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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 730, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 730

[ 15/11-22
अनुवाद—जगन्नाथ मिश्र विश्वरूपके यौवनकालमें
प्रवेशको देखकर उनके विवाहके लिये किसी योग्य
कन्याका हाथ माँगनेका मनमें विचार करने लगे॥ 11॥
विश्वरूपके द्वारा संन्यास ग्रहण :-
विश्वरूप शुनि' घर छाड़ि' पलाइला।
संन्यास करिया तीर्थ करिवारे गेला॥ 12 ॥
अनुवाद—ऐसा सुनकर विश्वरूप घर छोड़कर भाग
गये। वे संन्यास लेकर तीर्थयात्रापर निकल पड़े॥ 12॥
शची और मिश्रका दुःख और
महाप्रभुके द्वारा उन्हें सान्त्वना :-
शुनि' शची-मिश्रेर दुःखी हैल मन।
तबे प्रभु माता-पितार कैल आश्वासन ॥ 13 ॥
श्रीकृष्णका भजन करनेके लिये सन्तानके
संन्याससे माता-पिताके कुलोंका उद्धार :-
“भाल हैल,—विश्वरूप संन्यास करिल।
पितृकुल, मातृकुल,—दुइ उद्धारिल ॥ 14 ॥
महाप्रभुके आश्वासनसे माता-पिताका सन्तोष :-
आमि त' करिब तोमा' दुँहार सेवन।”
शुनिया सन्तुष्ट हैल पिता-मातार मन ॥ 15 ॥
अनुवाद—ऐसा सुनकर शचीमाता और जगन्नाथ
मिश्रके मनमें बहुत दुःख हुआ। तब महाप्रभुने माता-पिताको
आश्वासन देते हुए कहा,—“अच्छा ही हुआ जो
[भगवद्भजनके लिये] विश्वरूपने संन्यास ग्रहण कर
लिया है। इसके द्वारा वे पितृकुल और मातृकुल,
दोनोंका ही उद्धार करेंगे। मैं तो आपके साथ रहकर
आप दोनोंकी सेवा करूँगा।” महाप्रभुके ऐसे मधुर
वचनोंको सुनकर पिता-माताका मन सन्तुष्ट हो
गया॥ 13-15 ॥
महाप्रभुकी मूर्च्छा :-
एकदिन नैवेद्य-ताम्बुल खाइया।
भूमिते पड़िला प्रभु अचेतन हञा ॥ 16 ॥
अनुवाद—एक दिन महाप्रभुने भगवान्‌को निवेदित
किये गये पानको खाया और वे साथ-ही-साथ मूर्च्छित
होकर भूमिपर गिर पड़े॥ 16॥
विश्वरूपके साथ साक्षात्कार और महाप्रभुके
संन्यासके सम्बन्धमें दोनोंके बीच वार्तालाप :-
आस्ते-व्यस्ते पिता-माता मुखे दिल पानि।
सुस्थ हञा कहे प्रभु अपूर्व काहिनी ॥ 17 ॥
“एथा हैते विश्वरूप मोरे लञा गेला।
‘संन्यास करह तुमि’, आमारे कहिला ॥ 18 ॥
आमि कहि,—‘आमार अनाथ पिता-माता।
आमि बालक,—संन्यासेर किबा जानि कथा ॥ 19 ॥
गृहस्थ हइया करि पितृ-मातृ-सेवन।
इहाते सन्तुष्ट हबेन लक्ष्मी-नारायण ॥' 20 ॥
तबे विश्वरूप इहाँ पाठाइल मोरे।
माताके कहिओ कोटि कोटि नमस्कारे ॥” 21 ॥
अनुवाद—शीघ्रतासे माता-पिताने महाप्रभुके मुखमें
जल दिया, जिससे वे स्वस्थ हो गये। तब उन्होंने एक
अपूर्व बात कही,—‘विश्वरूप आकर मुझे यहाँसे ले
गये और मुझसे कहा—‘तुम भी संन्यास ग्रहण करो।'
मैंने उनसे कहा,—‘यदि मैं भी संन्यास लूँगा, तो हमारे
माता-पिता निराश्रय हो जायेंगे। मैं तो अभी बालक हूँ,
मैं संन्यासके विषयमें क्या जानता हूँ? मैं गृहस्थ होकर
अपने माता-पिताकी सेवा करूँगा जिससे लक्ष्मी-नारायण
मेरे प्रति सन्तुष्ट होवेंगे।' मेरी बात सुनकर तब
विश्वरूपने मुझे पुनः यहाँ भेज दिया और कहा कि
माताको मेरी ओरसे कोटि-कोटि नमस्कार
कहना ॥” 17-21 ॥
एइ मत नाना लीला करे गौरहरि।
कि-कारणे लीला,—इहा बुझिते ना पारि ॥ 22 ॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीगौरहरि नाना प्रकारकी
194 | श्रीचैतन्यचरितामृत