सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 876, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 876

पहला अध्याय 1/93–100 ]
और महाप्रभुने संन्यासके बाद पहली भिक्षा वहीं की।
उस रात उन्होंने भक्तोंके साथ सङ्कीर्तन किया॥ 93-94 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'प्रथमभिक्षा' - संन्यास लेनेके बाद
कुछ दिन भ्रमण करनेके बाद श्रीअद्वैत-प्रभुके घरमें
प्रथम अन्नभिक्षा ग्रहण की ॥ 94 ॥
शचीमाता और भक्तोंके साथ मिलन, पुरीमें गमन :-
माता भक्तगणेर ताँहा करिल मिलन।
सर्व समाधान करि' कैल नीलाद्रिगमन ॥ 95 ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यके घरमें महाप्रभुका शचीमाता
और मायापुरके भक्तोंसे मिलन हुआ। तब मातासे
अनुमति और सब भक्तोंसे विदा लेकर वे वहाँसे
नीलाचलकी ओर चले पड़े ॥ 95 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला तीसरा अध्याय देखें ॥ 91-95 ॥
पुरीके मार्गमें रेमुणामें माधवेन्द्र पुरीका
वृत्तान्त और गोपीनाथ-दर्शन :-
पथे नाना लीला, सब देव-दरशन।
माधवपुरीर कथा, गोपाल-स्थापन ॥ 96 ॥
अनुवाद-नीलाचल जाते हुए महाप्रभुने अनेक
लीलाएँ कीं और मार्गमें उन्होंने सभी मन्दिरोंमें विग्रहोंके
दर्शन किये। उन्होंने श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी कथाका वर्णन
किया कि कैसे उन्होंने श्रीगोपालके विग्रहकी गोवर्धनमें
स्थापना की ॥ 96 ॥
अनुभाष्य-श्रीमाधवपुरी-शब्दसे श्रीमाधवेन्द्रपुरीको
समझना चाहिये। श्रीगदाधर-पण्डित गोस्वामीकी शाखामें
श्रीवल्लभभट्टने श्रीमङ्गलभाष्यके लेखक श्रीमाधवाचार्यसे
त्रिदण्ड संन्यास ग्रहण किया था। श्रीमाधवाचार्य और
श्रीमाधवेन्द्रपुरी दो अलग व्यक्ति हैं ॥ 96 ॥
श्रीनित्यानन्दके द्वारा साक्षी-गोपालका वृत्तान्त
वर्णन और महाप्रभुके संन्यास दण्डको तोड़ना :-
क्षीर-चुरि-कथा, साक्षिगोपाल-विवरण।
नित्यानन्द कैल प्रभुर दण्ड-भञ्जन ॥ 97 ॥
अनुवाद-गोपीनाथजीके द्वारा श्रीमाधवेन्द्रपुरीके लिये
खीर चुराना, गोपालजीका ब्राह्मणके लिये साक्षी देनेके
लिये वृन्दावनसे विशाखापट्टनम् आना आदि लीलाओंका
महाप्रभुने आस्वादन किया। मार्गमें श्रीनित्यानन्द प्रभुने
उनका संन्यास दण्ड तोड़कर उसे नदीमें फेंक दिया ॥ 97 ॥
अनुभाष्य - 'क्षीरचोरा गोपीनाथ' - श्रीपाट रेमुणामें है।
टीका लिखनेके समय श्रीश्यामसुन्दर अधिकारी मन्दिरके
सेवायत थे। वे श्रीश्यामानन्द प्रभुके अनुगत श्रील
रसिकानन्द मुरारिके श्रीपाट मेदिनीपुर जिलाके छोरपर
रहनेवाले गोपीवल्लभपुरके शिष्य हैं।
'साक्षिगोपाल'-भुवनेश्वरसे पुरीके मार्गपर 'सत्यवादी'
नामक ग्राममें श्रीमन्दिर अवस्थित है। श्रीमन्महाप्रभुके
समयमें कटक-शहरमें साक्षिगोपालका मन्दिर था।
(मध्यलीला 5/8 का अमृतप्रवाह-भाष्य देखें।)
मध्यलीला चौथा और पाँचवाँ अध्याय भी देखें ॥ 96-97 ॥
अकेले श्रीजगन्नाथ दर्शन करते समय मूर्च्छा :-
क्रुद्ध हञा एका गेला जगन्नाथ देखिते।
देखिया मूर्छित हञा पड़िला भूमिते ॥ 98 ॥
श्रीसार्वभौमके घरमें महाप्रभुको लाना और मूर्च्छाभङ्ग :-
सार्वभौम लञा गेला आपन-भवन।
तृतीय प्रहरे प्रभु हइल चेतन ॥ 99 ॥
अनुवाद-उनके दण्डको तोड़कर फेंक देनेकी
बातसे क्रोधित होकर महाप्रभु अकेले ही श्रीजगन्नाथके
दर्शनोंके लिये आये और वहाँ दर्शन करते ही वे
मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य
उन्हें उठाकर अपने घर ले आये। तीन प्रहर बाद
महाप्रभुकी चेतना लौटी ॥ 98-99 ॥
बादमें श्रीनित्यानन्दादि भक्तोंके साथ मिलन :-
नित्यानन्द, जगदानन्द, दामोदर, मुकुन्द।
पाछे आसि' मिलि' सबे पाइल आनन्द ॥ 100 ॥
अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीजगदानन्द, श्रीस्वरूप
। 23