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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 875, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 875

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

[ 1/87–94 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
हैं, कभी-कभी घनघोर अन्धकारमें भी शीघ्रतासे अभिसारिणी
होकर भ्रमण करने लगती हैं।”
अधिरूढ़-महाभाव दो प्रकारका होता है—मोदन
और मादन। मोदनभाव वियोग-दशामें 'मोहन' नामसे
प्रसिद्ध है। इस मोहन-महाभावमें भी विरह-विवशता
हेतु सात्त्विकभावसमूह सुदीप्त रूपमें प्रकाशित हुआ
करते हैं॥ 87॥
अन्तके बारह वर्षोंमें महाप्रभुका श्रीकृष्ण विरह :-
द्वादश वत्सर शेष ऐछे गोङाइल।
एइ मत शेषलीलार विधान करिल॥ 88॥
अनुवाद—अन्तिम बारह वर्ष महाप्रभुने इसी प्रकार
उन्माद दशामें बिताये, इस प्रकार उन्होंने (तीन प्रकारसे
मध्य और अन्त्य) शेषलीला की॥ 88॥
महाप्रभुकी असीम लीलाएँ :-
संन्यास करि' चब्बिश वत्सर कैला ये ये कर्म।
अनन्त, अपार—तारके जानिबे मर्म॥ 89॥
ग्रन्थकारका दिग्दर्शन :-
उद्देश करिते करि दिग्-दरशन।
मुख्य-मुख्य-लीलार करि सूत्र गणन॥ 90॥
अनुवाद—संन्यास लेनेके बाद चौबीस वर्षोंमें उन्होंने
जो-जो लीलाएँ कीं, वे अनन्त-अपार हैं और उनके
मर्मको कौन जान सकता है? इसलिये मैं केवल
उनका दिग्दर्शन करानेके लिये मुख्य-मुख्य लीलाओंको
सूत्र रूपमें वर्णन करूँगा॥ 89-90॥
पहले महाप्रभुका संन्यास और बादमें वृन्दावन-यात्रा :-
प्रथम सूत्र प्रभुर संन्यासकरण।
संन्यास करि' चलिला प्रभु श्रीवृन्दावन॥ 91॥
अनुवाद—प्रथम सूत्र यह है कि महाप्रभुने संन्यास
ग्रहण किया और उसके बाद वे वृन्दावनकी ओर
चले॥ 91॥
अनुभाष्य—महाप्रभुका संन्यास साधारण कर्मियों
और ज्ञानियोंके संन्यासके जैसा नहीं है। उन्होंने संन्यास
ग्रहण करके वृन्दावन जानेकी लीला प्रदर्शित की।
सांसारिक भोगोंके विचारको छोड़कर श्रीकृष्णका अनुकूल
अनुशीलन ही अवैष्णवतासे संन्यास लेना है।
“अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः।
निर्बन्धः कृष्णसम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते॥”
—(भःरःसिः 1/2/255)
अर्थात् “विषयोंमें अनासक्त होकर अपनी भक्तिके
अनुकूल यथा-उपयुक्त विषय-भोग करते हुए श्रीकृष्णकी
भक्तिके सम्बन्धमें विशेष आग्रह रखना 'युक्त-वैराग्य'
कहलाता है।”
ज्ञानी-संन्यासी हरिसेवासे विमुख होनेके कारण
अप्राकृत तत्त्वको नहीं समझ पाते, इसलिये वे हरिसम्बन्धी
वस्तुओंको भी भौतिक मानते हैं॥ 91॥
तीन दिन तक राढ़ देशमें भ्रमण :-
प्रेमेते विह्वल बाह्य नाहिक स्मरण।
राढ़देशे तिन दिन करिला भ्रमण॥ 92॥
अनुवाद—महाप्रभु श्रीकृष्णप्रेममें ऐसे मत्त हो गये
कि उन्हें बाहरकी सुध-बुध ही नहीं रही और वे मनमें
यही भावना कर रहे थे कि वे वृन्दावनकी ओर जा
रहे हैं, परन्तु वे तीन दिन तक निरन्तर राढ़देशमें ही
घूमते रहे॥ 92॥
श्रीनित्यानन्दकी चतुरतासे महाप्रभुका नवद्वीपमें आगमन :-
नित्यानन्द प्रभु महाप्रभु भुलाइया।
गङ्गातीरे लञा गेला 'यमुना' बलिया॥ 93॥
शान्तिपुरमें श्रीअद्वैतके घरमें भिक्षा और कीर्तन :-
शान्तिपुरे आचार्येर गृहे आगमन।
प्रथम भिक्षा कैल ताहाँ, रात्रे सङ्कीर्त्तन॥ 94॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुको वृन्दावन
ले जानेके छलसे उन्हें भ्रमित करके गङ्गाके तटपर
लाकर कहा कि ये यमुनाजी हैं। उसके बाद श्रीनित्यानन्द
प्रभु उन्हें शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यके घर लेकर आये
22 ।