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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

15/9-11 ]
कहा गया है—'एकादशी तिथिके दिन भोजन मत करो,
क्योंकि यह व्रत विष्णु सम्बन्धी है और महान् है।' यह
एकादशी-व्रत अवैष्णवोंके लिये भी अवश्य कर्त्तव्य
है।"
वैष्णव लोग महाप्रसादके अतिरिक्त अन्य कोई भी
वस्तु किसी दिन, किसी भी समय स्वीकार नहीं करते,
किन्तु एकादशीके दिन महाप्रसाद-त्याग करनेका नाम
ही 'उपवास' है॥9॥
अमृतानुकणिका—हःभःविः (12/3)—
“अत्र व्रतस्य नित्यत्वादवश्यं तत् समाचरेत्।
सर्वपापापहं सर्वार्थदं श्रीकृष्णतोषणम्॥”
“एकादशी व्रत नित्य और अवश्य पालनीय है।
इसका अनुष्ठान करनेसे सभी पाप नाश होते हैं,
सर्वार्थकी प्राप्ति होती है और सर्वोपरि श्रीकृष्ण प्रसन्न
होते हैं।” हःभःविः (12/5) में मत्स्य और भविष्यपुराणसे
उद्धृत श्लोक—
“एकादश्यां निराहारो यो भुङ्क्ते द्वादशीदिने।
शुक्ले वा यदि कृष्णे तद्व्रतं वैष्णवं महत्॥”
“शुक्ल और कृष्ण, दोनों पक्षोंकी एकादशीमें
उपवासी रहकर द्वादशीके दिन भोजन करनेसे इस व्रतसे
श्रीकृष्ण परम सन्तुष्ट होते हैं।”
एकादशीके दिन भोजन निषेध है। जैसे अग्निपुराणमें
(हःभःविः 12/6)—
“एकादश्यां न भुञ्जीत व्रतमेतद्धि वैष्णवम्॥”
तथा नारदीय पुराण और पद्मपुराणमें (हःभःविः
12/12) कहा गया है—
“न भोक्तव्यं न भोक्तव्यं संप्राप्ते हरिवासरे॥”
चारों आश्रमोंमें स्थित व्यक्तियोंके लिये एकादशी
पालनीय है, ऐसा विष्णुधर्मोत्तर (हःभःविः 12/25) में
कहा गया है—
“ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽथवा यतिः।
एकादश्यां हि भुञ्जानो भुङ्क्ते गोमांसमेव हि॥”
“ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, अथवा संन्यासी, जो
कोई भी हो,—हरिवासरमें भोजन करनेपर वह गोमांस
भोजन होता है।” बृहन्नारदीये पुराण (हःभःविः 12/7) में
सभी वर्णोंके लिये भी एकादशी पालनका निर्देश दिया
गया है—
“ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणाञ्चैव योषिताम्।
मोक्षदं कुर्वतां भक्त्या विष्णु प्रियतरं द्विजाः॥”
“हे द्विजवृन्द! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, नारी—जो
कोई भी क्यों न हो, भक्तिपूर्वक श्रीविष्णु-प्रीतिप्रद
एकादशी व्रतका पालन करनेसे मोक्ष प्राप्त कर सकते
हैं।” इस श्लोकमें नारी कहनेसे सधवा और विधवा,
दोनोंको लक्ष्य किया गया है। परन्तु कुछ लोगोंका मत
है कि सधवा नारीको एकादशीका व्रत नहीं करना
चाहिये, ऐसा वे एक स्मृति वाक्यको लेकर कहते हैं—
“पत्यौ जीविति या नारी उपवासव्रतंश्चरेत्।
आयुः सा हरति भर्तुर्नरकाञ्चैव गच्छति॥”
“पतिके जीवित रहते जो नारी उपवास-व्रतका
आचरण करती है, वह अपने पतिकी आयुका हरण
करके नरकमें गमन करती है।” इस वाक्यका उद्देश्य
एकादशी व्रतका निषेध नहीं है, अपितु अन्य सभी
व्रतोपवासोंका ही निषेध है, अन्यथा इस वाक्यका अन्य
शास्त्र प्रमाणोंसे विरोध होता है। विष्णुधर्मोत्तर (हःभःविः
12/47) में कहा है—
“सपुत्रश्च सभार्थ्याश्च स्वजनैर्भक्तिसंयुक्तः।
एकादश्यामुपवसेत् पक्षयोरुभयोरपि॥”
“भक्तिसे युक्त होकर पत्नी, पुत्र और स्वजनोंके
सहित दोनों पक्षोंकी एकादशी तिथिमें उपवास करना
चाहिये।” यहाँ पत्नी सहित कहनेसे यह स्पष्ट है कि
सधवा स्त्रियोंको भी एकादशीका व्रतोपवास करना
चाहिये। इसलिये महाप्रभुने भी अपनी सधवा मातासे
एकादशी उपवासके अनुरोध किया और श्रीशची माताने
उसे सहर्ष स्वीकार किया॥9-10॥
विश्वरूपका विवाह करानेकी चेष्टा :—
तबे मिश्र विश्वरूपेर देखिया यौवन।
कन्या मागि' विवाह दिते कैल मन॥11॥
पन्द्रहवाँ अध्याय | 193

[ 15/11-22
अनुवाद—जगन्नाथ मिश्र विश्वरूपके यौवनकालमें
प्रवेशको देखकर उनके विवाहके लिये किसी योग्य
कन्याका हाथ माँगनेका मनमें विचार करने लगे॥ 11॥
विश्वरूपके द्वारा संन्यास ग्रहण :-
विश्वरूप शुनि' घर छाड़ि' पलाइला।
संन्यास करिया तीर्थ करिवारे गेला॥ 12 ॥
अनुवाद—ऐसा सुनकर विश्वरूप घर छोड़कर भाग
गये। वे संन्यास लेकर तीर्थयात्रापर निकल पड़े॥ 12॥
शची और मिश्रका दुःख और
महाप्रभुके द्वारा उन्हें सान्त्वना :-
शुनि' शची-मिश्रेर दुःखी हैल मन।
तबे प्रभु माता-पितार कैल आश्वासन ॥ 13 ॥
श्रीकृष्णका भजन करनेके लिये सन्तानके
संन्याससे माता-पिताके कुलोंका उद्धार :-
“भाल हैल,—विश्वरूप संन्यास करिल।
पितृकुल, मातृकुल,—दुइ उद्धारिल ॥ 14 ॥
महाप्रभुके आश्वासनसे माता-पिताका सन्तोष :-
आमि त' करिब तोमा' दुँहार सेवन।”
शुनिया सन्तुष्ट हैल पिता-मातार मन ॥ 15 ॥
अनुवाद—ऐसा सुनकर शचीमाता और जगन्नाथ
मिश्रके मनमें बहुत दुःख हुआ। तब महाप्रभुने माता-पिताको
आश्वासन देते हुए कहा,—“अच्छा ही हुआ जो
[भगवद्भजनके लिये] विश्वरूपने संन्यास ग्रहण कर
लिया है। इसके द्वारा वे पितृकुल और मातृकुल,
दोनोंका ही उद्धार करेंगे। मैं तो आपके साथ रहकर
आप दोनोंकी सेवा करूँगा।” महाप्रभुके ऐसे मधुर
वचनोंको सुनकर पिता-माताका मन सन्तुष्ट हो
गया॥ 13-15 ॥
महाप्रभुकी मूर्च्छा :-
एकदिन नैवेद्य-ताम्बुल खाइया।
भूमिते पड़िला प्रभु अचेतन हञा ॥ 16 ॥
अनुवाद—एक दिन महाप्रभुने भगवान्‌को निवेदित
किये गये पानको खाया और वे साथ-ही-साथ मूर्च्छित
होकर भूमिपर गिर पड़े॥ 16॥
विश्वरूपके साथ साक्षात्कार और महाप्रभुके
संन्यासके सम्बन्धमें दोनोंके बीच वार्तालाप :-
आस्ते-व्यस्ते पिता-माता मुखे दिल पानि।
सुस्थ हञा कहे प्रभु अपूर्व काहिनी ॥ 17 ॥
“एथा हैते विश्वरूप मोरे लञा गेला।
‘संन्यास करह तुमि’, आमारे कहिला ॥ 18 ॥
आमि कहि,—‘आमार अनाथ पिता-माता।
आमि बालक,—संन्यासेर किबा जानि कथा ॥ 19 ॥
गृहस्थ हइया करि पितृ-मातृ-सेवन।
इहाते सन्तुष्ट हबेन लक्ष्मी-नारायण ॥' 20 ॥
तबे विश्वरूप इहाँ पाठाइल मोरे।
माताके कहिओ कोटि कोटि नमस्कारे ॥” 21 ॥
अनुवाद—शीघ्रतासे माता-पिताने महाप्रभुके मुखमें
जल दिया, जिससे वे स्वस्थ हो गये। तब उन्होंने एक
अपूर्व बात कही,—‘विश्वरूप आकर मुझे यहाँसे ले
गये और मुझसे कहा—‘तुम भी संन्यास ग्रहण करो।'
मैंने उनसे कहा,—‘यदि मैं भी संन्यास लूँगा, तो हमारे
माता-पिता निराश्रय हो जायेंगे। मैं तो अभी बालक हूँ,
मैं संन्यासके विषयमें क्या जानता हूँ? मैं गृहस्थ होकर
अपने माता-पिताकी सेवा करूँगा जिससे लक्ष्मी-नारायण
मेरे प्रति सन्तुष्ट होवेंगे।' मेरी बात सुनकर तब
विश्वरूपने मुझे पुनः यहाँ भेज दिया और कहा कि
माताको मेरी ओरसे कोटि-कोटि नमस्कार
कहना ॥” 17-21 ॥
एइ मत नाना लीला करे गौरहरि।
कि-कारणे लीला,—इहा बुझिते ना पारि ॥ 22 ॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीगौरहरि नाना प्रकारकी
194 | श्रीचैतन्यचरितामृत

15/22-24 ]
लीलाएँ करते हैं। वे किस उद्देश्यसे ऐसी लीलाएँ करते
हैं, कोई इसे नहीं समझ सकता॥ 22 ॥
मिश्रका अप्रकट होना :-
कतदिन रहि' मिश्र गेला परलोक।
माता-पुत्र दुँहार बाड़िल हृदि शोक॥ 23 ॥
अनुवाद-कुछ दिनोंके बाद श्रीजगन्नाथ मिश्र परलोक
सिधार गये। उनके विरहमें माता और पुत्र दोनोंके
हृदयका शोक दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा॥ 23 ॥
अनुभाष्य-(चैःभाः आदिखण्ड, आठवाँ अध्याय)-
“हेनमते कतदिन थाकि' मिश्रवर।
अन्तर्धान हैल नित्यसिद्ध कलेवर॥ 109 ॥
मिश्रेर विजये प्रभु कान्दिला विस्तर।
दशरथ-विजये ये हेन रघुवर॥ 110 ॥
दुःख बड़-ए सकल, विस्तार करिते।
दुःख हय, अतएव कहिलुँ संक्षेपे॥ 112 ॥”
“इस प्रकार श्रीजगन्नाथ मिश्र कुछ दिन इस अनित्य
संसारमें रहकर अपने नित्यसिद्ध शरीरके साथ अन्तर्धान
हो गये। उनके अप्रकट होनेपर महाप्रभु बहुत रोये,
जैसे दशरथ महाराजके अप्रकट होनेपर श्रीरघुवीरने
विलाप किया था। यह बहुत करुण कथा है, इसे
विस्तारसे कहनेपर बहुत दुःख होता है, इसलिये मैंने
संक्षेपमें इसका वर्णन किया है॥” 23 ॥
महाप्रभुका पितृ-श्राद्ध :-
बन्धु-बान्धव आसि' दुँहा प्रबोधिल।
पितृक्रिया विधिमते ईश्वर करिल॥ 24 ॥
अनुवाद-बन्धु-बान्धवोंने आकर दोनोंको सान्त्वना
दी। भगवान् श्रीगौरहरिने स्वयं शास्त्रविधिके अनुसार
अपने पिताका क्रिया-कर्म किया॥ 24 ॥
अमृतानुकणिका-हःभःविः (9/294) में वैष्णवश्राद्धकी
विधि दी गयी है-
“प्राप्ते श्राद्धदिनेऽपि प्रागन्नं भगवतेऽर्पयेत्।
तच्छेषेणैव कुर्वीत श्राद्धं भागवतो नरः॥”
“भगवत् परायण मनुष्य श्राद्धके दिन पहले
श्रीभगवान्‌को अन्न निवेदन करके उक्त अन्नके द्वारा
श्राद्धका अनुष्ठान करें।” विष्णुधर्ममें भगवद्-वाक्य-
“प्राणेभ्यो जुहुयादन्नं मन्निवेदितमुत्तमम्।
तृप्यन्ति सर्वदा प्राणा मन्निवेदितभक्षणात्॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रदेयं मन्निवेदितम्।
ममापि हृदयस्थस्य पितृणाञ्च विशेषतः॥”
“मेरे उद्देश्यसे निवेदित उत्कृष्ट अन्नकी आहुति
प्राणसमूहमें प्रदान करें। मेरे उद्देश्यसे निवेदित वस्तु
भक्षणके द्वारा प्राणादि वायु सर्वदा परितृप्त होते हैं।
इसलिये यत्नपूर्वक सबके हृदयमें अवस्थित परमात्मस्वरूप
मुझको विशेषतः पितृपुरुषोंको मेरे उद्देश्यसे निवेदित
अन्न प्रदान करें।”
“भक्ष्यं भोज्यञ्च यत्किञ्चिदनिवेद्याग्रभोक्तरि।
न देयं पितृदेवेभ्यः प्रायश्चिती यतो भवेत्॥”
“अग्रभोक्ता श्रीभगवान्‌को भक्ष्य भोज्य सामग्री अर्पण
न करके पितृगणको निवेदन न करे, क्योंकि अनिवेदित
वस्तु प्रदान करनेसे प्रायश्चित करना पड़ता है।” स्कन्द
पुराणमें श्रीमार्कण्डेय-भगीरथ संवादमें-
“यस्तु विद्याविनिर्मुक्तं मूर्खं मत्वा तु वैष्णवम्।
वेदविद्व्योऽददाद्विप्रः श्राद्धां तद्राक्षसं भवेत्॥
सिक्थमात्रन्तु यद्भुङ्क्ते जलं गण्डूषमात्रकम्।
तदन्नं मेरुणा तुल्यं तज्जलं सागरोपमम्॥”
“जो विप्र, विद्यारहित वैष्णवको मूर्ख मानकर
वेदज्ञोंको श्राद्धपात्र प्रदान करते हैं, वह राक्षस श्राद्ध
होता है। श्राद्धमें यदि वैष्णव, एक ग्रास अन्न भोजन
और चुल्लु भर जल पान करते हैं, तब वह अन्न
मेरुतुल्य एवं वह जल सागरतुल्य होता है।”
दूसरोंको निवेदित की हुई वस्तु उच्छिष्ट कही गयी
है। इसलिये किसी प्रकारसे ही उक्त सामग्री श्रीभगवान्‌को
समर्पण न करें। जैसे नारदपुराणमें लिखित है-
“पितृशेषन्तु यो दद्याद्धरये परमात्मने।
रेतोदाः पितरस्तस्य भवन्ति क्लेशभागिनः॥”
“जो मानव पितृपुरुषका उच्छिष्ट परमात्माको अर्पण
पन्द्रहवाँ अध्याय | 195

[ 15/24-28
करते हैं, उनके पितृगण रेत पान करके क्लेशके भागी
होते हैं।”
और भी विशेष विधि यह है कि श्राद्ध तिथि
एकादशीके (अथवा उपवास यदि द्वादशीके दिन हो, तब
उस) दिन उपस्थित होनेपर उस उपवासवाले दिन श्राद्ध
न करके पारणके दिन श्राद्ध करना चाहिये। हःभःविः
बारहवें अध्यायमें एकादशी नियमोंके प्रसङ्गमें ऐसा
वर्णित है। जैसे पद्मपुराणके पुष्कर खण्डमें लिखा है—
“एकादश्यां यदा राम श्राद्धं नैमित्तिकं भवेत्।
तद्दिने तु परित्यज्य द्वादश्यां श्राद्धमाचरेत्॥”
“हे राम! एकादशीमें नैमित्तिक श्राद्ध उपस्थित
होनेपर उस दिनको छोड़कर द्वादशीमें श्राद्ध करना
चाहिये।” पद्मपुराणके उत्तरखण्डमें लिखा है—
“एकादश्यान्तु प्राप्तायां मातापित्रोर्मृतेऽहनि।
द्वादश्यां तत् प्रदातव्यं नोपवासदिने क्वचित्।
गर्हितान्नं न चाश्नन्ति पितरश्च दिवौकसः॥”
“माता-पिताके मृत्यु-दिनमें एकादशी उपस्थित होनेपर
द्वादशीमें श्राद्ध करना चाहिये। उपवासके दिन कदापि
श्राद्ध न करे, क्योंकि देवता एवं पितृगण निन्दितान्न
भोजन नहीं करते हैं।” स्कन्द-पुराणमें भी कहा है—
“एकादशी यदा नित्या श्राद्धं नैमित्तिकं भवेत्।
उपवासं तदा कुर्याद्द्वादश्यां श्राद्धमाचरेत्॥”
“नित्य स्वरूपिणी एकादशीमें नैमित्तिक श्राद्ध समागत
होनेपर एकादशीमें उपवासी रहकर द्वादशीमें श्राद्ध करना
चाहिये।” ब्रह्मवैवर्त पुराणमें कहा है—
“ये कुर्वन्ति महीपाल श्राद्धं त्वेकादशीदिने।
त्रयस्ते नरकं यान्ति दाता भोक्ता प्रेतकः॥”
“हे राजन्! एकादशीके दिनमें श्राद्ध करनेसे दाता,
भोक्ता एवं प्रेत—तीनोंकी नरकमें गति होती है॥” 24॥
गृहस्थ-लीलाकी इच्छा :—
कत दिन प्रभु चित्ते करिला चिन्तन।
गृहस्थ हइलाम, एबे चाहि गृहधर्म ॥ 25 ॥
गृहिणीसे ही गृह :—
गृहिणी बिना गृहधर्म ना हय शोभन।
एत चिन्ति' विवाह करिते हैल मन ॥ 26 ॥
अनुवाद—कुछ समय व्यतीत होनेपर महाप्रभुने
चिन्तन किया कि अब घरका दायित्व मुझपर आ गया
है, इसलिये मुझे गृहस्थ धर्मका पालन करना चाहिये।
महाप्रभुने विचार किया कि गृहणीके बिना गृहस्थ धर्म
शोभा नहीं देता, इसलिये उन्होंने विवाह करनेका मनमें
निश्चय किया॥ 25-26 ॥
उद्वाह-तत्त्व (7)—
न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते।
तया हि सहितः सर्वान् पुरुषार्थान् समश्नुते ॥ 27 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥ 27 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—गृहको 'गृह' नहीं कहते, गृहिणीको
'गृह' कहते हैं, गृहिणीके साथ समस्त पुरुषार्थोंको भोग
करूँगा॥ 27 ॥
इति अमृतप्रवाह-भाष्ये पञ्चदश परिच्छेद।
पन्द्रहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य पूर्ण हुआ।
अनुभाष्य—गृहम् (आवासमन्दिरं) गृहं न, इति आहुः।
गृहिणी (गृहाधिष्ठात्री सहधर्मिणी) एव गृहम् उच्यते। तया (गृहिण्या)
सहितः (मिलितः सन्) [मानवः] सर्वान् पुरुषार्थान् (धर्मार्थकाममोक्षादीन्
चतुर्वर्गान्) समश्नुते (प्राप्नोति)।
श्लोक भावानुवाद—केवल घरको ही गृह नहीं कहा
जाता, गृहणी (सहधर्मिणी) को ही गृह कहा जाता है।
पुरुष गृहणीके साथ मिलकर ही समस्त पुरुषार्थों
(धर्म-अर्थ-काम-मोक्षादि चतुवर्ग) को भोग कर सकता
है।
महाभारत शान्तिपर्व 144/6 श्लोक द्रष्टव्य है॥ 27 ॥
लक्ष्मीदेवीके साथ साक्षात्कार :—
दैवे एकदिन प्रभु पड़िया आसिते।
वल्लभाचार्येर कन्या देखे गङ्गा-पथे ॥ 28 ॥
196 | श्रीचैतन्यचरितामृत

15/28–33 ]
अनुवाद—दैवयोगसे एक दिन जब महाप्रभु पढ़कर
आ रहे थे, तब उन्होंने श्रीवल्लभाचार्यकी कन्या
'लक्ष्मीदेवी' को गङ्गाकी ओर जाते देखा॥ 28॥
अमृतानुक्रमणिका—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका (श्लोक 45-46) में—
“श्रीजानकी रुक्मिणी च लक्ष्मीनाम्नी च तत्सुता।
चैतन्यचरिते व्यक्ता लक्ष्मीनाम्नी च सा यथा॥ 45॥
सा वल्लभाचार्यसुता चलन्ती
स्नातुं सखीभिः सुरदीर्घिकायाम्।
लक्ष्मीरनेनैव कृतावतारा
प्रभोर्ययौ लोचनवर्त्म तत्र॥” 46॥
“श्रीजानकी और श्रीरुक्मिणी एक साथ मिलकर श्रीवल्लभाचार्यकी पुत्री श्रीलक्ष्मी अर्थात् लक्ष्मीप्रियादेवी हुई हैं। इन्हीं श्रीलक्ष्मीप्रियाके विषयमें श्रीचैतन्यचरित महाकाव्यके तृतीय सर्गके सातवें श्लोकमें कहा गया है कि श्रीवल्लभाचार्यकी कन्या श्रीलक्ष्मीप्रियादेवी, जो स्वयं लक्ष्मीका अवतार हैं, जिस समय वे सखियोंके साथ गङ्गा-स्नानके लिये जा रही थीं, तभी अकस्मात् श्रीमन् महाप्रभुकी दृष्टि उन पर पड़ी॥” 28॥
वनमाली पण्डितके द्वारा घटकका कार्य सम्पादन करना :—
पूर्वासिद्ध भाव दुँहार उदय करिला।
दैवे वनमाली घटक शची-स्थाने आइला॥ 29॥
अनुवाद—एक दूसरेको देखकर दोनोंका पूर्वासिद्ध [नित्य] भाव उदित हो गया। दैवयोगसे वनमाली नामक घटक (विवाहका सम्बन्ध करवानेवाला) शचीमाताके पास आया॥ 29॥
अनुभाष्य—'वनमाली घटक'—एक नवद्वीपवासी ब्राह्मण। इन्होंने महाप्रभुके विवाहमें घटकका कार्य किया। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 49वाँ श्लोक)—
“विश्वामित्रोऽपि घटकः श्रीरामोद्वाहकर्मणि।
रुक्मिण्या प्रेषितो विप्रो यस्य श्रीकृष्णवं प्रति।
तावयं वनमाली यत्कर्मणाचार्यतां गतः॥ 49॥”
“श्रीरामचन्द्रके विवाहमें घटक अर्थात् विवाहके संयोजकका कार्य करनेवाले विश्वामित्र और श्रीरुक्मिणीदेवीके द्वारा श्रीकृष्णके निकट भेजे गये ब्राह्मण—इन दोनोंने मिलकर वनमाली नामसे जन्म लेकर कर्मके द्वारा अर्थात् घटकका कार्य करने हेतु आचार्यत्वको प्राप्त किया है॥” 29॥
सम्बन्ध और लक्ष्मीदेवीके साथ महाप्रभुका विवाह :—
शचीर इङ्गिते सम्बन्ध करिल घटन।
लक्ष्मीरे विवाह कैल शचीर नन्दन॥ 30॥
अनुवाद—शचीमाताकी सम्मति पाकर घटकने महाप्रभु और लक्ष्मीदेवीका सम्बन्ध करवा दिया। इस प्रकार शचीनन्दनने लक्ष्मीदेवीके साथ विवाह किया॥ 30॥
चैतन्यभागवतमें पौगण्डलीलाका विस्तारसे वर्णन :—
विस्तारिया वर्णिला ताहा वृन्दावन-दास।
एइ त' पौगण्ड-लीलार सूत्र-प्रकाश॥ 31॥
अनुवाद—श्रीवृन्दावनदासने इस लीलाका विस्तारसे वर्णन किया है। यहाँ तक महाप्रभुकी पौगण्ड लीलाका मैंने सूत्ररूपमें वर्णन किया है॥ 31॥
अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड, दसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है। चैःभाः आदिखण्ड, आठवें अध्यायमें उपनयन और माताको स्वर्ण-दान अधिक विस्तृत रूपमें वर्णित किया गया है॥ 31॥
इति अनुभाष्ये पञ्चदश परिच्छेद।
पन्द्रहवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ।
पौगण्ड-लीलाय लीला बहुत प्रकार।
वृन्दावन-दास इहा करियाछेन विस्तार॥ 32॥
अतएव दिङमात्र इहाँ देखाइल।
चैतन्यमङ्गले सर्वलोके ख्याति हैल॥ 33॥
अनुवाद—महाप्रभुकी पौगण्ड-लीलाएँ अनेक हैं,
पन्द्रहवाँ अध्याय | 197

[ 15/33-34
जिनका श्रीवृन्दावनदासने विस्तृत रूपसे वर्णन किया है।
'चैतन्यमङ्गल' ग्रन्थके द्वारा ऐसी लीलाओंकी समस्त
जगत्में ख्याति हुई है, इसलिये मैंने केवल उनका
दिग्दर्शनमात्र कराया है॥ ३३॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ ३४ ॥
इति चैतन्यचरितामृते आदिखण्डे पौगण्ड लीलासूत्र-वर्णनं
नाम पञ्चदश परिच्छेदः।
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है॥ ३४॥
श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला पौगण्ड लीलाका सूत्ररूपमें
वर्णन नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

सोलहवाँ अध्याय

चित्र 9

सोलहवाँ अध्याय
सोलहवें अध्यायका कथासार—इस अध्यायमें महाप्रभुकी
कैशोरलीला वर्णित है। अध्यापन, पण्डित-विजय, जाह्नवी
(गङ्गा) में जलक्रीड़ा, धन एकत्रित करनेके लिये
बङ्गदेशमें (वर्तमान बाङ्गलादेशमें) जाना, वहाँपर विद्या-विचार
और नाम-सङ्कीर्तन, तपन मिश्रसे भेंट और उनको
साध्य-साधनका उपदेश तथा उन्हें वाराणसी जानेका
आदेश देना आदि लीलाएँ इस अध्यायमें वर्णित हैं।
महाप्रभुके बङ्ग-विजयके समय लक्ष्मीदेवीका सर्पके
काटे जानेके छलसे वैकुण्ठ-गमन हुआ। महाप्रभुने
स्वदेशमें लौटकर शचीदेवीको तत्त्वज्ञानके द्वारा शान्त
किया और बादमें विष्णुप्रियासे विवाह किया। महाप्रभुने
दिग्विजयी केशवकाश्मीरके साथ वार्तालाप किया और
उसके द्वारा रचित गङ्गा-माहात्म्य-श्लोकोंमेंसे एक श्लोकपर
विचार करके उसमें पाँच अलङ्कार गुण और पाँच
अलङ्कार दोष दिखाकर उसके गर्वको चूर्ण किया।
दिग्विजयी कविने रात्रिमें सरस्वती देवीसे महाप्रभुके
तत्त्वको जाना और अगले दिन प्रातःकाल उनके
शरणागत हुआ। (अमृतप्रवाह भाष्य)
सदा कृपारत श्रीगौरहरि :—
कृपासुधा-सरिद्यस्य विश्वमाप्लावयन्त्यपि।
नीचगैव सदा भाति तं चैतन्यप्रभुं भजे ॥ 1 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥1॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिनकी कृपा-सुधा-सरिता विश्वको
आप्लावित करनेपर भी सदैव निम्नगामिनी रूपमें प्रकाशित
हो रही है, उन्हीं श्रीचैतन्य महाप्रभुका मैं भजन करता
हूँ॥1॥
अनुभाष्य—यस्य (चैतन्यदेवस्य) कृपा-सुधा-सरित्
(कृपामृत-नदी) विश्वं (संसारं) आप्लावयन्ती (निमज्जयन्ती)
अपि, सदा नीचगा (निम्नगामिनी-ऐश्वर्यविहीनेषु अकिञ्चनेषु
दीनजनेषु करुणामयी एव) भाति (प्रकाशते), तं चैतन्यप्रभुम्
[अहं] भजे।
श्लोक भावानुवाद—जिनकी कृपामृत-नदी समस्त
विश्वको निमज्जित करके भी अकिञ्चन दीन-हीन
लोगोंके प्रति सदा करुणामयी रूपमें प्रकाशित होती है,
उन श्रीचैतन्य महाप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥
जय जय श्रीचैतन्य, जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥
अनुवाद—महाप्रभु श्रीचैतन्यदेवकी जय हो। श्रीनित्यानन्द
प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर
भक्तवृन्दकी जय हो॥ 2 ॥
लक्ष्मी-सरस्वतीके द्वारा पूजित श्रीगौरहरि :—
जीयात् कैशोर-चैतन्यो मूर्त्तिमत्या गृहाश्रमात्।
लक्ष्म्यार्च्चितोऽथ वाग्देव्या दिशांजायिजयच्छलात् ॥ 3 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥3॥
अमृतप्रवाह भाष्य—गृहमें विराजमान मूर्तिमती
लक्ष्मीदेवीके द्वारा अर्चित और दिग्विजयीको जय करनेके
छलसे सरस्वतीदेवीके द्वारा अर्चित कैशोर-श्रीचैतन्यदेव
जययुक्त हों॥3॥
अनुभाष्य—गृहाश्रमात् (गृहगमनात् वा गृहाश्रमं प्राप्य) मूर्तिमत्या
(शरीरधारिण्या) लक्ष्म्या अर्च्चितः (सेवितः), अथ दिशांजायिजयच्छलात्
(दिग्विजयी-केशवकाश्मीराख्य-विबुधस्य जयव्यपदेशात्) वाग्देव्या
(सरस्वत्या) अर्च्चितः (पूजितः) कैशोरचैतन्यः (किशोर-वयसि
स्थितः चैतन्यः) जीयात्।
श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥3॥
कैशोर-लीला :—
एइ त' कैशोर-लीला-सूत्र-अनुबन्ध।
शिष्यगण पड़ाइते करिला आरम्भ॥4॥

[ 16/4-11
अनुवाद-अब महाप्रभुकी कैशोरलीलाका सूत्ररूपमें
वर्णन कर रहे हैं। महाप्रभुने अब शिष्योंको पढ़ाना
आरम्भ किया॥4॥
अनुभाष्य-'कैशोर'- ग्यारह वर्षसे पन्द्रह वर्ष तककी
अवस्थाको किशोर कहते हैं, उसी अवस्थाके अनुरूप
ही महाप्रभु भावान्वित हैं॥4॥
निमाइके अध्यापनसे सभी विस्मित :-
शत शत शिष्यसङ्गे सदा अध्यापन।
व्याख्या शुनि' सर्वलोकेर चमकित मन॥5॥
अनुवाद-सैकड़ों शिष्य आकर महाप्रभुसे शिक्षा
प्राप्त करने लगे। महाप्रभुकी व्याख्याको सुनकर सभी
चकित रह जाते ॥5॥
निमाइसे पराजित होनेपर भी पण्डितोंमें सन्तोष :-
सर्वशास्त्रे सर्व पण्डित पाय पराजय।
विनयभङ्गीते कारो दुःख नाहि हय ॥6॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥6॥
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभु पण्डितोंको सभी शास्त्रोंमें
पराजित कर देते, परन्तु उनके विनीतभावके कौशलसे
उन पण्डितोंको दुःख नहीं होता था॥6॥
विविध औद्धत्य करे शिष्यगण-सङ्गे।
जाह्नवीते जलकेलि करे नाना रङ्गे॥7॥
अनुवाद-शिष्योंके साथ महाप्रभु अनेक प्रकारकी
चञ्चलता करते और गङ्गामें अनेक प्रकारसे जलक्रीड़ा
करते॥7॥
पूर्व बङ्गालमें गमन और नामसङ्कीर्तन-प्रवर्त्तन :-
कत दिने कैल प्रभु बङ्गेते गमन।
याँहा याय, ताँहा लओयाय नाम-सङ्कीर्त्तन ॥8॥
महाप्रभुके पाण्डित्यकी ख्याति सुनकर
अनेक छात्रोंके द्वारा अध्ययन :-
विद्यार प्रभाव देखि' चमत्कार चित्ते।
शत शत पड़ुया आसि लागिला पड़िते॥9॥
अनुवाद-कुछ दिनोंके बाद महाप्रभु पूर्वी बङ्गाल
गये। वे जहाँ भी जाते, वहाँपर लोगोंसे नाम-सङ्कीर्तन
कराते। महाप्रभुकी विद्याके प्रभावको देखकर सभीका
चित्त चमत्कृत हो जाता और वहाँ भी सैकड़ों छात्र
उनके निकट आकर पढ़ने लगे॥8-9॥
महाप्रभुके साथ तपन मिश्रका साक्षात्कार
और साध्य-साधन-तत्त्व-जिज्ञासा :-
सेइ देशे विप्र, नाम-मिश्र तपन।
निश्चय करिते नारे साध्य-साधन ॥10॥
अनेक शास्त्रोंमें अनेक मुनियोंके
नाना-मतोंसे बुद्धि-विभ्रम :-
बहुशास्त्रे बहुवाक्ये चित्ते भ्रम हय।
साध्य-साधन श्रेष्ठ ना हय निश्चय ॥11॥
अनुवाद-उस देशमें तपन मिश्र नामक एक ब्राह्मण
रहते थे। अनेक शास्त्रोंका अध्ययन करके भी वे
साध्य-साधन तत्त्वके विषयमें निश्चय नहीं कर पा रहे
थे। बहुत शास्त्रोंके अनेक प्रकारके वाक्योंके द्वारा
उनके चित्तमें और भी भ्रम होता। इसलिये वे श्रेष्ठ
साध्य-साधन क्या है, इसका निर्णय नहीं कर पा रहे
थे॥10-11॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'साध्य-साधन'-साधनके द्वारा जो
साधित (प्राप्त) होता है, उसका नाम 'साध्य' है। जिस
उपायके अवलम्बनसे साध्यवस्तुकी प्राप्ति होती है,
उसका नाम 'साधन' है॥10॥
अनुभाष्य-(भाः 7/13/8)-
“न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान् नैवाभ्यासेद् बहून्।
न व्याख्यामुपयुञ्जीत नारम्भानारभेत् क्वचित्॥”
“अपने चरम कल्याणकी कामनावाले (भगवद्भजनके
इच्छुक) को बहुत ग्रन्थोंका कलाभ्यास और शास्त्र
व्याख्याके द्वारा जीविका उपार्जन करनेवाला नहीं बनना
चाहिये, उसे सर्वप्रथम ऐसे प्रलोभनका परित्याग करना
चाहिये।” भक्तिरसामृतसिन्धु पूर्व, द्वितीय लहरी-(भाः
11/21/34,36)-
202 | श्रीचैतन्यचरितामृत

16/11–15 ]
“एवं पुष्पिताया वाचा व्याक्षिप्तमनसां नृणाम्।
मानिनाञ्चातिलुब्धानां मद्दार्त्तापि न रोचते॥ 34 ॥
शब्दब्रह्म-सुदुर्बोधं प्राणेन्द्रियमनोमयम्।
अनन्तपारं गम्भीरं दुर्विगाह्यं समुद्रवत् ॥ 36 ॥ ”
“कर्म और ज्ञानकाण्डके पोषक शास्त्रोंको जीविका
बनानेवाले वक्ता मधुपुष्पित (मनोहर) वाक्योंके द्वारा
निष्काम-भगवद्भक्ति-विरोधी तथा मात्सर्य और [स्वर्गादि]
फलभोग-तात्पर्यमय कथा करते हैं। उनके वाक्योंको
श्रवण अथवा पाठ करके अनभिज्ञ सरलमति कोमल
श्रद्धावाले व्यक्ति जीवके नित्यसाधन और नित्यसाध्य
श्रीकृष्णभक्ति और श्रीकृष्णप्रेमकी परम महिमा तथा
सौन्दर्यको नहीं समझ पाते। जिसके फलस्वरूप वे
अनादि बहिर्मुखतासे बँधे व्यक्ति बहुत सरलतासे कर्मी
और ज्ञानीके आनुगत्यको स्वीकार कर लेते हैं। इस
प्रकार वे लोग जीवोंके निर्मत्सर परम-हितैषी शुद्ध
कृष्णभक्तोंकी कृपा प्राप्त करनेसे वञ्चित हो जाते हैं।
इसलिये ऐसे व्यक्ति भक्ति-उन्मुखी सुकृतिके अभावमें
एकमात्र नित्य कल्याणके मार्ग शुद्ध-भक्तिसे अत्यधिक
दूर जाकर अन्तमें केवल दुर्गति तथा दुर्दशाकी चरम
सीमाको प्राप्त करते हैं। जिस समय श्रीगौरसुन्दरने
वाराणसी धाममें श्रीसनातन गोस्वामी प्रभुके प्रश्नके
उत्तरमें साध्य-साधन तत्त्वको बतलाया था, उस समय
वहाँपर तपन मिश्र भी उपस्थित थे और उसे श्रवण
करके उनको निज संशयकी मीमांसा (गम्भीर आलोचना)
प्राप्त हुई थी। अनेक शास्त्रों और अनेक गुरुब्रुवोंके
(अयोग्य गुरुओंके) आनुगत्यको स्वीकार करनेवाले
अबोध जीवोंके मङ्गल हेतु महाप्रभुने अपने भक्त
तपनमिश्रके चरित्रसे (इस संशयकी मीमांसाके द्वारा)
शिक्षा प्रदानकी है॥ 11 ॥
स्वप्नमें एक ब्राह्मणके द्वारा उनको निमाइ
पण्डितसे तत्त्व जिज्ञासा करनेका उपदेश :–
स्वप्ने एक विप्र कहे,–“शुनह तपन।
निमाञिपण्डित-स्थाने करह गमन ॥ 12 ॥
तेंहो तोमार साध्य-साधन करिबे निश्चय।
साक्षात् ईश्वर तेंहो,–नाहिक संशय ॥ ” 13 ॥
अनुवाद—[एक दिन] स्वप्नमें एक ब्राह्मणने
कहा,–“तपन! सुनो, तुम निमाइ पण्डितके पास जाओ।
वे तुम्हारे लिये साध्य-साधन तत्त्वको निश्चित रूपमें
बतलायेंगे। वे साक्षात् ईश्वर हैं, इसमें कोई भी संशय
नहीं है॥” 12–13 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—शास्त्र अनेक हैं। इन-इन शास्त्रोंमें
जिसको 'साध्य' और जिसको 'साधन' कहकर निर्देश
किया गया है, वे भिन्न-भिन्न दिखायी देते हैं। बहुत
शास्त्र पढ़नेपर, कौन-सा साध्य श्रेष्ठ है और कौन-सा
साधन श्रेष्ठ है—यह स्थिर नहीं कर पानेके कारण चित्त
भ्रमित हो जाता है। तपनमिश्रके चित्तमें इस प्रकारका
भ्रम होनेपर उन्हें निमाइ-पण्डितके निकट जाकर उनसे
साध्य-साधन निश्चित कर लेनेके लिये स्वप्नमें आदेश
प्राप्त हुआ। उस स्वप्नमें यह भी कहा था कि
'निमाइ-पण्डित साक्षात् ईश्वर हैं, इस बातमें कोई
संशय नहीं करना।' ॥ 11–13 ॥
महाप्रभुको स्वप्नका वृत्तान्त सुनाना :–
स्वप्न देखि' मिश्र आसि' प्रभुर चरणे।
स्वप्नेर वृत्तान्त सब कैल निवेदने ॥ 14 ॥
अनुवाद—स्वप्न देखनेके बाद तपन मिश्रने महाप्रभुके
पास आकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया और उन्होंने
स्वप्नमें जो देखा था, उसे महाप्रभुसे कहा॥ 14 ॥
महाप्रभुका हरिनामको ही साध्य-साधनके
रूपमें बतलाना :–
प्रभु तुष्ट हञा साध्य-साधन कहिल।
'नाम-सङ्कीर्त्तन कर',–उपदेश कैल ॥ 15 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने प्रसन्न होकर उन्हें साध्य-साधन
तत्त्वके विषयमें बतलाया और उन्हें नाम-सङ्कीर्तन
करनेका उपदेश दिया॥ 15 ॥
सोलहवाँ अध्याय | 203

[ 16/15-21
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने कहा, - "अभेद ब्रह्मज्ञान
और स्वर्गादि भुक्ति - ये जीवके लिये साध्यवस्तु नहीं हैं;
श्रीकृष्णप्रेम ही जीवके लिये एकमात्र साध्यवस्तु है।
कर्म और ज्ञान, - ये उक्त साध्यवस्तुके प्राप्तिके साधन
अथवा उपाय नहीं हैं। शुद्ध श्रीकृष्णनामाश्रय ग्रहण
करके भक्ति ही साध्यवस्तु प्राप्त करनेका एकमात्र
उपाय है॥" 15 ॥
उनको काशी जानेका आदेश :-
ताँर इच्छा, - "प्रभुसङ्गे नवद्वीपे बसि'।"
प्रभु आज्ञा दिल, - "तुमि याओ वाराणसी ॥ 16 ॥
ताँहा आमा-सङ्गे तोमार हवे दरशन।"
आज्ञा पाञा मिश्र कैल काशीते गमन ॥ 17 ॥
भविष्यमें काशीमें महाप्रभु-सेवाका सौभाग्य और
श्रीसनातनके प्रश्नोंसे महाप्रभुके श्रीमुखसे साध्य-साधन-
तत्त्वकी पूर्ण मीमांसा श्रवण करनेका सौभाग्य :-
प्रभुर अनन्त-लीला बुझिते ना पारि।
स्वसङ्ग छाड़ाञा केने पाठान काशीपुरी ॥ 18 ॥
अनुवाद-तब तपन मिश्रने इच्छा प्रकाश की, - "मैं
आपके साथ नवद्वीपमें वास करना चाहता हूँ।" परन्तु
महाप्रभुने उन्हें आज्ञा दी, - "तुम वाराणसी जाओ।
वहींपर ही तुम्हें मेरे दर्शन होंगे।" महाप्रभुकी आज्ञा
पाकर तपन मिश्रने काशीके लिये प्रस्थान किया।
महाप्रभुकी लीलाएँ अनन्त हैं, उन्हें कौन समझ सकता
है? अपना सङ्ग छुड़ाकर उन्हें काशी नगरीमें क्यों भेज
दिया ? ॥ 16-18 ॥
पूर्वी बंगालके सभी निवासियोंका मङ्गल :-
एइ मत बङ्गेर लोकेर कैल सबार हित।
'नाम' दिया भक्त कैल, पड़ाञा पण्डित ॥ 19 ॥
अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुने पूर्वबङ्गालके लोगोंको
'नाम' प्रदान करके श्रीकृष्णभक्त और शास्त्र-विद्या
दानकर उन्हें पण्डित बनाकर उनका कल्याण किया॥ 19॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'नाम दिया' अर्थात् "हरे कृष्ण
हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम
राम हरे हरे॥" - इस कृष्णनामको प्रदानकर बङ्गवासियोंको
भक्त बनाया और शास्त्र पढ़ाकर अनेक लोगोंको
पण्डित बना दिया ॥ 19 ॥
एइ मत बङ्गे प्रभु करे नाना लीला।
एथा नवद्वीपे लक्ष्मी विरहे दुःखी हैला ॥ 20 ॥
महाप्रभुके विच्छेदरूपी कालसर्पके
डँसनेसे लक्ष्मीदेवी अप्रकट :-
प्रभुर विरह-सर्प लक्ष्मीरें दंशिल।
विरह-सर्प-विषे ताँर परलोक हैल ॥ 21 ॥
अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु जब पूर्व बङ्गालमें
अनेक लीलाएँ कर रहे थे, तब इधर नवद्वीपमें
श्रीलक्ष्मीप्रिया देवी उनके विरहमें अत्यन्त दुःखी हो रही
थीं। महाप्रभुके विरहरूपी सर्पने श्रीलक्ष्मीप्रिया देवीको
डँस लिया। विरहरूपी सर्पके विषसे वे परलोक सिधार
गयीं ॥ 20-21 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुके विच्छेदके क्लेशने
सर्पका रूप धारणकर लक्ष्मीप्रिया देवीको डँस लिया
और उन्होंने परलोक अर्थात् सर्वश्रेष्ठ लोकरूप अपने
वैकुण्ठधाममें गमन किया ॥ 21 ॥
अमृतानुकणिका-चैःभाः आदिखण्ड चौदह अध्यायमें
इसका वर्णन इस प्रकार है-
“एथा नवद्वीपे लक्ष्मी प्रभुर विरहे।
अन्तरे दुःखिता देवी कारे नाहि कहे ॥ 99 ॥
निरवधि करे देवी आडर सेवन।
प्रभु गियाछेन हैते नाहिक भोजन ॥ 100 ॥
नामे से अन्नमात्र परिग्रह करे।
ईश्वर-विच्छेदे बड़ दुःखिता अन्तरे ॥ 101 ॥
एकेश्वर सर्वरात्रि करेन क्रन्दन।
चित्ते स्वास्थ्य लक्ष्मी ना पायेन कोन क्षण ॥ 102 ॥
ईश्वर-विच्छेदे लक्ष्मी ना पारे सहिते।
इच्छा करिलेन प्रभुर समीपे याइते ॥ 103 ॥
निज-प्रतिकृति-देह थुइ' पृथिवीते।
चलिलेन प्रभु-पाशे अति अलक्षिते ॥ 104 ॥
204 | श्रीचैतन्यचरितामृत

16/21-25 ]
प्रभु-पादपद्म लक्ष्मी धरिया हृदय।
ध्याने गङ्गातीरे देवी करिला विजय॥105॥"
“महाप्रभुकी विरहमें लक्ष्मी देवी अत्यन्त दुःखी थीं,
परन्तु यह बात वे किसीसे नहीं कहती थीं। वे निरन्तर
शचीमाताकी सेवा करती थीं, परन्तु महाप्रभुकी विरहमें
उन्होंने भोजन करना छोड़ दिया था, वे नाम मात्रको
अन्न ग्रहण करती थीं। महाप्रभुकी विरहमें हृदयमें बड़ी
दुःखी थीं और अकेले रात्रि भर रोती रहती थीं, उनके
चित्तको क्षण भर भी सुख नहीं मिलता था। वे
महाप्रभुके विरहको सहन नहीं कर पा रही थीं और
उनके पास जानेकी इच्छा करने लगीं, इसलिये अपनी
छाया-देहको पृथ्वीपर छोड़कर वे अलक्षित रूपसे
महाप्रभुके पास चली गयीं। लक्ष्मीदेवीने महाप्रभुके
चरणोंको अपने हृदयमें धारण करते हुए गङ्गाके तटपर
स्वधामकी ओर विजय (यात्रा) की॥” 21॥
अन्तर्यामी महाप्रभुका स्वदेश लौटना :-
अन्तरे जानिला प्रभु, याते अन्तर्यामी।
देशेर आइला प्रभु शची-दुःख जानि'॥22॥
अनुवाद-महाप्रभु अन्तर्यामी हैं, इसलिये वे सब
कुछ जान गये और शचीमाताके दुःखको समझकर वे
नवद्वीप लौट आये॥22॥
महाप्रभुके मुखसे तत्त्वज्ञान-श्रवण करके
शचीमाताका दुःख कम होना :-
घरे आइला प्रभु बहु लञा धन-जन।
तत्त्व कहि' कैल शचीर दुःख विमोचन॥23॥
अनुवाद-महाप्रभु बहुत धन और शिष्य लेकर
अपने घर लौटे। उन्होंने शचीमाताको तत्त्व सिद्धान्त
समझाकर उनके दुःखका निवारण किया॥23॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'तत्त्व कहि' के स्थानपर किसी
अन्य पाठमें 'तत्त्वजाले' देखा जाता है। “के कस्य
पति-पुत्राद्याः” अर्थात् 'कौन किसका पति, कौन किसका
पुत्र, कौन किसकी पत्नी' इस प्रकार तत्त्वज्ञानरूप
जालका विस्तार करके शचीमाताके दुःखका विमोचन
किया॥23॥
महाप्रभुका विद्या-विलास :-
शिष्यगण लञा पुनः विद्यार विलास।
विद्या-बले सबा जिनि' औद्धत्य प्रकाश॥24॥
अनुवाद-नवद्वीपमें आकर महाप्रभु पुनः शिष्योंको
विद्या अध्ययन कराने लगे। विद्याके बलपर महाप्रभु
सभीको पराजित करके अभिमानको प्रकट करने लगे॥24॥
राजपण्डित सनातनकी पुत्री श्रीविष्णुप्रियाके साथ
विवाह तथा केशव काश्मीरीकी पराजय :-
तबे विष्णुप्रिया-ठाकुराणीर परिणय।
तबे त' करिल प्रभु दिग्विजयी जय॥25॥
अनुवाद-कुछ समयके बाद उन्होंने श्रीविष्णुप्रिया
ठाकुराणीके साथ विवाह किया। इसके बाद उन्होंने
दिग्विजयीको पराजित किया॥25॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'दिग्विजयी' - काश्मीर देशके एक
'केशव-मिश्र' नामक एक पण्डित। महाप्रभुसे शिक्षित
होनेके बाद उन्होंने श्रीनिम्बादित्य सम्प्रदायमें आचार्य पद
प्राप्त किया और उन्होंने वेदान्त-पारिजातादि भाष्योंकी
टिप्पणी लिखी॥25॥
अनुभाष्य- 'दिग्विजयी'-काश्मीर देशके 'केशव' नामक
पण्डित। ये उस समय भारतवर्षके विभिन्न स्थानोंपर
अपनी प्रतिभाके द्वारा पण्डितोंको जय करनेके उद्देश्यसे
भ्रमण करते-करते अन्तमें गौड़देशमें नवद्वीपमें पधारे।
श्रीगौरसुन्दरसे पराजित होनेके बाद इन्होंने श्रीमन्महाप्रभुके
तत्त्वको जानकर भगवद्-भजनके उद्देश्यसे निम्बार्क
-सम्प्रदायमें प्रवेश किया। इन्होंने निम्बार्कके द्वारा रचित
वेदान्त-दर्शनके 'पारिजात'-भाष्यके टीकाकार श्रीनिवासाचार्यके
'वेदान्त-कौस्तुभ' टीकाकी 'कौस्तुभप्रभा' नामक टिप्पणीकी
रचना की। भक्ति-रत्नाकरकी बारहवीं
तरङ्गमें-“श्रीनिम्बादित्यकी शिष्य परम्परा-
सोलहवाँ अध्याय | 205

[ 16/25-30
(1) श्रीनिवासाचार्य, (2) विश्वाचार्य, (3) पुरुषोत्तम,
(4) विलास, (5) स्वरूप, (6) माधव, (7) बलभद्र,
(8) पद्म, (9) श्याम, (10) गोपाल, (11) कृपा,
(12) देवाचार्य, (13) सुन्दरभट्ट, (14) पद्मनाभ,
(15) उपेन्द्र, (16) रामचन्द्र, (17) वामन, (18) कृष्ण,
(19) पद्माकर, (20) श्रवण, (21) भुरि, (22) माधव,
(23) श्याम, (24) गोपाल, (25) बलभद्र,
(26) गोपीनाथ, (27) केशव, (28) गोकुल,
(29) केशव काश्मीरी।” इसी भक्तिरत्नाकरमें—
“सरस्वती-देवीरे करिया मन्त्र जप।
हैल सर्व विद्यास्फूर्ति बाड़िल प्रताप॥
सर्वदिशा जय करि' 'दिग्विजयी' ख्याति।
काश्मीर-देशस्थ अति शिष्ट विप्रजाति॥
सर्व त्याग करि' प्रभु-आज्ञाय चलिला।
॰ ॰ वर्णिलाभोग 'लघुकेशव' नामाते॥”
“सरस्वती देवीका मन्त्र जप करनेपर इनको सभी विद्याओंकी स्फूर्ति हुई और इनका प्रताप बहुत बढ़ गया। सभी दिशाओंके विद्वानोंको पराजित करनेके कारण इनकी 'दिग्विजयी' नामसे ख्याति हो गयी। ये काश्मीर-देशके बहुत कुलीन ब्राह्मण थे। महाप्रभुकी आज्ञासे ये अपना अभिमानादि सब कुछ त्यागकर चल दिये। इनकी लीला 'लघुकेशव' के नामसे वर्णनकी गयी है।” वैष्णव-मञ्जूषा (प्रथम संख्या) द्रष्टव्य है॥25॥
अमृतानुकणिका—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका (श्लोक 47-48) में—
“श्रीसनातनमिश्रोऽयं पुरा सत्राजितो नृपः।
विष्णुप्रिया जगन्माता यत् कन्या भू-स्वरूपिणी॥47॥”
“पूर्वकालके सत्राजित राजा अब श्रीसनातन मिश्र हैं तथा भू-शक्ति स्वरूपिणी जगत् माता श्रीविष्णुप्रियादेवी इन्हींकी कन्या हैं। (इसका तात्पर्य यह है कि सत्राजितकी कन्या श्रीसत्यभामा ही श्रीविष्णुप्रियादेवी हैं)।”
“उक्ता प्रसङ्गात् कलिना श्रीचैतन्यविधूदये।
“भुवोऽंशरूपामपरांश्च विष्णुप्रियेति
वित्तां परिणीय कान्ताम्।” इत्यादि॥48॥
“श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकके प्रथम अङ्कके सैंतीसवें श्लोकमें कलिने प्रसङ्गवशतः कहा है कि देवादेव श्रीशचीनन्दनने अपनी एक अन्य शक्ति भू-देवीकी अंशरूपिणी श्रीविष्णुप्रिया-देवीके साथ विवाह किया इत्यादि॥”25॥
श्रीवृन्दावनदास ठाकुरको सम्मान-प्रदान :—
वृन्दावन-दास इहा करियाछेन विस्तार।
स्फुट नाहि करे दोष-गुणेर विचार॥26॥
केशव-काश्मीरीका श्लोकके दोष-गुण विचार :—
सेइ अंश कहि, ताँरे करि' नमस्कार।
या शुनि' दिग्विजयी कैल आपना धिक्कार॥27॥
अनुवाद—श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने इस लीलाका विस्तारसे वर्णन किया है, परन्तु (दिग्विजयीके द्वारा कहे गये श्लोक) के दोष और गुणोंका स्पष्टरूपसे विचार नहीं किया। इसलिये मैं श्रीवृन्दावनदास ठाकुरको नमस्कार करके उसी अंशको कह रहा हूँ, जिसे सुनकर दिग्विजयीने अपनेको धिक्कार दिया था॥26-27॥
दिग्विजयी-पराजय-वृत्तान्त; दिग्विजयीका आगमन :—
ज्योत्स्नावती रात्रि, प्रभु शिष्यगण सङ्गे।
बसियाछेन गङ्गातीरे विद्यार प्रसङ्गे॥28॥
हेनकाले दिग्विजयी ताहाँइ आइला।
गङ्गार वन्दन करि' प्रभुरे मिलिला॥29॥
महाप्रभुका मान-प्रदान धर्म :—
बसाइला तारे प्रभु आदर करिया।
दिग्विजयी कहे मने अवज्ञा करिया॥30॥
अनुवाद—एक दिन चाँदनी रात्रिके समय महाप्रभु अपने शिष्योंको गङ्गाके तटपर बैठकर पढ़ा रहे थे। तभी दिग्विजयी वहाँपर आये और पहले गङ्गाकी वन्दना करके फिर महाप्रभुसे मिले। महाप्रभुने उन्हें आदरपूर्वक बैठाया। मन-ही-मन महाप्रभुका अनादर करते हुए दिग्विजयी कहने लगे॥28-30॥
206 | श्रीचैतन्यचरितामृत

16/31–39 ]
अभिमानके कारण दिग्विजयीके
द्वारा महाप्रभुका अनादर :—
“व्याकरण पड़ाह, निमाञि पण्डित—तोमार नाम।
बाल्यशास्त्रे लोके तोमार कहे गुणग्राम ॥31॥
अनुवाद—“मैं समझता हूँ कि तुम व्याकरण पढ़ाते
हो और तुम्हारा नाम ‘निमाइ पण्डित’ है। लोग तुम्हारे
बाल्यशास्त्र (व्याकरण) के अध्यापनकी प्रशंसा करते
हैं॥31॥
अनुभाष्य—‘बाल्यशास्त्र’—व्याकरण; क्योंकि सभी
शास्त्रोंके अध्ययनसे पहले भाषाको जाननेके लिये
व्याकरण-शास्त्रके अध्ययनका नियम ही प्रचलित है॥31॥
व्याकरण-मध्ये, जानि, पड़ाह कलाप।
शुनिलुँ फाँकिते तोमार शिष्येर संलाप ॥”32॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥32॥
अमृतप्रवाह भाष्य—तुम ‘कलाप’-नामक व्याकरण
पढ़ाते हो, ऐसा मैंने तुम्हारे शिष्योंका व्याकरणकी
फाँकिमें अर्थात् जटिल प्रश्नके विषयमें संलाप अर्थात्
विशेष प्रकारका जो आलाप होता है, वह सुना
है॥”32॥
महाप्रभुकी दैन्योक्ति और गङ्गाका
स्तव करनेके लिये अनुरोध :—
प्रभु कहे,—“व्याकरण पड़ाइ—अभिमान करि।
शिष्येते ना बुझे, आमि बुझाइते नारि॥33॥
काँहा तुमि सर्वशास्त्रे कवित्वे प्रवीण।
काहाँ आमि सबे शिशु—पड़ुआ नवीन ॥34॥
तोमार कवित्व किछु शुनिते हय मन।
कृपा करि’ कर यदि गङ्गार वर्णन ॥”35॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं तो केवल अभिमान
करता हूँ कि मैं व्याकरण पढ़ाता हूँ। किन्तु न तो मेरे
शिष्य ही मेरी बात समझते हैं और न ही मैं उनको
समझा सकता हूँ। कहाँ आप, जो सभी शास्त्रोंमें और
विशेषतः कविता रचनामें प्रवीण हैं और कहाँ हम, जो
अभी बालक और नवीन छात्र हैं। आपकी कविताको
सुननेकी मनमें उत्कण्ठा हो रही है। आपकी कृपा होगी
यदि आप गङ्गाकी महिमाका कुछ वर्णन करें॥”33-35॥
दिग्विजयीका सौ श्लोकोंके द्वारा गङ्गाका स्तव-वर्णन :—
शुनिया ब्राह्मण गर्वे वर्णिते लागिला।
घटी एके शत श्लोक गङ्गार वर्णिला ॥36॥
अनुवाद—यह सुनकर वे दिग्विजयी ब्राह्मण गर्वित
होकर गङ्गाकी महिमाका वर्णन करने लगे। एक घण्टेमें
ही उन्होंने गङ्गाका वर्णन एक सौ श्लोकोंमें किया॥36॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘घटि एके’ अर्थात् एक घण्टेके
भीतर॥36॥
महाप्रभुके द्वारा प्रशंसा और मान-प्रदान :—
शुनिया कहिल प्रभु बहुत सत्कार।
“तोमा-सम पृथिवीते कवि नाहि आर॥37॥
तोमार कविता-श्लोक बुझिते कार शक्ति।
तुमि भाल जान अर्थ किव्वा सरस्वती॥38॥
स्तवमेंसे एक श्लोककी व्याख्या करनेका अनुरोध :—
एक श्लोकेर अर्थ यदि कर निज-मुखे।
शुनि’ सब लोक तबे पाय बड़सुखे॥”39॥
अनुवाद—श्लोकोंको सुनकर महाप्रभुने उनका सम्मान
करते हुए कहा,—“पृथ्वीपर आपके समान और कोई
कवि नहीं है। आपकी कविताके श्लोकोंका अर्थ
समझनेकी शक्ति किसमें है? उनके अर्थोंको आप ही
अच्छी प्रकारसे जानते है अथवा सरस्वतीदेवी ही
जानती हैं। यदि आप एक श्लोककी व्याख्या स्वयं
अपने मुखसे कर दें, तो उसे सुनकर सब लोगोंको
बहुत आनन्द होगा॥”37-39॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘करिल सत्कार’—सम्मान किया।
‘किंवा’—अथवा॥37-38॥
सोलहवाँ अध्याय | 207

[ 16/40-46
अलौकिक श्रुतिधर महाप्रभुके द्वारा
सौ श्लोकोंमेंसे एक श्लोकका दोहराना :—
तबे दिग्विजयी व्याख्यार श्लोक पुछिल।
शत-श्लोकेर एक श्लोक प्रभु त' पड़िल ॥ ४० ॥
अनुवाद—तब दिग्विजयी पण्डितने पूछा कि किस
श्लोककी व्याख्या सुनना चाहते हो। महाप्रभुने उन सौ
श्लोकोंमेंसे एक श्लोक सुनाया ॥ ४० ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—दिग्विजयीने पूछा कि कौनसे
श्लोककी व्याख्या करनी होगी ? ॥ ४० ॥
केशव-काश्मीरीका गङ्गा-माहात्म्य-श्लोक :—
दिग्विजयि-वाक्य—
महत्त्वं गङ्गायाः सततमिदमाभाति नितरां
यदेषा श्रीविष्णोश्चरणकमलोत्पत्तिसुभगा।
द्वितीय-श्रीलक्ष्मीखिव सुरनरैरर्च्यचरणा
भवानीभर्तुर्या शिरसि विभवत्यद्भुतगुणा ॥ ४१ ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ४१ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—इन गङ्गादेवीका महत्व सर्वदा
दैदीप्यमान है, क्योंकि ये अति सौभाग्यवती हैं। ये
श्रीविष्णुके चरणकमलोंसे उत्पन्न हुई हैं और लक्ष्मीदेवीके
द्वितीय स्वरूपके समान देवताओं तथा मनुष्योंके द्वारा
इनके चरणोंकी पूजा होती है। ये अद्भुत गुणवती हैं
और भवानीके पति महादेवके मस्तकपर विराजमान
हैं ॥ ४१ ॥
अनुभाष्य—गङ्गायाः इदं महत्त्वं सतत (नित्यं) नितरां
(निःसंशयेन) आभाति (प्रकाशते); यत् (यस्मात्) एषा (गङ्गा)
श्रीविष्णोश्चरणकमलोत्पत्तिसुभगा (श्रीविष्णोश्चरणकमलयोः भगवत्पादपद्मयोः
उत्पत्तिः सृष्टिः, तया सुशोभनं भगं ऐश्वर्यं यस्याः सा) द्वितीय-श्रीलक्ष्मीखिव
(सौन्दर्यशालिनी द्वितीयकमला इव) सुरनरैः (देवमानवाद्यैः) अर्च्यचरणाः
(सेवितपदाः) भवानीभर्तुः (भवान्याः भर्त्ता स्वामी तस्य गिरिशस्य
भवस्येत्यर्थः) शिरसि (मस्तके) या (गङ्गा) विभवति; [अतः
इयम्] अद्भुतगुणा (चमत्कारगुणशालिनी)।
श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ४१ ॥
“एइ श्लोकेर अर्थ कर”—प्रभु यदि कहिल।
विस्मित हञा दिग्विजयी प्रभुके पुछिल ॥ ४२ ॥
महाप्रभुकी स्मृतिशक्तिको देखकर
दिग्विजयीका विस्मय और जिज्ञासा :—
झंझावात-प्राय आमि श्लोक पड़िल।
तार मध्ये श्लोक तुमि कैछे कण्ठे कैल ॥ ४३ ॥
अनुवाद—जब महाप्रभुने कहा,—“इस श्लोकका अर्थ
कहिये”, यह सुनकर दिग्विजयीने विस्मित होकर उनसे
पूछा—'प्रायः आँधीके समान मैंने श्लोकोंको पढ़ा था,
उनमेंसे इस श्लोकको तुमने कैसे कण्ठस्थ कर
लिया ?' ॥ ४२-४३ ॥
महाप्रभुका सविनय उत्तर :—
प्रभु कहे,—“देवेर वरे तुमि—'कविवर'।
ऐछे देवेर वरे केह हय 'श्रुतिधर' ॥” ४४ ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“देवताओंके वरसे जैसे
आप 'कवि-श्रेष्ठ' हैं, वैसे ही देवताओंके वरसे कोई
'श्रुतिधर' (सुनकर ही स्मरण कर लेने वाला) भी होता
है॥” ४४ ॥
दिग्विजयीकी व्याख्या :—
श्लोकेर अर्थ कैल विप्र पाइया सन्तोष।
प्रभु कहे,—“कह श्लोकेर किवा गुण-दोष ॥” ४५ ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी बातसे सन्तुष्ट होकर दिग्विजयी
ब्राह्मणने श्लोककी व्याख्या की। महाप्रभुने कहा,—“आप
इस श्लोकमें कौनसे गुण और दोष हैं, यह बतलाइये ॥” ४५ ॥
महाप्रभुके अनुरोधसे अपने श्लोकके निर्दोष
होनेका निर्देश और गुण-वर्णन :—
विप्र कहे,—“श्लोके नाहि दोषेर प्रकाश।
उपमालङ्कार गुण, किछु अनुप्रास ॥” ४६ ॥
अनुवाद—दिग्विजयी ब्राह्मणने कहा,—“इस श्लोकमें
कोई भी दोष नहीं है। इसमें उपमा-अलङ्कार और कुछ
208 | श्रीचैतन्यचरितामृत

16/46-54 ]
अनुप्रास (एक समान ध्वनियों, अक्षरों या वर्णोंकी
पुनरावृत्ति) हैं, जो इस श्लोकके गुण हैं॥" 46॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'उपमालङ्कार' - उपमा देकर
आलङ्कारिक गुणोंका प्रकाश करना। 'अनुप्रास' - श्लोकके
अन्तिम चरणमें अनेक बार 'भ' वर्ण और उसके
समान ध्वनिवाले वर्णोंका बहुत बार प्रयोग करके जो
शब्द-चातुर्य दिखलाया है, वह ॥ 46 ॥
महाप्रभु और कविकी उक्ति एवं प्रत्युक्ति :-
प्रभु कहेन, - "कहि, यदि ना करह रोष।
कह तोमार श्लोके किंवा आछे दोष ॥ 47 ॥
महाप्रभुके द्वारा प्रशंसा और कविताके
गुण-दोष विचारके लिये अनुरोध :-
प्रतिभार वाक्य तोमार, देवता सन्तोषे।
भालमते विचारिले जानि गुण-दोषे ॥ 48 ॥
ताते भाल करि' श्लोक करह विचार।"
कवि कहे, - "ये कहिले सेइ वेदसार ॥ 49 ॥
दिग्विजयीके द्वारा महाप्रभुको काव्यरसमें
अनभिज्ञ समझकर उपहास :-
वैयाकरण तुमि, नाहि पड़ अलङ्कार।
तुमि कि जानिबे एइ कवित्वेर सार ॥" 50 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "यदि आप बुरा न
मानें, तो आपके इस श्लोकमें क्या दोष हैं, उसे
कहूँगा। आपकी काव्यकी प्रतिभासे देवता भी आपसे
सन्तुष्ट हैं, परन्तु भली-भाँति विचार करनेपर इसके
गुण और दोष जाने जा सकते हैं। इसलिये आप
भली-भाँति इस श्लोकका विचार कीजिये।" कविने
कहा, - "मैंने जो कुछ कहा है, वही वेदोंका सार है।
तुम तो केवल व्याकरण जानते हो, तुमने अलङ्कार
नहीं पढ़ा है। तुम इस कविताके सारको कैसे समझ
सकते हो ?" ॥ 47-50 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-नये-नये प्रकारसे वाक्य-विन्यास
करनेकी जो बुद्धि-शक्ति है, उसको 'प्रतिभा' कहते हैं।
आपने इस श्लोकमें उस बुद्धिका परिचय देकर
देवताओंको भी सन्तुष्ट कर दिया है; अर्थात् इस
काव्यमें आपकी प्रचुर प्रतिभा-शक्ति है। किन्तु अच्छी
तरह विचार करनेसे इसके गुण और दोषोंको देखा जा
सकता है॥ 48 ॥
तुम वैयाकरण अथवा व्याकरणविद् अर्थात्
(केवलमात्र) बालविद्यामें विशारद हो, इसलिये अलङ्कारादि
शास्त्रका विचार करनेमें असमर्थ हो ॥ 50 ॥
महाप्रभुकी उक्ति :-
प्रभु कहेन, - "अतएव पूछिये तोमारे।
विचारिया गुण-दोष बुझाह आमारे ॥ 51 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "इसलिये तो मैं आपसे
पूछ रहा हूँ कि विचार करके श्लोकके गुण और दोष
मुझे समझायें ॥ 51 ॥
नाहि पड़ि अलङ्कार, करियाछि श्रवण।
ताते एइ श्लोके देखि बहु दोष-गुण ॥" 52 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 52 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- [यह सत्य है कि] मैंने अलङ्कार
नहीं पढ़े हैं, किन्तु पण्डितोंके मुखसे श्रवण किया है।
उसीके आधारपर इस श्लोकमें अनेक दोष-गुण देखता
हूँ॥ 52 ॥
कविके अनुरोधपर महाप्रभुके द्वारा
श्लोकके गुण-दोष विचार :-
कवि कहे, - "कह देखि, कोन् गुण-दोष।"
प्रभु कहेन, - "कहि, शुन, ना करिह रोष ॥ 53 ॥
पाँच दोष और पाँच गुण :-
पञ्च दोष एइ श्लोके पञ्च अलङ्कार।
क्रमे आमि कहि, शुन, करह विचार ॥ 54 ॥
अनुवाद-कविने कहा, - "तो कहो मैं देखूँ इसमें
कौनसे गुण और दोष हैं।" महाप्रभुने कहा, - "आप
सोरहवाँ अध्याय | 209

[ 16/53–65
क्रोध नहीं कीजियेगा, मैं जो कहने जा रहा हूँ, उसे
कृपा सुनिये। इस श्लोकमें पाँच दोष हैं और पाँच
अलङ्कार (गुण) हैं। मैं क्रमशः इनका वर्णन कर रहा
हूँ, आप सुनकर विचार कीजिये ॥ 53–54 ॥
श्लोकके पाँच दोष; प्रथम दोषकी व्याख्या :—
‘अविमृष्ट-विधेयांश’—दुइ ठाञि चिह्न।
‘विरुद्धमति’, ‘भग्नक्रम’, ‘पुनरात्त’,—दोष तिन ॥ 55 ॥
अनुवाद—‘अविमृष्ट-विधेयांश’ दोष दो स्थानोंपर है।
‘विरुद्धमति’, ‘भग्नक्रम’, ‘पुनरात्त’, ये तीन अन्य दोष
हैं ॥ 55 ॥
‘गङ्गार महत्त्व’—श्लोके मूल ‘विधेय’।
इदं-शब्दे ‘अनुवाद’—पाछे अविधेय ॥ 56 ॥
‘विधेय’ आगे कहि’ पाछे कहिला ‘अनुवाद’।
एइ लागि’ श्लोकेर अर्थ करियाछे बाध ॥ 57 ॥
अनुवाद—‘गङ्गाका महत्व’, श्लोकमें मूल ‘विधेय’ है
(क्योंकि यह अभी ज्ञात नहीं है)। ‘इदं’ अर्थात् ‘यह’
शब्द ज्ञात वस्तुका द्योतक है, इसलिये ‘अनुवाद’ है,
जिसको विधेयके बाद कहा गया है। ‘विधेय’ पहले
कहकर बादमें ‘अनुवाद’ कहा गया है, इसलिये इस
श्लोकके वास्तविक अर्थको समझनेमें बाधा होती
है ॥ 56–57 ॥
एकादशी-तत्त्वसे उद्धृत न्याय :—
अनुवादमनुक्त्वा तु न विधेयमुदीरयेत्।
न ह्यलब्धास्पदं किञ्चित् कुत्रचित् प्रतिष्ठिति ॥ 58 ॥
अनुवाद—किसी वाक्यमें अनुवाद (ज्ञात वस्तु) को
न कहकर विधेय (अज्ञात वस्तु) को पहले नहीं कहना
चाहिये, क्योंकि ऐसा करनेसे उस वाक्यका कोई आधार
नहीं होता और उसकी कहीं भी अल्प प्रतिष्ठा भी नहीं
होती ॥ 58 ॥
अनुभाष्य—चैःचः आदिलाीला 2/74 संख्या द्रष्टव्य
है ॥ 58 ॥
दूसरे दोषकी व्याख्या :—
‘द्वितीय श्रीलक्ष्मी’ इहाँ ‘द्वितीयत्व’ विधेय।
समासे गौण हैल, शब्दार्थ गेल क्षय ॥ 59 ॥
‘द्वितीय’ शब्द—विधेय, ताहा पड़िल समासे।
‘लक्ष्मीरे समता’ अर्थ करिल विनाशे ॥ 60 ॥
‘अविमृष्ट-विधेयांश’—एइ दोष नाम।
आर एक दोष आगे, शुन सावधान ॥ 61 ॥
अनुवाद—‘द्वितीय श्रीलक्ष्मी’—यहाँपर ‘द्वितीयत्व’ विधेय
है। (द्वितीय और श्रीलक्ष्मी) इन शब्दोंका समास करनेसे
इसका अर्थ गौण होनेसे प्रयोजनीय अर्थ नष्ट हो गया
है। ‘द्वितीय’ शब्द विधेय (अज्ञात) है, इसका ‘श्रीलक्ष्मी’के
साथ समास (संयुक्त शब्द) करनेसे जो ‘लक्ष्मीके समान’
अर्थ आप प्रकाश करना चाहते थे, वह अर्थ नष्ट हो
गया है। इस दोषका नाम ‘अविमृष्ट-विधेयांश’ है। आगे
और भी एक दोष है, सावधान होकर उसे सुनिये ॥ 59–61 ॥
तीसरे दोषकी व्याख्या :—
‘भवानीभर्तुः’—शब्द दिले पाइया सन्तोष।
‘विरुद्धमति’—कृत नाम एइ महादोष ॥ 62 ॥
भवानी-शब्दे कहे महादेवेर गृहिणी।
ताँर भर्त्ता कहिले द्वितीय भर्त्ता जानि ॥ 63 ॥
‘शिवपत्नीर भर्त्ता’—इहा शुनिते विरुद्ध।
‘विरुद्धमति’—शब्द शास्त्रे कभु नहे शुद्ध ॥ 64 ॥
इसका एक अन्य दृष्टान्त :—
‘ब्राह्मण-पत्नीर भर्त्ता—हस्ते देह दान’।
शब्द शुनिलेइ हय द्वितीय-भर्त्ता ज्ञान ॥ 65 ॥
अनुवाद—‘भवानीभर्तुः’ शब्दका प्रयोग करके आप
बहुत सन्तुष्ट हुए हैं, परन्तु इसमें ‘विरुद्धमति’-कृत
नामक एक महादोष है। भवानी शब्द कहनेसे महादेव
(भव) की पत्नीको समझा जाता है, उनका पति
(महादेवकी पत्नीका पति) कहनेसे ऐसा प्रतीत होता है
कि उनका कोई दूसरा पति भी है। ‘शिवकी पत्नीका
210 | श्रीचैतन्यचरितामृत

16/62-74 ]
पति', इस उक्तिको सुननेपर इसमें विरोधी अर्थका भान
होता है, इसलिये 'विरुद्धमति' शब्द शास्त्रमें कभी शुद्ध
नहीं माना गया है। 'ब्राह्मणकी पत्नीके पतिके हाथमें
दान दो', ऐसा सुननेसे ही उनका कोई दूसरा पति है,
ऐसा ज्ञान होता है॥62-65॥
चौथे दोषकी व्याख्या :-
'विभवति' क्रियार वाक्य-साङ्ग, पुनः विशेषण।
'अद्भुतगुणा'-एइ पुनराय दूषण॥66॥
पाँचवें दोषकी व्याख्या :-
तिन पादे अनुप्रास देखि अनुपम।
एक पादे नाहि, एइ दोष 'भग्नक्रम'॥67॥
पाँच दोषोंके कारण श्लोककी महिमामें हानि :-
यद्यपि एइ श्लोके आछे पञ्च अलङ्कार।
एइ पञ्चदोषे श्लोक कैल छारखार॥68॥
अनुवाद-'विभवति' क्रियापर वाक्य सम्पूर्ण होता
है, किन्तु पुनः विशेषण 'अद्भुतगुणा' का प्रयोग करना
पुनरात्त दोष है। श्लोकके तीन पादोंमें-प्रथम पादमें
'त'कार, तृतीय पादमें 'र'कार और चतुर्थ पादमें 'भ'कार,
ये अनुपम अनुप्रास देखता हूँ, किन्तु द्वितीय पादमें
अनुप्रास नहीं है, यह 'भग्नक्रम' दोष है। यद्यपि इस
श्लोकमें पाँच अलङ्कार हैं, तथापि इन पाँच दोषोंने
श्लोकको नष्ट कर दिया है॥66-68॥
दश अलङ्कारे यदि एक श्लोक हय।
एक दोषे सब अलङ्कार हय क्षय॥69॥
उपमा :-
सुन्दर शरीर यैछे भूषणे भूषित।
एक श्वेतकुष्ठे यैछे करये विगीत॥70॥
अनुवाद-एक श्लोकमें यदि दस अलङ्कार भी हों,
तो भी केवलमात्र एक दोषके कारण सभी अलङ्कार
नष्ट हो जाते हैं। भूषणोंसे भूषित सुन्दर शरीरमें जैसे
एक श्वेतकुष्ठका दाग पूरे शरीरको निन्दित कर देता
है॥70॥
अनुभाष्य-'विगीत'-निन्दित॥70॥
भरतमुनि-वाक्य :-
रसालङ्कारवत् काव्यं दोषयुक्त चेद्विभूषितम्।
स्याद्वपुः सुन्दरमपि श्वित्रेणैकेन दुर्भगम्॥71॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥71॥
अमृतप्रवाह भाष्य-विभूषित सुन्दर शरीर कुष्ठयुक्त
होनेपर जिस प्रकार निन्दनीय होता है, रसालङ्कारयुक्त
काव्य भी दोषयुक्त होनेपर वैसे ही निन्दित होता
है॥71॥
अनुभाष्य-विभूषितं (समलङ्कृतं) सुन्दरं (मनोहरम्) अपि
वपुः (शरीरं) यथा एकेन श्वित्रेण (श्वेताख्यकुष्ठरोगेण) दुर्भगं
(श्री-रहितं मलिनं) स्यात्, तथा रसालङ्कारवत् (रसः शृङ्गारादिः
अलङ्कारः अनुप्रासोपमादिः, ताभ्यां युक्तं) काव्यं (रसात्मकं वाक्यं)
चेत् (यदि) दोषयुक्तं भवति, तथा दुर्भगं (श्रीहीनं) ज्ञेयम्।
श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥71॥
श्लोकके पाँच गुण :-
पञ्च अलङ्कारेरे एबे शुनह विचार।
दुइ शब्दालङ्कार, तिन अर्थ-अलङ्कार॥72॥
अनुवाद-अब आप इन पाँच अलङ्कारोंका विचार
सुनिये, इसमें दो शब्दालङ्कार और तीन अर्थालङ्कार
हैं॥72॥
पहला और दूसरा गुण-दोनों ही शब्दालङ्कार :-
शब्दालङ्कारे-तिनपदे आछे अनुप्रास।
'श्रीलक्ष्मी'-शब्दे 'पुनरुक्तवदाभास'॥73॥
अनुवाद-तीन पदोंमें जो अनुप्रास हैं और 'श्रीलक्ष्मी'
शब्दमें जो 'पुनरुक्तवदाभास' है, ये दो शब्दालङ्कार
हैं॥73॥
प्रथम-चरणे पञ्च 'त'-कारेरे पाँति।
तृतीय-चरणे हय पञ्च 'रेफ'-स्थिति॥74॥
सोलहवाँ अध्याय | 211

[ 16/74-84
चतुर्थ-चरणे चारि 'भ'-कार-प्रकाश।
अतएव शब्दालङ्कार अनुप्रास ॥ 75 ॥
अनुवाद—प्रथम चरणमें पाँच बार 'त'-कार का, तीसरे पदमें पाँच बार 'र'-कार का और चौथे चरणमें चार बार 'भ'-कार का प्रयोग हुआ है। इसलिये यह अनुप्रास नामक शब्दालङ्कार है॥ 74-75 ॥
'श्री'-शब्दे, 'लक्ष्मी'-शब्दे—एक वस्तु उक्त।
पुनरुक्तवदाभासे, नहे पुनरुक्त ॥ 76 ॥
'श्रीयुत लक्ष्मी' अर्थे अर्थेर विभेद।
पुनरुक्तवदाभासे शब्दालङ्कार-भेद ॥ 77 ॥
अनुवाद—'श्री' और 'लक्ष्मी' शब्द एक ही वस्तुका नाम है, इससे पुनरुक्तिका आभास होता है, किन्तु यह पुनरुक्ति नहीं है। 'श्रीयुत लक्ष्मी' अर्थमें अर्थका विभेद है अर्थात् 'श्री' का अर्थ यहाँ शोभा है, इसलिये 'श्रीलक्ष्मी' का अर्थ 'शोभायुक्त लक्ष्मी' होनेसे यह पुनरुक्ति दोष नहीं है। इसी प्रकार पुनरुक्तवदाभास शब्दालङ्कारका एक भेद है॥ 76-77 ॥
तीसरा, चौथा और पाँचवाँ गुण—तीनों अर्थालङ्कार :-
'लक्ष्मीरिव' अर्थालङ्कार—उपमा-प्रकाश।
आर अर्थालङ्कार आछे, नाम—'विरोधाभास' ॥ 78 ॥
'गङ्गाते कमल जन्मे'—सबार सुबोध।
'कमले गङ्गार जन्म'—अत्यन्त विरोध ॥ 79 ॥
'इहाँ विष्णुपादपद्मे गङ्गार उत्पत्ति'।
विरोद्धालङ्कार इहार महा-चमत्कृति ॥ 80 ॥
ईश्वर-अचिन्त्यशक्त्ये गङ्गार प्रकाश।
इहाते विरोध नाहि, विरोध-आभास ॥ 81 ॥
अनुवाद—'लक्ष्मीरिव' में 'उपमा' अर्थालङ्कार है। श्लोकमें एक और अर्थालङ्कार है जिसका नाम 'विरोधाभास' है। 'गङ्गासे कमलकी उत्पत्ति' होती है, यह सभी भली-भाँति जानते हैं, किन्तु 'कमलसे गङ्गाकी उत्पत्ति' जो कहा गया है—इसमें अत्यन्त विरोध है। यहाँ श्रीविष्णुके चरणकमलोंसे गङ्गाकी उत्पत्ति कही गयी है, यह महाचमत्कारी विरोद्धालङ्कार है। ईश्वरकी अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे गङ्गाकी उत्पत्ति हुई है, इसमें कोई भी विरोध नहीं है; अपितु यह विरोधाभास अलङ्कार है॥ 78-81 ॥
श्रीकृष्णकी अचिन्त्य शक्तिका परिचय :-
श्रीभगवत्-श्रीकृष्णचैतन्यपादोक्त श्लोक—
अम्बुजमम्बुनि जातं क्वचिदपि न जातमम्बुजादम्बु।
मुरभिदि तद्विपरीतं पादाम्भोजान्महानदी जाता ॥ 82 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 82 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जलमें ही कमल उत्पन्न होता है, कमलसे कभी भी जल उत्पन्न नहीं होता। किन्तु आश्चर्यका विषय यह है कि श्रीकृष्णमें इसके विपरीत देखा जाता है, उनके श्रीचरणकमलोंसे महानदी गङ्गाका जन्म हुआ है॥ 82 ॥
अनुभाष्य—अम्बुनि (जले) अम्बुजं (पद्मं) जातम् (उत्पन्नम्); क्वचित् (कुत्र) अपि अम्बुजात् (पद्मात्) अम्बु (जलं) न जातम्; किन्तु मुरभिदि (मुरारौ कृष्णे) तद्विपरीतं (कार्य-कारण-भावयोर्वैषम्यं) दृश्यते, यतः (कृष्णपादपद्मात्) महानदी (गङ्गा) जाता (निःसृता)।
श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 82 ॥
गङ्गार महत्त्व—साध्य, साधन ताहार।
विष्णुपादोत्पत्ति—'अनुमान'—अलङ्कार ॥ 83 ॥
अनुवाद—इस श्लोकमें गङ्गाका महत्त्व वर्णन करना साध्य है और महिमाका साधन अर्थात् कारण उनका श्रीविष्णुके चरणकमलोंसे उत्पन्न होना है। यह अनुमान-अलङ्कार है॥ 83 ॥
स्थूल एइ पञ्च दोष, पञ्च अलङ्कार।
सूक्ष्म विचारिये यदि आछये अपार ॥ 84 ॥
अनुवाद—स्थूलरूपसे विचार करनेपर ये पाँच दोष
212 | श्रीचैतन्यचरितामृत