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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 742, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 742

[ 16/25-30
(1) श्रीनिवासाचार्य, (2) विश्वाचार्य, (3) पुरुषोत्तम,
(4) विलास, (5) स्वरूप, (6) माधव, (7) बलभद्र,
(8) पद्म, (9) श्याम, (10) गोपाल, (11) कृपा,
(12) देवाचार्य, (13) सुन्दरभट्ट, (14) पद्मनाभ,
(15) उपेन्द्र, (16) रामचन्द्र, (17) वामन, (18) कृष्ण,
(19) पद्माकर, (20) श्रवण, (21) भुरि, (22) माधव,
(23) श्याम, (24) गोपाल, (25) बलभद्र,
(26) गोपीनाथ, (27) केशव, (28) गोकुल,
(29) केशव काश्मीरी।” इसी भक्तिरत्नाकरमें—
“सरस्वती-देवीरे करिया मन्त्र जप।
हैल सर्व विद्यास्फूर्ति बाड़िल प्रताप॥
सर्वदिशा जय करि' 'दिग्विजयी' ख्याति।
काश्मीर-देशस्थ अति शिष्ट विप्रजाति॥
सर्व त्याग करि' प्रभु-आज्ञाय चलिला।
॰ ॰ वर्णिलाभोग 'लघुकेशव' नामाते॥”
“सरस्वती देवीका मन्त्र जप करनेपर इनको सभी विद्याओंकी स्फूर्ति हुई और इनका प्रताप बहुत बढ़ गया। सभी दिशाओंके विद्वानोंको पराजित करनेके कारण इनकी 'दिग्विजयी' नामसे ख्याति हो गयी। ये काश्मीर-देशके बहुत कुलीन ब्राह्मण थे। महाप्रभुकी आज्ञासे ये अपना अभिमानादि सब कुछ त्यागकर चल दिये। इनकी लीला 'लघुकेशव' के नामसे वर्णनकी गयी है।” वैष्णव-मञ्जूषा (प्रथम संख्या) द्रष्टव्य है॥25॥
अमृतानुकणिका—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका (श्लोक 47-48) में—
“श्रीसनातनमिश्रोऽयं पुरा सत्राजितो नृपः।
विष्णुप्रिया जगन्माता यत् कन्या भू-स्वरूपिणी॥47॥”
“पूर्वकालके सत्राजित राजा अब श्रीसनातन मिश्र हैं तथा भू-शक्ति स्वरूपिणी जगत् माता श्रीविष्णुप्रियादेवी इन्हींकी कन्या हैं। (इसका तात्पर्य यह है कि सत्राजितकी कन्या श्रीसत्यभामा ही श्रीविष्णुप्रियादेवी हैं)।”
“उक्ता प्रसङ्गात् कलिना श्रीचैतन्यविधूदये।
“भुवोऽंशरूपामपरांश्च विष्णुप्रियेति
वित्तां परिणीय कान्ताम्।” इत्यादि॥48॥
“श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकके प्रथम अङ्कके सैंतीसवें श्लोकमें कलिने प्रसङ्गवशतः कहा है कि देवादेव श्रीशचीनन्दनने अपनी एक अन्य शक्ति भू-देवीकी अंशरूपिणी श्रीविष्णुप्रिया-देवीके साथ विवाह किया इत्यादि॥”25॥
श्रीवृन्दावनदास ठाकुरको सम्मान-प्रदान :—
वृन्दावन-दास इहा करियाछेन विस्तार।
स्फुट नाहि करे दोष-गुणेर विचार॥26॥
केशव-काश्मीरीका श्लोकके दोष-गुण विचार :—
सेइ अंश कहि, ताँरे करि' नमस्कार।
या शुनि' दिग्विजयी कैल आपना धिक्कार॥27॥
अनुवाद—श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने इस लीलाका विस्तारसे वर्णन किया है, परन्तु (दिग्विजयीके द्वारा कहे गये श्लोक) के दोष और गुणोंका स्पष्टरूपसे विचार नहीं किया। इसलिये मैं श्रीवृन्दावनदास ठाकुरको नमस्कार करके उसी अंशको कह रहा हूँ, जिसे सुनकर दिग्विजयीने अपनेको धिक्कार दिया था॥26-27॥
दिग्विजयी-पराजय-वृत्तान्त; दिग्विजयीका आगमन :—
ज्योत्स्नावती रात्रि, प्रभु शिष्यगण सङ्गे।
बसियाछेन गङ्गातीरे विद्यार प्रसङ्गे॥28॥
हेनकाले दिग्विजयी ताहाँइ आइला।
गङ्गार वन्दन करि' प्रभुरे मिलिला॥29॥
महाप्रभुका मान-प्रदान धर्म :—
बसाइला तारे प्रभु आदर करिया।
दिग्विजयी कहे मने अवज्ञा करिया॥30॥
अनुवाद—एक दिन चाँदनी रात्रिके समय महाप्रभु अपने शिष्योंको गङ्गाके तटपर बैठकर पढ़ा रहे थे। तभी दिग्विजयी वहाँपर आये और पहले गङ्गाकी वन्दना करके फिर महाप्रभुसे मिले। महाप्रभुने उन्हें आदरपूर्वक बैठाया। मन-ही-मन महाप्रभुका अनादर करते हुए दिग्विजयी कहने लगे॥28-30॥
206 | श्रीचैतन्यचरितामृत

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