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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 888, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 888

पहला अध्याय 1/185–190 ]

[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

अनुवाद—उन दोनोंने परम दैन्यभावसे अपने मुखमें
तृणके गुच्छे दबाकर और गलेमें वस्त्र बाँधकर (बिके
हुए पशुके समान मुखमें तृण और गलेमें रस्सीके
बन्धन जैसे) महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया॥185॥
दैन्य रोदन करे, आनन्दे विह्वल।
प्रभु कहे,—उठ, उठ, हइल मङ्गल ॥ 186 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके दर्शनसे वे आनन्दमें विह्वल
हो गये और दैन्यताके कारण रोने लगे। महाप्रभुने
कहा,—“उठो-उठो! तुम्हारा मङ्गल हुआ है॥” 186 ॥
श्रीरूप-सनातनका दैन्य और स्तव :—
उठि' दुइ भाइ तबै दन्ते तृण धरि'।
दैन्य करि' स्तुति करे करयोड़ करि' ॥ 187 ॥
“जय जय श्रीकृष्णचैतन्य दयामय।
पतितपावन जय, जय महाशय ॥ 188 ॥
नीच-जाति, नीच-सङ्गी, करि नीच काज।
तोमार अग्रेते प्रभु कहिते वासि लाज ॥ 189 ॥
अनुवाद—दोनों भाई उठकर दैन्यतासे दाँतोंमें तृण
दबाकर हाथ जोड़कर महाप्रभुकी स्तुति करने
लगे,—“पतितोंका उद्धार करनेवाले परम दयालु
श्रीकृष्णचैतन्यकी बारम्बार जय हो। परम पुरुषकी जय
हो, जय हो। हम नीच जातिके हैं, नीच लोगोंका सङ्ग
करते हैं और सदा नीच कार्योंमें रत हैं। आपके सामने
खड़े होनेमें हमें बड़ी लज्जा आ रही है॥187–189॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीरूप और सनातनका विचार
था कि उन्होंने नीच जातिमें जन्में नीच लोगोंका सङ्ग
और उनकी सेवा करके नीच कार्य किया है॥189॥
अनुभाष्य— 'नीचजाति'—श्रीरूप-सनातन पवित्र
कन्नड़-ब्राह्मण कुलमें जन्में थे, परन्तु दैन्यवशतः
अपनेको नीचजातिका कहते थे। जन्म तीन प्रकारके
होते हैं—शौक्र, सावित्र और दैक्ष। नीच लोगोंका सङ्ग
करनेसे स्वभाव नीच होता है।


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

“म्लेच्छजाति, म्लेच्छसङ्गी, करि म्लेच्छकर्म।
गो-ब्राह्मण-द्रोहि-सङ्गे आमार सङ्गम॥”
अर्थात् “हम मलेच्छ जातिके हैं, क्योंकि हम
मलेच्छोंका सङ्ग करते हैं और मलेच्छों जैसे कर्म
करते हैं। हम गो और ब्राह्मणोंका वध करनेवालोंका
सङ्ग करते हैं।”
श्रीमद्भागवतके सातवें स्कन्धमें आदेश-मत है—
“यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यञ्जकम्।
यदन्यत्रापि दृश्येत तत्तेनैव विनिर्दिशेत् ॥”
अर्थात् “जिस व्यक्तिमें पूर्व वर्णित ब्राह्मण, क्षत्रिय,
वैश्य और शूद्रके जो लक्षण दिखायी दें, चाहे उसने
किसी अन्य वर्णमें जन्म लिया हो, उसे लक्षणोंके
अनुसार वर्णका ही मानना चाहिये।”
श्रीरूप-सनातनने यवनकी सेवाके कारण स्वयंको
नीचजातिका कहा। ब्राह्मण-वृत्तिरहित नीचजातीयकी
नीच शूद्रवृत्तिको ग्रहणके कारण उसे उसी जातिका
कहा जाता है। भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें कहा गया
है—
“नीचजाति-सङ्गे सदा नीच व्यवहार।
एइ हेतु नीच-जात्यादिक उक्ति ताँर ॥”
अर्थात् “नीचजातिके सङ्गसे सदा नीच व्यवहार
होता है, इसलिये श्रीरूप-सनातन ऐसा कह रहे
हैं॥”189॥
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/154) :—
मत्तुल्यो नास्ति पापात्मा नापराधी च कश्चन।
परिहारेऽपि लज्जा मे किं ब्रुवे पुरुषोत्तम ॥ 190 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह-भाष्य देखें॥190॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मेरे जैसा कोई पापी नहीं है,
मेरे जैसा कोई अपराधी भी नहीं है। हे पुरुषोत्तम! मेरे
द्वारा किये गये पापों और अपराधोंका उल्लेख करने
और उन्हें क्षमा करानेकी चेष्टा करनेमें भी मुझे लज्जा
आ रही है॥ 190 ॥
अनुभाष्य—
हे पुरुषोत्तम (पुरुषश्रेष्ठ) मत्तुल्यः कश्चित् पापात्मा (पापी)

। 35