—रास के रस से ब्रज की बालायें थक गयी । रात को सुख देकर (कृष्ण)
उन्हे जमुना के तट पर ले गये, उस समय सबेरा हो गया । (गोपियो की) सारी
मनोकामनाये पूर्ण हो गयी, एक भी इच्छा बाकी न रही । सोलह हजार नारियो के
साथ मोहन ने अगाध सुख प्राप्त किया । कृष्ण सुकुमारियो को साथ मे लेकर जमुना
के जल मे बिहार करते है । सूरदास कहते है कि वृन्दावन की धरती धन्य है और
सुख देने वाली यमुना (धन्य है) ॥६६॥
ललकत स्याम मन ललचात ।
कहत हैं घर जाहु सुंदरि, मुख न आवति बात ।
षट सहस दस गोप कन्या, रैनि भोगीं रास ।
एक छिन भईँ कोउ न न्यारी, सबनि पूजी आस ।
बिहंसि सब घर-घर पठाईँ, ब्रज गईँ ब्रज-बाल ।
सूर प्रभु-नंद-धाम पहुँचे, लख्यौ काहु न ख्याल ॥१००॥
अर्थ—इच्छा से (कृष्ण का) मन (बार-बार) ललचाता है । कृष्ण कहते हैं कि
हे सुन्दरियों घर जाओ, (लेकिन) मुँह मे बात नही आती । सोलह हजार गोप कन्याओ
ने रात मे रास का भोग किया । कोई एक भी क्षण अलग न हुई और सभी ने अपनी-
अपनी आशाओ को पूर्ण किया । कृष्ण ने हँस कर ब्रज बालाओं को उनके घर भेज
दिया । सूरदास कहते है कि फिर कृष्ण नन्द के घर पहुँचे और किसी ने इस खेल को
देखा समझा नही ॥१००॥
ब्रजबासी सब सोवत पाए ।
नंद सुवन मति ऐसी ठानी, उनि घर लोग जगाए ।
उठे प्रात-गाथा मुख भाषत, आतुर रैनि बिहानी ।
ऐँडत अंग जम्हात बदन भरि, कहत सबै यह बानी ।
जो जैसेँ सो तैसेँ लागे, अपनैँ-अपनैँ काज ।
सूर स्याम के चरित अगोचर, राखी कुल की लाज ॥१०१॥
अर्थ—(लौटकर) उन लोगों ने ब्रजवासियो को सोता पाया । नंद के पुत्र (कृष्ण)
ने बुद्धि मे ऐसा निश्चय करके उनके घर के लोगों को जगाया । उठ करके प्रातः काल
सामान्य बातो को मुँह से कहते हैं । आतुरता मे ही रात बीती । अङ्ग को ऐठकर तथा
मुँह भरकर जम्हाई लेते हुये सभी यह बात कहते है । जो जैसे थे वैसे ही अपने-अपने
काम में लग गये । सूरदास कहते है कि कृष्ण चरित्र न दिखाई देने वाला है (उन्होने
गोपियों की) कुल की लाज रख दी ॥१०१॥

३. गोचारण तथा दानलीला

१२० सूरसागर सार सटीक
ब्रज-जुवती रस-रास पगीँ ।
कियौ स्याम सब को मन भायो, निसि रति-रंग जगीँ ।
पूरन ब्रह्म, अकल, अविनासी, सबनि सग सुख दीन्ही ।
जितनी नारि भेष भए तितने, भेद न काहू कीन्ही ।
वह सुख टरत न काहूँ मन तैँ, पति हित-साध पुराईँ ।
सूर स्याम दूलह सब दुलहिनि, निसि भाँवरि दै आईं ॥१०२॥
अर्थ - ब्रज युवतियां रास के रस मे पगी रही । कृष्ण (के द्वारा) किया गया
(रास) सब के मन को अच्छा लगा । (वे) रात भर रति के रङ्ग मे जागती रही ।
पूर्ण ब्रह्म, अकल, अविनाशी, कृष्ण ने सब को साथ सुख दिया । जितनी स्त्रियां थी,
कृष्ण ने उतने ही वेष बनाये, किसी के साथ भेद-भाव नही किया । वह सुख किसी
के मन से टलता नही है । उन्होने (कृष्ण के लिए) पति प्रेम की इच्छा पूर्ण कर ली ।
सूरदास कहते हैं कि कृष्ण दूल्हा तथा (सब गोपियां) दुल्हिनियां रात मे भांवर दे
आईं ॥१०२॥
रास रस लीला गाइ सुनाऊँ ।
यह जस कहै, सुनै मुख श्रवननि, तिहि चरननि सिर नाऊँ ।
कहा कहौँ वक्ता स्रोता फल, इक रसना क्यौँ गाऊँ ।
अष्ट सिद्धि नवनिधि सुख-सपति, लघुता करि दरसाऊँ ।
जौ परतीति होइ हिरदै मैंँ, जग-माया धिक देखै ।
हरि-जन दरस हरिहि सम बूझै, अंतर कपट न लेखै ।
धनि वक्ता, तेई धन स्रोता, स्याम निकट हैं ताकैं ।
सूर धन्य तिहि के पितु, माता, भाव भगति है जाकैं ॥१०३॥
अर्थ - रास के रस की लीला को गाकर सुनाता हूँ । यह यश जो मुंह से कहता
और सुनता है उसके चरणो पर सिर झुका दूं । कहने वाले और सुनने वाले के फल
को कहाँ तक कहूँ और इस एक जीभ से क्यो गाऊँ । आठो सिद्धियां और नौ निधियों
के सुख सम्पत्ति को ( इस रास रस के सामने ) हीन करके दिखा दूँ । यदि हृदय मे
विश्वास हो तो ससार की माया को देखना धिक्कार है । भगवान् के भक्त का दर्शन
भगवान् के समान ही समझते हुए हृदय मे कपट नही रखे । वह वक्ता धन्य है और
वही श्रोता धन्य है और उसी के निकट कृष्ण हैं । सूरदास कहते हैं कि उसी के माता-
पिता धन्य हैं जिनमे भक्ति भाव है ॥१०३॥
पनघट लीला
पनघट रोके रहत कन्हाई ।
जमुना-जल कोउ भरन न पावै, देखत हीँ फिरि जाई ।
तबहिँ स्याम इक बुद्धि उपाई, आपुन रहे छपाई ।

वृन्दावन लीला १२१
तट ठाढे जे सखा संग के, तिनकौं लियौ बुलाई।
बैठारयौ ग्वालनि कौं द्रुमतर, आपुन फिरि-फिरि देखत।
बड़ी वार भई कोउ न आई, सूर स्याम मन लेखत ॥१५०४॥
अर्थ—कृष्ण पनघट को रोके रहते है। यमुना में कोई जल भरने नही पाता
और (कृष्ण को देखते ही) सब वापस फिर जाती हैं। तभी कृष्ण को एक उपाय सूझा
और उन्होंने अपने को छिपा लिया। तट पर जो मित्र खड़े थे उन्हें बुला लिया।
ग्वालों को वृक्ष के नीचे बैठा दिया और स्वयं घूम-घूम कर देखते हैं। बैठे-बैठे देर हो
गई लेकिन कोई (गोपी) नही आई जिससे कृष्ण मन में सोचते हैं ॥१५०४॥
जुवति इक आवति देखी स्याम।
द्रुम कैं ओट रहै हरि आपुन, जमुना तट गई बाम।
जल हलोरि गागरि भरि नागरि, जबहीं सीस उठायो।
घर कौं चली जाइ ता पाछैं, सिर तैं घट ढरकायो।
चतुर ग्वालि कर गह्यो स्याम कौ, कनक लकुटिया पाई।
औरनि सौं करि रहे अचगरी, मोसौँ लगत कन्हाई।
गागरि लै हँसि देत ग्वारि-कर, रीतौ घट नहिं लैहौँ।
सूर स्याम ह्वाँ आनि देहु भरि, तबहिँ लकुट कर दैहौं ॥१५०५॥
अर्थ—एक युवती को आते हुए कृष्ण ने देखा। कृष्ण स्वयं वृक्ष की ओट में
(छिपे) रहे और वह युवती यमुना के तट पर गयी। जल हिलोर कर गगरी भर कर
जब स्त्री ने सिर पर उठाया और (जैसे ही) घर की ओर चली, (कृष्ण ने) पीछे से
जाकर सिर से घड़ा ढरका दिया। चतुर ग्वालिन ने कृष्ण के हाथ को पकड़ा और
सोने की लकुटी पा गयी। (ग्वालिन बोली) कृष्ण औरों से शरारत करते रहे मुझसे
(क्यों) लगते हो। (कृष्ण) हंसकर खाली घड़ा ग्वालिन को देते है, (लेकिन वह कहती
है) मैं खाली घड़ा नही लूंगी। सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है) कृष्ण इसे भर
कर लाओ तभी लकुटी दूंगी ॥१५०५॥
घट भरि दियौ स्याम उठाइ।
नैंकु तन की सुधि न ताकौं, चली ब्रज-समुहाइ।
स्याम सुन्दर नैन-भीतर, रहे आनि समाइ।
जहाँ-तहँ भरि दृष्टि देखै, तहाँ-तहाँ कन्हाइ।
उतहिं तैं इक सखी आई, कहति कहा भुलाइ।
सूर अबहीं हँसत आई, चली कहाँ गवाँइ ॥१५०६॥
अर्थ—कृष्ण ने घड़ा उठाकर भर दिया। उसे तनिक भी शरीर का ख्याल नही
और ब्रज की ओर चली। श्याम सुन्दर नयनों के भीतर आकर समा गये। जहाँ-जहाँ
निगाह भर कर देखती है तहाँ-तहाँ कृष्ण ही दिखाई देते हैं। उस तरफ से एक सखी

१२२ सूरसागर सार सटीक
आयी ओर कहती है कि (तुम) कैसे भूली हुई हो। सूरदास कहते हैं कि (सखी पूछती
है) अभी तो तुम हँसती हुई आयी, कहाँ (मन) गवांकर चली जा रही हो ॥१०६॥
नौकैं देहु न मेरी गिंडुरी ।
लै जैहैं धरि जसुमति आगैं, आवहु री सब मिलि झुंडरी ।
काहूनहीं डरात कन्हाई, वाट घाट तुम करत अचगरी ।
जमुना-दह गिंडुरी फटकारी, फोरी सब मटुकी अरु गगरी ।
भली करी यह कुंवर कन्हाई, आजु मेटिहैं तुम्हरी लंगरी ।
चलीं सूर जसुमति के आगैं, उरहन लै ब्रज-तरुनी सगरी ॥१०७॥
अर्थ—(गोपियां कहती है) ठीक है तुम हमारी गिंडुरी मत दो । तुम्हे पकड़कर
यशोदा के आगे ले चलूंगी। आओ (सखियो) सब झुंड बनाकर चले । कृष्ण किसी से
नही डरते, घाट तथा रास्ते में शरारत करते है। यमुना के दह मे गिंडुरी फेक दी,
और मटकी तथा गगरी को फोड दिया । कुंवर कृष्ण तुमने अच्छा किया । आज
तुम्हारी दुष्टता मिटा दूंगी । सूरदास कहते हैं कि सभी ब्रज की तरुणियां यशोदा के
आगे शिकायत करने चली ॥१०७॥
सुनहु महरि तेरौ लाड़िलौ, अति करत अचगरी ।
जमुन भरन जल हम गईँ, तहँ रोकत डगरी ।
सिरतैं नीर ढराइ दै, फोरी सब गगरी ।
गेँडुरि दई फटकारि कै, हरि करत जु लंगरी ।
नित प्रति ऐसे ढंग करै, हमसौँ कहै धगरी ।
अब बस-वास बनैं, नहिं इहिँ तुव ब्रज-नगरी ।
आपु गयौ चढ़ि कदम पर, चितवत रहौँ सगरी ।
सूर स्याम ऐसेंहि सदा, हम सौं करै झगरी ॥१०८॥
अर्थ—(गोपियां कहती है) महरि सुनो तुम्हारा लाड़ला बहुत शरारत करता
है । हम यमुना मे जल भरने गयी थी वहां (हमारी) राह रोकता था । सिर से पानी
ढुलकाकर सब घडे फोड डाले । गेडुरी फेक दी, (इस प्रकार) कृष्ण शरारत करते हैं।
नित्य प्रति ऐसा ही ढङ्ग अपनाते है और हमे कुलटा कहते हैं। तुम्हारी इस ब्रज नगरी
में अब बसना-सहना नही बनता । स्वय कदम्ब पर चढ गये और (हम) सब देखती
रही। सूरदास कहते हैं कि हम (गोपियो) से ऐसे हमेशा झगडा करते है ॥१०८॥
ब्रज-घर-घर यह बात चलावत ।
जसुमति कौ सुत करत अचगरी, जमुना जल कोउ भरन न पावत ।
स्याम वरन नटवर बपु काछे, मुरली राग मलार बजावत ।
कुंडल-छबि रबि किरनहुँ तैं दुति, मुकुट इंद्र-धनुहुँ तैं भावत ।
मानत काहु न करत अचगरी, गागरि धरि जल मुंह ढरकावत ।
सूर स्याम कौं मात पिता दोउ, ऐसे ढंग आपुनहिं पढ़ावत ॥१०६॥

वृन्दावन लीला १२३
अर्थ—ब्रज के ( निवासी ) घर-घर यह बात चलाते हैं कि यशोदा का पुत्र
दुष्टता करता है जिससे कोई यमुना में जल भरने नही पाता । श्याम वर्ण के (कृष्ण)
नटवर का रूप सँवार कर मुरली से मलार राग बजाते है । कुंडल की छवि सूर्य की
किरण से भी तेज, मुकुट इन्द्र-धनुष से भी (अधिक) अच्छा लगता है । किसी का
कहना न मानकर (वे) शरारत करते हैं । गगरी को पकड़ कर मुंह से जल ढलका
देते हैं । सूरदास कहते हैं कि (ब्रजवासी कहते हैं) कृष्ण के माता-पिता ऐसे ढङ्ग स्वयं
(कृष्ण को) पढ़ाते हैं ॥११०६॥
करत अचगरी नंद महर कौ ।
सखा लिये जमुना तट बैठ्यो, निबह न लोग डगर कौ ।
कोउ खीझो, कोऊ बिन बरजौ, जुवतिन कैं मन ध्यान ।
मन-बच-कर्म स्याम सुन्दर तजि, और न जानति आन ।
यह लीला सब स्याम करत हैं, ब्रज-जुवतिन कैं हेत ।
सूर भजे जिहिं भाव कृष्ण कौं, ताकौं, सोइ फल देत ॥११०॥
अर्थ—महर नन्द के (पुत्र) शरारत करते रहते हैं । मित्रों को लेकर यमुना के
तट पर बैठ गये हैं जिससे लोगों को रास्ते मे निवाह नही है । कोई (चाहे) खीझे,
कोई (चाहे) रोके, युवतियो के मन मे (कृष्ण का गहरा) ध्यान है । मन, वाणी तथा
कर्म से कृष्ण को छोड़कर और किसी को नही जानती । यह सब लीला ब्रज की
युवतियों के लिए (ही) कृष्ण करते हैं । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण को जो जिस भाव
से भजता है उसे वैसा ही फल देते हैं ॥११०॥
दान लीला
ऐसी दान माँगिये नहिं जौ, हम पैं दियौ न जाइ ।
बन मैं पाइ अकेली जुवतिनि, मारग रोकत धाइ ।
घाट बाट औघट जमुना-तट, बातें कहत बनाइ ।
कोऊ ऐसी दान लेत है, कौनैं पठाए सिखाइ ।
हम जानतिं तुम यौँ नहिं रहौ, रहिहौ गारी खाइ ।
जो रस चाहौ सो रस नाहीँ, गोरस पियौ अघाइ ।
औरनि सौं लै लीजै मोहन, तब हम देहिं बुलाइ ।
सूर स्याम कत करत अचगरी, हम सौं कुँवर कन्हाइ ॥१११॥
अर्थ—(गोपियां कहती हैं) ऐसा दान मत मांगिये जो हमसे दिया न जा
सके । वन में युवतियों को अकेली पाकर दौड़कर (कृष्ण) रास्ता रोकते हो । घाट,
रास्ते दुर्गम पथ तथा यमुना के तट पर बनाकर बातें कहते हो । कोई ऐसा दान
लेता है (लगता है तुम्हे) किसी ने सिखाकर भेजा है । हम जानते है कि तुम ऐसे
नहीं रहोगे बल्कि गाली खाकर ही रहोगे । जो रस चाहते हो वह रस नही है, गोरस
भरपेट पी सकते हो । मोहन औरों से ले लीजिए तब हम बुलाकर दे देगी । सूरदास
कहते हैं कि (गोपियां कहती है) हे कुंवर कृष्ण हमसे दुष्टता क्यो करते हो ॥१११॥

१२४ सूरसागर सार सटीक
ऐसैं जनि बोलहु नंद-लाला ।
छाँड़ि देहु अँचरा मेरौ नीकैं, जानत और सी वाला ।
बार-बार मै तुमहिं कहत हौं, परिहौ बहुरि जँजाला ।
जोवन, रूप देखि ललचाने, अवहीं तैं ये ख्याला ।
तरुनाई तनु आवन दीजै, कत जिय होत विहाला ।
सूर स्याम उर तैं कर टारहु, टूटै मोतिनि-माला ॥११२॥
अर्थ—(गोपी कहती है) हे नन्दलाल ऐसे मत कहो । मेरे सुन्दर अंचल को
छोड़ दो, मुझे अन्य बालाओं के समान (तो नहीं) समझ रहे हो । मैं वार-वार तुमसे
कहती हूँ कि फिर तुम जंजाल मे पड़ जाओगे । यौवन रूप को देखकर (आप) ललचा
गये और अभी से ये बाते सोचने लगे । शरीर मे जवानी आने दीजिए; मन (अभी से)
आकुल क्यों होता है । सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है) वक्षस्थल से हाथ हटा
लो (नही तो) मोतियो की माला टूट जायेगी ॥११२॥
तैं कत तोर्यौ हार नौ सरि कौ ।
मोती वगरि रहे सब-वन मैं, गयौ कान कौ तरिकौ ।
ये अवगुन जु करत गोकुल मैं, तिलक दिये केसरि कौ ।
ढीठ गुवाल दही कौ मातौ, ओढ़नहार कमरि कौ ।
जाइ पुकारैं जसुमति आगैं, कहति जु मोचन लरिकौ ।
सूर स्याम जानी चतुराई, जिहिँ अभ्यास महुअरि कौ ॥११३॥
अर्थ—तुमने नव लड़ियो का हार क्यों तोड़ दिया ? (टूटकर) सब मोती वन
में बिखर गये । कान का तरीना भी (चला) गया । केसर का तिलक देकर गोकुल मे
इन अवगुणो को करते हो । (तुम) दही से मस्त, तथा कमरी के ओढ़ने वाले ढीठ
ग्वाल हो । जाकर पुकार कर यशोदा के आगे कहूँगी जो मोहन को बालक कहती हैं ।
सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है) कृष्ण चतुरता जान गये जिन्हे महुअर (बाजा)
का अभ्यास हो गया है ॥११३॥
आपुन भईं सवै अब भोरी ।
तुम हरि कौ पीताम्बर झटक्यौ, उन तुम्हरी मोतिनि लर तोरी ।
माँगत दान ज्वाव नहिं देतीं, ऐसी तुम जोवन की जोरी ।
डर नहिं मानतिं नंद-नंदन कौ, करतिं आनि झकझोरा झोरी ।
इक तुम नारि गँवारि भली हौ, त्रिभुवन मैं इनकी सरि को री ।
सूर सुनहु लैहैं छँडाइ सब, अवहिँ फिरौगी दौरी दौरी ॥११४॥
अर्थ—अब सभी अपने आप अनजान (भोली) हो गयी, तुमने कृष्ण का पीतांबर
झटका, उन्होने तुम्हारी मोतियो की लड़ी तोड़ी । (उनके) दान मांगने पर (तुम लोग)
जवाब नहीं देती, (तुम) ऐसी यौवन के जोर वाली हो गयी हो । तुम नन्द के
नन्दन (कृष्ण) का डर नही मानती जो इस तरह आकर धक्का-मुक्की करती हो ।