श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 877, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 1/100-106 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
दामोदर, श्रीमुकुन्द पीछे आकर महाप्रभुसे मिले और
उन्हें बहुत आनन्द हुआ॥100॥
श्रीसार्वभौमपर कृपा और षड्भुज-प्रदर्शन :-
तबे सार्वभौमे प्रभु प्रसाद करिल।
आपन-ईश्वरमूर्त्ति ताँरे देखाइल॥101॥
अनुवाद-तब महाप्रभुने श्रीसार्वभौमपर कृपा करके
उन्हें अपनी ईश्वरमूर्तिका (पहले चतुर्भुज नारायणरूपके
और बादमें अपने नित्य श्यामसुन्दर-वंशीधारी श्रीकृष्ण
स्वरूपके) दर्शन कराये॥101॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 6/201-204 संख्या देखें॥101॥
महाप्रभुका दक्षिण भारतकी ओर गमन तथा
कूर्मक्षेत्रमें कुष्ठरोगी विप्रका उद्धार :-
तबे त' करिला प्रभु दक्षिण गमन।
कूर्मक्षेत्रे कैल वासुदेव-विमोचन॥102॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौमपर कृपा करके तब महाप्रभुने
दक्षिण भारतकी यात्रा आरम्भ की। कूर्मक्षेत्र पहुँचकर
उन्होंने कुष्ठरोगी वासुदेव नामक ब्राह्मणका उद्धार
किया॥102॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 7/113 के अनुभाष्यमें कूर्मस्थान
और श्रीनरहरि (नृहरि) तीर्थके समयमें 1203 शकाब्दके
पत्थर-पटलका वृत्तान्त देखें॥102॥
जियड़-नृसिंह-दर्शन :-
जियड़-नृसिंहे कैल नृसिंह-स्तवन।
पथे-पथे ग्रामे-ग्रामे नामप्रवर्त्तन॥103॥
अनुवाद-जियड़-नृसिंह क्षेत्रमें भगवान् नृसिंहदेवके
दर्शन करके उनकी स्तुति की और मार्गमें आनेवाले
सभी ग्रामोंमें उन्होंने श्रीकृष्णनाम-कीर्त्तनका प्रचार
किया॥103॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 8/3 का अनुभाष्य देखें॥103॥
विद्यानगरमें गोदावरी-तटपर श्रीराय-रामानन्दसे मिलन :-
गोदावरीतीर-वने वृन्दावन-भ्रम।
रामानन्द राय सह ताहाञि मिलन॥104॥
अनुवाद-गोदावरीके तटपर एक वनको देखकर
महाप्रभुको वृन्दावनका भ्रम हो गया। वहीं उनका श्रीराय
रामानन्दसे मिलन हुआ॥104॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 8/11 और 8/14-20 संख्या
देखें॥104॥
तिरुमलयमें तिरुपतिका दर्शन :-
त्रिमल्ल-त्रिपदी स्थान कैल दरशन।
सर्वत्र करिल कृष्णनाम प्रचारण॥105॥
अनुवाद-फिर महाप्रभुने त्रिमल्ल और त्रिपदी
स्थानोंमें जाकर दर्शन किये और सर्वत्र श्रीकृष्णनामका
प्रचार किया॥105॥
अनुभाष्य- 'त्रिमल्ल' (तिरुमलय) - ताञ्जोर जिलामें
अवस्थित है (मध्यलीला 9/71 संख्या देखें)। 'त्रिपदी'
(तिरुपति, पदि या तिरु-पाट्टुर) - (उत्तर आर्कटमें)
व्येङ्कटाचलकी घाटीमें अवस्थित है, वहाँ श्रीरामचन्द्रका
मन्दिर है। इसी व्येङ्कटाचलके ऊपर सुप्रसिद्ध श्रीबालाजीका
मन्दिर है (मध्यलीला 9/64 संख्या देखें)॥105॥
पाखण्डी-बौद्धोंका उद्धार और अहोबल-नृसिंह-दर्शन :-
तबे त' पाषण्डिगणे करिल दलन।
अहोबल-नृसिंहादि कैल दरशन॥106॥
अनुवाद-तब उन्होंने कुछ पाखण्डियोंको परास्त
किया। इसके बाद उन्होंने अहोबल-नृसिंह आदि
मन्दिरोंके दर्शन किये॥106॥
अनुभाष्य- 'पाषण्डदलन' - मध्यलीला 9/42-62 संख्या
देखें। 'अहोबल'-नामान्तर 'अहोबिलम्' मन्दिर-
दक्षिण-भारतके कर्नूल जिलाके सार्बेल-तालुकामें है।
सम्पूर्ण जिलेमें यह श्रीनृसिंहदेवका मन्दिर ही विख्यात
है। पीछे अन्य नौ विष्णुविग्रहोंसे युक्त मन्दिरसे मिलनेपर
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