श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 874, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय 1/75-87 ]
ते (तव) क्षौणी (व्रजभूमिः) विलसति, तत्र (व्रजपुर्यां)
चटुलपशुपीभावमुग्धान्तराभिः (चटुलाः चञ्चलाः पशुपीभावेन
गोपीभावेन मुग्धान्तःकरणं यासां ताभिः) अस्माभिः (गोपीभिः)
संवीतः (सम्मिलितः) वदनोल्लासिवेणुः (वदनात् उल्लसितुं शीलमस्य
इति उल्लासी वंशी यस्य तथाभूतः सन्, स्मितवदनोत्थ-
गोप्युन्मादिमुरलीनिनादकारी) त्वं विहारं कलय (कुरु)।
श्लोक-भावानुवाद—गोपियाँ कह रही हैं,- "हे कृष्ण !
मधुर लीलारसके सौरभको विस्तार करनेवाले वनसमूहसे
परिव्याप्त, मथुरामण्डलकी माधुरीसे परिवेष्टित जो धन्य
व्रजभूमि विराजमान है, उस व्रजपुरीमें मुग्धचित्त हम
गोपियोंसे परिवेष्टित होकर प्रफुल्लित मुखसे आनन्द-प्रसारण
करनेवाले वेणुवादन करते हुए तुम विहार करो।"
मध्यलीला 13/121-159 संख्या देखें ॥ 75-84 ॥
विरह हेतु श्रीजगन्नाथजीको व्रज ले जानेका आग्रह :-
एइरूप महाप्रभु देखि' जगन्नाथे।
सुभद्रा-सहित देखे, वंशी नाहि हाते ॥ 85 ॥
त्रिभङ्ग-सुन्दर व्रजे व्रजेन्द्रनन्दन।
काहाँ पाव, एइ वाञ्छा करे अनुक्षण ॥ 86 ॥
अनुवाद-इस प्रकार जब महाप्रभुने श्रीजगन्नाथजीको
देखा कि वे अपनी बहन सुभद्राके साथ हैं और उनके
हाथमें वंशी भी नहीं है, तो उनके हृदयमें श्रीजगन्नाथजीको
त्रिभङ्ग-ललित मुद्रामें खड़े परम सुन्दर व्रजेन्द्रनन्दनके
रूपमें देखनेकी इच्छा पल-पल बढ़ने लगी ॥ 85-86 ॥
उद्धवके दर्शनसे राधिका-भावमय महाप्रभु :-
राधिका-उन्माद यैछे उद्धव-दर्शने।
उद्घूर्णा-प्रलाप तैछे प्रभुर रात्रि-दिने ॥ 87 ॥
अनुवाद-उद्धवजीको देखकर जैसे श्रीमती राधिका
दिव्योन्मादकी दशामें उद्घूर्णा-प्रलाप करने लगीं थी,
वैसे ही महाप्रभु दिन-रात उन्मादित होकर प्रलाप
करते ॥ 87 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'उद्घूर्णा-प्रलाप'-नाना प्रकार
विवशतापूर्ण चेष्टासे जो प्रलापादि उदित होते हैं ॥ 87 ॥
अनुभाष्य - 'उन्माद'- उद्घूर्णा और चित्रजल्पादियुक्त
दिव्योन्माद।
"एतस्य मोहनाख्यस्य गतिं कामप्युपेयुषः ।
भ्रमाभा कापि वैचित्री दिव्योन्माद इतीर्यते ॥"
-(उ:नी: 14/190)
अर्थात् "किसी अनिर्वचनीय विशेष-वृत्तिको प्राप्त
होनेपर मोहनभावकी अद्भुत भ्रान्ति-सदृश स्फूर्तिरूपा
वैचित्रीको पण्डितजन दिव्योन्माद कहते हैं।" इस श्लोककी
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्तीकी आनन्दचन्द्रिका टीका-
"कामपि निर्वक्तुमशक्यां गतिं वृत्तिमुपेयुषः प्राप्तस्य काप्यद्भुता
वैचित्री दिव्योन्मादः ।"
अर्थात् "किसी अनिर्वचनीया वृत्तिसे प्राप्त मोहनके
भ्रमतुल्य विचित्रतापूर्ण अवस्थाको दिव्योन्माद कहते हैं।"
"उद्घूर्णा चित्रजल्पाद्यास्तद्भेदा बहवो मताः।"
-(उ:नी: 14/191)
अर्थात् "इस दिव्योन्मादमें उद्घूर्णा और चित्रजल्पादि
बहुतसे भेद हुआ करते हैं।"
'उद्घूर्णा'-
"स्याद्विलक्षणमुद्घूर्णा नानावैवश्यचेष्टितम् ।”
-(उ:नी: 14/192)
अर्थात् "नाना प्रकारकी विलक्षण विवशतापूर्ण
चेष्टाको उद्घूर्णा कहते हैं।" जैसे-
“शय्यां कुञ्जगृहे क्वचिद्वितनुते सा वाससज्जायिता,
नीलाभ्रं धृतखण्डिता व्यवहृतिश्खण्डौ क्वचित्तर्जति ।
आघूर्णत्यभिसारसंभ्रमवती ध्वान्ते क्वचिद्दारुणे,
राधा ते विरहोद्भ्रमप्रमथिता धत्ते न कां वा दशाम्।”
-(उ:नी: 14/193)
अर्थात् उद्धवजी श्रीकृष्णसे कहते हैं- "हे श्रीकृष्ण !
श्रीमती राधिका तुम्हारे विरहमें महाभ्रान्तिसे पीड़ित
होकर न जाने कौन-कौनसी दशाको प्राप्त नहीं हो रही
हैं? वे कभी वासकसज्जाकी भाँति कुञ्जभवनको
सजाती हैं, शय्या-रचना करती हैं, कभी खण्डितावस्थामें
अति क्रोधित होकर नीलमेघको भी तर्जन-गर्जन करती
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