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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 744, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 744

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अलौकिक श्रुतिधर महाप्रभुके द्वारा
सौ श्लोकोंमेंसे एक श्लोकका दोहराना :—
तबे दिग्विजयी व्याख्यार श्लोक पुछिल।
शत-श्लोकेर एक श्लोक प्रभु त' पड़िल ॥ ४० ॥
अनुवाद—तब दिग्विजयी पण्डितने पूछा कि किस
श्लोककी व्याख्या सुनना चाहते हो। महाप्रभुने उन सौ
श्लोकोंमेंसे एक श्लोक सुनाया ॥ ४० ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—दिग्विजयीने पूछा कि कौनसे
श्लोककी व्याख्या करनी होगी ? ॥ ४० ॥
केशव-काश्मीरीका गङ्गा-माहात्म्य-श्लोक :—
दिग्विजयि-वाक्य—
महत्त्वं गङ्गायाः सततमिदमाभाति नितरां
यदेषा श्रीविष्णोश्चरणकमलोत्पत्तिसुभगा।
द्वितीय-श्रीलक्ष्मीखिव सुरनरैरर्च्यचरणा
भवानीभर्तुर्या शिरसि विभवत्यद्भुतगुणा ॥ ४१ ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ४१ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—इन गङ्गादेवीका महत्व सर्वदा
दैदीप्यमान है, क्योंकि ये अति सौभाग्यवती हैं। ये
श्रीविष्णुके चरणकमलोंसे उत्पन्न हुई हैं और लक्ष्मीदेवीके
द्वितीय स्वरूपके समान देवताओं तथा मनुष्योंके द्वारा
इनके चरणोंकी पूजा होती है। ये अद्भुत गुणवती हैं
और भवानीके पति महादेवके मस्तकपर विराजमान
हैं ॥ ४१ ॥
अनुभाष्य—गङ्गायाः इदं महत्त्वं सतत (नित्यं) नितरां
(निःसंशयेन) आभाति (प्रकाशते); यत् (यस्मात्) एषा (गङ्गा)
श्रीविष्णोश्चरणकमलोत्पत्तिसुभगा (श्रीविष्णोश्चरणकमलयोः भगवत्पादपद्मयोः
उत्पत्तिः सृष्टिः, तया सुशोभनं भगं ऐश्वर्यं यस्याः सा) द्वितीय-श्रीलक्ष्मीखिव
(सौन्दर्यशालिनी द्वितीयकमला इव) सुरनरैः (देवमानवाद्यैः) अर्च्यचरणाः
(सेवितपदाः) भवानीभर्तुः (भवान्याः भर्त्ता स्वामी तस्य गिरिशस्य
भवस्येत्यर्थः) शिरसि (मस्तके) या (गङ्गा) विभवति; [अतः
इयम्] अद्भुतगुणा (चमत्कारगुणशालिनी)।
श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ४१ ॥
“एइ श्लोकेर अर्थ कर”—प्रभु यदि कहिल।
विस्मित हञा दिग्विजयी प्रभुके पुछिल ॥ ४२ ॥
महाप्रभुकी स्मृतिशक्तिको देखकर
दिग्विजयीका विस्मय और जिज्ञासा :—
झंझावात-प्राय आमि श्लोक पड़िल।
तार मध्ये श्लोक तुमि कैछे कण्ठे कैल ॥ ४३ ॥
अनुवाद—जब महाप्रभुने कहा,—“इस श्लोकका अर्थ
कहिये”, यह सुनकर दिग्विजयीने विस्मित होकर उनसे
पूछा—'प्रायः आँधीके समान मैंने श्लोकोंको पढ़ा था,
उनमेंसे इस श्लोकको तुमने कैसे कण्ठस्थ कर
लिया ?' ॥ ४२-४३ ॥
महाप्रभुका सविनय उत्तर :—
प्रभु कहे,—“देवेर वरे तुमि—'कविवर'।
ऐछे देवेर वरे केह हय 'श्रुतिधर' ॥” ४४ ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“देवताओंके वरसे जैसे
आप 'कवि-श्रेष्ठ' हैं, वैसे ही देवताओंके वरसे कोई
'श्रुतिधर' (सुनकर ही स्मरण कर लेने वाला) भी होता
है॥” ४४ ॥
दिग्विजयीकी व्याख्या :—
श्लोकेर अर्थ कैल विप्र पाइया सन्तोष।
प्रभु कहे,—“कह श्लोकेर किवा गुण-दोष ॥” ४५ ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी बातसे सन्तुष्ट होकर दिग्विजयी
ब्राह्मणने श्लोककी व्याख्या की। महाप्रभुने कहा,—“आप
इस श्लोकमें कौनसे गुण और दोष हैं, यह बतलाइये ॥” ४५ ॥
महाप्रभुके अनुरोधसे अपने श्लोकके निर्दोष
होनेका निर्देश और गुण-वर्णन :—
विप्र कहे,—“श्लोके नाहि दोषेर प्रकाश।
उपमालङ्कार गुण, किछु अनुप्रास ॥” ४६ ॥
अनुवाद—दिग्विजयी ब्राह्मणने कहा,—“इस श्लोकमें
कोई भी दोष नहीं है। इसमें उपमा-अलङ्कार और कुछ
208 | श्रीचैतन्यचरितामृत