श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 745, कुल 2549 में से
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अनुप्रास (एक समान ध्वनियों, अक्षरों या वर्णोंकी
पुनरावृत्ति) हैं, जो इस श्लोकके गुण हैं॥" 46॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'उपमालङ्कार' - उपमा देकर
आलङ्कारिक गुणोंका प्रकाश करना। 'अनुप्रास' - श्लोकके
अन्तिम चरणमें अनेक बार 'भ' वर्ण और उसके
समान ध्वनिवाले वर्णोंका बहुत बार प्रयोग करके जो
शब्द-चातुर्य दिखलाया है, वह ॥ 46 ॥
महाप्रभु और कविकी उक्ति एवं प्रत्युक्ति :-
प्रभु कहेन, - "कहि, यदि ना करह रोष।
कह तोमार श्लोके किंवा आछे दोष ॥ 47 ॥
महाप्रभुके द्वारा प्रशंसा और कविताके
गुण-दोष विचारके लिये अनुरोध :-
प्रतिभार वाक्य तोमार, देवता सन्तोषे।
भालमते विचारिले जानि गुण-दोषे ॥ 48 ॥
ताते भाल करि' श्लोक करह विचार।"
कवि कहे, - "ये कहिले सेइ वेदसार ॥ 49 ॥
दिग्विजयीके द्वारा महाप्रभुको काव्यरसमें
अनभिज्ञ समझकर उपहास :-
वैयाकरण तुमि, नाहि पड़ अलङ्कार।
तुमि कि जानिबे एइ कवित्वेर सार ॥" 50 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "यदि आप बुरा न
मानें, तो आपके इस श्लोकमें क्या दोष हैं, उसे
कहूँगा। आपकी काव्यकी प्रतिभासे देवता भी आपसे
सन्तुष्ट हैं, परन्तु भली-भाँति विचार करनेपर इसके
गुण और दोष जाने जा सकते हैं। इसलिये आप
भली-भाँति इस श्लोकका विचार कीजिये।" कविने
कहा, - "मैंने जो कुछ कहा है, वही वेदोंका सार है।
तुम तो केवल व्याकरण जानते हो, तुमने अलङ्कार
नहीं पढ़ा है। तुम इस कविताके सारको कैसे समझ
सकते हो ?" ॥ 47-50 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-नये-नये प्रकारसे वाक्य-विन्यास
करनेकी जो बुद्धि-शक्ति है, उसको 'प्रतिभा' कहते हैं।
आपने इस श्लोकमें उस बुद्धिका परिचय देकर
देवताओंको भी सन्तुष्ट कर दिया है; अर्थात् इस
काव्यमें आपकी प्रचुर प्रतिभा-शक्ति है। किन्तु अच्छी
तरह विचार करनेसे इसके गुण और दोषोंको देखा जा
सकता है॥ 48 ॥
तुम वैयाकरण अथवा व्याकरणविद् अर्थात्
(केवलमात्र) बालविद्यामें विशारद हो, इसलिये अलङ्कारादि
शास्त्रका विचार करनेमें असमर्थ हो ॥ 50 ॥
महाप्रभुकी उक्ति :-
प्रभु कहेन, - "अतएव पूछिये तोमारे।
विचारिया गुण-दोष बुझाह आमारे ॥ 51 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "इसलिये तो मैं आपसे
पूछ रहा हूँ कि विचार करके श्लोकके गुण और दोष
मुझे समझायें ॥ 51 ॥
नाहि पड़ि अलङ्कार, करियाछि श्रवण।
ताते एइ श्लोके देखि बहु दोष-गुण ॥" 52 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 52 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- [यह सत्य है कि] मैंने अलङ्कार
नहीं पढ़े हैं, किन्तु पण्डितोंके मुखसे श्रवण किया है।
उसीके आधारपर इस श्लोकमें अनेक दोष-गुण देखता
हूँ॥ 52 ॥
कविके अनुरोधपर महाप्रभुके द्वारा
श्लोकके गुण-दोष विचार :-
कवि कहे, - "कह देखि, कोन् गुण-दोष।"
प्रभु कहेन, - "कहि, शुन, ना करिह रोष ॥ 53 ॥
पाँच दोष और पाँच गुण :-
पञ्च दोष एइ श्लोके पञ्च अलङ्कार।
क्रमे आमि कहि, शुन, करह विचार ॥ 54 ॥
अनुवाद-कविने कहा, - "तो कहो मैं देखूँ इसमें
कौनसे गुण और दोष हैं।" महाप्रभुने कहा, - "आप
सोरहवाँ अध्याय | 209