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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 113

११२ सूरसागर सार सटीक
विरध अरु बिन भागहूँ कौ, पतित जौ पति होइ ।
जऊ मूरख होइ रोगी, तजै नाहीं जोइ ।
यहै मैं पुनि कहत तुम सौं, जगत मैं यह सार ।
सूर पति-सेवा बिना, क्यों तरौगी ससार ॥८२॥
अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) इस प्रकार वेद की रीति सुनो । कपट त्यागकर पति
की पूजा करो (और) क्या तुम मन मे गुनती हो । पति मान करके भवसागर तर
जाओगी और कोई उपाय नही है । उसे छोड़कर वन मे क्यों आई और यहाँ आने पर
क्या मिला । बुड्ढा, अभागा, पतित, मूर्ख तथा रोगी कैसा भी पति हो उसको भी
पत्नी के द्वारा नही छोड़ा जाना चाहिए । यही मैं तुमसे फिर कहता हूँ कि संसार मे
यही सार है । सूरदास कहते हैं (कृष्ण समझाते है) पति की सेवा के बिना संसार को
क्योकर पार करोगी ॥८२॥
तुम पावत हम घोष न जाहिँ ।
कहा जाइ लैहैं हम व्रज यह दरसन त्रिभुवन नाहिं ।
तुमहूँ तैं ब्रज हितू न कोऊ, कोटि कहौ नहिं मानैं ।
काके पिता, मातु हैं काकी, काहूँ हम नहिं जानैं ।
काके पति, सुत-मोह कौन कौ, घरही कहा पठावत ।
कैसौ धर्म, पाप है कैसो, आप निरास करावत ।
हम जानैं केवल तुमहीं कौं, और बृथा ससार ।
सूर स्याम निठुराई तजियै, तजियै वचन-विकार ॥८३॥
अर्थ—गोपियां उत्तर देती है कि तुम को पाते हुए हम अहीरो की वस्ती मे
(वापस) नही जायेगी । ब्रज मे जाकर हम क्या पायेगी, यह (आपका) दर्शन संसार मे
कही नही है । तुमसे अधिक हितकारक ब्रज मे ओर कोई नही है । आप हजारो बार कहे
लेकिन हम मानती नही । किसके पिता (है) किसकी माता है । हम किसी को नही
जानती । किसके पति, किसे पुत्र का स्नेह है और आप किसके घर भेजते है । कैसा
धर्म, कैसा पाप, आप हमे निराश करते है । हम केवल आप ही को जानती है और
संसार व्यर्थ है । हे कृष्ण निठुराई तथा उल्टी बातो को छोड़ दीजिए ॥८३॥
कहत स्याम श्रीमुख यह वानी ।
धन्य-धन्य दृढ़ नेम तुम्हारौ, बिनु दामनि मो हाथ बिकानी ।
निरदय बचन कपट के भाखे, तुम अपने जिय नैंकु न आनी ।
भजीं निसक आइ तुम मोकौं, गुरुजन की संका नहिं मानी ।
सिंह रहै जंबुक सरनागत, देखो सुनी न अकथ कहानी ।
सूर स्याम अंकन भरि लीन्हीँ, विरह अगिन-झर तुरत बुझानी ॥८४॥
अर्थ—कृष्ण अपने सुन्दर मुख से यह वाणी कहते है । तुम लोगो के नियम
दृढ है (इसलिए) तुम धन्य हो । बिना दाम के मेरे हाथ बिक गयी । कपट से भरे निर्दय