श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 743, कुल 2549 में से
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अभिमानके कारण दिग्विजयीके
द्वारा महाप्रभुका अनादर :—
“व्याकरण पड़ाह, निमाञि पण्डित—तोमार नाम।
बाल्यशास्त्रे लोके तोमार कहे गुणग्राम ॥31॥
अनुवाद—“मैं समझता हूँ कि तुम व्याकरण पढ़ाते
हो और तुम्हारा नाम ‘निमाइ पण्डित’ है। लोग तुम्हारे
बाल्यशास्त्र (व्याकरण) के अध्यापनकी प्रशंसा करते
हैं॥31॥
अनुभाष्य—‘बाल्यशास्त्र’—व्याकरण; क्योंकि सभी
शास्त्रोंके अध्ययनसे पहले भाषाको जाननेके लिये
व्याकरण-शास्त्रके अध्ययनका नियम ही प्रचलित है॥31॥
व्याकरण-मध्ये, जानि, पड़ाह कलाप।
शुनिलुँ फाँकिते तोमार शिष्येर संलाप ॥”32॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥32॥
अमृतप्रवाह भाष्य—तुम ‘कलाप’-नामक व्याकरण
पढ़ाते हो, ऐसा मैंने तुम्हारे शिष्योंका व्याकरणकी
फाँकिमें अर्थात् जटिल प्रश्नके विषयमें संलाप अर्थात्
विशेष प्रकारका जो आलाप होता है, वह सुना
है॥”32॥
महाप्रभुकी दैन्योक्ति और गङ्गाका
स्तव करनेके लिये अनुरोध :—
प्रभु कहे,—“व्याकरण पड़ाइ—अभिमान करि।
शिष्येते ना बुझे, आमि बुझाइते नारि॥33॥
काँहा तुमि सर्वशास्त्रे कवित्वे प्रवीण।
काहाँ आमि सबे शिशु—पड़ुआ नवीन ॥34॥
तोमार कवित्व किछु शुनिते हय मन।
कृपा करि’ कर यदि गङ्गार वर्णन ॥”35॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं तो केवल अभिमान
करता हूँ कि मैं व्याकरण पढ़ाता हूँ। किन्तु न तो मेरे
शिष्य ही मेरी बात समझते हैं और न ही मैं उनको
समझा सकता हूँ। कहाँ आप, जो सभी शास्त्रोंमें और
विशेषतः कविता रचनामें प्रवीण हैं और कहाँ हम, जो
अभी बालक और नवीन छात्र हैं। आपकी कविताको
सुननेकी मनमें उत्कण्ठा हो रही है। आपकी कृपा होगी
यदि आप गङ्गाकी महिमाका कुछ वर्णन करें॥”33-35॥
दिग्विजयीका सौ श्लोकोंके द्वारा गङ्गाका स्तव-वर्णन :—
शुनिया ब्राह्मण गर्वे वर्णिते लागिला।
घटी एके शत श्लोक गङ्गार वर्णिला ॥36॥
अनुवाद—यह सुनकर वे दिग्विजयी ब्राह्मण गर्वित
होकर गङ्गाकी महिमाका वर्णन करने लगे। एक घण्टेमें
ही उन्होंने गङ्गाका वर्णन एक सौ श्लोकोंमें किया॥36॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘घटि एके’ अर्थात् एक घण्टेके
भीतर॥36॥
महाप्रभुके द्वारा प्रशंसा और मान-प्रदान :—
शुनिया कहिल प्रभु बहुत सत्कार।
“तोमा-सम पृथिवीते कवि नाहि आर॥37॥
तोमार कविता-श्लोक बुझिते कार शक्ति।
तुमि भाल जान अर्थ किव्वा सरस्वती॥38॥
स्तवमेंसे एक श्लोककी व्याख्या करनेका अनुरोध :—
एक श्लोकेर अर्थ यदि कर निज-मुखे।
शुनि’ सब लोक तबे पाय बड़सुखे॥”39॥
अनुवाद—श्लोकोंको सुनकर महाप्रभुने उनका सम्मान
करते हुए कहा,—“पृथ्वीपर आपके समान और कोई
कवि नहीं है। आपकी कविताके श्लोकोंका अर्थ
समझनेकी शक्ति किसमें है? उनके अर्थोंको आप ही
अच्छी प्रकारसे जानते है अथवा सरस्वतीदेवी ही
जानती हैं। यदि आप एक श्लोककी व्याख्या स्वयं
अपने मुखसे कर दें, तो उसे सुनकर सब लोगोंको
बहुत आनन्द होगा॥”37-39॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘करिल सत्कार’—सम्मान किया।
‘किंवा’—अथवा॥37-38॥
सोलहवाँ अध्याय | 207