श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 878, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय
1/106-112 ]
[बायाँ स्तम्भ]
इसे 'नवनृसिंहमन्दिर' भी कहते हैं। प्रधान मन्दिर चौंसठ
खम्बोंपर निर्मित है और प्रत्येक खम्बेपर छोटे-छोटे
खम्बे खुदे हैं। मन्दिरके सामने अत्यधिक कुशल
शिल्पकारोंकी कलाकारीके नमूनेके रूपमें सफेद पत्थरसे
निर्मित तीन फुट व्यासके गोलाकार बड़े-बड़े स्तम्भोंसे
युक्त एक असम्पूर्ण किन्तु बहुत विचित्र मण्डप विद्यमान
है (कर्णूल म्यानुयेलन पत्रिका)॥ 106 ॥
श्रीरङ्गनाथ-दर्शन :-
श्रीरङ्गक्षेत्र आइला कावेरीर तीर।
श्रीरङ्ग देखिया प्रेमे हइला अस्थिर ॥ 107 ॥
**अनुवाद—**वहाँसे वे कावेरीके तटपर श्रीरङ्गम पहुँचे।
श्रीरङ्गजीके दर्शन करके वे प्रेममें मत्त हो गये॥ 107 ॥
अनुभाष्य—'श्रीरङ्गक्षेत्र'—मध्यलीला 9/79 संख्याका
अनुभाष्य देखें ॥ 107 ॥
त्रिमल्ल भट्टके घरमें चातुर्मास्य-यापन :-
त्रिमल्ल भट्टेर घरे कैल प्रभु वास।
ताहाञि रहिला प्रभु वर्षा चारि मास ॥ 108 ॥
**अनुवाद—**महाप्रभु श्रीरङ्गममें त्रिमल्ल भट्टके घरमें
वर्षाकालके चार मास (चातुर्मास्य) तक रहे॥ 108 ॥
त्रिमल्ल भट्ट—श्रीसम्प्रदायके वैष्णव :-
‘श्रीवैष्णव’ त्रिमल्ल भट्ट—परम पण्डित।
गोसाञिर पाण्डित्य-प्रेमे हइला विस्मित ॥ 109 ॥
**अनुवाद—**त्रिमल्ल भट्ट बड़े विद्वान और श्रीसम्प्रदायमें
दीक्षित वैष्णव थे। परन्तु महाप्रभुका पाण्डित्य और
श्रीकृष्णप्रेम देखकर आश्चर्यचकित हो गये॥ 109 ॥
अनुभाष्य—'त्रिमल्ल भट्ट'—तमिलप्रदेशके अन्तर्गत श्रीरङ्गम
और अन्यान्य स्थानोंके रहनेवालोंकी 'तिरुमलय' या
'व्येङ्कट' नाम रखनेकी रीति नहीं है, विशेषतः तिरुमलय
या व्येङ्कट भट्ट आदि बङ्ग्लइ अर्थात् उत्तरमें स्थित
आन्ध्रप्रदेशके वैष्णव हैं और श्रीरङ्गमवासी तेङ्गलइ या
[दायाँ स्तम्भ]
दक्षिण-प्रदेशवासी वैष्णव हैं। मध्यलीला 9/82 संख्याका
अमृतभाष्य प्रवाह और अनुभाष्य देखें ॥ 108-109 ॥
चातुर्मास्य महाप्रभु श्रीवैष्णवेर सने।
गोङाइल नृत्य-गीत-कृष्णसङ्कीर्तने ॥ 110 ॥
**अनुवाद—**महाप्रभुने चातुर्मास्य त्रिमल्ल भट्ट और
उसके परिवारके साथ नृत्य-गीत सहित श्रीकृष्ण
नाम-सङ्कीर्तनमें बिताये ॥ 110 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'चातुर्मास्य'—आषाढ़मासकी
शुक्ला-द्वादशीसे कार्तिकमासकी शुक्ला-द्वादशी तक
चार मास ॥ 110 ॥
अनुभाष्य—'श्रीवैष्णव-घरमें महाप्रभुका चातुर्मास्य-
यापन'—मध्यलीला 9/84-164 संख्या देखें ॥ 110 ॥
श्रीरङ्गमके दक्षिणमें परमानन्द पुरीसे मिलन :-
चातुर्मास्यान्तरे पुनः दक्षिण गमन।
परमानन्दपुरी सह ताहाञि मिलन ॥ 111 ॥
**अनुवाद—**चातुर्मास्यके बाद वे पुनः दक्षिण भारत
भ्रमणपर निकले और वहाँ श्रीपरमानन्दपुरीसे उनका
मिलन हुआ ॥ 111 ॥
अनुभाष्य—'ताहाञि'—ऋषभ पर्वतपर। मध्यलीला
9/167-173 संख्या और 9/167 संख्याका अनुभाष्य
देखें ॥ 111 ॥
सङ्गी कृष्णदासका उद्धार, रामसेवकको
कृष्ण नाममें प्रवर्त्तन :-
तबे भट्टथारि हैते कृष्णदासेर उद्धार।
रामजपी विप्रमुखे कृष्णनाम प्रचार ॥ 112 ॥
**अनुवाद—**तान्त्रिक भट्टथारियोंके द्वारा स्त्री और
धनके आकर्षणमें फंसाये गये अपने सङ्गी कृष्णदासका
महाप्रभुने उद्धार किया। श्रीराम-नाम जप करनेवाले
ब्राह्मणके मुखसे उन्होंने श्रीकृष्णनामका प्रचार
करवाया ॥ 112 ॥
। 25