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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पहला अध्याय 1/59-65 ]
एकमात्र स्वरूप दामोदर ही महाप्रभुके भावोंके ज्ञाता :—
एइ श्लोकेर अर्थ जाने एकेला स्वरूप।
दैवे से वत्सर ताहाँ गियाछेन रूप ॥ 59 ॥
अनुवाद—केवल श्रीस्वरूप दामोदर ही इस श्लोकके
पाठके पीछे महाप्रभुके अप्राकृत भावोंको जानते थे।
दैववश उस वर्ष श्रीरूप गोस्वामी भी वहाँ उपस्थित
थे ॥ 59 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'एकेला स्वरूप'—उक्त श्लोक
अत्यन्त तुच्छ नायक-नायिकाके सम्बन्धमें रचित है।
महाप्रभु इसका जो इतने आदरके साथ पाठ कर रहे
थे, उसका गूढ़ तात्पर्य स्वरूप-दामोदरके अतिरिक्त
अन्य कोई भी नहीं जानता था ॥ 59 ॥
श्रीरूपके द्वारा उसके अनुरूप स्वरचित श्लोक :—
प्रभुमुखे श्लोक शुनि' श्रीरूपगोसाञि।
सेइ श्लोकेर अर्थ-श्लोक करिला तथाइ ॥ 60 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके मुखसे इस श्लोकको सुनकर
श्रीरूप गोस्वामीने उनके भावोंके अनुरूप एक श्लोककी
रचना की ॥ 60 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला, 13/111-159 संख्या
देखें ॥ 53-60 ॥
महाप्रभु और श्रीरूपके द्वारा रचित श्लोककी कथा :—
श्लोक करि' एक तालपत्रेते लिखिया।
आपन वासार चाले राखिला गुञ्जिया ॥ 61 ॥
श्लोक राखि' गेला समुद्रस्नान करिते।
हेनकाले आइला प्रभु ताँहारे मिलिते ॥ 62 ॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने श्लोककी रचना करके
उसे एक तालपत्रपर लिखा और अपने वास स्थानपर
फूसकी छतमें उसे फंसाकर रख दिया और समुद्रमें
स्नानके लिये चले गये। तभी इसी बीच महाप्रभु उनसे
मिलनेके लिये वहाँ आये ॥ 61-62 ॥
ब्राह्मणोंके गुरु अप्राकृत वैष्णवाचार्य होनेपर भी दीनतावश
मर्यादाका पालन करते हुए तीन व्यक्तियोंकी
श्रीजगन्नाथ-मन्दिरमें जानेकी अनिच्छा :—
हरिदास ठाकुर, श्रीरूप-सनातन।
जगन्नाथ-मन्दिरे ना या'न तिन जन ॥ 63 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीरूप और श्रीसनातन
गोस्वामी, ये तीनों श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें दर्शनके लिये नहीं
जाते थे ॥ 63 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हरिदास ठाकुर काजीके पुत्र थे।
मन्दिरकी मर्यादा भङ्ग न हो, इसलिये वे मन्दिरके
भीतर नहीं जाते थे। श्रीरूप-सनातन दैन्यवशतः अपनेको
तृणसे भी सुनीच मानते थे और उन्होंने नीच जातिके
लोगोंकी नौकरी की थी, इसलिये अपनेको नीच
जातिका ही मानकर मन्दिरमें नहीं जाते थे ॥ 63 ॥
महाप्रभु जगन्नाथेर उपल-भोग देखिया।
निजगृहे या'न एइ तिनरे मिलिया ॥ 64 ॥
अनुवाद—महाप्रभु प्रतिदिन श्रीजगन्नाथदेवका उपल-
भोग देखकर इन तीनोंसे मिलकर अपने वास स्थानपर
जाते थे ॥ 64 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'उपल-भोग'—छत्र-भोग।
श्रीजगन्नाथदेवके अन्य सभी भोग मणिकोठाके भीतर
अर्पित किये जाते हैं। गरुड़-स्तम्भके पीछे एक बहुत
बड़ा पत्थरसे बना स्थान है, दिनमें दोपहर बारह बजेके
बाद जो बृहत् (बड़ा) भोग होता है, वह इस पत्थरके
ऊपर लगाया जाता है। उपलका अर्थ होता है—पत्थर।
उस पथरीली भूमिके ऊपर जो भोग लगाया जाता है,
उसे 'उपल-भोग' कहते हैं ॥ 64 ॥
एइ तिन मध्ये यबे थाके येइ जन।
ताँरे आसि' आपने मिले,–प्रभुर नियम ॥ 65 ॥
अनुवाद—इन तीनोंमें जो भी उस स्थानपर होते थे,
उनसे महाप्रभु आकर भेंट करते थे—ऐसा उनका
नित्यका नियम था ॥ 65 ॥
। 17

[ 1/66–76 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
दैवे आसि' प्रभु यबे ऊर्ध्वेते चाहिल।
चाले गोंजा तालपत्रे सेइ श्लोक पाइल ॥ 66 ॥
श्लोक पड़ि' आछे प्रभु आविष्ट हइया।
रूपगोसाञि आसि' पड़े दण्डवत् हञा ॥ 67 ॥
अनुवाद—महाप्रभु जब वहाँ पहुँचे, तो अचानक
उनकी दृष्टि ऊपर गयी और उन्हें वह तालपत्र
दिखलायी दिया। श्लोक पढ़कर महाप्रभु भावमें आविष्ट
हो गये और तभी श्रीरूप गोस्वामी वहाँ आये और
उन्होंने महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया ॥ 66–67 ॥
श्रीरूपके प्रति महाप्रभुकी अकृत्रिम स्नेह-कृपा :-
उठि' महाप्रभु ताँरे चापड़ मारिया।
कहिते लागिला किछु कोलेते करिया ॥ 68 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने उनको उठाकर प्रेमसे एक
चाँटा मारा और अपनी गोदमें बैठाकर कुछ पूछने
लगे ॥ 68 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'उठि'—पाठान्तर, 'उठाइ' ॥ 68 ॥
“मोर श्लोकेर अभिप्राय ना जाने कोन जने।
मोर मनेर कथा तुञि जानिलि केमने ? ॥” 69 ॥
एत बलि' ताँरे बहु प्रसाद करिया।
स्वरूप-गोसाञिरे श्लोक देखाइल लञा ॥ 70 ॥
अनुवाद—मेरे श्लोकका अभिप्राय कोई नहीं जानता
है, तो मेरे मनके भाव तुमने कैसे जान लिये ? यह
कहकर महाप्रभुने उन्हें बहुत आशीर्वाद दिये और वह
श्लोक दिखानेके लिये श्रीस्वरूप दामोदरजीके पास
आये ॥ 69–70 ॥
श्रीस्वरूपको श्रीरूपके द्वारा रचित
श्लोक दिखलाकर प्रश्न :-
स्वरूपे पुछेन प्रभु हइया विस्मिते।
“मोर मनेर कथा रूप जानिल केमते ? ॥” 71 ॥
अनुवाद—महाप्रभु विस्मित होकर श्रीस्वरूप दामोदरसे
पूछने लगे कि मेरे मनके भावोंको रूपने कैसे जान
लिया ? ॥ 71 ॥
स्वरूप कहे, —“याते जानिल तोमार मन।
ताते जानि, —हय तोमार कृपार भाजन ॥” 72 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा—"यदि उसने
आपके मनके भावोंको जान लिया है, तो यह निश्चित
है कि वह आपका कृपापात्र ही है ॥" 72 ॥
प्रभु कहे, —“तारे आमि सन्तुष्ट हञा।
आलिङ्गन कैलुँ सर्वशक्ति सञ्चारिया ॥ 73 ॥
योग्यपात्र हय गूढ़रस-विवेचने।
तुमिओ कहिओ तारे गूढ़रसाख्याने ॥” 74 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“मैं उससे सन्तुष्ट हुआ
हूँ और उसका आलिङ्गन करके मैंने अपनी सारी
शक्ति उसमें सञ्चारित की है। भक्तिरसके गूढ़ तत्त्वोंको
समझनेका वह योग्य पात्र है। तुम उसको भक्तिरसके
गूढ़ उपाख्यान समझाना ॥” 73–74 ॥
एसब कहिब आगे विस्तार करिया।
संक्षेपे उद्देश कैल प्रस्ताव पाइया ॥ 75 ॥
अनुवाद—(श्रीकृष्णदास कह रहे हैं) इन सबको
विस्तारसे आगेके अध्यायोंमें कहूँगा, यहाँ तो मैंने केवल
प्रसङ्गवशतः संक्षेपमें वर्णन किया है ॥ 75 ॥
पद्यावलीमें श्रीरूपकृत श्लोक (387) :-
प्रियः सोऽयं कृष्णः सहचरि कुरुक्षेत्रमिलित-
स्तथाहं सा राधा तदिदमुभयोः सङ्गमसुखम्।
तथाप्यन्तः खेलन्मधुरमुरलीपञ्चमजुषे
मनो मे कालिन्दीपुलिनविपिनाय स्पृहयति ॥ 76 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 76 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे सहचरी ! मेरे वे अतिप्रिय
कृष्ण मुझसे अभी कुरुक्षेत्रमें मिल रहे हैं, मैं भी वही
18 ।

पहला अध्याय 1/76-81 ]
राधा हूँ; और हम दोनोंके मिलनका सुख भी वैसा ही
है; तथापि इन कृष्णकी वनमें क्रीड़ाशील मुरलीके
पञ्चमसुरके आनन्दसे प्लावित कालिन्दीके तटपर वृन्दावनमें
जानेकी स्पृहा मेरे हृदयमें हो रही है ॥76॥
अनुभाष्य-
हे सहचरि (सखि), सः (मम कान्तः) अयं प्रियः
(प्राणारामः) कृष्णः कुरुक्षेत्रमिलितः (कुरुक्षेत्रे प्राप्तः) तथा
सा राधा अहं उभयोः तत् इदं सङ्गमसुखं (मिथो मिलनेन
यद्यपि सुखं जातं); तथापि अन्तःखेलन्मधुर-मुरली-पञ्चमजुषे
(अन्तः हृदयाभ्यन्तरे वृन्दावनमध्ये वा खेलन् क्रीडन् मधुरो
यः वंश्याः पञ्चमो रागः तं जुषते सेवते तस्मै)
कालिन्दीलिनविपिनाय (कालिन्द्याः यमुनायाः पुलिनं तटस्थलं
तस्मिन् यत् विपिनं तरु-समाकीर्णं निर्जनं काननं तस्मै
वंशीनिनादपूर्णयामुनतटान्तस्थ-वृन्दावनाय) मे (मम) मनः स्पृहयति
(गमनाय समुत्कण्ठितो भवति)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥76॥
श्लोकमें श्रीजगन्नाथ-दर्शनसे महाप्रभुके भाव व्यक्त :-
एइ श्लोकेर संक्षेपार्थ शुन, भक्तगण।
जगन्नाथ देखि' यैछे प्रभुर भावन ॥77॥
अनुवाद-हे भक्तों ! इस श्लोकका संक्षेपमें अर्थ
सुनो। श्रीजगन्नाथको देखकर महाप्रभुमें जैसे भाव आते
थे ॥77॥
कुरुक्षेत्रमें श्रीकृष्ण दर्शनसे राधिकाका भाव :-
श्रीराधिका कुरुक्षेत्रे कृष्णेर दरशन।
यद्यपि पायेन, तबु भावेन ऐछन ॥78॥
विधिधर्म और ऐश्वर्य त्याग करवाके श्रीकृष्णको ब्रजमें
दीन गोपियोंके मध्य प्राप्त करनेकी आकाङ्क्षा :-
राजवेश, हाती, घोड़ा, मनुष्य गहन।
काहाँ गोपवेश, काहाँ निर्जन वृन्दावन ॥79॥
सेइ भाव, सेइ कृष्ण, सेइ वृन्दावन।
यबे पाइ, तबे हय वाञ्छित-पूरण ॥80॥
अनुवाद-कुरुक्षेत्रमें श्रीमती राधिकाने श्रीकृष्णके
दर्शन किये और वे साक्षात् उनके सामने थे, परन्तु
उनके भाव इस प्रकार थे—यहाँ कृष्णका राजवेश है,
चारों ओर हाथी, घोड़े और मनुष्योंकी भीड़ लगी है
और कहाँ निर्जन वृन्दावनमें कृष्णका गोपवेश होता था।
वही प्रेमके भाव, वही गोपवेशमें कृष्ण और वही
वृन्दावनका परिवेश हो, तभी मेरी वाञ्छा पूर्ण होगी ॥78-80॥
श्रीकृष्णसे स्वगृहमें मिलनकी आकाङ्क्षा :-
श्रीमद्भागवत (10/82/48)-
आहुश्च ते नलिननाभ पदारविन्दं
योगेश्वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः।
संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं
गेहं जुषामपि मनस्युदियात् सदा नः॥81॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥81॥
अमृतप्रवाह भाष्य-गोपियोंने कहा,-'हे कमलनाभ !
संसार-कूपमें पतित लोगोंके पार होनेके लिये आपके
चरणकमल ही एकमात्र आश्रय हैं, जो ब्रह्मादि अति
ज्ञानवान् योगेश्वरोंके हृदयमें ही सर्वतोभावेन (सभी
प्रकारसे) चिन्तनीय हैं, वे चरणकमल हम गृहसेवियोंके
मनमें सदा उदित हों।"
किसी-किसी पाठमें निम्नलिखित श्लोक दिखायी
देता है (श्रीमद्भागवत 10/83/2)-
"त एवं लोकनाथेन परिपृष्टाः सुसत्कृताः।
प्रत्युचुर्हृष्टमनसस्तत्पादैकाहतांहसः ॥"81॥
अनुभाष्य-स्यमन्तपञ्चक अर्थात् कुरुक्षेत्रमें श्रीकृष्णदि
प्रमुख वृष्णियोंके साथ गोप-गोपियोंके मिलनके बाद
श्रीकृष्णके प्रति गोपियोंकी उक्ति-
गोप्यः आहुः-हे नलिननाभ (पद्मनाभ), अगाधबोधैः (बुद्धेः
पारङ्गतैः) योगेश्वरैः (विषयनिवृत्तैः) हृदि (मनसि) विचिन्त्यं
(सर्वतोभावेन चिन्तनीयं) संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं (संसार
एव कूपः तस्मिन् पतिताः ये तेषां उत्तरणाय उद्धाराय
अवलम्बम् आश्रयरूपं विषयैरतानां मुक्त्युपायरूपं) ते (तव)
पदारविन्दं (चरणकमलं) गेहं (गोपभवनं वृन्दावनं) जुषां
(सेवमानानां सहजगृहधर्मनिरतानां गोपीनां) अपि नः (अस्माकं)
मनसि सदा उदियात्। [सांसारिकविषयरसाविष्ठानां उद्धरणसमर्थं
विषयरहितानां योगीनां च ध्यानविषयात्मकं तव पदकमलं,
। 19

[ 1/81–84
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला


किन्तु अस्माकं सहजगृहधर्मपराणां तव विरहसिन्धुनिमग्नानां
नोद्धर्त्तुं शक्नुयात्, यतः वयं न ध्यानपरा योगिनः, न च
पतिपुत्रादिकथारताः कृपणाः संसारिणः]।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें।
[इस श्लोकमें गोपियोंके गूढ़ भाव इस प्रकार
हैं,—“हे कृष्ण! आपके चरणकमल सांसारिक
विषयरस-विष्ठासे उद्धार करनेमें समर्थ और योगियोंके
ध्यानके विषय हैं, किन्तु हमारे जैसी सहज गृहधर्म
परायणा जो आपके विरह-समुद्रमें डूब रही हैं, उनका
उद्धार करनेमें सक्षम नहीं हैं, क्योंकि हम न तो
ध्यानपरायण योगिनी हैं और न ही पति-पुत्रादिमें
आसक्त कृपण संसारी नारी हैं।”] ॥ 81 ॥

दीर्घ विरहके अन्तमें मिलनकी आकाङ्क्षा :—
तोमार चरण मोर व्रजपुरघरे।
उदय करये यदि, तबे वाञ्छा पूरे ॥ 82 ॥

अनुवाद—यदि तुम अपने चरण पुनः मेरे घर
वृन्दावनमें रखोगे, तभी मेरी अभिलाषा पूर्ण होगी ॥ 82 ॥

अनुभाष्य—गोपियाँ विशुद्ध कृष्णसेवा-परायणा हैं,
उन्हें श्रीकृष्णके ऐश्वर्य या अन्य किसी वैभवसे कोई
प्रयोजन नहीं हैं। इसलिये कुरुक्षेत्रमें श्रीकृष्णके हाथी,
घोड़ों और राजवेशमें उनकी कोई रुचि नहीं है। जिस
प्रकार गोपीजनवल्लभ श्रीकृष्ण गोपियोंके निर्मल प्रेमभावके
वशीभूत हैं, उसी प्रकार गोपियाँ भी गोपीजनवल्लभकी
नित्य सेविकाएँ हैं। योगीजन जिस प्रकार समस्त
सांसारिक कामनाओंका त्यागकर एकाग्र चित्तसे अखिल
वैभवके स्वामी श्रीकृष्णका ध्यान करते हैं, गोपियाँ उस
प्रकार श्रीकृष्णका ध्यान करनेकी चेष्टा नहीं करती हैं।
अथवा विषयोंमें आसक्त लोग जिस प्रकार अपनी
समृद्धिके लिये अपने देह-पुत्र-परिवारके लौकिक मङ्गल
अथवा स्वयं भवसागरसे मुक्त होनेके उद्देश्यसे हरिपादाश्रय
करते हैं, गोपियोंकी उस प्रकारके सत्कर्मोंमें रुचि या
निपुणता नहीं हैं। वे तो अपनी समस्त इन्द्रियोंके द्वारा
काय-मनो-वाक्यसे श्रीकृष्णकी शुद्धसेवामें निरन्तर रत
रहती हैं। गोपियाँ नीरस शुष्क तर्क-विचार अथवा
प्राकृत रसके भोग अथवा त्याग—इन सबसे परे हैं।
गोपियाँ यह नहीं चाहतीं कि उनके प्राणवल्लभ अन्य
किसी कार्यमें व्यस्त रहें अथवा मर्यादाका पालन
करनेके लिये वृन्दावनके अतिरिक्त किसी अन्य स्थानमें
रहें। वे तो श्रीवृन्दावनमें अपनी समस्त इन्द्रियोंसे सेवाके
द्वारा व्रजेन्द्रनन्दनको सुखी करके ही सुखका अनुभव
करती हैं ॥ 82 ॥

भागवतेर श्लोकार्थ विचार करिया।
रूप-गोसाञि श्लोक कैल लोक बुझाइञा ॥ 83 ॥

अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने एक ही श्लोकमें भागवतके
गूढ़ रहस्यको प्रकाशित कर दिया जिसे साधारण लोग
भी समझ सकते हैं ॥ 83 ॥

विरहके कारण चिरकालसे मधुर-स्मृतिमय
मिलनकी आकाङ्क्षा :—
ललितमाधव (10/38) —
या ते लीलारसपरिमलोद्गारिवन्यापरीता
धन्या क्षौणी विलसति वृता माधुरी माधुरीभिः।
तत्रास्माभिश्चटुलपशूपीभावमुग्धान्तराभिः
सम्बीतस्त्वं कलय वदनोल्लासि-वेणुर्विहारम् ॥ 84 ॥

अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 84 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे कृष्ण! तुम्हारी लीला-रस-
गन्धको विस्तार करनेवाले वनसमूहके द्वारा व्याप्त,
मथुरामण्डलीय माधुरीके द्वारा परिवेष्टित और भावके
द्वारा मुग्धचित्त हम गोपियोंके द्वारा परिसेवित होकर जिस
धन्य वृन्दावनमें विलास करते थे, हे वंशीवदन! (वहीं)
तुम हमारे सङ्ग वही लीला-विहार करो ॥ 84 ॥

अनुभाष्य—श्रीकृष्णकी श्रीमती राधिकासे अभीष्ट
वर माँगनेकी प्रार्थना करनेपर श्रीमतीकी उक्ति,—
लीलारसपरिमलोद्गारिवन्यापरीता (लीलारस-सुरभि-निःसारिणी
या वन्या वनसमूहतया परीता व्याप्ता), माधुरी (मथुरा-सम्बन्धिनी)
माधुरीभिः (सौन्दर्यैः) वृता (आवृता) धन्या (प्रशंसनीया), या


20

पहला अध्याय 1/75-87 ]
ते (तव) क्षौणी (व्रजभूमिः) विलसति, तत्र (व्रजपुर्यां)
चटुलपशुपीभावमुग्धान्तराभिः (चटुलाः चञ्चलाः पशुपीभावेन
गोपीभावेन मुग्धान्तःकरणं यासां ताभिः) अस्माभिः (गोपीभिः)
संवीतः (सम्मिलितः) वदनोल्लासिवेणुः (वदनात् उल्लसितुं शीलमस्य
इति उल्लासी वंशी यस्य तथाभूतः सन्, स्मितवदनोत्थ-
गोप्युन्मादिमुरलीनिनादकारी) त्वं विहारं कलय (कुरु)।
श्लोक-भावानुवाद—गोपियाँ कह रही हैं,- "हे कृष्ण !
मधुर लीलारसके सौरभको विस्तार करनेवाले वनसमूहसे
परिव्याप्त, मथुरामण्डलकी माधुरीसे परिवेष्टित जो धन्य
व्रजभूमि विराजमान है, उस व्रजपुरीमें मुग्धचित्त हम
गोपियोंसे परिवेष्टित होकर प्रफुल्लित मुखसे आनन्द-प्रसारण
करनेवाले वेणुवादन करते हुए तुम विहार करो।"
मध्यलीला 13/121-159 संख्या देखें ॥ 75-84 ॥
विरह हेतु श्रीजगन्नाथजीको व्रज ले जानेका आग्रह :-
एइरूप महाप्रभु देखि' जगन्नाथे।
सुभद्रा-सहित देखे, वंशी नाहि हाते ॥ 85 ॥
त्रिभङ्ग-सुन्दर व्रजे व्रजेन्द्रनन्दन।
काहाँ पाव, एइ वाञ्छा करे अनुक्षण ॥ 86 ॥
अनुवाद-इस प्रकार जब महाप्रभुने श्रीजगन्नाथजीको
देखा कि वे अपनी बहन सुभद्राके साथ हैं और उनके
हाथमें वंशी भी नहीं है, तो उनके हृदयमें श्रीजगन्नाथजीको
त्रिभङ्ग-ललित मुद्रामें खड़े परम सुन्दर व्रजेन्द्रनन्दनके
रूपमें देखनेकी इच्छा पल-पल बढ़ने लगी ॥ 85-86 ॥
उद्धवके दर्शनसे राधिका-भावमय महाप्रभु :-
राधिका-उन्माद यैछे उद्धव-दर्शने।
उद्घूर्णा-प्रलाप तैछे प्रभुर रात्रि-दिने ॥ 87 ॥
अनुवाद-उद्धवजीको देखकर जैसे श्रीमती राधिका
दिव्योन्मादकी दशामें उद्घूर्णा-प्रलाप करने लगीं थी,
वैसे ही महाप्रभु दिन-रात उन्मादित होकर प्रलाप
करते ॥ 87 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'उद्घूर्णा-प्रलाप'-नाना प्रकार
विवशतापूर्ण चेष्टासे जो प्रलापादि उदित होते हैं ॥ 87 ॥
अनुभाष्य - 'उन्माद'- उद्घूर्णा और चित्रजल्पादियुक्त
दिव्योन्माद।
"एतस्य मोहनाख्यस्य गतिं कामप्युपेयुषः ।
भ्रमाभा कापि वैचित्री दिव्योन्माद इतीर्यते ॥"
-(उ:नी: 14/190)
अर्थात् "किसी अनिर्वचनीय विशेष-वृत्तिको प्राप्त
होनेपर मोहनभावकी अद्भुत भ्रान्ति-सदृश स्फूर्तिरूपा
वैचित्रीको पण्डितजन दिव्योन्माद कहते हैं।" इस श्लोककी
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्तीकी आनन्दचन्द्रिका टीका-
"कामपि निर्वक्तुमशक्यां गतिं वृत्तिमुपेयुषः प्राप्तस्य काप्यद्भुता
वैचित्री दिव्योन्मादः ।"
अर्थात् "किसी अनिर्वचनीया वृत्तिसे प्राप्त मोहनके
भ्रमतुल्य विचित्रतापूर्ण अवस्थाको दिव्योन्माद कहते हैं।"
"उद्घूर्णा चित्रजल्पाद्यास्तद्भेदा बहवो मताः।"
-(उ:नी: 14/191)
अर्थात् "इस दिव्योन्मादमें उद्घूर्णा और चित्रजल्पादि
बहुतसे भेद हुआ करते हैं।"
'उद्घूर्णा'-
"स्याद्विलक्षणमुद्घूर्णा नानावैवश्यचेष्टितम् ।”
-(उ:नी: 14/192)
अर्थात् "नाना प्रकारकी विलक्षण विवशतापूर्ण
चेष्टाको उद्घूर्णा कहते हैं।" जैसे-
“शय्यां कुञ्जगृहे क्वचिद्वितनुते सा वाससज्जायिता,
नीलाभ्रं धृतखण्डिता व्यवहृतिश्खण्डौ क्वचित्तर्जति ।
आघूर्णत्यभिसारसंभ्रमवती ध्वान्ते क्वचिद्दारुणे,
राधा ते विरहोद्‌भ्रमप्रमथिता धत्ते न कां वा दशाम्।”
-(उ:नी: 14/193)
अर्थात् उद्धवजी श्रीकृष्णसे कहते हैं- "हे श्रीकृष्ण !
श्रीमती राधिका तुम्हारे विरहमें महाभ्रान्तिसे पीड़ित
होकर न जाने कौन-कौनसी दशाको प्राप्त नहीं हो रही
हैं? वे कभी वासकसज्जाकी भाँति कुञ्जभवनको
सजाती हैं, शय्या-रचना करती हैं, कभी खण्डितावस्थामें
अति क्रोधित होकर नीलमेघको भी तर्जन-गर्जन करती
। 21

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

[ 1/87–94 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
हैं, कभी-कभी घनघोर अन्धकारमें भी शीघ्रतासे अभिसारिणी
होकर भ्रमण करने लगती हैं।”
अधिरूढ़-महाभाव दो प्रकारका होता है—मोदन
और मादन। मोदनभाव वियोग-दशामें 'मोहन' नामसे
प्रसिद्ध है। इस मोहन-महाभावमें भी विरह-विवशता
हेतु सात्त्विकभावसमूह सुदीप्त रूपमें प्रकाशित हुआ
करते हैं॥ 87॥
अन्तके बारह वर्षोंमें महाप्रभुका श्रीकृष्ण विरह :-
द्वादश वत्सर शेष ऐछे गोङाइल।
एइ मत शेषलीलार विधान करिल॥ 88॥
अनुवाद—अन्तिम बारह वर्ष महाप्रभुने इसी प्रकार
उन्माद दशामें बिताये, इस प्रकार उन्होंने (तीन प्रकारसे
मध्य और अन्त्य) शेषलीला की॥ 88॥
महाप्रभुकी असीम लीलाएँ :-
संन्यास करि' चब्बिश वत्सर कैला ये ये कर्म।
अनन्त, अपार—तारके जानिबे मर्म॥ 89॥
ग्रन्थकारका दिग्दर्शन :-
उद्देश करिते करि दिग्-दरशन।
मुख्य-मुख्य-लीलार करि सूत्र गणन॥ 90॥
अनुवाद—संन्यास लेनेके बाद चौबीस वर्षोंमें उन्होंने
जो-जो लीलाएँ कीं, वे अनन्त-अपार हैं और उनके
मर्मको कौन जान सकता है? इसलिये मैं केवल
उनका दिग्दर्शन करानेके लिये मुख्य-मुख्य लीलाओंको
सूत्र रूपमें वर्णन करूँगा॥ 89-90॥
पहले महाप्रभुका संन्यास और बादमें वृन्दावन-यात्रा :-
प्रथम सूत्र प्रभुर संन्यासकरण।
संन्यास करि' चलिला प्रभु श्रीवृन्दावन॥ 91॥
अनुवाद—प्रथम सूत्र यह है कि महाप्रभुने संन्यास
ग्रहण किया और उसके बाद वे वृन्दावनकी ओर
चले॥ 91॥
अनुभाष्य—महाप्रभुका संन्यास साधारण कर्मियों
और ज्ञानियोंके संन्यासके जैसा नहीं है। उन्होंने संन्यास
ग्रहण करके वृन्दावन जानेकी लीला प्रदर्शित की।
सांसारिक भोगोंके विचारको छोड़कर श्रीकृष्णका अनुकूल
अनुशीलन ही अवैष्णवतासे संन्यास लेना है।
“अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः।
निर्बन्धः कृष्णसम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते॥”
—(भःरःसिः 1/2/255)
अर्थात् “विषयोंमें अनासक्त होकर अपनी भक्तिके
अनुकूल यथा-उपयुक्त विषय-भोग करते हुए श्रीकृष्णकी
भक्तिके सम्बन्धमें विशेष आग्रह रखना 'युक्त-वैराग्य'
कहलाता है।”
ज्ञानी-संन्यासी हरिसेवासे विमुख होनेके कारण
अप्राकृत तत्त्वको नहीं समझ पाते, इसलिये वे हरिसम्बन्धी
वस्तुओंको भी भौतिक मानते हैं॥ 91॥
तीन दिन तक राढ़ देशमें भ्रमण :-
प्रेमेते विह्वल बाह्य नाहिक स्मरण।
राढ़देशे तिन दिन करिला भ्रमण॥ 92॥
अनुवाद—महाप्रभु श्रीकृष्णप्रेममें ऐसे मत्त हो गये
कि उन्हें बाहरकी सुध-बुध ही नहीं रही और वे मनमें
यही भावना कर रहे थे कि वे वृन्दावनकी ओर जा
रहे हैं, परन्तु वे तीन दिन तक निरन्तर राढ़देशमें ही
घूमते रहे॥ 92॥
श्रीनित्यानन्दकी चतुरतासे महाप्रभुका नवद्वीपमें आगमन :-
नित्यानन्द प्रभु महाप्रभु भुलाइया।
गङ्गातीरे लञा गेला 'यमुना' बलिया॥ 93॥
शान्तिपुरमें श्रीअद्वैतके घरमें भिक्षा और कीर्तन :-
शान्तिपुरे आचार्येर गृहे आगमन।
प्रथम भिक्षा कैल ताहाँ, रात्रे सङ्कीर्त्तन॥ 94॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुको वृन्दावन
ले जानेके छलसे उन्हें भ्रमित करके गङ्गाके तटपर
लाकर कहा कि ये यमुनाजी हैं। उसके बाद श्रीनित्यानन्द
प्रभु उन्हें शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यके घर लेकर आये
22 ।

पहला अध्याय 1/93–100 ]
और महाप्रभुने संन्यासके बाद पहली भिक्षा वहीं की।
उस रात उन्होंने भक्तोंके साथ सङ्कीर्तन किया॥ 93-94 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'प्रथमभिक्षा' - संन्यास लेनेके बाद
कुछ दिन भ्रमण करनेके बाद श्रीअद्वैत-प्रभुके घरमें
प्रथम अन्नभिक्षा ग्रहण की ॥ 94 ॥
शचीमाता और भक्तोंके साथ मिलन, पुरीमें गमन :-
माता भक्तगणेर ताँहा करिल मिलन।
सर्व समाधान करि' कैल नीलाद्रिगमन ॥ 95 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यके घरमें महाप्रभुका शचीमाता
और मायापुरके भक्तोंसे मिलन हुआ। तब मातासे
अनुमति और सब भक्तोंसे विदा लेकर वे वहाँसे
नीलाचलकी ओर चले पड़े ॥ 95 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला तीसरा अध्याय देखें ॥ 91-95 ॥
पुरीके मार्गमें रेमुणामें माधवेन्द्र पुरीका
वृत्तान्त और गोपीनाथ-दर्शन :-
पथे नाना लीला, सब देव-दरशन।
माधवपुरीर कथा, गोपाल-स्थापन ॥ 96 ॥
अनुवाद-नीलाचल जाते हुए महाप्रभुने अनेक
लीलाएँ कीं और मार्गमें उन्होंने सभी मन्दिरोंमें विग्रहोंके
दर्शन किये। उन्होंने श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी कथाका वर्णन
किया कि कैसे उन्होंने श्रीगोपालके विग्रहकी गोवर्धनमें
स्थापना की ॥ 96 ॥
अनुभाष्य-श्रीमाधवपुरी-शब्दसे श्रीमाधवेन्द्रपुरीको
समझना चाहिये। श्रीगदाधर-पण्डित गोस्वामीकी शाखामें
श्रीवल्लभभट्टने श्रीमङ्गलभाष्यके लेखक श्रीमाधवाचार्यसे
त्रिदण्ड संन्यास ग्रहण किया था। श्रीमाधवाचार्य और
श्रीमाधवेन्द्रपुरी दो अलग व्यक्ति हैं ॥ 96 ॥
श्रीनित्यानन्दके द्वारा साक्षी-गोपालका वृत्तान्त
वर्णन और महाप्रभुके संन्यास दण्डको तोड़ना :-
क्षीर-चुरि-कथा, साक्षिगोपाल-विवरण।
नित्यानन्द कैल प्रभुर दण्ड-भञ्जन ॥ 97 ॥
अनुवाद-गोपीनाथजीके द्वारा श्रीमाधवेन्द्रपुरीके लिये
खीर चुराना, गोपालजीका ब्राह्मणके लिये साक्षी देनेके
लिये वृन्दावनसे विशाखापट्टनम् आना आदि लीलाओंका
महाप्रभुने आस्वादन किया। मार्गमें श्रीनित्यानन्द प्रभुने
उनका संन्यास दण्ड तोड़कर उसे नदीमें फेंक दिया ॥ 97 ॥
अनुभाष्य - 'क्षीरचोरा गोपीनाथ' - श्रीपाट रेमुणामें है।
टीका लिखनेके समय श्रीश्यामसुन्दर अधिकारी मन्दिरके
सेवायत थे। वे श्रीश्यामानन्द प्रभुके अनुगत श्रील
रसिकानन्द मुरारिके श्रीपाट मेदिनीपुर जिलाके छोरपर
रहनेवाले गोपीवल्लभपुरके शिष्य हैं।
'साक्षिगोपाल'-भुवनेश्वरसे पुरीके मार्गपर 'सत्यवादी'
नामक ग्राममें श्रीमन्दिर अवस्थित है। श्रीमन्महाप्रभुके
समयमें कटक-शहरमें साक्षिगोपालका मन्दिर था।
(मध्यलीला 5/8 का अमृतप्रवाह-भाष्य देखें।)
मध्यलीला चौथा और पाँचवाँ अध्याय भी देखें ॥ 96-97 ॥
अकेले श्रीजगन्नाथ दर्शन करते समय मूर्च्छा :-
क्रुद्ध हञा एका गेला जगन्नाथ देखिते।
देखिया मूर्छित हञा पड़िला भूमिते ॥ 98 ॥
श्रीसार्वभौमके घरमें महाप्रभुको लाना और मूर्च्छाभङ्ग :-
सार्वभौम लञा गेला आपन-भवन।
तृतीय प्रहरे प्रभु हइल चेतन ॥ 99 ॥
अनुवाद-उनके दण्डको तोड़कर फेंक देनेकी
बातसे क्रोधित होकर महाप्रभु अकेले ही श्रीजगन्नाथके
दर्शनोंके लिये आये और वहाँ दर्शन करते ही वे
मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य
उन्हें उठाकर अपने घर ले आये। तीन प्रहर बाद
महाप्रभुकी चेतना लौटी ॥ 98-99 ॥
बादमें श्रीनित्यानन्दादि भक्तोंके साथ मिलन :-
नित्यानन्द, जगदानन्द, दामोदर, मुकुन्द।
पाछे आसि' मिलि' सबे पाइल आनन्द ॥ 100 ॥
अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीजगदानन्द, श्रीस्वरूप
। 23

[ 1/100-106 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
दामोदर, श्रीमुकुन्द पीछे आकर महाप्रभुसे मिले और
उन्हें बहुत आनन्द हुआ॥100॥
श्रीसार्वभौमपर कृपा और षड्भुज-प्रदर्शन :-
तबे सार्वभौमे प्रभु प्रसाद करिल।
आपन-ईश्वरमूर्त्ति ताँरे देखाइल॥101॥
अनुवाद-तब महाप्रभुने श्रीसार्वभौमपर कृपा करके
उन्हें अपनी ईश्वरमूर्तिका (पहले चतुर्भुज नारायणरूपके
और बादमें अपने नित्य श्यामसुन्दर-वंशीधारी श्रीकृष्ण
स्वरूपके) दर्शन कराये॥101॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 6/201-204 संख्या देखें॥101॥
महाप्रभुका दक्षिण भारतकी ओर गमन तथा
कूर्मक्षेत्रमें कुष्ठरोगी विप्रका उद्धार :-
तबे त' करिला प्रभु दक्षिण गमन।
कूर्मक्षेत्रे कैल वासुदेव-विमोचन॥102॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौमपर कृपा करके तब महाप्रभुने
दक्षिण भारतकी यात्रा आरम्भ की। कूर्मक्षेत्र पहुँचकर
उन्होंने कुष्ठरोगी वासुदेव नामक ब्राह्मणका उद्धार
किया॥102॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 7/113 के अनुभाष्यमें कूर्मस्थान
और श्रीनरहरि (नृहरि) तीर्थके समयमें 1203 शकाब्दके
पत्थर-पटलका वृत्तान्त देखें॥102॥
जियड़-नृसिंह-दर्शन :-
जियड़-नृसिंहे कैल नृसिंह-स्तवन।
पथे-पथे ग्रामे-ग्रामे नामप्रवर्त्तन॥103॥
अनुवाद-जियड़-नृसिंह क्षेत्रमें भगवान् नृसिंहदेवके
दर्शन करके उनकी स्तुति की और मार्गमें आनेवाले
सभी ग्रामोंमें उन्होंने श्रीकृष्णनाम-कीर्त्तनका प्रचार
किया॥103॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 8/3 का अनुभाष्य देखें॥103॥
विद्यानगरमें गोदावरी-तटपर श्रीराय-रामानन्दसे मिलन :-
गोदावरीतीर-वने वृन्दावन-भ्रम।
रामानन्द राय सह ताहाञि मिलन॥104॥
अनुवाद-गोदावरीके तटपर एक वनको देखकर
महाप्रभुको वृन्दावनका भ्रम हो गया। वहीं उनका श्रीराय
रामानन्दसे मिलन हुआ॥104॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 8/11 और 8/14-20 संख्या
देखें॥104॥
तिरुमलयमें तिरुपतिका दर्शन :-
त्रिमल्ल-त्रिपदी स्थान कैल दरशन।
सर्वत्र करिल कृष्णनाम प्रचारण॥105॥
अनुवाद-फिर महाप्रभुने त्रिमल्ल और त्रिपदी
स्थानोंमें जाकर दर्शन किये और सर्वत्र श्रीकृष्णनामका
प्रचार किया॥105॥
अनुभाष्य- 'त्रिमल्ल' (तिरुमलय) - ताञ्जोर जिलामें
अवस्थित है (मध्यलीला 9/71 संख्या देखें)। 'त्रिपदी'
(तिरुपति, पदि या तिरु-पाट्टुर) - (उत्तर आर्कटमें)
व्येङ्कटाचलकी घाटीमें अवस्थित है, वहाँ श्रीरामचन्द्रका
मन्दिर है। इसी व्येङ्कटाचलके ऊपर सुप्रसिद्ध श्रीबालाजीका
मन्दिर है (मध्यलीला 9/64 संख्या देखें)॥105॥
पाखण्डी-बौद्धोंका उद्धार और अहोबल-नृसिंह-दर्शन :-
तबे त' पाषण्डिगणे करिल दलन।
अहोबल-नृसिंहादि कैल दरशन॥106॥
अनुवाद-तब उन्होंने कुछ पाखण्डियोंको परास्त
किया। इसके बाद उन्होंने अहोबल-नृसिंह आदि
मन्दिरोंके दर्शन किये॥106॥
अनुभाष्य- 'पाषण्डदलन' - मध्यलीला 9/42-62 संख्या
देखें। 'अहोबल'-नामान्तर 'अहोबिलम्' मन्दिर-
दक्षिण-भारतके कर्नूल जिलाके सार्बेल-तालुकामें है।
सम्पूर्ण जिलेमें यह श्रीनृसिंहदेवका मन्दिर ही विख्यात
है। पीछे अन्य नौ विष्णुविग्रहोंसे युक्त मन्दिरसे मिलनेपर
24 ।

पहला अध्याय
1/106-112 ]


[बायाँ स्तम्भ]

इसे 'नवनृसिंहमन्दिर' भी कहते हैं। प्रधान मन्दिर चौंसठ
खम्बोंपर निर्मित है और प्रत्येक खम्बेपर छोटे-छोटे
खम्बे खुदे हैं। मन्दिरके सामने अत्यधिक कुशल
शिल्पकारोंकी कलाकारीके नमूनेके रूपमें सफेद पत्थरसे
निर्मित तीन फुट व्यासके गोलाकार बड़े-बड़े स्तम्भोंसे
युक्त एक असम्पूर्ण किन्तु बहुत विचित्र मण्डप विद्यमान
है (कर्णूल म्यानुयेलन पत्रिका)॥ 106 ॥

श्रीरङ्गनाथ-दर्शन :-
श्रीरङ्गक्षेत्र आइला कावेरीर तीर।
श्रीरङ्ग देखिया प्रेमे हइला अस्थिर ॥ 107 ॥

**अनुवाद—**वहाँसे वे कावेरीके तटपर श्रीरङ्गम पहुँचे।
श्रीरङ्गजीके दर्शन करके वे प्रेममें मत्त हो गये॥ 107 ॥

अनुभाष्य—'श्रीरङ्गक्षेत्र'—मध्यलीला 9/79 संख्याका
अनुभाष्य देखें ॥ 107 ॥

त्रिमल्ल भट्टके घरमें चातुर्मास्य-यापन :-
त्रिमल्ल भट्टेर घरे कैल प्रभु वास।
ताहाञि रहिला प्रभु वर्षा चारि मास ॥ 108 ॥

**अनुवाद—**महाप्रभु श्रीरङ्गममें त्रिमल्ल भट्टके घरमें
वर्षाकालके चार मास (चातुर्मास्य) तक रहे॥ 108 ॥

त्रिमल्ल भट्ट—श्रीसम्प्रदायके वैष्णव :-
‘श्रीवैष्णव’ त्रिमल्ल भट्ट—परम पण्डित।
गोसाञिर पाण्डित्य-प्रेमे हइला विस्मित ॥ 109 ॥

**अनुवाद—**त्रिमल्ल भट्ट बड़े विद्वान और श्रीसम्प्रदायमें
दीक्षित वैष्णव थे। परन्तु महाप्रभुका पाण्डित्य और
श्रीकृष्णप्रेम देखकर आश्चर्यचकित हो गये॥ 109 ॥

अनुभाष्य—'त्रिमल्ल भट्ट'—तमिलप्रदेशके अन्तर्गत श्रीरङ्गम
और अन्यान्य स्थानोंके रहनेवालोंकी 'तिरुमलय' या
'व्येङ्कट' नाम रखनेकी रीति नहीं है, विशेषतः तिरुमलय
या व्येङ्कट भट्ट आदि बङ्ग्लइ अर्थात् उत्तरमें स्थित
आन्ध्रप्रदेशके वैष्णव हैं और श्रीरङ्गमवासी तेङ्गलइ या


[दायाँ स्तम्भ]

दक्षिण-प्रदेशवासी वैष्णव हैं। मध्यलीला 9/82 संख्याका
अमृतभाष्य प्रवाह और अनुभाष्य देखें ॥ 108-109 ॥

चातुर्मास्य महाप्रभु श्रीवैष्णवेर सने।
गोङाइल नृत्य-गीत-कृष्णसङ्कीर्तने ॥ 110 ॥

**अनुवाद—**महाप्रभुने चातुर्मास्य त्रिमल्ल भट्ट और
उसके परिवारके साथ नृत्य-गीत सहित श्रीकृष्ण
नाम-सङ्कीर्तनमें बिताये ॥ 110 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'चातुर्मास्य'—आषाढ़मासकी
शुक्ला-द्वादशीसे कार्तिकमासकी शुक्ला-द्वादशी तक
चार मास ॥ 110 ॥

अनुभाष्य—'श्रीवैष्णव-घरमें महाप्रभुका चातुर्मास्य-
यापन'—मध्यलीला 9/84-164 संख्या देखें ॥ 110 ॥

श्रीरङ्गमके दक्षिणमें परमानन्द पुरीसे मिलन :-
चातुर्मास्यान्तरे पुनः दक्षिण गमन।
परमानन्दपुरी सह ताहाञि मिलन ॥ 111 ॥

**अनुवाद—**चातुर्मास्यके बाद वे पुनः दक्षिण भारत
भ्रमणपर निकले और वहाँ श्रीपरमानन्दपुरीसे उनका
मिलन हुआ ॥ 111 ॥

अनुभाष्य—'ताहाञि'—ऋषभ पर्वतपर। मध्यलीला
9/167-173 संख्या और 9/167 संख्याका अनुभाष्य
देखें ॥ 111 ॥

सङ्गी कृष्णदासका उद्धार, रामसेवकको
कृष्ण नाममें प्रवर्त्तन :-
तबे भट्टथारि हैते कृष्णदासेर उद्धार।
रामजपी विप्रमुखे कृष्णनाम प्रचार ॥ 112 ॥

**अनुवाद—**तान्त्रिक भट्टथारियोंके द्वारा स्त्री और
धनके आकर्षणमें फंसाये गये अपने सङ्गी कृष्णदासका
महाप्रभुने उद्धार किया। श्रीराम-नाम जप करनेवाले
ब्राह्मणके मुखसे उन्होंने श्रीकृष्णनामका प्रचार
करवाया ॥ 112 ॥


। 25

[ 1/112-119 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला


[बायाँ स्तम्भ]

अमृतप्रवाह भाष्य— 'रामजपी'—जो ब्राह्मण
श्रीराम-नामका जप करता था॥112॥
अनुभाष्य— 'भट्टथारि'—यही वास्तविक शब्द है।
'भट्टथारी'-शब्द ही लिखनेवालेकी असावधानीके कारण
बङ्गला ग्रन्थोंमें “भट्टमारि” हो गया है।
मालाबार प्रदेशमें पवित्रता-अभिमानी बहुत
नम्बुद्रि-ब्राह्मण रहते थे। ये भट्टथारि लोग उनके
पुरोहितका कार्य करते थे। इनकी मारण-उच्चाटन-
वशीकरण आदि तान्त्रिक याग-यज्ञमें निपुणता विख्यात
थी। महाप्रभुके सङ्गी कृष्णदास ब्राह्मणका चित्त चञ्चल
और उसकी मति भी चञ्चल थी। वह इनके चङ्गलमें
फंसकर जीवके एकमात्र धर्म महाप्रभुके सर्वोत्तम दास्यको
भूल गया था। दीन-तारण महाप्रभुने केशोंसे पकड़कर
उसे मायाके पाशसे मुक्त करवाके अपने 'अहैतुकी-कृपासिन्धु'
नामकी सार्थकताको स्थापित किया।
'भट्टथारिसे कृष्णदासका उद्धार'—मध्यलीला 9/226-233
संख्या देखें॥112॥

श्रीरङ्गपुरीके साथ मिलन, रावणके द्वारा माया-सीताके
हरणकी कथा वर्णनकर रामदास विप्रको सान्त्वना :—
श्रीरङ्गपुरी सह ताहारि मिलन।
रामदास विप्रेर कैल दुःखविमोचन॥113॥
**अनुवाद—**फिर महाप्रभु श्रीरङ्गपुरीसे मिले। तत्पश्चात्
रामदास नामक ब्राह्मणके दुःखको दूर किया॥113॥
अनुभाष्य— 'रामसेवक ब्राह्मणपर कृपा'—मध्यलीला
9/180-197, 201-217 संख्या देखें॥113॥

तत्त्ववादी माध्वमठाधीशके साथ विचार :—
तत्त्ववादी सह कैल तत्त्वेर विचार।
आपनाके हीनबुद्धि हैल ताँ-सबार॥114॥
**अनुवाद—**तत्पश्चात् मध्व-सम्प्रदायके तत्त्ववादियोंके
साथ महाप्रभुने तत्त्वकी आलोचना की जिसके फलस्वरूप
उन सबने अपने-आपको अल्पज्ञ माना॥114॥


[दायाँ स्तम्भ]

अनुभाष्य— 'तत्त्ववादियोंका गर्वनाश'—मध्यलीला
9/245-278 संख्या देखें। इन तत्त्ववादाचार्यका नाम
उत्तरराढ़ी-मठाधीश श्रीरघुवर्य-तीर्थ-मध्वाचार्य था॥114॥

विष्णुविग्रह-दर्शन :—
अनन्त, पुरुषोत्तम, श्रीजनार्द्दन।
पद्मनाभ, वासुदेव कैल दरशन॥115॥
**अनुवाद—**उसके बाद महाप्रभुने श्रीअनन्तदेव,
श्रीपुरुषोत्तम, श्रीजनार्द्दन, श्रीपद्मनाभ और श्रीवासुदेवके
दर्शन किये॥115॥
अनुभाष्य— 'अनन्त-पद्मनाभ'—त्रिवेन्द्रम जिलेका इस
नामसे प्रसिद्ध एक विष्णु-मन्दिर है।
'श्रीजनार्द्दन'—त्रिवेन्द्रम जिलेके छब्बीस मील उत्तरमें
बर्कालाके निकट यह विष्णु-मन्दिर है॥115॥

सप्तताल-उद्धार, रामेश्वरमें सेतुबन्ध-तीर्थमें स्नान :—
तबे प्रभु कैल सप्तताल-विमोचन।
सेतुबन्धे स्नान, रामेश्वर-दरशन॥116॥
**अनुवाद—**तब महाप्रभुने सप्तताल वृक्षोंका उद्धार
किया। सेतुबन्धपर स्नान करके महाप्रभुने श्रीरामेश्वरके
दर्शन किये॥116॥
अनुभाष्य— 'सप्तताल-विमोचन'—मध्यलीला 9/311-315
संख्या और 'सेतुबन्ध' एवं 'रामेश्वर'—मध्यलीला, 9/200
संख्याका अनुभाष्य देखें॥116॥

रामेश्वर तीर्थसे कूर्मपुराणको लेकर
रामदास विप्रके दुःखका मोचन :—
ताहाञि करिल कूर्मपुराण श्रवण।
मायासीता निलेक रावण, ताहाते लिखन॥117॥
शुनिय़ा प्रभुर आनन्दित हैल मन।
रामदास विप्रेर कथा हइल स्मरण॥118॥
सेइ पुरातन पत्र आग्रह करि' निल।
रामदासे देखाइय़ा दुःख खण्डाइल॥119॥


26 ।

पहला अध्याय 1/117-126 ]
अनुवाद-वहाँ उन्होंने कूर्मपुराणका श्रवण किया
जिसमें लिखा है कि रावणने मायासीताका ही हरण
किया था, वास्तविक सीताका नहीं। यह कथा सुनकर
महाप्रभुको बहुत आनन्द हुआ और उन्हें रामदास
ब्राह्मणकी बात स्मरण हो आयी (वह सीताजीका भक्त
सदा दुःखी रहता था कि सीताजीको उस राक्षसने स्पर्श
किया था)। महाप्रभुने कूर्मपुराणका पाठ करनेवाले
ब्राह्मणोंसे विनम्रतापूर्वक आग्रह करके कूर्मपुराणकी वह
पुरातन पोथी लेकर उसकी नकल करवाकर उन्हें दे
दी और वह पुरातन पोथी रामदासको दिखाकर उसके
दुःखको दूर किया ॥ 117-119 ॥
अनुभाष्य- 'रामदास ब्राह्मणको कूर्मपुराणका
पत्रार्पण'-मध्यलीला 9/201-217 संख्या देखें ॥ 117 ॥
'ब्रह्मसंहिता' और 'कर्णामृत' - दो ग्रन्थोंको लाना :-
ब्रह्मसंहिता, कर्णामृत, दुइ पुँथि पाञा।
दुइ पुस्तक लञा आइला उत्तम जानिञा ॥ 120 ॥
अनुवाद-महाप्रभुको ब्रह्मसंहिता और कृष्णकर्णामृत
नामक दो ग्रन्थ प्राप्त हुए और उन्हें उत्तम जानकर
वे अपने साथ ले आये ॥ 120 ॥
अनुभाष्य- 'ब्रह्मसंहिता' - मध्यलीला 9/237-241 संख्या
और अनुभाष्य; एवं 'कर्णामृत'- मध्यलीला 9/305-309,
323-325 संख्या देखें ॥ 120 ॥
पुरीमें वापिस लौटना और स्नानयात्रा-दर्शन :-
पुनरपि नीलाचले गमन करिल।
भक्तगणे मेलिया स्नानयात्रा देखिल ॥ 121 ॥
अनुवाद-उन्होंने पुनः नीलाचलकी ओर गमन
किया और वहाँ पहुँचकर भक्तोंसे भेंटकर करके
श्रीजगन्नाथजीकी स्नान यात्राका दर्शन किया ॥ 121 ॥
अनवसरमें आलालनाथ जाना और वहाँपर वास :-
अनवसरे जगन्नाथ ना पाञा दरशन।
विरहे आलालनाथ करिला गमन ॥ 122 ॥
अनुवाद-स्नानयात्राके बाद श्रीजगन्नाथजीकी
अस्वस्थ-लीलाके कारण उनके दर्शन न होनेके कारण
वे विरहमें दुःखी होकर अलालनाथ चले गये ॥ 122 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'अनवसर'-स्नानयात्राके बाद
'नवयौवन'-दर्शनके पूर्व दिन तक कुछ दिन श्रीजगन्नाथजीके
दर्शन नहीं होते हैं, उस समयको 'अनवसर' कहते
हैं ॥ 122 ॥
अनुभाष्य- 'आलालनाथ'-इसका दूसरा नाम 'ब्रह्मगिरि'
है। पुरीसे समुद्रके तटके साथ-साथ रेतीले मार्गसे
जानेपर लगभग चौदह मील दूरीपर यह मन्दिर है।
[टीका लिखनेके समय] वहाँ एक थाना और डाकघर
है (मध्यलीला 7/59 संख्याका अमृतप्रवाह-भाष्य
देखें) ॥ 122 ॥
गौड़ीय भक्तोंके आगमनका श्रवण :-
भक्तसने दिन कत ताहाञि रहिल।
गौड़ेर भक्त आइसे, समाचार पाइल ॥ 123 ॥
महाप्रभुको पुरीमें लाना :-
नित्यानन्द-सार्वभौम आग्रह करिञा।
नीलाचले आइला महाप्रभुके लइञा ॥ 124 ॥
महाप्रभुका रात-दिन कृष्णविरह :-
विरहे विह्वल प्रभु गोङाय रात्रि-दिने।
हेनकाले आइला गौड़ेर भक्तगणे ॥ 125 ॥
सबे मिलि' युक्ति करि' कीर्त्तन आरम्भिल।
कीर्त्तन-आवेशे प्रभुर मन स्थिर हैल ॥ 126 ॥
अनुवाद-भक्तोंके साथ वे कुछ दिन आलालनाथमें
रहे और तब उन्हें समाचार मिला कि गौड़देशसे भक्त
उनसे मिलने आ रहे हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु और
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य बहुत आग्रह करके महाप्रभुको पुरी
ले आये। महाप्रभु दिन-रात श्रीजगन्नाथके (श्रीकृष्णके)
विरहमें विह्वल रहते थे। तभी वहाँ गौड़देशके भक्त आ
पहुँचे। महाप्रभुकी विरह दशा देखकर भक्तोंने एक युक्ति
सोची और सभी मिलकर कीर्तन करने लगे। महाप्रभु
। 27

[ 1/123-136 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
भी कीर्तनमें सम्मिलित हो गये और कीर्तनके आवेशमें
उनका मन स्थिर हो गया॥ 123-126॥
श्रीरामानन्दका पुरीमें आकर महाप्रभुके साथ
कृष्ण-कथालोचना :—
पूर्वे यबे प्रभु रामानन्देर मिलिला।
नीलाचले आसिबारे ताँरे आज्ञा दिला॥ 127॥
राज-आज्ञा लञा तेँहो आइला कत दिने।
रात्रि-दिने कृष्णकथा रामानन्द-सने॥ 128॥
अनुवाद—पहले दक्षिण भारत यात्रामें जब महाप्रभु
श्रीराय रामानन्दसे मिले थे, तब उन्हें नीलाचल आनेकी
आज्ञा दी थी। राजा प्रतापरुद्रसे सेवा-निवृत्तिकी आज्ञा
लेकर श्रीराय रामानन्द कुछ दिनों बाद नीलाचल आ
गये। महाप्रभु रात-दिन श्रीराय रामानन्दके साथ
श्रीकृष्णकथाकी चर्चा करते॥ 127-128॥
काशीमिश्र और प्रद्युम्नमिश्र एवं परमानन्द पुरी,
श्रीगोविन्द और काशीश्वरके साथ मिलन :—
काशीमिश्रे कृपा, प्रद्युम्न मिश्रादि-मिलन।
परमानन्दपुरी-गोविन्द-काशीश्वरागमन॥ 129॥
अनुवाद—महाप्रभुने काशीमिश्रपर अपनी कृपा की
और फिर प्रद्युम्न मिश्र आदिसे उनकी भेंट हुई। तब
श्रीपरमानन्दपुरी, श्रीगोविन्द और श्रीकाशीश्वर नीलाचल
आये॥ 129॥
श्रीस्वरूप दामोदर और शिखि-माहितिके साथ मिलन :—
दामोदर स्वरूप-मिलने परम आनन्द।
शिखिमाहिति-मिलन, राय भवानन्द॥ 130॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरसे मिलकर महाप्रभुको
परम आनन्द हुआ। वे शिखिमाहिति और श्रीराय
भवानन्दसे भी मिले॥ 130॥
अनुभाष्य—मध्यलीला दसवाँ अध्याय देखें॥ 121-130॥
गौड़देशसे आये कुलीन ग्रामवासियोंके साथ मिलन :—
गौड़ हइते सर्व वैष्णवेर आगमन।
कुलीनग्रामवासि-सङ्गे प्रथम मिलन॥ 131॥
अनुवाद—गौड़देशसे सभी वैष्णवोंका नीलाचलमें
आगमन होने लगा। कुलीनग्रामवासी भक्तोंका महाप्रभुसे
यह पहला मिलन था॥ 131॥
खण्डवासी और शिवानन्दके साथ मिलन :—
नरहरि दास आदि यत खण्डवासी।
शिवानन्द-सङ्गे मिलिला सबे आसि'॥ 132॥
अनुवाद—नरहरि आदि खण्डवासी शिवानन्दसेनके
साथ आकर महाप्रभुसे मिले॥ 132॥
अनुभाष्य—मध्यलीला ग्यारहवाँ अध्याय
देखें॥ 131-132॥
भक्तोंके साथ स्नानयात्रा-दर्शन और गुण्डिचा मार्जन :—
स्नानयात्रा देखि' प्रभु-सङ्गे भक्तगण।
सबा लञा कैला प्रभु गुण्डिचा-मार्जन॥ 133॥
अनुवाद—महाप्रभुने सब भक्तोंके साथ स्नानयात्राका
दर्शन किया। रथयात्रासे एक दिन पूर्व महाप्रभुने सब
भक्तोंको लेकर गुण्डिचा मन्दिरका मार्जन किया॥ 133॥
अनुभाष्य—मध्यलीला बारहवाँ अध्याय देखें॥ 133॥
रथके आगे नृत्य-कीर्तन :—
सबा-सङ्गे रथयात्रा कैल दरशन।
रथ-अग्रे नृत्य करि' उद्याने गमन॥ 134॥
अनुवाद—महाप्रभुने सबके साथ श्रीजगन्नाथदेवकी
रथयात्राके दर्शन किये और रथके आगे नृत्य करते हुए
चले। रथके आगे उद्दण्ड नृत्य करनेके बाद थोड़ा
विश्राम करनेके लिये वे मार्गके साथ एक उद्यानमें
गये॥ 134॥
प्रतापरुद्रपर कृपा और प्रति वर्ष
गौड़ीय-भक्तोंको आमन्त्रण :—
प्रतापरुद्रेर कृपा कैल सेइ स्थाने।
गौड़भक्ते आज्ञा दिल विदायेर दिने॥ 135॥
'प्रत्यब्द आसिबे रथयात्रा-दरशने।'
एइ छले चाहे भक्तगणेर मिलने॥ 136॥
28 ।

पहला अध्याय 1/134-144 ]

अनुवाद—उस उद्यानमें उन्होंने राजा प्रतापरुद्रपर
कृपा की। जब गौड़ीय भक्त वापिस लौटने लगे, तब
उन्हें विदा करते हुए महाप्रभुने आज्ञा दी कि वे प्रति
वर्ष श्रीजगन्नाथजीकी रथयात्राके दर्शन करने आते रहें।
इस आज्ञाके छलसे महाप्रभु अपने भक्तोंसे मिलना
चाहते थे ॥ 135-136 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला तेरहवें अध्यायमें रथके आगे
नृत्य, चौदहवें अध्यायमें उद्यानमें जाना और प्रतापरुद्रपर
कृपा वर्णित है॥ 134-135 ॥
श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुको भिक्षा देना, उनके
जामाता अमोघका अपराध और उद्धार :-
सार्वभौम-घरे प्रभुर भिक्षा-परिपाटी।
षाठीर माता कहे, याते राण्डी हउक् षाठी ॥ 137 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभुको अपने
घर प्रति मास पाँच दिन भिक्षा कराते थे। एक दिन
जब महाप्रभु प्रसाद पा रहे थे, तब श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यके दामादने महाप्रभुको खूब प्रसाद पाते देखकर
उन्हें बड़े अपशब्द कहे। यह सुनकर श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यकी पत्नीने कहा—“अच्छा हो कि षाठी (उनकी
पुत्री) विधवा हो जाय अर्थात् उनके दामादकी मृत्यु हो
जाय ॥" 137 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला पन्द्रहवाँ अध्याय देखें ॥ 137 ॥
दूसरे वर्ष श्रीअद्वैतादि भक्तोंका गौड़देशसे आगमन :-
वर्षान्तरे अद्वैतादि भक्तेर आगमन।
प्रभुरे देखिते सबे करिला गमन ॥ 138 ॥
अनुवाद—वर्षके अन्तमें अर्थात् दूसरे वर्ष श्रीअद्वैताचार्य
आदि सभी भक्त भारी संख्यामें महाप्रभुके दर्शनके लिये
नीलाचल आये ॥ 138 ॥
महाप्रभुके द्वारा सभीकी व्यवस्थाका सम्पादन :-
आनन्दे सबारे निया देन वासस्थान।
शिवानन्दसेन करे सबार पालन ॥ 139 ॥
अनुवाद—महाप्रभु सबसे मिलकर बड़े आनन्दित
हुए और उनके रहनेकी व्यवस्था की। श्रीशिवानन्दसेनने
सभीके भोजन, शयन आदिका उत्तरदायित्व सम्भाला॥ 139 ॥
शिवानन्दके साथ आये कुत्तेका महाप्रभुके
चरण दर्शनके बाद अन्तर्धान होना :-
शिवानन्देर सङ्गे आइला कुक्कुर भाग्यवान्।
प्रभुर चरण देखि' कैल अन्तर्धान ॥ 140 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्दसेनके सङ्ग एक कुत्ता भी
आया था और वह सौभाग्यवान् महाप्रभुके चरणोंके
दर्शन करते ही अन्तर्धान हो गया (अर्थात् शरीर
त्यागकर भगवद्-धामको चला गया) ॥ 140 ॥
पुरी आनेवाले भक्तोंका काशीकी ओर
जा रहे श्रीसार्वभौमके साथ मार्गमें मिलन :-
पथे सार्वभौम सह सबार मिलन।
सार्वभौम भट्टाचार्येर काशीते गमन ॥ 141 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य जब एक बार
काशी जा रहे थे, तब मार्गमें उनके साथ नीलाचल
आते हुए गौड़भक्तोंका मिलन हुआ था ॥ 141 ॥
भक्तोंके साथ जल क्रीड़ा :-
प्रभुरे मिलिला सर्व वैष्णव आसिया।
जलक्रीड़ा कैल प्रभु सबारे लइया ॥ 142 ॥
अनुवाद—नीलाचल आनेपर सभी वैष्णव महाप्रभुसे
मिले। महाप्रभुने सबको साथ लेकर जलक्रीड़ा की ॥ 142 ॥
रथके आगे नृत्य और गुण्डिचा-मार्जन :-
सबा लञा कैल गुण्डिचा-गृह-संमार्जन।
रथयात्रा-दरशने प्रभुर नर्त्तन ॥ 143 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने सभी भक्तोंको लेकर गुण्डिचा
मन्दिरका मार्जन किया और रथयात्रामें सभीने उनके
नृत्यका आनन्दसे दर्शन किया ॥ 143 ॥
विप्रलम्भ-भावमय महाप्रभुका विलास :-
उपवने कैल प्रभु विविध विलास।
प्रभुर अभिषेक कैल विप्र कृष्णदास ॥ 144 ॥

। 29

[ 1/144-151 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—रथयात्राके मार्गके साथ लगे उपवनमें
महाप्रभुने भक्तोंके साथ सङ्कीर्तन-नृत्य आदि विविध
विलास किये। कृष्णदास नामक एक ब्राह्मणने महाप्रभुका
अभिषेक किया ॥ 144 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'उपवन'—जिस मार्गसे रथ गुण्डिचा
मन्दिर जाता है, उसका नाम बड़दाँड़ है; उसके दोनों
ओर जो सब उद्यान हैं, उन्हें 'उपवन' कहा जाता
है॥ 144 ॥
नृत्यके अन्तमें जलक्रीड़ा और हेरा-पञ्चमी :—
गुण्डिचाते नृत्य-अन्ते कैल जलकेलि।
हेरा-पञ्चमी देखिल लक्ष्मीदेवीरे केलि ॥ 145 ॥
अनुवाद—रथयात्राके गुण्डिचा मन्दिर पहुँचनेपर
महाप्रभुने नृत्य समाप्तकर जलक्रीड़ा की। हेरा पञ्चमीके
दिन उन्होंने लक्ष्मीदेवीकी लीलाका दर्शन किया ॥ 145 ॥
श्रीकृष्ण-जन्माष्टमीपर गोपलीला :—
कृष्णजन्म-यात्राते प्रभु गोपवेश हैल।
दधिभार वहिं' तबे लगुड़ फिराइल ॥ 146 ॥
अनुवाद—जन्माष्टमीके दिन महाप्रभुने गोपवेश धारण
किया और सिरपर दहीकी मटकियाँ धरकर हाथमें
लठिया घुमाते हुए चले ॥ 146 ॥
गौड़ीय भक्तोंको विदायी देना :—
गौड़ेर भक्तगणे तबे करिल विदाय।
सङ्गेर भक्त लञा करे कीर्त्तन सदाय ॥ 147 ॥
अनुवाद—तत्पश्चात् महाप्रभुने गौड़देशके भक्तोंको
विदा किया और नीलाचलमें रहनेवाले भक्तोंके साथ वे
सदा कीर्त्तन करते थे ॥ 147 ॥
वृन्दावनके उद्देश्यसे गौड़देश जाते समय
प्रतापरुद्रके द्वारा महाप्रभुकी सेवा :—
वृन्दावन याइते कैल गौड़ेर गमन।
प्रतापरुद्र कैल पथे विविध सेवन ॥ 148 ॥
अनुवाद—महाप्रभु वृन्दावन जाते हुए गौड़देश गये।
उन्हें प्रसन्न करनेके लिये राजा प्रतापरुद्रने मार्गमें उनकी
अनेक प्रकारसे सेवाकी व्यवस्था की ॥ 148 ॥
महाप्रभुके साथ-साथ श्रीरायरामानन्दका
भद्रक तक आगमन :—
पुरीगोसाञि-सङ्गे वस्त्रप्रदान-प्रसङ्ग।
रामानन्द राय आइला भद्रक पर्यन्त ॥ 149 ॥
अनुवाद—मार्गमें एक स्थानपर महाप्रभुने पुरी गोसाईंको
शचीमाताको देनेके लिये श्रीजगन्नाथके प्रसादी वस्त्र
प्रदान किये। श्रीराय रामानन्द उनके साथ भद्रक तक
आये ॥ 149 ॥
गौड़देशके विद्यानगरमें आगमन :—
आसि' विद्यावाचस्पतिर गृहेते रहिला।
प्रभुरे देखिते लोकसंघट्ट हइला ॥ 150 ॥
अनुवाद—विद्यानगर (बङ्गाल) पहुँचकर वे
श्रीविद्यावाचस्पतिके घरपर रहे। उनसे मिलनेके लिये
आनेवाले लोगोंका ताँता लग गया ॥ 150 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभु वृन्दावन जाते समय
जब गौड़मण्डलमें आये, तब वे श्रीविशारदके पुत्र
अर्थात् श्रीसार्वभौमके भाई श्रीविद्यावाचस्पतिके घरमें
अर्थात् विद्यानगरमें रहे ॥ 150 ॥
कुलियामें आगमन :—
पञ्चदिन देखे लोक नाहिक विश्राम।
लोकभये रात्रे प्रभु आइला कुलिया-ग्राम ॥ 151 ॥
अनुवाद—पाँच दिनों तक वे लोगोंसे मिलते रहे
और उन्हें विश्राम करनेका अवसर ही नहीं मिला। तब
वे भीड़से बचनेके लिये रात्रिमें कुलिया-ग्राम आ
गये ॥ 151 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभु विद्यानगरमें पाँच दिन
रहे और वहाँ लोगोंकी भीड़ देखकर रात्रिकालमें
चुपकेसे कुलिया-ग्राम आ गये। श्रीचैतन्यभागवतके
अन्त्यखण्डके तृतीय अध्यायमें लिखा है,—
30 ।

पहला अध्याय 1/151-159 ]
“गङ्गा प्रति महा-अनुराग बाड़ाइया।
अति शीघ्र गौड़देशे आइला चलिया ॥ 272 ॥
सार्वभौम-भ्राता 'विद्या-वाचस्पति' नाम।273 (क)।
++आचम्बिते आसि' उत्तरिला तार घर ॥ 274 (ख) ॥
++नवद्वीप आदि सर्वदिके हैल ध्वनि।
वाचस्पति घरे आइलेन न्यासिमणि ॥ 286 ॥
++कुलियाय आइलेन वैकुण्ठ-ईश्वर। 345 (क)।
++सबे गङ्गा-मध्ये नदीयाय-कुलियाय।
शुनि मात्र सर्वलोक महानन्दे धाय ॥ 380 ॥ "
अर्थात् “गङ्गाके प्रति महा-अनुराग बढ़ाकर महाप्रभु
अति शीघ्र गौड़देशमें चले आये। महाप्रभु अचानक
श्रीसार्वभौमके भाई श्रीविद्यावाचस्पतिके घरमें आ पधारे।
नवद्वीप आदि सभी जगह यह बात फैल गयी कि
श्रीवाचस्पतिके घर संन्यासी शिरोमणि पधारे हैं। (अनेक
लोगोंकी भीड़के कारण श्रीवाचस्पतिको भी बिना बताये)
महाप्रभु कुलिया चले आये। नदीया और कुलियाके
बीचमें गङ्गा बहती हैं, महाप्रभुके कुलिया आनेका
समाचार पाकर सब लोग आनन्दसे उधर दौड़ पड़े।”
चैतन्यभागवतके इस अध्यायका श्रीलोचनदासके
वर्णनके साथ पाठ करनेसे यह स्पष्ट होता है कि
वर्तमान 'नवद्वीप' नामक जो स्थान है, वही प्राचीन
नवद्वीपके दूसरे पार स्थित उस समयका 'कुलिया-ग्राम'
था। उसी स्थानपर देवानन्द पण्डित, गोपाल चापाल
और अन्य कई लोगोंका अपराध भञ्जन (क्षमा) हुआ
था। तब विद्यानगरसे कुलिया आनेके लिये गङ्गाकी एक
धाराको पार करना होता था और कुलियासे नवद्वीप
जानेके लिये मूल भागीरथीको (गङ्गाको) पार करना
होता था। आजकल इन सब स्थानोंको देखनेसे ऐसा
लगता है कि उस समय कुलिया-ग्राममें 'चिनाडाङ्गा'
आदि पल्ली और 'कुलियार गञ्ज' जिसे अब 'कोलेर
गञ्ज' कहते हैं, वह समस्त भूमि उस समयके
कुलियाके बचे हुए अंशके रूपमें है ॥ 151 ॥
महाप्रभुके दर्शनके लिये लोगोंकी भीड़ :-
कुलिया-ग्रामेते प्रभुर शुनिया आगमन।
कोटि कोटि लोक आसि' कैल दरशन ॥ 152 ॥
अनुवाद-कुलिया ग्राममें महाप्रभुके आगमनका
समाचार सुनकर लाखों लोग महाप्रभुके दर्शनके लिये
एकत्रित हो गये ॥ 152 ॥
कुलियामें देवानन्द और चापाल-गोपालके
अपराध-भञ्जन :-
कुलिया-ग्रामे कैल देवानन्देरे प्रसाद।
गोपाल-विप्रेरे क्षमाइल श्रीवासापराध ॥ 153 ॥
पाषण्डी निन्दक आसि' पड़िला चरणे।
अपराध क्षमि' तारे दिल कृष्णप्रेमे ॥ 154 ॥
अनुवाद-उन्होंने कुलिया ग्राममें देवानन्द पण्डितपर
कृपा की और गोपाल-चापाल नामक ब्राह्मणका श्रीवासके
चरणोंमें जो अपराध हुआ था, उसे क्षमा करवाया।
अनेक नास्तिक और भगवान् एवं भक्तोंकी निन्दा
करनेवालोंने महाप्रभुके चरणोंमें क्षमा याचना की और
महाप्रभुने उन्हें क्षमा करके श्रीकृष्णप्रेमका दान
किया ॥ 153-154 ॥
अनुभाष्य—'चापाल-गोपालका उद्धार'-आदिलीला
17/55-59 संख्या देखें ॥ 153 ॥
महाप्रभुकी व्रजयात्राको श्रवणकर श्रीनृसिंहानन्दके द्वारा
ध्यानमें कानाई-नाटशाला तक मार्ग-सजाना और उसे
रत्नोंके द्वारा जड़ना :-
वृन्दावन याबेन प्रभु शुनि' नृसिंहानन्द।
पथ साजाइल मने करिया आनन्द ॥ 155 ॥
कुलिया नगर हैते पथ रत्ने बान्धाइल।
निवृन्त पुष्पशय्या उपरे पातिल ॥ 156 ॥
पथे दुइदिके पुष्पबकुलेर श्रेणी।
मध्ये मध्ये दुइपाशे दिव्य पुष्करिणी ॥ 157 ॥
रत्नबन्ध-घाट, ताहे प्रफुल्ल कमल।
नाना पक्षि-कोलाहल, सुधा-सम जल ॥ 158 ॥
शीतल समीर बहे नाना गन्ध लञा।
'कानाइर नाटशाला' पर्यन्त लैल बान्धिञा ॥ 159 ॥
। 31

[ 1/155-166 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
आगे मन नाहि चले, ना पारे बान्धिते।
पथबान्धा ना याय, नृसिंह हैला विस्मिते॥160॥
अनुवाद—महाप्रभुके वृन्दावन जानेका समाचार सुनकर
श्रीनृसिंहानन्दने आनन्दित होकर उनके मार्गको मन-ही-मनमें
सजाया। उन्होंने मन-ही-मन कुलिया नगरसे वृन्दावनतक
सुन्दर मार्गकी कल्पना की और उसके ऊपर रत्न
जड़कर पुष्पोंकी कोमल पँखुड़ियोंका गद्दा बिछाया,
जिससे महाप्रभुके कोमल चरणोंको कोई कष्ट नहीं हो।
मार्गके दोनों ओर उन्होंने छायाके लिये बकुलादि
पुष्पोंके वृक्ष लगाये और उनके बीच-बीचमें दिव्य
निर्मल जलके सरोवर बनाये। उन अमृतके समान
जलवाले सरोवरोंके घाट रत्नोंसे जड़ित थे और उनमें
सुगन्धित कमल पुष्प खिले हुए थे। नाना प्रकारके पक्षी
मधुर कलरव कर रहे थे। पुष्पोंकी सुगन्ध लेकर
शीतल समीर बह रहा था और इस प्रकार उन्होंने
'कानाइर नाटशाला' तक मार्गका निर्माण कर लिया।
परन्तु वहाँसे आगे उनका मन चल नहीं रहा था और
वे आगे मार्गका निर्माण करनेमें असमर्थ हो गये।
श्रीनृसिंहानन्द बड़े विस्मित हो गये कि वे आगे क्यों
नहीं बढ़ पा रहे हैं? ॥ 155-160 ॥
श्रीनृसिंहानन्दकी भविष्यवाणी :-
निश्चय करिया कहे,—"शुन, भक्तगण।
एबार ना याबेन प्रभु श्रीवृन्दावन ॥ 161 ॥
'कानाञ्जिर नाटशाला' हैते आसिब फिरिञा।
जानिबे पश्चात्, कहिलु निश्चय करिञा॥" 162 ॥
अनुवाद—तब उन्होंने यह निश्चित करके कहा,—"हे
भक्तों ! सुनो, महाप्रभु इस बार श्रीवृन्दावन नहीं जायेंगे।
वे 'कानाइर नाटशाला'से ही लौट आयेंगे, यह मैं
विश्वासपूर्वक कह रहा हूँ। इस बातकी सत्यताको आप
लोग बादमें स्वयं देखेंगे ॥" 161-162 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिस समय महाप्रभु कुलियासे
वृन्दावन जा रहे थे, तब ऐसा हुआ—उस समय
महाप्रभुके परमभक्त श्रीनृसिंहानन्दने ध्यानमें कुलियासे
वृन्दावनतक मार्गका निर्माण और उसे सजाना आरम्भ
किया। जब उन्होंने गौड़देशके निकटवर्ती 'कानाइ-नाटशाला'
तक पथ तैयार कर लिया, तब उनका चित्त विचलित
होनेसे ध्यान भङ्ग हो गया। तभी श्रीनृसिंहानन्दने
कहा,—इस बार महाप्रभु केवल कानाइ-नाटशाला तक
ही जायेंगे, वृन्दावन नहीं जायेंगे ॥ 160-162 ॥
अनुभाष्य—'कानाइ नाटशाला'—कोलकातासे लगभग
दो सौ मीलकी दूरी पर 'तिनपहाड़' स्टेशनपर उतरकर
फिर शाखा-लाईनसे राजमहल-स्टेशनसे प्राय छह मीलकी
दूरीपर है (वर्तमानमें 'तालझाड़ि' स्टेशनसे दो मीलकी
दूरीपर है) ॥ 162 ॥
महाप्रभुकी कुलियासे वृन्दावनकी यात्रा :—
गोसाञि कुलिया हैते चलिला वृन्दावन।
सङ्गे सहस्रेक लोक यत भक्तगण ॥ 163 ॥
अनुवाद—महाप्रभु कुलियासे वृन्दावनकी ओर चले
और उनके साथ हजारों भक्त लोग भी चले ॥ 163 ॥
महाप्रभुके दर्शनके लिये असंख्य लोगोंकी भीड़ :—
याहाँ याय प्रभु, ताँहा कोटिसंख्य लोक।
देखिते आइसे, देखि' खण्डे दुःख-शोक ॥ 164 ॥
अनुवाद—जहाँ-जहाँ महाप्रभु जाते, वहाँ असंख्य
लोग उनके दर्शनके लिये आते और उनके दर्शन
करके उनके सभी दुःख-शोक दूर हो जाते ॥ 164 ॥
याहाँ याहाँ प्रभुर चरण पड़ये चलिते।
से मृत्तिका लय लोक, गर्त्त हय पथे ॥ 165 ॥
अनुवाद—जहाँ-जहाँ महाप्रभुके चरण पड़ते, वहाँसे
लोग धूल उठाते और उन लोगोंके धूल उठानेसे मार्गमें
गड्ढे पड़ जाते ॥ 165 ॥
रामकेलिमें आगमन :—
ऐछे चलि' आइला प्रभु 'रामकेलि' ग्राम।
गौड़ेर निकट ग्राम अति अनुपम ॥ 166 ॥
32 ।

पहला अध्याय 1/166-175 ]

याँहा नृत्य करे प्रभु प्रेमे अचेतन।
कोटि कोटि लोक आइसे देखिते चरण ॥ 167 ॥

अनुवाद—इस प्रकार चलते हुए महाप्रभु 'रामकेलि'
ग्राम पहुँचे। गौड़देशकी सीमाके निकट यह ग्राम अति
मनोहर था। वहाँ नृत्य करते हुए महाप्रभु प्रेमके
आवेशमें मूर्च्छित हो गये थे। असंख्य लोग उनके
चरणकमलोंके दर्शन करनेके लिये आने लगे॥ 166-167 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'रामकेलिग्राम'—गौड़देशके निकट
गङ्गाके तटपर रामकेलिग्राम है, श्रीरूप-सनातन उस
समय वहीं रहते थे ॥ 166 ॥

बादशाहके द्वारा अपने कर्मचारियोंको महाप्रभुके
स्वतन्त्र भ्रमणमें बाधा न देनेका आदेश :-
गौड़ाध्यक्ष यवन-राजा प्रभाव शुनिञा।
कहिते लागिल किछु विस्मित हञा ॥ 168 ॥
“बिना दाने एत लोक याँर पाछे हय।
सेइ त' गोसाञा, इहा जानिह निश्चय ॥ 169 ॥
काजी, यवन इहार ना करिह हिंसन।
आपन-इच्छाय बुलुन, याहाँ उँहार मन॥”170 ॥

अनुवाद—महाप्रभुके अद्भुत प्रभावके विषयमें सुनकर
बङ्गालका यवन-राजा विस्मित होकर ऐसा कहने
लगा,—“ये लोगोंको कुछ दान भी नहीं कर रहे हैं, तो
भी यदि इतने लोग उनके पीछे जा रहे हैं, तो निश्चय
ही ये पैगम्बर हैं। हे काजी! हे मुसलमानों! इन हिन्दू
पैगम्बरसे ईर्ष्या-द्वेष मत करना। अपनी इच्छानुसार वे
जहाँ जाना चाहें, उन्हें वहाँ जाने देना॥”168-170 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'गौड़ाध्यक्ष यवनराजा'—हुसेनशाह
बादशाह ॥ 168 ॥

क्षत्रिय केशवकी महाप्रभुके लिये शुभ इच्छा और
उसके अनुसार ही बादशाहको समझाना :-
केशव-छत्रीरे राजा वार्त्ता पूखिल।
प्रभुर महिमा छत्री उड़ाइया दिल ॥ 171 ॥

“भिखारी संन्यासी करे तीर्थ पर्यटन।
ताँरे देखिबारे आइसे दुइ चारि जन ॥ 172 ॥
यवने तोमार ठाञि करये लागानि।
ताँर हिंसाय लाभ नाहि, हय आर हानि ॥”173 ॥

अनुवाद—यवन-राजाने अपने सैनिक अधिकारी
केशव क्षत्रियसे महाप्रभुके प्रभावके बारेमें जिज्ञासा की,
तो उसने महाप्रभुकी महिमाको छिपाते हुए कहा,—“वह
एक भिखारी संन्यासी है और तीर्थ भ्रमण करता रहता
है। दो-चार लोग ही उससे मिलने आते हैं। आपके
मुसलमान सेवक उससे ईर्ष्याके कारण आपको उकसा
रहे हैं। उससे ईर्ष्या करनेमें मैं कोई लाभ नहीं देखता
हूँ, अपितु इसमें हानि ही हो सकती है॥”171-173 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—क्षत्रिय केशवको महाप्रभुके तत्त्वका
ज्ञान था। परन्तु यह विचार करके कि बादशाह यदि
अधिक अनुसन्धान करेगा, तो वह महाप्रभुसे शत्रुता
करने लगेगा,—इसी आशङ्कासे उसने बादशाहकी बातको
बढ़ने नहीं दिया ॥ 171 ॥

गुप्तचरके द्वारा महाप्रभुसे अन्य
स्थानपर चले जानेका अनुरोध :-
राजारे प्रबोधि' केशव, ब्राह्मण पाठाञा।
चलिबार तरे प्रभुके कहिल याञा ॥ 174 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 174 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—राजाको इस प्रकार समझाकर
सैनिक कर्मचारी केशवने एक ब्राह्मणको भेजकर
महाप्रभुसे वहाँसे शीघ्र चले जानेका अनुरोध किया॥ 174 ॥

श्रीरूपसे महाप्रभुके विषयमें बादशाहकी जिज्ञासा :-
दबिर खासरे राजा पुछिल निभृते।
गोसाञिर महिमा तेंहो लागिल कहिते ॥ 175 ॥

अनुवाद—यवन राजाने एकान्तमें दबिर खास (श्रीरूप
गोस्वामी)से महाप्रभुके विषयमें जिज्ञासा की, तो वे
कहने लगे ॥ 175 ॥

33

[ 1/175–185 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य—‘दबिरखास’—श्रीरूपको उस समयके
यवन राजाके द्वारा दिया गया नाम॥175॥
श्रीरूपके द्वारा महाप्रभुके माहात्म्यका कीर्तन :—
“ये तोमारे राज्य दिल, ये तोमार गोसाञा।
तोमार देशे, तोमार भाग्ये जन्मिला आसिञा॥176॥
तोमार मङ्गल वाञ्छे, वाक्यसिद्ध हय।
इहार आशीर्वादे तोमार सर्वत्रइ जय॥177॥
बादशाहकी प्रशंसा :—
मोरे केन पुछ, तुमि पुछ आपन–मन।
तुमि नराधिप हओ, विष्णु–अंश सम॥178॥
तोमार चित्ते चैतन्येरै कैछे हय ज्ञान।
तोमार चित्ते येइ लय, सेइ त’ प्रमाण॥”179॥
अनुवाद—“ये वही आपके अल्लाह (परमेश्वर) हैं,
जिन्होंने आपको यह राज्य दिया है और जिनको आप
पैगम्बर मान रहे हो। इनका आपके राज्यमें जन्म ग्रहण
करनेसे आपके सौभाग्यका उदय हुआ है। ये आपका
मङ्गल चाहते हैं, इनकी कृपासे आपके सभी वाक्य
सिद्ध हो जायेंगे और इनके आशीर्वादसे सर्वत्र आपकी
जय होगी। परन्तु, आप मुझसे यह सब क्यों पूछ रहे
हैं? आप स्वयं अपने मनसे पूछिये (वह आपको
यथार्थ उत्तर देगा) क्योंकि आप राजा होनेके कारण
भगवान् विष्णुके अंश समान हैं। आपके हृदयमें
श्रीचैतन्यके प्रति कैसे भाव आते हैं? जो भाव आपके
हृदयमें आते हैं, वे ही इस बातका प्रमाण हैं॥”176–179॥
अनुभाष्य—मनुसंहिता(7/8)—
“महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति॥”
अर्थात् “(राजा) ही नररूपमें महान् देवता है॥”178॥
बादशाहका महाप्रभुको ईश्वरके रूपमें मानना :—
राजा कहे,—“शुन, मोर मने येइ लय।
साक्षात् ईश्वर इँह, नाहिक संशय॥”180॥
अनुवाद—राजाने कहा,—‘सुनो! मेरे मनमें यही
विश्वास उठता है कि ये तो साक्षात् भगवान् हैं, इसमें
कोई संशय नहीं है॥”180॥
एत कहि’ राजा गेला निज अभ्यन्तरे।
तबे दबिर खास आइला आपनार घरे॥181॥
श्रीरूप-सनातनका विचार-विमर्श :—
घरे आसि’ दुइ भाइ युकति करिञा।
प्रभु देखिबारे चले वेश लुकाञा॥182॥
अनुवाद—यह कहकर राजा अपने महलके अन्तःपुरमें
चले गये। तब दबिर खास अपने घर आ गये। घरमें
आकर उन्होंने अपने भाई (श्रीसनातन)से विचार-विमर्श
किया और वे दोनों वेश बदलकर महाप्रभुके दर्शनके
लिये चल पड़े॥181-182॥
दोनोंका महाप्रभुके दर्शनके लिये जाना और सबसे
पहले श्रीनिताइ और हरिदासके साथ मिलन :—
अर्धरात्रे दुइ भाइ आइला प्रभु-स्थाने।
प्रथमे मिलिला नित्यानन्द-हरिदास-सने॥183॥
अनुवाद—वे आधी रातमें महाप्रभुके स्थानपर पहुँचे
और पहले श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीहरिदास ठाकुरसे
मिले॥183॥
ताँरा दुइजन जानाइला प्रभुर गोचरे।
रूप, साकरमल्लिक आइला तोमा’ देखिबारे॥184॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु और हरिदास ठाकुरने
महाप्रभुके पास आकर कहा कि रूप और साकरमल्लिक
(सनातन) आपके दर्शनके लिये आये हैं॥184॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘साकरमल्लिक’—जिस प्रकार
श्रीरूपका नाम दबिरखास हुआ था, उसी प्रकार
श्रीसनातनका भी उस समयके राजाके द्वारा दिया गया
नाम ‘साकर-मल्लिक’ प्रसिद्ध था॥184॥
दोनोंका दैन्य प्रदर्शन :—
दुइ गुच्छ तृण दुँहे दशने धरिञा।
गले वस्त्र बान्धि’ पड़े दण्डवत् हञा॥185॥
34 ।

पहला अध्याय 1/185–190 ]

[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

अनुवाद—उन दोनोंने परम दैन्यभावसे अपने मुखमें
तृणके गुच्छे दबाकर और गलेमें वस्त्र बाँधकर (बिके
हुए पशुके समान मुखमें तृण और गलेमें रस्सीके
बन्धन जैसे) महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया॥185॥
दैन्य रोदन करे, आनन्दे विह्वल।
प्रभु कहे,—उठ, उठ, हइल मङ्गल ॥ 186 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके दर्शनसे वे आनन्दमें विह्वल
हो गये और दैन्यताके कारण रोने लगे। महाप्रभुने
कहा,—“उठो-उठो! तुम्हारा मङ्गल हुआ है॥” 186 ॥
श्रीरूप-सनातनका दैन्य और स्तव :—
उठि' दुइ भाइ तबै दन्ते तृण धरि'।
दैन्य करि' स्तुति करे करयोड़ करि' ॥ 187 ॥
“जय जय श्रीकृष्णचैतन्य दयामय।
पतितपावन जय, जय महाशय ॥ 188 ॥
नीच-जाति, नीच-सङ्गी, करि नीच काज।
तोमार अग्रेते प्रभु कहिते वासि लाज ॥ 189 ॥
अनुवाद—दोनों भाई उठकर दैन्यतासे दाँतोंमें तृण
दबाकर हाथ जोड़कर महाप्रभुकी स्तुति करने
लगे,—“पतितोंका उद्धार करनेवाले परम दयालु
श्रीकृष्णचैतन्यकी बारम्बार जय हो। परम पुरुषकी जय
हो, जय हो। हम नीच जातिके हैं, नीच लोगोंका सङ्ग
करते हैं और सदा नीच कार्योंमें रत हैं। आपके सामने
खड़े होनेमें हमें बड़ी लज्जा आ रही है॥187–189॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीरूप और सनातनका विचार
था कि उन्होंने नीच जातिमें जन्में नीच लोगोंका सङ्ग
और उनकी सेवा करके नीच कार्य किया है॥189॥
अनुभाष्य— 'नीचजाति'—श्रीरूप-सनातन पवित्र
कन्नड़-ब्राह्मण कुलमें जन्में थे, परन्तु दैन्यवशतः
अपनेको नीचजातिका कहते थे। जन्म तीन प्रकारके
होते हैं—शौक्र, सावित्र और दैक्ष। नीच लोगोंका सङ्ग
करनेसे स्वभाव नीच होता है।


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

“म्लेच्छजाति, म्लेच्छसङ्गी, करि म्लेच्छकर्म।
गो-ब्राह्मण-द्रोहि-सङ्गे आमार सङ्गम॥”
अर्थात् “हम मलेच्छ जातिके हैं, क्योंकि हम
मलेच्छोंका सङ्ग करते हैं और मलेच्छों जैसे कर्म
करते हैं। हम गो और ब्राह्मणोंका वध करनेवालोंका
सङ्ग करते हैं।”
श्रीमद्भागवतके सातवें स्कन्धमें आदेश-मत है—
“यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यञ्जकम्।
यदन्यत्रापि दृश्येत तत्तेनैव विनिर्दिशेत् ॥”
अर्थात् “जिस व्यक्तिमें पूर्व वर्णित ब्राह्मण, क्षत्रिय,
वैश्य और शूद्रके जो लक्षण दिखायी दें, चाहे उसने
किसी अन्य वर्णमें जन्म लिया हो, उसे लक्षणोंके
अनुसार वर्णका ही मानना चाहिये।”
श्रीरूप-सनातनने यवनकी सेवाके कारण स्वयंको
नीचजातिका कहा। ब्राह्मण-वृत्तिरहित नीचजातीयकी
नीच शूद्रवृत्तिको ग्रहणके कारण उसे उसी जातिका
कहा जाता है। भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें कहा गया
है—
“नीचजाति-सङ्गे सदा नीच व्यवहार।
एइ हेतु नीच-जात्यादिक उक्ति ताँर ॥”
अर्थात् “नीचजातिके सङ्गसे सदा नीच व्यवहार
होता है, इसलिये श्रीरूप-सनातन ऐसा कह रहे
हैं॥”189॥
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/154) :—
मत्तुल्यो नास्ति पापात्मा नापराधी च कश्चन।
परिहारेऽपि लज्जा मे किं ब्रुवे पुरुषोत्तम ॥ 190 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह-भाष्य देखें॥190॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मेरे जैसा कोई पापी नहीं है,
मेरे जैसा कोई अपराधी भी नहीं है। हे पुरुषोत्तम! मेरे
द्वारा किये गये पापों और अपराधोंका उल्लेख करने
और उन्हें क्षमा करानेकी चेष्टा करनेमें भी मुझे लज्जा
आ रही है॥ 190 ॥
अनुभाष्य—
हे पुरुषोत्तम (पुरुषश्रेष्ठ) मत्तुल्यः कश्चित् पापात्मा (पापी)

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[ 1/190-197 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
नास्ति, कश्चन् अपराधी न (नास्ति); परिहारे (अपराधक्षमापणविषये)
अपि मे (मम) लज्जा (व्रीडात्मकः सङ्कोचः) [अतः अहं]
किं ब्रुवे (कथयामि) [-मम प्रार्थनावसरोऽपि नास्ति इत्यर्थः] ।
श्लोक-भावानुवाद-मेरे समान न तो कोई पापी है
और न ही कोई अपराधी भी है। हे पुरुषोत्तम ! क्या
कहूँ? अपने दोषोंको क्षमा करनेकी प्रार्थना करनेमें भी
मुझे लज्जा आती है अर्थात् मेरे पाप-अपराध अनन्त
और प्रायश्चितके अयोग्य हैं ॥ 190 ॥
पतितपावन-हेतु तोमार अवतार।
आमा-बइ जगते, पतित नाहि आर ॥ 191 ॥
जगाइ-मधाइकी अपेक्षा अपनेको
अधिक हीन और पापी समझना :-
जगाइ-माधाइ दुइ करिले उद्धार।
ताँहा उद्धारिते श्रम नहिल तोमार ॥ 192 ॥
ब्राह्मण-जाति तारा, नवद्वीपे घर।
नीच-सेवा नाहि करे, नहे नीचेर कूर्पर ॥ 193 ॥
नामाभासके द्वारा ही उनका पापनाश और उद्धार :-
सबे एक दोष तार, हय पापाचार।
पापराशि दहे नामाभासेइ तोमार ॥ 194 ॥
तोमार नाम लञा तोमार करिल निन्दन।
सेइ नाम हइल तार मुक्तिर कारण ॥ 195 ॥
अनुवाद-पतितोंका उद्धार करनेके लिये आपने
अवतार लिया है और हमसे अधिक पतित इस जगत्में
कोई नहीं है। हे प्रभो ! आपने जगाइ-मधाइ, दोनोंका
उद्धार किया है और उनका उद्धार करनेमें आपको
कोई परिश्रम भी नहीं करना पड़ा था। (क्योंकि) वे
दोनों जातिसे ब्राह्मण थे और उन्होंने पावन नवद्वीपमें
जन्म लिया था। उन्होंने नीच लोगोंकी सेवा भी नहीं
की थी और वे नीच लोगोंके अधीन भी नहीं थे।
उनका तो मात्र एक ही दोष था, वह था पापका
आचरण। आपके नामाभाससे ही कूट पापराशि जलकर
भस्म हो जाती है। आपका नाम लेकर उन्होंने आपकी
निन्दा की और वही नाम (नामाभास) उनकी (पापोंसे)
मुक्तिका कारण बन गया ॥ 191-195 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जगाइ-मधाइका उद्धार करनेमें
आपको अधिक श्रम नहीं हुआ। हम तो उनसे अधिक
अधम हैं, हमारा उद्धार करनेके लिये आपको विशेष
यत्न करना पड़ेगा। जगाइ-मधाइ तो उच्च ब्राह्मण
जातिके थे और वे महातीर्थ नवद्वीपमें वास करते थे।
हमारे जैसे उन्होंने कभी भी नीच लोगोंकी सेवा नहीं
की थी, वे नीच लोगोंके अधीन भी नहीं थे अर्थात्
उनका पालन नीच लोगोंने नहीं किया था; वे केवलमात्र
पापाचारी थे। आपके नामाभाससे ही सारे पाप जलकर
समाप्त हो जाते हैं; उन्होंने आपका नाम लेकर
आपकी निन्दा की थी, वह नाम ही उनकी पापोंसे
मुक्तिका कारण बन गया ॥ 192-195 ॥
अनुभाष्य-जगाइ और मधाइ यद्यपि पापी थे,
तथापि उन्होंने नीच व्यक्तिके सेवक बनकर स्वयंको
बेचकर स्वामीके लिये निन्दनीय कर्म नहीं किये थे।
हम उनकी अपेक्षा भी घृणित हैं, क्योंकि हम नीच
व्यक्तिके हाथोंकी कठपुतली हैं। हमारा स्वामी हमारे
द्वारा ही अनेक प्रकारके नीच कार्य करवाता है।
साधुकी निन्दा करनेसे अपराध होता है। विष्णुकी
निन्दासे जो अपराध होता है, वह उनका नाम ग्रहण
करनेसे विनष्ट हो जाता है ॥ 193-195 ॥
जगाइ-माधाइसे भी अपनेको अधम माननेकी उक्ति :-
जगाइ-माधाइ हैते कोटी कोटी गुण।
अधम पतित पापी आमि दुइ जन ॥ 196 ॥
म्लेच्छजाति, म्लेच्छसङ्गी, करि म्लेच्छकर्म।
गो-ब्राह्मण-द्रोहि-सङ्गे आमार सङ्गम ॥ 197 ॥
अनुवाद-जगाइ और मधाइसे भी करोड़ों-करोड़ों
गुणा हम दोनों अधम, पतित और पापी हैं। हम म्लेच्छ
जातिके हैं, क्योंकि हम म्लेच्छोंका सङ्ग करते हैं और
म्लेच्छों जैसे कर्म करते हैं। हाय! हम गो और
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