श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 746, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 16/53–65
क्रोध नहीं कीजियेगा, मैं जो कहने जा रहा हूँ, उसे
कृपा सुनिये। इस श्लोकमें पाँच दोष हैं और पाँच
अलङ्कार (गुण) हैं। मैं क्रमशः इनका वर्णन कर रहा
हूँ, आप सुनकर विचार कीजिये ॥ 53–54 ॥
श्लोकके पाँच दोष; प्रथम दोषकी व्याख्या :—
‘अविमृष्ट-विधेयांश’—दुइ ठाञि चिह्न।
‘विरुद्धमति’, ‘भग्नक्रम’, ‘पुनरात्त’,—दोष तिन ॥ 55 ॥
अनुवाद—‘अविमृष्ट-विधेयांश’ दोष दो स्थानोंपर है।
‘विरुद्धमति’, ‘भग्नक्रम’, ‘पुनरात्त’, ये तीन अन्य दोष
हैं ॥ 55 ॥
‘गङ्गार महत्त्व’—श्लोके मूल ‘विधेय’।
इदं-शब्दे ‘अनुवाद’—पाछे अविधेय ॥ 56 ॥
‘विधेय’ आगे कहि’ पाछे कहिला ‘अनुवाद’।
एइ लागि’ श्लोकेर अर्थ करियाछे बाध ॥ 57 ॥
अनुवाद—‘गङ्गाका महत्व’, श्लोकमें मूल ‘विधेय’ है
(क्योंकि यह अभी ज्ञात नहीं है)। ‘इदं’ अर्थात् ‘यह’
शब्द ज्ञात वस्तुका द्योतक है, इसलिये ‘अनुवाद’ है,
जिसको विधेयके बाद कहा गया है। ‘विधेय’ पहले
कहकर बादमें ‘अनुवाद’ कहा गया है, इसलिये इस
श्लोकके वास्तविक अर्थको समझनेमें बाधा होती
है ॥ 56–57 ॥
एकादशी-तत्त्वसे उद्धृत न्याय :—
अनुवादमनुक्त्वा तु न विधेयमुदीरयेत्।
न ह्यलब्धास्पदं किञ्चित् कुत्रचित् प्रतिष्ठिति ॥ 58 ॥
अनुवाद—किसी वाक्यमें अनुवाद (ज्ञात वस्तु) को
न कहकर विधेय (अज्ञात वस्तु) को पहले नहीं कहना
चाहिये, क्योंकि ऐसा करनेसे उस वाक्यका कोई आधार
नहीं होता और उसकी कहीं भी अल्प प्रतिष्ठा भी नहीं
होती ॥ 58 ॥
अनुभाष्य—चैःचः आदिलाीला 2/74 संख्या द्रष्टव्य
है ॥ 58 ॥
दूसरे दोषकी व्याख्या :—
‘द्वितीय श्रीलक्ष्मी’ इहाँ ‘द्वितीयत्व’ विधेय।
समासे गौण हैल, शब्दार्थ गेल क्षय ॥ 59 ॥
‘द्वितीय’ शब्द—विधेय, ताहा पड़िल समासे।
‘लक्ष्मीरे समता’ अर्थ करिल विनाशे ॥ 60 ॥
‘अविमृष्ट-विधेयांश’—एइ दोष नाम।
आर एक दोष आगे, शुन सावधान ॥ 61 ॥
अनुवाद—‘द्वितीय श्रीलक्ष्मी’—यहाँपर ‘द्वितीयत्व’ विधेय
है। (द्वितीय और श्रीलक्ष्मी) इन शब्दोंका समास करनेसे
इसका अर्थ गौण होनेसे प्रयोजनीय अर्थ नष्ट हो गया
है। ‘द्वितीय’ शब्द विधेय (अज्ञात) है, इसका ‘श्रीलक्ष्मी’के
साथ समास (संयुक्त शब्द) करनेसे जो ‘लक्ष्मीके समान’
अर्थ आप प्रकाश करना चाहते थे, वह अर्थ नष्ट हो
गया है। इस दोषका नाम ‘अविमृष्ट-विधेयांश’ है। आगे
और भी एक दोष है, सावधान होकर उसे सुनिये ॥ 59–61 ॥
तीसरे दोषकी व्याख्या :—
‘भवानीभर्तुः’—शब्द दिले पाइया सन्तोष।
‘विरुद्धमति’—कृत नाम एइ महादोष ॥ 62 ॥
भवानी-शब्दे कहे महादेवेर गृहिणी।
ताँर भर्त्ता कहिले द्वितीय भर्त्ता जानि ॥ 63 ॥
‘शिवपत्नीर भर्त्ता’—इहा शुनिते विरुद्ध।
‘विरुद्धमति’—शब्द शास्त्रे कभु नहे शुद्ध ॥ 64 ॥
इसका एक अन्य दृष्टान्त :—
‘ब्राह्मण-पत्नीर भर्त्ता—हस्ते देह दान’।
शब्द शुनिलेइ हय द्वितीय-भर्त्ता ज्ञान ॥ 65 ॥
अनुवाद—‘भवानीभर्तुः’ शब्दका प्रयोग करके आप
बहुत सन्तुष्ट हुए हैं, परन्तु इसमें ‘विरुद्धमति’-कृत
नामक एक महादोष है। भवानी शब्द कहनेसे महादेव
(भव) की पत्नीको समझा जाता है, उनका पति
(महादेवकी पत्नीका पति) कहनेसे ऐसा प्रतीत होता है
कि उनका कोई दूसरा पति भी है। ‘शिवकी पत्नीका
210 | श्रीचैतन्यचरितामृत