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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

10/113-115 ]
जब ये गङ्गामें स्नान करने गये, तो इनके चरणोंको
बहती हुई एक मृत देहने स्पर्श किया। इन्होंने उसे पुनः
जीवन प्रदानकर उसे अपना शिष्य बनाया। उनके
शिष्य 'ठाकुर मुरारि' के नामसे प्रसिद्ध हुए और उनकी
वंश-परम्परा अब भी 'शर्'-नामक ग्राममें वास करती
है। श्रीशार्ङ्गके नामके साथ मुरारिकी कथा जुड़नेके
कारण 'शार्ङ्ग-मुरारि' के नामसे प्रसिद्धि अभी तक भी
सुनी जाती है।
आज भी शार्ङ्गठाकुरकी एक प्राचीन सेवा मामगाछि
ग्राममें है। बादमें श्रीठाकुरके एक और मन्दिरका प्राचीन
बकुल वृक्षके सामने निर्माण किया गया है।
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 172वाँ श्लोक)—
“व्रजे नान्दीमुखी यासीत् साद्य सारङ्गठक्कुरः।
प्रह्लादो मन्यते कैश्चिन्मत्पिता स न मन्यते॥ 172॥”
“व्रजकी नान्दीमुखी अब सारङ्ग ठाकुर हैं। कोई-कोई
महात्मा इन्हें प्रह्लाद कहते हैं, किन्तु मेरे पिता (श्रीशिवानन्द
सेन) ने इसे स्वीकार नहीं किया।”
'जगन्नाथ तीर्थ'—चैःचः आदिलीला 9/14 (अनुभाष्य)
द्रष्टव्य है।
'वाणीनाथ'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 195 और 204
श्लोक)—
“वाणीनाथद्विजश्चम्पहट्टवासी प्रभोः प्रियः ॥ 204 ॥”
“चम्पाहट्ट निवासी द्विज वाणीनाथ महाप्रभुके अत्यन्त
प्रिय हैं। व्रजलीलामें ये कामलेखा हैं।” चम्पाहट्ट या
चाँपाहार्टि-वर्धमान जिलामें समुद्रगढ़के अन्तर्गत एक
छोटासा ग्राम है। इस प्राचीन श्रीपाटकी सेवामें अनियन्त्रित
व्यवस्था और अवहेलना देखकर बङ्गाब्द 1328 में
श्रीपरमानन्द ब्रह्मचारी (श्रीभक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरके
शिष्य) और चैतन्य मठके सेवकोंने उसका संस्कारकर
वहाँ एक नये मन्दिरका निर्माण करवाया। अब वहाँ
श्रीवाणीनाथके द्वारा प्रतिष्ठित नयनाभिराम श्रीगौर-गदाधरके
विग्रहोंकी शास्त्रविधिके अनुसार अर्चा-पूजा हो रही
है ॥ 113-114 ॥
(81) गोविन्द, (82) माधव, (83) वासुदेव :—
गोविन्द, माधव, वासुदेव-तिन भाइ।
याँ-सबार कीर्त्तने नाचे चैतन्य-निताइ ॥ 115 ॥
अनुवाद—गोविन्द, माधव और वासुदेव-ये तीन
भाई वृक्षकी एक और शाखा थे। इनके कीर्त्तनमें
महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु नृत्य करते थे॥115॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'गोविन्द'—अग्रद्वीपमें श्रीगोपीनाथके
स्थापक ॥ 115 ॥
अनुभाष्य—'गोविन्द, माधव और वासुदेव घोष'—इन
तीनों भाइयोंका जन्म उत्तर-राढ़ीय कायस्थकुलमें हुआ
था। (चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय)—
“सुकृति माधवघोष कीर्त्तने तत्पर।
हेन कीर्त्तनीया नाहि पृथिवी-भितर ॥ 257 ॥
याहारे कहेन वृन्दावनर गायन।
नित्यानन्दस्वरूपेर महाप्रियतम ॥ 258 ॥
माधव, गोविन्द, वासुदेव-तिन भाइ।
गाइते लागिला, नाचे ईश्वर निताई ॥ 259 ॥”
“सुकृतिवान् माधव घोष कीर्त्तन करनेमें तत्पर हो
गये। पृथ्वीपर उनके समान कीर्त्तनीया और कोई नहीं
था। उन्हें वृन्दावनके वैभवका गायक कहा जाता था
और वे श्रीनित्यानन्द प्रभुके अतिशय प्रिय थे। जब ये
तीनों भाई मिलकर गान करते थे, तो महाप्रभु और
श्रीनित्यानन्द प्रभु भावावेशमें नृत्य करते थे।”
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 188वाँ श्लोक)—
“कलावती', 'रसोल्लासा', 'गुणतुङ्गा' व्रजे स्थिता।
श्रीविशाखाकृतं गीतं गायन्ति स्माद्य ता मताः।
गोविन्द-माधवानन्द-वासुदेवा यथाक्रमम् ॥ 188 ॥”
“कलावती, रसोल्लासा और गुणतुङ्गा नामक जो
सखियाँ व्रजमें विशाखा सखीके द्वारा रचित गीतोंको
गाया करती थीं, अब वे यथाक्रमसे गोविन्द, माधवानन्द
और वासुदेव हैं।” श्रीक्षेत्रमें रथको ले जाते समय
महाप्रभुके साथ सात कीर्त्तन सम्प्रदायोंमेंसे एक सम्प्रदायमें
ये तीनों भाई मूल गायक थे और उन्हें साक्षात्
दसवौँ अध्याय | 81

[ 10/115-120

श्रीवक्रेश्वर पण्डित प्रधान नर्तक रूपमें प्राप्त हुए थे (चैःचः मध्यलीला, 13/42-43 संख्या द्रष्टव्य है) ॥115॥

(84) अभिराम ठाकुर :-
रामदास अभिराम—सख्य-प्रेमराशि।
षोलसाङ्गेर काष्ठ तुलि' ये करिल वाँशी॥116॥

अनुवाद—रामदास अभिराम सख्यप्रेममें सदा डूबे रहते थे। ये सोलह साङ्गकी* लकड़ीको अकेले ही उठाकर (वंशीके जैसे) धारण कर लेते थे। ॥116॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'अभिराम'—खानाकुल-कृष्णनगर-वासी॥116॥

श्रीनिताइके साथ अभिराम, माधव और वासुघोषका गौड़में नामप्रचार और महाप्रभुके साथ गोविन्दका वास :-
प्रभुर आज्ञाय नित्यानन्द गौड़े चलिला।
ताँर सङ्गे तिनजन प्रभु-आज्ञाय आइला॥117॥
श्रीरामदास, माधव, आर वासुदेव घोष।
प्रभु-सङ्गे रहे गोविन्द पाइया सन्तोष॥118॥

अनुवाद—महाप्रभुकी आज्ञा पाकर श्रीनित्यानन्द प्रभु जब प्रचारके लिये गौड़देश चले, तो उनके साथ रामदास, माधव और वासुदेव घोष—ये तीन भक्त थे। परन्तु गोविन्द महाप्रभुके साथ ही जगन्नाथपुरीमें बड़े आनन्दके साथ रहे॥117-118॥

अनुभाष्य—चैःचः मध्यलीला, 15/42-43 संख्या द्रष्टव्य है। 'रामदास'—चैःचः आदिलीला 11/13-16 और मध्य 15/42-43 संख्या द्रष्टव्य है॥117-118॥


*कोई भारी वस्तु उठानेके लिये उसे एक मजबूत लकड़ीके बीचमें बाँधकर दो व्यक्ति दोनों ओरसे उसे उठाते हैं, उस लकड़ीको साङ्ग कहते हैं। इसलिये सोलह साङ्गकी लकड़ीको उठानेके लिये बत्तीस लोग चाहिये।


(76), (41), (39क), (85) माधवाचार्य,
(86) कमलाकान्त (87) यदुनन्दन :-
भागवताचार्य, चिरञ्जीव, श्रीरघुनन्दन।
श्रीमाधवाचार्य, कमलाकान्त, श्रीयदुनन्दन॥119॥

अनुवाद—भागवताचार्य, चिरञ्जीव, श्रीरघुनन्दन, श्रीमाधवाचार्य, कमलाकान्त और श्रीयदुनन्दन, महाप्रभुकी अन्य शाखाएँ हैं॥119॥

अनुभाष्य— 'माधवाचार्य'—ये ब्रजकी माधवी हैं (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 169वाँ श्लोक)। ये श्रीनित्यानन्द-शाखामें हैं और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी पुत्री श्रीमती गङ्गादेवीके पति हैं। इन्होंने श्रीनित्यानन्द प्रभुके गण पुरुषोत्तम (नागर) से दीक्षा ग्रहणकी थी। ऐसा कहा जाता है कि गङ्गादेवीके विवाहके समय श्रीनित्यानन्द प्रभुने माधवको पाँजिनगर दानमें दिया था। इनका श्रीपाट जीराट्में है। चैःचः आदिलीला 11/38 संख्या द्रष्टव्य है।

'कमलाकान्त'—ये अद्वैताचार्यके जन कमलाकान्त विश्वास हैं।

'यदुनन्दनाचार्य'—ये श्रीअद्वैतशाखामें हैं (चैःचः अन्त्यलीला, 6/160-169 संख्या द्रष्टव्य है॥119॥

(88) जगाइ और (89) माधाइ :-
महाकृपापात्र प्रभुर जगाइ, माधाइ।
'पतितपावन' नामेर साक्षी दुइ भाइ॥120॥

अनुवाद—जगाइ और माधाइ, महाप्रभुकी महाकृपाके पात्र थे। इन दोनों भाइयोंने इस बातके साक्षी होकर प्रमाणित किया कि महाप्रभुका 'पतितपावन' नाम यथार्थ है॥120॥

अनुभाष्य—'जगाइ और माधाइ'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 115वाँ श्लोक)—
“वैकुण्ठे द्वारपालौ यौ जयाद्यविजययान्तकौ।
तावद्य जातौ स्वेच्छात्तः श्रीजगन्नाथ-माधवौ॥115॥"
“वैकुण्ठके द्वारपाल जय और विजय स्वेच्छापूर्वक


82 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/120-127 ]
अब श्रीजगन्नाथ (जगाइ) और माधव (मधाइ) के रूपमें
अवतीर्ण हुए हैं।” ये दोनों नवद्वीपमें ब्राह्मण परिवारमें
जन्म ग्रहणकर भी चोरी-डकैती और अन्य सभी
प्रकारके पापकर्मोंमें लिप्त थे। किन्तु बादमें श्रीमन्महाप्रभु
और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपासे हरिनाम प्राप्तकर दोनों
'महाभागवत' बन गये। मधाइका वंश आज भी विद्यमान
है और वे सब कुलीन ब्राह्मण हैं। आकाइहाट जानेके
मार्गमें कटोआसे एक मील दक्षिणकी ओर 'घोषहाट'
अथवा माधाइतला-गाँवमें जगाइ और मधाइका समाज
है। सुना जाता है कि श्रीगोपीचरणदास बाबाजीने लगभग
300 वर्ष पहले इसका उद्धार करके श्रीनिताइ-गौरके
श्रीविग्रहकी प्रतिष्ठाकी थी॥120॥
असंख्य गौड़ीयभक्तोंमें उल्लिखित कुछेक वैष्णवगण :-
गौड़देश-भक्तेर कैल संक्षेप कथन।
अनन्त चैतन्यभक्त ना याय गणन॥121॥
अनुवाद—महाप्रभुके गौड़देशके भक्तोंका मैंने यहाँ
संक्षेपमें वर्णन किया है। श्रीचैतन्यमहाप्रभुके भक्त अनन्त
हैं, जिनकी गणना करना सम्भव नहीं है॥121॥
गौड़ और उड़ीसा, दोनों स्थानोंपर इनकी गौरसेवा :-
नीलाचले इसब भक्त प्रभुसङ्गे।
दुइ स्थाने प्रभु-सेवा कैल नानारङ्गे॥122॥
अनुवाद—मैंने जिन भक्तोंका वर्णन किया है, वे
सब महाप्रभुके पास नीलाचल आते थे। उन्होंने गौड़देश
और नीलाचल, इन दोनों स्थानोंमें महाप्रभुकी अनेक
प्रकारसे सेवा की थी॥122॥
केवल नीलाचलमें मिले सेवकोंका उल्लेख :-
केवल नीलाचले प्रभुर ये ये भक्तगण।
संक्षेपे करिये किछु से-सब कथन॥123॥
अनुवाद—केवल नीलाचलमें महाप्रभुके जो-जो भक्त
थे, उनका संक्षेपमें मैं कुछ वर्णन करूँगा॥123॥
नीलाचले प्रभुसङ्गे सब भक्तगण।
सबार अध्यक्ष—प्रभुर मर्म दुइजन॥124॥
सर्वप्रधान—(1) श्रीपरमानन्द और (2) श्रीस्वरूप :-
परमानन्दपुरी, आर स्वरूप दामोदर।
गदाधर, जगदानन्द, शङ्कर, वक्रेश्वर॥125॥
दामोदर पण्डित, ठाकुर हरिदास।
रघुनाथ वैद्य, आर रघुनाथदास॥126॥
इत्यादिक पूर्वसङ्गी बड़ भक्तगण।
नीलाचले रहि' प्रभुर करेन सेवन॥127॥
अनुवाद—नीलाचलमें महाप्रभुके सङ्ग जो भक्त थे,
उनमें दो प्रधान—परमानन्दपुरी और स्वरूप दामोदर
महाप्रभुके मर्मको जाननेवाले थे। श्रीगदाधर पण्डित,
जगदानन्द पण्डित, शङ्कर, वक्रेश्वर, दामोदर पण्डित,
हरिदास ठाकुर, रघुनाथ वैद्य तथा रघुनाथदास गोस्वामी
आदि बड़े भक्त महाप्रभुके पूर्व सङ्गी थे। उन्होंने
नीलाचलमें रहकर महाप्रभुकी सेवा की॥124-127॥
अनुभाष्य—'रघुनाथ वैद्य'—(चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ
अध्याय)—
“रघुनाथ वैद्य आइलेन ततक्षणे।
परमवैष्णव, अन्त नाहि याँर गुणे॥97॥”
“जब महाप्रभु पाणिहाटीमें थे, तब उनके दर्शनके
लिये रघुनाथ वैद्य तुरन्त वहाँ आये। वे परम वैष्णव
हैं और उनमें अनन्त गुण हैं।”
श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ गौड़देश आते हुए उनके
सहगामी भक्तोंका व्रजभाव—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ
अध्याय)—
“रघुनाथ वैद्य उपाध्याय महामति।
हइलेन मूर्त्तिमति ये हेन रेवती॥239॥”
“श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ गौड़देश आते समय
मार्गमें साथ चलते हुए रघुनाथ वैद्य मूर्तिमति रेवती जैसे
हो गये।”
दसवाँ अध्याय | 83

[ 10/126-130


[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

“रघुनाथ वैद्य उपाध्याय महामति।
याँर दृष्टिपाते कृष्णे हय रति मति॥ 726॥”
“उन्हें देखने मात्रसे ही देखनेवालेका चित्त श्रीकृष्णमें
लग जाता था।” चैःचः आदिलीला, 11/22 संख्या
द्रष्टव्य है। ये पुरीमें समुद्र तटपर रहते थे और इन्होंने
वहाँके ‘स्थान-निरूपण’ नामक ग्रन्थकी रचना की
थी॥ 126॥

आर यत भक्तगण गौड़देशवासी।
प्रत्यब्दे प्रभुरे देखे नीलाचले आसि’॥ 128॥

**अनुवाद—**और जितने भी गौड़देशके भक्त, जिनका
नाम पहले उल्लेख किया है, वे प्रतिवर्ष महाप्रभुसे
मिलने नीलाचल आते थे॥ 128॥

नीलाचले प्रभुसह प्रथम मिलन।
सेइ भक्तगणेर एबे करिये गणन॥ 129॥

**अनुवाद—**नीलाचलमें महाप्रभुसे जिनका प्रथम मिलन
हुआ था, उन भक्तोंकी गणना अब मैं करूँगा॥ 129॥

(3) सार्वभौम शाखा, (4) गोपीनाथाचार्य :—
बड़शाखा एक,—सार्वभौम भट्टाचार्य।
ताँर भगनीपति श्रीगोपीनाथाचार्य॥ 130॥

**अनुवाद—**सार्वभौम भट्टाचार्य एक बड़ी शाखा हैं,
श्रीगोपीनाथाचार्य उनके बहनोई हैं॥ 130॥

अनुभाष्य—‘सार्वभौम भट्टाचार्य’—इनका नाम पहले
वासुदेव भट्टाचार्य था। ये वर्तमान नवद्वीप अथवा
चाँपाहाटीसे दो मील दूर ‘विद्यानगर’ नामक पल्लीके
प्रसिद्ध महेश्वर विशारदके पुत्र थे। कहा जाता है कि
ये उस समय भारतके सर्वप्रधान नैयायिक थे। इन्होंने
मिथिलाके सुविख्यात न्याय-विद्यालयके प्रधान अध्यापक
पक्षधर मिश्रसे समस्त न्यायशास्त्रको कण्ठस्थ करके
नवद्वीपमें न्यायविद्यालयकी स्थापना करके वहाँ
अध्यापन कार्य आरम्भ किया। न्याय-शास्त्रके इतिहासमें
इन्होंने नये युगका आरम्भ किया। तबसे नवद्वीप


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

मिथिलाको गौरवहीन करके आज भी समस्त भारतमें
सर्वप्रधान न्याय-विद्यापीठके रूपमें परिचित है।
किसी-किसीके मतानुसार ‘दीधिति’ ग्रन्थोंके रचयिता
सुविख्यात नैयायिक रघुनाथ शिरोमणि इनके ही छात्र
हैं। जैसा भी हो, (सार्वभौम) न्याय और वेदान्तशास्त्रके
प्रकाण्ड पण्डित थे। वे गृहस्थाश्रममें रहकर भी क्षेत्र-संन्यास
ग्रहणकर नीलाचलमें वेदान्त पढ़ाया करते थे। इन्होंने
श्रीमन्महाप्रभुको शाङ्कर-भाष्यानुमोदित वेदान्त सुनाया।
बादमें महाप्रभुसे श्रवण करके ये वेदान्तके वास्तविक
अर्थसे अवगत हुए। इन्होंने महाप्रभुकी षड्भुज-मूर्तिका
दर्शन किया। इनके द्वारा रचित ‘चैतन्यशतक’ में
गौरभक्ति प्रकटित है; विशेषतः “वैराग्यविद्यानिजभक्ति
योग’ दो श्लोक सार्वभौमके पाण्डित्यकी सीमा है।
महाप्रभुका सार्वभौमके साथ मिलन और इनके साथ
विचार और उद्धारके वृत्तान्तके लिये मध्यलीलाका छठा
अध्याय द्रष्टव्य है। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 119वाँ
श्लोक)—
“भट्टाचार्यः सार्वभौमः पुरासीद्गीष्पतिर्दिवि॥ 119॥”
“देवलोकके बृहस्पति अब सार्वभौम भट्टाचार्य हैं।”
‘गोपीनाथ आचार्य’—ये नवद्वीपवासी और महाप्रभुके
सङ्गी ब्राह्मण हैं। ये सार्वभौम भट्टाचार्यके बहनोई हैं।
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 178वाँ श्लोक)—
“पुरा प्राणसखी यासीन्नाम्ना रत्नावली व्रजे।
गोपीनाथाख्यकाचार्यो निर्मलत्वेन विश्रुतः॥ 178॥”
“पहले जो व्रजमें रत्नावली नामक प्राणसखी थीं,
वे ही अब श्रीगोपीनाथाचार्यके नामसे विख्यात हैं।”
किसी-किसी के मतानुसार, ये ब्रह्मा हैं।
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 75वाँ श्लोक)—
“गोपीनाथाचार्यनाम्ना ब्रह्मा ज्ञेयो जगत्पतिः।
नवव्यूहे तु गणितो यस्तन्त्रे तन्त्रवेदिभिः॥ 75॥”
“तन्त्रवादी लोग जिनकी तन्त्रमें वर्णित नवव्यूहके
अन्तर्गत गणना करते हैं, उन्हीं जगत्पति ब्रह्माको
श्रीगोपीनाथाचार्य जानना होगा॥” 130॥


84 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/131-134 ]
(5) काशीमिश्र, (6) प्रद्युम्नमिश्र, (7) राय भवानन्द :-
काशीमिश्र, प्रद्युम्नमिश्र, राय भवानन्द।
याँहार मिलने प्रभु पाइला आनन्द ॥ 131 ॥
आलिङ्गन करि' ताँरे बलिल वचन।
तुमि पाण्डु, पञ्चपाण्डव—तोमार नन्दन ॥ 132 ॥
अनुवाद-काशीमिश्र, प्रद्युम्नमिश्र और राय भवानन्द,
जिन्हें मिलकर महाप्रभुको आनन्द हुआ। राय भवानन्दका
आलिङ्गन करके महाप्रभुने कहा कि तुम पाण्डु हो
और तुम्हारे पुत्र पाँच पाण्डव हैं॥ 131-132 ॥
अनुभाष्य-‘काशीमिश्र’-राजपुरोहित थे। नीलाचलमें
श्रीमन्महाप्रभु इनके घरमें ही रहे थे। बादमें यह स्थान
श्रीवक्रेश्वर पण्डितको मिला। उनके शिष्य श्रीगोपालगुरु
गोस्वामीके समयमें वहाँपर 'श्रीराधाकान्त' विग्रहकी स्थापना
हुई थी। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 193वाँ श्लोक)—
“मथुरायां पुरा यासीत् सैरन्ध्री कृष्णवल्लभा।
साद्य नीलाचलावासः काशीमिश्रः प्रभोः प्रियः ॥ 193 ॥”
“पहले मथुरामें जो श्रीकृष्णकी प्रिया सैरन्ध्री
(कुब्जा) थीं, वे ही अब महाप्रभुके प्रियपात्र नीलाचलवासी
काशी मिश्र हैं।”
'प्रद्युम्न मिश्र'-उड़ीसाके निवासी थे। (चैःभाः
अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)-
“श्रीप्रद्युम्न मिश्र कृष्णसुखेर सागर।
आत्मपद याँरे दिला श्रीगौरसुन्दर ॥ 211 ॥”
“श्रीकृष्णप्रेमके सागर श्रीप्रद्युम्न मिश्र, जिन्हें
श्रीगौरसुन्दरने आत्म-पद प्रदान किया।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड,
आठवाँ अध्याय)-
“श्रीप्रद्युम्नमिश्र प्रेमभक्तिर प्रधान ॥ 57 ॥”
“प्रेमभक्तिके प्रधान श्रीप्रद्युम्न मिश्र।” (चैःचः मध्य,
10/43)-
“प्रद्युम्नमिश्र इहँ वैष्णव-प्रधान।
जगन्नाथेर 'महासोयार' इहँ 'दास' नाम ॥ 43 ॥”
“प्रद्युम्नमिश्र वैष्णवोंमें प्रधान हैं। वे भगवान् श्रीजगन्नाथके
प्रधान रसोइया हैं। दास इनका नाम है॥”
अशौक्र-ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न महाभागवत श्रीराय
रामानन्दके निकट शौक्र-ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न प्रद्युम्नमिश्रको
हरिकथा-श्रवणरूप शिष्यत्व प्रदानकर महाप्रभुकी कृपाका
प्रसङ्ग-चैःचः अन्त्यलीला, पाँचवाँ अध्याय द्रष्टव्य है।
'भवानन्द राय' - श्रीरामानन्द रायके पिता। पुरीसे
पश्चिमकी ओर छह कोसकी दूरीपर ब्रह्मगिरी अथवा
आलालनाथके निकट इनका वास स्थान था। ये जातिसे
शौक्र-करण थे। इनके पाँच पुत्रोंके सम्बन्धमें 133
संख्या द्रष्टव्य है। ये पहले 'पाण्डुराज' के रूपमें
परिचित थे॥ 131 ॥
(8) श्रीराय-रामानन्दादि पाँच भाई :-
रामानन्द राय, पट्टनायक गोपीनाथ।
कलानिधि, सुधानिधि, नायक वाणीनाथ ॥ 133 ॥
एइ पञ्चपुत्र तोमार—मोर प्रियपात्र।
रामानन्द-सह मोर देह-भेद मात्र ॥ 134 ॥
अनुवाद-यद्यपि तुम्हारे ये पाँचों पुत्र रामानन्द राय,
गोपीनाथ पट्टनायक, कलानिधि, सुधानिधि और नायक
वाणीनाथ, मेरे प्रिय पात्र हैं, किन्तु रामानन्द मेरा ही
स्वरूप है, उसके साथ मेरा केवल देह मात्रका भेद
है॥ 133-134 ॥
अनुभाष्य-‘रामानन्द राय'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
120-124वें श्लोक)—
“प्रियनर्मसखः कश्चिदर्जुनः पाण्डवोऽर्जुनः।
मिलित्वा समभूद्रामानन्दरायः प्रभोः प्रियः ॥ 120 ॥
अतो राधाकृष्णभक्तिप्रेमतत्त्वादिकं कृती।
रामानन्दो गौरचन्द्रं प्रत्यवर्णयदन्वहम् ॥ 121 ॥
ललितेत्याहुरेके यत्तदेकेनानुमन्यते।
भवानन्दं प्रति प्राह गौरो यत्त्वं पृथापतिः ॥ 122 ॥
गोप्योऽर्जुनीयया सार्द्धमेकीभूयापि पाण्डवः।
अर्जुनो यद्रायरामानन्द इत्याहुरुत्तमाः ॥ 123 ॥
अर्जुनीयाभवत्तूष्णीमर्जुनोऽपि च पाण्डवः।
इति पाद्मोत्तरे खण्डे व्यक्तमेव विराजते।
तस्मादेतत्त्रयं रामानन्दराय-महाशयः ॥ 124 ॥”
दसवाँ अध्याय | 85

[ 10/134

“श्रीकृष्णके प्रियनर्म सखा श्रीअर्जुन और पाण्डव-अर्जुन
मिलकर श्रीगौरप्रिय श्रीरामानन्द राय हुए हैं। इसलिये
रामानन्द प्रतिदिन ही श्रीगौरचन्द्रको राधाकृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व,
प्रेमतत्त्व आदि वर्णन करते थे। कोई उन्हें श्रीललिता
भी कहते हैं, किन्तु अधिकांश महात्मा इस बातको
स्वीकार नहीं करते हैं, क्योंकि श्रीगौरसुन्दरने भवानन्दको
कहा है कि आप कुन्तीपति राजा पाण्डु हैं। विज्ञजन
कहते हैं कि अर्जुनीया नामकी गोपी और पाण्डुपुत्र
अर्जुन एक होकर श्रीरायरामानन्द हुए हैं। पाद्मोत्तर-खण्डमें
कहा गया है कि अर्जुनीया ही अर्जुन हुई थी। इसलिये
श्रीललितादेवी (अथवा प्रियनर्मसखा अर्जुन?), श्रीमती
अर्जुनीया और पाण्डव-अर्जुन, ये तीनोंका मिलित रूप
श्रीरायरामानन्द हैं।”
किसी-किसीके मतमें ये विशाखादेवी हैं (चैःचः
मध्यलीला, नौवाँ और अन्त्य, पाँचवाँ अध्याय द्रष्टव्य
है)। अन्तरङ्ग भक्तोंके बीच इनका बहुत ऊँचा स्थान
है। महाप्रभुका कथन है—
“आमि त' संन्यासी, आपना विरक्त करि' मानि।
दर्शन दूरे, प्रकृतिर नाम यदि शुनि ॥
तबहिँ विकार पाय मोर तनु मन।
प्रकृति-दर्शने स्थिर हय कोन् जन॥
निर्विकार देह-मन काष्ठ-पाषाण सम।
आश्चर्य तरुणी-स्पर्शे निर्विकार मन ॥
एक रामानन्देर हय एइ अधिकार।
ताते जानि, - अप्राकृत देह ताँहार ॥
ताँहार मनेर भाव तिनिइ जाने मात्र।
ताहा जानिवारे आर द्वितीय नाहि पात्र ॥
गृहस्थ हञा नहे राय षड्वर्गेर वशे।
विषयी हञा संन्यासीरे उपदेशे ॥”
“मैं तो संन्यासी हूँ और अपनेको विरक्त मानता
हूँ। परन्तु दर्शन तो दूरकी बात है, स्त्रीका नाम भी
यदि मैं सुनता हूँ, तो मेरे तन-मनमें विकार आ जाता
है। स्त्रीका दर्शन करके कौन स्थिर रह सकता है?
किसका तन और मन काष्ठ-पत्थरके सामान निर्विकार
रह सकता है? यह बहुत आश्चर्यकी बात है कि
तरुणीके स्पर्शसे भी मन निर्विकार रहे। एक रामानन्दका
ही ऐसा अधिकार है। इसलिये यह समझना चाहिये कि
उनकी देह अप्राकृत है। उनके मनके भावोंको केवल
वे ही जान सकते हैं, उनको जाननेवाला कोई दूसरा
नहीं है। गृहस्थ होकर भी राय षड्वर्ग (काम, क्रोध,
मोह, लोभ, मद और मात्सर्य) के वशमें नहीं हैं। बाह्य
दृष्टिसे विषयी दिखनेपर भी वे इतने विरक्त हैं कि वे
विषयोंको त्याग किये हुए निर्गुण संन्यासीको भी जड़
विषयोंका त्यागकर श्रीकृष्णविषयके अनुशीलनमें प्रवृत्त
करानेमें समर्थ हैं।”
श्रीस्वरूप और इनके साथ महाप्रभु शेषलीलामें
निरन्तर श्रीकृष्णविरहिणी राधाके महाभाव-वैचित्र्यका
आस्वादन करते थे (चैःचः मध्यलीला, 2/77संख्या);
इनके शुद्धसख्यके द्वारा महाप्रभु वशीभूत थे (चैःचः
मध्यलीला, 2/78 संख्या)। सार्वभौम भट्टाचार्यका कथन—
“रामानन्द राय आछे गोदावरी तीरे।
अधिकारी हयेन तँहो विद्यानगरे॥
पृथिवीते रसिक भक्त नाहि ताँर सम।
पाण्डित्य आर भक्तिरस, दुँहेर तँहो सीमा ॥”
“रामानन्द राय गोदावरी तटपर विद्यानगरके अधिकारी
हैं। पृथ्वीपर उनके समान और कोई रसिक भक्त नहीं
है। वे पाण्डित्य और भक्तिरसकी सीमा हैं।”
श्रीरामरायके साथ महाप्रभुका मिलन और रायके
मुखसे साध्य-साधन तत्त्वका श्रवण, महाप्रभुका
रसराज-महाभाव-रूपका प्रदर्शन, महाप्रभुकी उक्ति—
“आमि एक बातुल, तुमि द्वितीय बातुल।
अतएव तोमाय आमाय हइ समतुल॥”
“मैं एक पागल हूँ और तुम दूसरे पागल हो।
इसलिये तुम और मैं एक समान हैं।”
रामरायको राजकार्य त्यागकर श्रीक्षेत्र जानेकी आज्ञा
(चैःचः मध्यलीला, आठवाँ अध्याय); महाप्रभुका दक्षिण
भारतमें प्रचारसे लौटनेके बाद रामरायके साथ पुनः
मिलन और उनका महाप्रभुको नीलाचल जानेका आग्रह

86 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/134-135 ]
(चैःचः मध्यलीला, 9/319-335 संख्या), बादमें नीलाचलमें
महाप्रभुके साथ मिलन (चैःचः मध्यलीला, 11/15
संख्या); राजा प्रतापरुद्रको महाप्रभुकी कृपा दिलवानेका
रायका यत्न (चैःचः मध्यलीला, 12/41-57 संख्या),
रथयात्राके दिन कीर्तनके अन्तमें सार्वभौमके साथ
जलकेलि (चैःचः मध्यलीला, 14/82 संख्या); महाप्रभुको
वृन्दावन जाने देनेकी अनिच्छा (चैःचः मध्यलीला,
16/10, 85 संख्या), अन्तमें महाप्रभुके अनुरोधसे बाध्य
होकर उनका अनुमोदन और कटक राजाके साथ
महाप्रभुका मिलन (चैःचः मध्यलीला, 16/105 संख्या);
रेमुणासे रायकी महाप्रभुको विदायी देना (चैःचः मध्यलीला,
16/153 संख्या); वृन्दावन नहीं जाकर महाप्रभुका गौड़देशसे
नीलाचल लौटनेपर रायके साथ मिलन (चैःचः मध्यलीला,
16/254 संख्या); श्रीरूपके साथ रसालोचना और श्रीरूपके
कवित्वकी प्रशंसा (चैःचः अन्त्यलीला, 1/115-196
संख्या); रामराय और श्रीसनातनमें वैराग्यकी समता
(चैःचः अन्त्यलीला, 1/201 संख्या); श्रीराधाकृष्ण-प्रेमरसपात्र
साढ़े तीन जनोंमें एक (चैःचः अन्त्यलीला, 2/106
संख्या); सनातन गोस्वामीके साथ मिलन (चैःचः
अन्त्यलीला, 4/110 संख्या); महाप्रभुके द्वारा प्रेरित
प्रद्युम्न मिश्रको श्रीकृष्णकथा सुनाना, महाप्रभुके द्वारा
रायकी प्रशंसा (चैःचः अन्त्यलीला, 5/4-85 संख्या)।
(चैःचः अन्त्यलीला, 5/9 संख्या)—
“सुबल यैछे पूर्वे कृष्णसुखेर सहाय।
गौरसुख-दानहेतु तैछे राम राय॥”
“सुबल जिस प्रकार पहले श्रीकृष्णके सुखमें सहायक
थे, वैसे ही रामराय गौरसुन्दरको सुख प्रदान करते थे।”
(चैःचः अन्त्यलीला, 7/36 संख्या)—
“कहने ना याय रायरामानन्देर प्रभाव।
राय-प्रसादे जानिलाम ब्रजेर शुद्धभाव॥”
“रायरामानन्दके प्रभावको मैं कह नहीं सकता,
उनकी कृपासे ही मैंने ब्रजके शुद्धभावको जाना है।”
(चैःचः अन्त्यलीला, 7/23 संख्या)—
“रामानन्दराय—कृष्णरसेर निदान।
तेंह जानाइल, कृष्ण स्वयं भगवान्॥”
“रामानन्दराय श्रीकृष्णरसको सम्पूर्ण रूपसे जाननेवाले
हैं, उन्होंने ही मुझे बतलाया है कि श्रीकृष्ण ही स्वयं
भगवान् हैं।”
शेषलीलामें रामराय और श्रीस्वरूपके निकट
श्रीकृष्णविरह-विलापमें रस-गीतका आस्वादन (चैःचः
अन्त्यलीला, चौदहसे बीस अध्याय द्रष्टव्य हैं)।
श्रीरामानन्दरायने ‘श्रीजगन्नाथ-वल्लभ’ नाटककी रचना
की थी॥134॥
(9) राजा प्रतापरुद्र, (10) कृष्णानन्द,
(11) परमानन्द महापात्र, (12) शिवानन्द :—
प्रतापरुद्र राजा, आर ओढ़
परमानन्द महापात्र, ओढ़
अनुवाद—राजा प्रतापरुद्र, उड़िया कृष्णानन्द, परमानन्द
महापात्र, और उड़िसावासी शिवानन्द महाप्रभुके कृपापात्र
हैं॥135॥
अनुभाष्य—‘प्रतापरुद्र’—ये गङ्गावंशीय (गजपति) उत्कल
सम्राट थे। कटक इनकी राजधानी थी। इन्हें महाप्रभुकी
गुणावलीको सुनकर उनके दर्शन और कृपा लाभ
करनेका लोभ हो गया, परन्तु महाप्रभु संन्यासी होनेके
कारण उनसे मिलना नहीं चाहते थे। राजाने दैन्यपूर्वक
उनकी अनेक प्रकारसे सेवा की। उनकी सेवा और
उत्कण्ठाको देखकर रामानन्दराय और सार्वभौमने उनकी
सहायता की। उनके कहनेपर इन्होंने राजवेशका त्यागकर
दीन व्यक्तिके वेशमें महाप्रभुके निकट जाकर उनकी
कृपा प्राप्त की। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 118वाँ श्लोक)—
“इन्द्रद्युम्नो महाराजो जगन्नाथार्चकः पुरा।
जातः प्रतापरुद्रः सन् सम् इन्द्रेण सोऽधुना॥118॥”
“पहले जो श्रीजगन्नाथके अर्चक महाराज इन्द्रद्युम्न
थे, उन्होंने ही इन्द्रके समान वैभवशाली होकर महाराज
प्रतापरुद्रके रूपमें जन्म ग्रहण किया है।” इनकी
दसवाँ अध्याय | 87

[ 10/135-136
इच्छानुसार कविकर्णपूरने 'चैतन्यचन्द्रोदय' नाटक लिखा
है।
'परमानन्द महापात्र'—(चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ
अध्याय)—
“उत्कले जन्मियाछिल यत अनुचर।
सबे चिनिलेन निज प्राणेर ईश्वर॥210॥
श्रीपरमानन्द महापात्र महाशय।
याँर तनु श्रीचैतन्य, –भक्तिरसमय॥212॥”
“नीलाचलमें महाप्रभुके जितने भी अनुचरोंका जन्म
हुआ था, उन्होंने महाप्रभुको देखते ही पहचान लिया
कि वे उनके प्राणेश्वर हैं। श्रीपरमानन्द महापात्रका
शरीर ही श्रीचैतन्य-भक्तिरससे बना है॥” 135॥
(13) भगवान् आचार्य, (14) ब्रह्मानन्द भारती,
(15) शिखि और (16) मुरारि माहिति :-
भगवान् आचार्य, ब्रह्मानन्दाख्य भारती।
श्रीशिखि माहिति, आर मुरारि माहिति॥136॥
अनुवाद—भगवान् आचार्य, ब्रह्मानन्द भारती, शिखि
माहिति और मुरारि माहिति, महाप्रभुके अन्य प्रिय
परिकर हैं॥ 136 ॥
अनुभाष्य—'भगवान् आचार्य'—ये हालिसहरके वासी
थे, इनके पुत्रका नाम रघुनाथ था (भक्तिरत्नाकर)। ये
पङ्गु थे। चैःचः मध्यलीला, 10/184 संख्यामें—
“रामभद्राचार्य आर भगवान् आचार्य।
प्रभु-पदे रहिला दुँहे छाड़ि' सर्व कार्य॥184॥”
“ये सब कुछ छोड़कर महाप्रभुके पास जगन्नाथपुरी
आ गये।” चैःचः अन्त्यलीला, दूसरा अध्याय—
“पुरुषोत्तमे प्रभुपाशे भगवान् आचार्य।
परम पण्डित तँहो सुपण्डित आर्य॥
सख्यभावाक्रान्त-चित्त गोप-अवतार।
स्वरूप गोसाञिसह सख्य-व्यवहार॥
एकान्तभावे आश्रियाछे चैतन्य-चरण।
मध्ये मध्ये प्रभुर तेंहो करे निमन्त्रण॥”
“भगवान् आचार्य परम पण्डित थे। सख्यभावसे
इनका चित आक्रान्त रहता था। ये व्रजके गोपके
अवतार थे। स्वरूप गोस्वामीके साथ इनका सखा जैसे
व्यवहार था। महाप्रभुके चरणोंमें इनकी ऐकान्तिक भक्ति
थी। कभी-कभी ये महाप्रभुको अपने घर निमन्त्रित
करते थे।” इन्हींके घरपर जब महाप्रभु भिक्षा करने
आये थे, तब उन्होंने छोटे हरिदासको माधवीदेवीसे
चावलकी भिक्षाके बहाने उनसे वार्तालाप करनेके
कारण उसका परित्याग किया था (चैःचः अन्त्यलीला,
2/101-166 संख्या द्रष्टव्य है)। ये अत्यन्त उदार और
सरल थे, परन्तु इनके पिता शतानन्द खाँ जैसे घोर
विषयी थे, इनके अनुज गोपाल भट्टाचार्य भी वैसे ही
कट्टर मायावादी थे। गोपाल भट्टाचार्य काशीमें
मायावाद-भाष्यका अध्ययन करके पुरीमें अपने बड़े
भाई भगवान् आचार्यके पास आये थे, यद्यपि भगवान्
आचार्य स्नेहवश इनसे मायावाद सुननेको सहमत हो
गये थे, किन्तु मायावाद-भाष्यके भक्ति विरोधी होनेके
कारण श्रीस्वरूप दामोदरने इन्हें सुननेके लिये मना
किया (चैःचः अन्त्यलीला, 2/89-100 संख्या द्रष्टव्य
हैं)। एक दिन इनके पूर्व-परिचित बङ्गालका 'जैसा-तैसा'
(जो रसतत्त्व और वैष्णवसिद्धान्तको ठीकसे नहीं जानता)
एक कवि एक भक्तिसिद्धान्त-विरोधी नाटककी रचना
करके इनके घर आकर ठहरा और उसने महाप्रभुको
उस नाटकको सुनानेकी इच्छा प्रकट की। श्रीस्वरूप
दामोदरको उनके नाटकपर सन्देह होनेपर भी उस
नाटकको सुननेके लिये इनके बहुत अनुरोध करनेपर
उसने पहले नान्दी-श्लोकका पाठ किया। उसे सुनते ही
श्रीस्वरूप दामोदरने नाटकमें अनेक भक्तिसिद्धान्त-विरोध
दिखलाये। अन्तमें उस कविने भक्तोंके चरणोंमें शरण
ग्रहण की (चैःचः अन्त्यलीला, 5/91-156 संख्या)।
चैःभाः अन्त्यखण्ड, तीसरा अध्याय द्रष्टव्य है।
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 74वाँ श्लोक)—
“आचार्यों भगवान् खञ्जः कला गौरस्य कथ्यते॥74(ख)॥”
“भगवान् आचार्य खञ्ज (पङ्गु) को श्रीगौराङ्गदेवकी
कला कहा जाता है।”
88 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/136 ]
'शिखि माहिति' - (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 189वाँ
श्लोक) -
"रागलेखा-कलाकेल्यौ राधादास्यौ पुरा स्थिते।
ते ज्ञेये शिखिमाहिती तत्स्वसा माधवी-क्रमात् ॥ 189 ॥"
“पहले रागलेखा और कलाकेलि नामक जो दो
श्रीराधादासी थीं, उन्हें ही अब क्रमशः शिखिमाहिति और
उनकी बहन माधवी जानना होगा।" ये और उनकी
बहन, दोनों ही महाप्रभुके उत्कलवासी अन्तरङ्ग अधिकारी
भक्त हैं। जैसे- श्रीचैतन्यचरित-महाकाव्य (13 सर्ग 89-109)
में इस प्रकार वर्णन है - "पुरुषोत्तमक्षेत्रमें शिखि माहिति
(हान्ति) नामक एक निर्मल हृदयवाले करुणाशील
महात्मा वास करते थे। वे नीलाचल-तिलक श्रीजगन्नाथदेवके
दास स्वरूप थे। 'मुरारि माहिति' इनके छोटे भाई थे
और इनकी छोटी बहन शुद्ध बुद्धिवाली माधवी देवी
थीं। इनके प्रिय भाई और बहन, दोनों ही श्रीगौरसुन्दरमें
अनुरक्त थे। उनकी बुद्धि सहज ही निश्चल थी,
इसलिये उन्हें कभी भी श्रीगौरसुन्दरकी विस्मृति नहीं
होती थी। इस समय वृन्दावनचन्द्र श्रीकृष्ण ही श्रीगौरचन्द्रके
रूपमें इस धराधामपर प्रकट हुए हैं, इस भावने
भाई-बहनके श्रीगौरस्नेहको और दृढ़ किया। नीलाचलेन्द्र
श्रीजगन्नाथके प्रेमी सेवक अपने बड़े भाई शिखि
माहितिको श्रीगौरसुन्दरके भजनमें लगानेका दोनों भाई-बहनने
बहुत प्रयास किया, किन्तु शिखि माहिति श्रीगौरभजनमें
रत नहीं हुए।
एक दिन अपने छोटे भाईके उपदेश सुनकर और
उनकी बहुत प्रकारसे आलोचना करते-करते वे सो
गये। रात्रिके आखिरी प्रहरमें उन्होंने चकित होकर
'श्रीगौर-चरणकमलोंके दर्शन करते हुए उनके भाई-बहन
उन्हें उठा रहे हैं' इस प्रकार एक स्वप्न देखा।
आश्चर्यमय स्वप्नको देखकर उनके शरीरमें पुलक हो
गया और आनन्दके कारण उनका आश्चर्य दो गुणा
बढ़ गया। आँख खोलते ही उन्होंने अपने भाई-बहनको
सामने खड़ा पाया। उन्होंने उन दोनोंको अपने गले लगा
लिया। इससे सभी आश्चर्यचकित हो गये। शिखि
माहिति उनसे कहने लगे, - "भाई! मैंने जो स्वप्न देखा,
उसे सुनो, वह बहुत ही विचित्र है। श्रीशचीनन्दनकी
महिमा जो असीम है, उसका मैंने आज ही अनुभव
किया। मैंने देखा कि श्रीगौरसुन्दर नीलाचलेन्द्रके दर्शनकर
बारम्बार उनमें प्रवेश कर रहे हैं और बाहर आ रहे
हैं, एवं पुनः पुनः श्रीजगन्नाथदेवका अवलोकन कर रहे
हैं- उन्होंने इस प्रकार लीलाका विस्तार किया। क्या
आश्चर्य है? मैं अभी भी परमेश्वर श्रीगौरसुन्दरको उसी
अवस्थामें देख रहा हूँ, क्या मेरे नेत्र भ्रमित हो रहे हैं?
हाय! उन असीम कृपासिन्धु श्रीगौरसुन्दरने मुझे जगन्नाथदेवके
समीप देखकर मुझे नाम लेकर बुलाया और अपनी
सुन्दर लम्बी भुजाओंके द्वारा मेरा आलिङ्गन किया।"
इस प्रकार पुलकित शरीर और अश्रुपूरित नेत्रोंके साथ
प्रेमसे गद्गद् वाणीसे यह सब बतलाते हुए वे बाहर
आये। मुरारि और माधवीने उनकी यह बात सुनकर
उन्हें महाप्रभुके दर्शनके लिये श्रीजगन्नाथजीके दर्शनके
लिये जानेको कहा। तब तीनों ही इस बातके लिये
सहमत होकर श्रीजगन्नाथजीके दर्शनके लिये गये। मुरारि
और माधवी महाप्रभुके जगमोहनमें दर्शन करके आनन्द-अश्रु
बहाने लगे, किन्तु उनके बड़े भाई शिखि माहितिने
महाप्रभुको जैसा स्वप्नमें देखा था, चारों ओर श्रीगौरसुन्दरको
ठीक उसी प्रकार प्रभावसे युक्त देखा और उनके हृदयमें
प्रेम उदित हो गया। महावदान्य महाप्रभुने भी 'तुम
मुरारिके अग्रज हो' यह कहकर अपनी दोनों भुजाओंसे
उनका आलिङ्गन किया। तब शिखि माहितिने श्रीगौरसेवामय
बुद्धिसे युक्त होकर परम सुखका अनुभव किया। तबसे
शिखि माहिति श्रीगौरसुन्दरके चरणकमलोंकी गन्धसे सब
कुछ भूल गये और अपने अभीष्टदेव श्रीगौरकी सेवा
करने लगे।
'मुरारि माहिति' - (चैःचः मध्यलीला, 10/44 संख्यामें) -
“मुरारि माहिति इहाँ शिखि-माहितिर भाइ।
तोमार चरण बिना अन्य गति नाइ॥”
दसवाँ अध्याय | 89

[ 10/136-141
“मुरारि माहित—ये शिखि माहितिके छोटे भाई हैं
और श्रीगौरसुन्दरके चरणोंके अतिरिक्त इनकी कोई गति
नहीं है॥”136॥
(17) माधवीदेवी :—
माधवीदेवी—शिखि माहितिर भगिनी।
श्रीराधार दासीमध्ये याँर नाम गणि॥ 137 ॥
अनुवाद—माधवी देवी शिखि माहितिकी बहन हैं
और उनकी गणना श्रीमती राधिकाकी दासियोंमें होती
है॥137॥
अनुभाष्य—‘माधवी देवी’—(चैःचः अन्त्यलीला,
2/104-106)—
“प्रभु लेखा करे याँरे राधिकार गण।
जगतेर मध्ये पात्र—साड़े तिनजन॥
स्वरूप गोसाञि, आर राय रामानन्द।
शिखि माहिति—तिन, ताँर भगिनी—अर्द्धजन॥”
“महाप्रभु माधवीदेवीको श्रीमती राधिकाके गणोंमें
मानते हैं। महाप्रभुके साढ़े तीन लोग अन्तरङ्ग भक्त हैं।
श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीराय रामानन्द और शिखि माहिति,
ये तीन लोग हैं और शिखि माहितिकी बहन माधवी
देवी आधा-जन हैं॥”137॥
(18) काशीश्वर, (19) गोविन्द :—
ईश्वरपुरीर शिष्य—ब्रह्मचारी काशीश्वर।
श्रीगोविन्द-नाम ताँर प्रिय अनुचर॥ 138 ॥
ताँर सिद्धिकाले दोँहे ताँर आज्ञा पाञा।
नीलाचले प्रभुस्थाने मिलिल आसिया॥ 139 ॥
अनुवाद—ब्रह्मचारी काशीश्वर श्रीईश्वरपुरीके शिष्य
और श्रीगोविन्द उनके प्रिय सेवक थे। श्रीईश्वरपुरीके
सिद्धिकालमें (अप्रकट होनेके समय) उनसे आज्ञा
प्राप्तकर, ये दोनों नीलाचलमें आकर महाप्रभुसे
मिले॥138-139॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘श्रीगोविन्द और काशीश्वर’—ये
दोनों श्रीईश्वरपुरीके शिष्य थे। ईश्वरपुरीके सिद्धिप्राप्तिके
समय उनकी आज्ञासे ये नीलाचलमें महाप्रभुके पास
आये थे॥138॥
अनुभाष्य—‘श्रीगोविन्द’—महाप्रभुके निज सेवक थे।
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 137वाँ श्लोक)—
“पुरा वृन्दावने चेटौ स्थितौ भृङ्गार-भङ्गुरौ।
श्रीकाशीश्वर-गोविन्दौ तौ जातौ प्रभु-सेवकौ॥ 137॥”
“जो पहले वृन्दावनमें भृङ्गार और भङ्गुर नामके दो
‘चेट’ थे, वे ही श्रीगौरसेवक काशीश्वर और गोविन्द
हैं।” महाप्रभुके साथ ईश्वरपुरीके शिष्य गोविन्दके मिलनके
वर्णनके लिये चैःचः मध्यलीला, 10/131-148 द्रष्टव्य
है। गोविन्दके शुद्धदास्यरसके वशीभूत महाप्रभु—(चैःचः
मध्यलीला, 2/78)। महाप्रभुकी सेवाके लिये उनकी
देहके ऊपरसे लांघकर जानेमें भी गोविन्दको कोई
दुविधा नहीं होती थी, किन्तु अपने लिये ऐसा करनेमें
उन्हें अपराधका भय रहता था—
“गोविन्द कहे, आमार सेवा से नियम।
अपराध हउक् किंवा नरके गमन॥”
“गोविन्द कहते थे—मेरा सेवाका यह नियम है,
इसके द्वारा अपराध हो अथवा नरकमें जाना पड़े, कोई
बात नहीं।” चैःचः मध्यलीला 10/82-100 संख्या द्रष्टव्य
है॥139॥
गोविन्द और काशीश्वरकी श्रीगौर-सेवा :—
गुरुर सम्बन्धे मान्य कैल दुँहाकारे।
ताँर आज्ञा मानि’ सेवा दिलेन दोँहारे॥ 140 ॥
अनुवाद—अपने गुरु श्रीईश्वरपुरीसे सम्बन्धित होनेके
कारण महाप्रभु इन दोनोंका सम्मान करते थे, किन्तु
गुरुकी आज्ञा मानकर महाप्रभुने इन दोनोंको अपनी
सेवा प्रदान की॥140॥
अङ्गसेवा गोविन्देर दिलेन ईश्वर।
जगन्नाथ देखिते आगे चले काशीश्वर॥ 141 ॥
90 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/141-147 ]
अपर्श याय गोसाञि मनुष्य-गहने।
मनुष्य ठेलि' पथ करे काशी बलवाने॥142॥
अनुवाद—महाप्रभुने गोविन्दको अपनी देहकी सेवा
प्रदान की। काशीश्वर बहुत बलवान थे और जब
महाप्रभु जगन्नाथजीके दर्शनके लिये जाते, तब काशीश्वर
महाप्रभु के आगे-आगे चलकर लोगोंको हटाकर मार्ग
बनाते, जिससे भीड़में कोई उनको स्पर्श न कर
पाये॥141-142॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘अपर्श’—बिना स्पर्श किये॥142॥
इति अमृतप्रवाह-भाष्ये दशम परिच्छेद।
दसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
(20) रामाइ, (21) नन्दाइ :-
रामाइ-नन्दाइ—दोँहे प्रभुर किङ्कर।
गोविन्देर सङ्गे सेवा करे निरन्तर॥143॥
बाइश घड़ा जल दिने भरेन रामाइ।
गोविन्देर आज्ञाय सेवा करेन नन्दाइ॥144॥
अनुवाद—रामाइ और नन्दाइ, ये दोनों महाप्रभुके
सेवक हैं और दोनों गोविन्दके साथ मिलकर निरन्तर
महाप्रभुकी सेवा करते थे। रामाइ दिनमें बाइस घड़े जल
भरते और नन्दाइ गोविन्दकी आज्ञानुसार महाप्रभुकी
सेवा करते॥143-144॥
अनुभाष्य—‘रामाइ और नन्दाइ’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
139वाँ श्लोक)—
“पयोद-वारिदौ प्राग् यौ नीरसंस्कारकारिणौ।
तावद्य भृत्यौ रामायिर्नन्दायिश्चेति विश्रुतौ॥139॥”
“पहले जो जलसंस्कारकारी (गोचारणके समय
श्रीकृष्णके व्यवहारके लिये जलसे परिपूर्ण पात्रोंको
उठाकर ले जानेवाले) पयोद और वारिद नामक
श्रीकृष्णके सेवक थे, वे ही अब रामाइ और नन्दाइके
नामसे प्रसिद्ध हैं।” ये गोविन्दके आनुगत्यमें महाप्रभुकी
सेवा करते थे॥143॥
(22) कालाकृष्णदास विप्र :-
कृष्णदास-नाम शुद्ध कुलीन ब्राह्मण।
यारे सङ्गे लैया कैल दक्षिण गमन॥145॥
अनुवाद—कृष्णदास नामक एक शुद्ध कुलीन
ब्राह्मण थे, जिन्हें महाप्रभु अपने साथ लेकर दक्षिण
भारतकी यात्रापर गये थे॥145॥
अनुभाष्य—‘कृष्णदास’—चैःचः मध्यलीला, सातवें और
नौवें अध्यायमें इनका प्रसङ्ग वर्णित है। जलपात्रको
उठाकर चलनेके लिये ये सरल ब्राह्मण महाप्रभुके साथ
दक्षिण भारत गये। महाप्रभुने मालाबार देशमें भटथारियोंके
द्वारा इनको स्त्रीरूपसे मोहित करके आबद्ध करनेकी
चेष्टाको देखकर इनका उद्धार किया और इनको
नीलाचलकी ओर लौटनेके लिये विदा किया॥145॥
(23) बलभद्र भट्ट :-
बलभद्र भट्टाचार्य—भक्ति-अधिकारी।
मथुरा-गमने प्रभुर यँहो ब्रह्मचारी॥146॥
अनुवाद—बलभद्र भट्टाचार्य भक्तिके योग्य अधिकारी
हैं। ये ब्रह्मचारी महाप्रभुके साथ मथुरा गये थे॥146॥
अनुभाष्य—‘बलभद्र भट्टाचार्य’—व्रजकी मधुरेक्षणा
हैं। संन्यासियोंके लिये भोजन बनाना आदि व्यवहारिक
कर्म-काण्ड निषिद्ध हैं। वे गृहस्थियोंसे यह सब ग्रहण
और स्वीकार करते हैं। संन्यासीगण-गुरु हैं और
ब्रह्मचारीगण शिष्य हैं। बलभद्र महाप्रभुके साथ जब
वृन्दावन गये, तब उन्होंने ब्रह्मचारीका कार्य किया॥146॥
(24) बड़े हरिदास, (25) छोटा हरिदास :-
बड़ हरिदास, आर छोट हरिदास।
दुइ कीर्त्तनीया रहे महाप्रभुर पाश॥147॥
अनुवाद—बड़े हरिदास और छोटे हरिदास, ये दो
कीर्तनीया महाप्रभुके पास रहते थे॥147॥
अनुभाष्य—‘छोट हरिदास’—इनका प्रसङ्ग चैःचः
अन्त्यलीला, दूसरे अध्यायमें द्रष्टव्य है॥147॥
दसवाँ अध्याय | 91

[ 10/148-158
(26) रामभद्र, (27) सिंहेश्वर, (28) तपनाचार्य,
(29) रघुनाथ, (30) नीलाम्बर :-
रामभद्राचार्य, आर ओढ़
तपन आचार्य, आर रघु, नीलाम्बर ॥ 148 ॥
(31) सिङ्गाभट्ट, (32) कामाभट्ट,
(33) शिवानन्द, (34) कमलानन्द :-
सिङ्गाभट्ट, कामाभट्ट, दस्तुर शिवानन्द।
गौड़े पूर्वे भृत्य प्रभुर प्रिय कमलानन्द ॥ 149 ॥
अनुवाद-रामभद्राचार्य, उड़ीसावासी सिंहेश्वर, तपन
आचार्य, रघु, नीलाम्बर, सिङ्गाभट्ट, कामाभट्ट, शिवानन्द
दस्तुर और कमलानन्द महाप्रभुके प्रिय भक्त हैं।
कमलानन्द पहले महाप्रभुके साथ गौड़देशमें थे और
बादमें नीलाचलमें उनके पास आ गये॥ 148-149 ॥
(35) अच्युतानन्द :-
अच्युतानन्द-अद्वैत-आचार्य तनय।
नीलाचले रहे प्रभुर चरण आश्रय ॥ 150 ॥
अनुवाद-अच्युतानन्द श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र हैं। वे
नीलाचलमें महाप्रभुके चरणाश्रयमें रहे॥ 150 ॥
अनुभाष्य-'अच्युतानन्द'-चैःचः आदिलाीला, 12/13
संख्या द्रष्टव्य है॥ 150 ॥
(36) गङ्गादास, (37) विष्णुदास :-
निर्लोम गङ्गादास, आर विष्णुदास।
एइ सबेर प्रभुसङ्गे नीलाचले वास ॥ 151 ॥
अनुवाद-निर्लोम गङ्गादास और विष्णुदास महाप्रभुके
अन्य भक्त थे। ये सब भक्त महाप्रभुके साथ नीलाचलमें
रहे ॥ 151 ॥
काशीप्रवासी—(1) चन्द्रशेखर,
(2) तपनमिश्र, (3) श्रीरघुनाथ भट्ट :-
वाराणसी-मध्ये प्रभुर भक्त तिनजन।
चन्द्रशेखर वैद्य, आर मिश्र तपन ॥ 152 ॥
रघुनाथ भट्टाचार्य-मिश्रेर नन्दन।
प्रभु यबे काशी आइला देखि' वृन्दावन ॥ 153 ॥
चन्द्रशेखर-गृहे कैल दुइमास वास।
तपन-मिश्रेर घरे भिक्षा दुइ मास ॥ 154 ॥
अनुवाद-चन्द्रशेखर वैद्य, तपन मिश्र और उनके
पुत्र रघुनाथ भट्टाचार्य, वाराणसीमें महाप्रभुके ये तीन
भक्त थे। महाप्रभु वृन्दावनके दर्शनके पश्चात् जब
काशी आये थे, तब वे चन्द्रशेखरके घरमें दो महीने
तक रहे और उस कालमें वे तपन मिश्रके घर भिक्षा
(प्रसाद) ग्रहण करते थे ॥ 152-154 ॥
अनुभाष्य-'तपनमिश्र'-महाप्रभु जब (पूर्व) बङ्गाल
(वर्तमान बङ्गलादेश) में गये थे, तब इन्होंने उनसे
साधन और साध्यतत्त्वके विषयमें जिज्ञासा की और
महाप्रभुसे हरिनाम ग्रहण किया। बादमें महाप्रभुकी आज्ञासे
ये काशीमें वास करने लगे। महाप्रभुने काशीवासकालमें
इनके घर भिक्षा करना (प्रसाद सेवन) स्वीकार किया
था ॥ 152 ॥
श्रीरघुनाथ भट्टका विवरण :-
रघुनाथ बाल्ये कैल प्रभुर सेवन।
उच्छिष्ट-मार्जन आर पाद-सम्वाहन ॥ 155 ॥
बड़ हैले नीलाचले गेला प्रभुर स्थाने।
अष्टमास रहिल भिक्षा देन कोन दिने ॥ 156 ॥
प्रभुर आज्ञा पाञा वृन्दावनरे आइला।
आसिया श्रीरूप-गोसाञिर निकटे रहिला ॥ 157 ॥
ताँर स्थाने रूप-गोसाञि शुनेन भागवत।
प्रभुर कृपाय तें'हो कृष्णप्रेमे मत्त ॥ 158 ॥
अनुवाद-जब महाप्रभु तपन मिश्रके घरमें रहे थे,
तब रघुनाथ भट्ट छोटे बालक थे। उन्होंने महाप्रभुके
बर्तन माँजने और उनके पाद सम्वाहन करनेकी सेवा
की थी। बड़े होनेपर वे महाप्रभुके पास नीलाचल गये
और वहाँ आठ महीने रहे। इस समयमें वे कभी-कभी
92 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/155-158 ]
महाप्रभुको प्रसाद निवेदन करते थे। महाप्रभुकी आज्ञा
पाकर वे वृन्दावन आ गये। श्रीरूप गोस्वामी उनके
स्थानपर आकर उनसे भागवत सुनते थे। महाप्रभुकी
कृपासे वे सदा कृष्णप्रेममें मत्त रहते थे॥155-158॥

ग्राम्यवार्त्ता ना सुने, ना कहे जिह्वाय।
कृष्णकथा-पूजादिते अष्टप्रहर याय॥
वैष्णवेर निन्द्यकर्म नाहि पाड़े काणे।
सबे कृष्णभजन करे, -एइमात्र जाने॥”

अनुभाष्य-‘रघुनाथ भट्टाचार्य'–ये छह गोस्वामियोंमें
अन्यतम और तपन मिश्रके पुत्र थे। लगभग 1425
शकाब्दमें इनका जन्म हुआ था। भागवत शास्त्रमें इनकी
विशेष निपुणता थी। (चैःचः अन्त्यलीला, तेरहवाँ
परिच्छेद)-

“रघुनाथ भट्ट पाके अति सुनिपुण।
येइ रान्धे सेइ हय अमृत-समान॥
परम सन्तोषे प्रभु करेन भोजन।
प्रभुर अवशिष्ट पात्र भट्टेर भक्षण॥
अष्टमास रहिं' प्रभु भट्टे विदाय दिल।
'विवाह ना करिह' बलि' निषेध करिल॥
'वृद्ध मातापिता याइ' करह सेवन।
वैष्णव-पाश भागवत कर अध्ययन॥
पुनरपि एकबार आसिह नीलाचले।'
एत बलि' कण्ठमाला दिल ताँर गले॥”
“चारि वत्सर घरे पिता-मातार सेवा कैल।
वैष्णव-पण्डित-ठाँइ भागवत पड़िल॥
पिता-माताय काशी पाइले उदासीन हञा।
पुनः प्रभुर ठाँइ आइला गृहादि छाड़िया॥”
“आमार आज्ञाय, रघुनाथ, याह वृन्दावने।
ताँहा याजा रह रूप-सनातन-स्थाने॥
भागवत पड़, सदा लह कृष्णनाम।
अचिरे करिबेन कृपा कृष्ण भगवान्॥
एत बलि' प्रभु ताँरे आलिङ्गन कैला।
प्रभुर कृपाते कृष्णप्रेममत्त हैला॥
चौद्दहात जगन्नाथेर तुलसीर माला।
सेइ माला, छुटापान प्रभु ताँरे दिला॥”
“रूप-गोसाञिर सभाय करे भागवत पठन।
भागवत पड़िते आउलाय ताँर मन॥
पिकस्वर कण्ठ, ताते रागेर विभाग।
एक श्लोक पड़िते फिराय चारि राग॥
निज-शिष्ये कहिं' गोविन्देर मन्दिर कराइल।
वंशी-मकर-कुण्डलादि भूषण करि' दिल॥

“रघुनाथ भट्ट भोजन बनानेमें अति निपुण थे। ये
जो कुछ भी बनाते थे, वह अमृतके समान होता था।
महाप्रभु परम सन्तोषके साथ इनका बनाया भोजन
करते थे और उनका उच्छिष्ट प्रसाद ये पाते थे। आठ
महीने नीलाचलमें रहनेके बाद महाप्रभुने इन्हें वहाँसे
विदा किया और विवाह करनेसे निषेध किया। महाप्रभुने
इन्हें वृद्ध माता-पिताके पास रहकर उनकी सेवा करने
और वैष्णवोंसे भागवत श्रवण करने तथा पुनः एक
बार नीलाचल आनेकी आज्ञा दी। यह कहकर महाप्रभुने
अपने गलेकी माला उनके गलेमें डाल दी।” “घर
जाकर इन्होंने चार वर्ष माता-पिताकी सेवा की और
वैष्णव-पण्डितसे भागवत पढ़ी। माता-पिताके देहावसानके
बाद ये जगत्के प्रति उदासीन हो गये और घर
छोड़कर पुनः महाप्रभुके पास नीलाचल आये।” “(महाप्रभुने
कहा-) मेरी आज्ञा है कि तुम वृन्दावन जाओ और
वहाँ रूप-सनातनके पास रहो। वहाँ भागवतका पाठ
करना और सदा कृष्णनाम करना। इस प्रकार भगवान्
श्रीकृष्ण तुमपर शीघ्र ही कृपा करेंगे। यह कहकर
महाप्रभुने इनका आलिङ्गन किया। महाप्रभुकी कृपासे ये
कृष्णप्रेममें मत्त हो गये। महाप्रभुने इनको जगन्नाथजीके
पान-सुपारी और चौदह हाथ लम्बी तुलसीकी माला
दी।” “ये रूप गोस्वामीकी सभामें भागवतका पाठ करते
थे और पाठ करते समय इनका हृदय विगलित हो
जाता था। इनका कण्ठ बहुत मधुर था और इनको
रागोंकी विशेष जानकारी थी। वे एक श्लोकको चार
विभिन्न रागोंमें गाते थे। इन्होंने अपने एक शिष्यको
आज्ञा देकर उनके द्वारा श्रीगोविन्ददेवजीके मन्दिरका
निर्माण करवाया था। श्रीगोविन्ददेवकी वंशी, मकर-कुण्डलादि
आभूषणादि इन्होंने अर्पित किये थे। वे कभी भी
ग्राम्यवार्त्ता न करते थे और न ही सुनते थे। कृष्णकथा

दसवाँ अध्याय | 93

[ 10/153–164
और पूजा आदिमें इनके आठों प्रहर व्यतीत होते थे।
ये कभी भी वैष्णवकी निन्दा नहीं सुनते थे और इनकी
उत्तम भागवतकी दृष्टि थी, जिस कारण ये सभीको
श्रीकृष्णका ही भजन करते हुए देखते थे।
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 185वाँ श्लोक)—
“रघुनाथाख्यको भट्टः पुरा या रागमञ्जरी।।185(क)।”
“पूर्वकालकी रागमञ्जरी ही रघुनाथ भट्ट कहलाते
हैं।” ॥ 153-158 ॥
इति अनुभाष्ये दशम परिच्छेद।
दसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
शाखा-प्रशाखाओंके क्रमसे असंख्य गौरभक्तोंके
द्वारा त्रिभुवनका उद्धार :—
एइमत संख्यातीत चैतन्य-भक्तगण।
दिङ्मात्र लिखि, सम्यक् ना याय कथन ॥ 159 ॥
एकैक-शाखाते लागे कोटि कोटि डाल।
तार शिष्य-उपशिष्य, तार उपडाल ॥ 160 ॥
सकल भरिया आछे प्रेम-फूल-फले।
भासाइल त्रिजगत् कृष्णप्रेम-जले ॥ 161 ॥
एक एक शाखार शक्ति अनन्त महिमा।
'सहस्र वदने' यार दिते नारे सीमा ॥ 162 ॥
संक्षेपे कहिल महाप्रभुर भक्तगण।
समग्र बलिते नारे 'सहस्र-वदन' ॥ 163 ॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीचैतन्य महाप्रभुके भक्तोंकी
संख्या अनन्त है। मैंने केवल उनका दिग्दर्शनमात्र
करवाया है, सम्पूर्ण रूपसे तो उनका वर्णन करना
सम्भव ही नहीं है। एक-एक शाखापर करोड़ों-करोड़ों
डालें हैं और उनके शिष्य-उपशिष्य उनकी उपडालें हैं।
सभी शाखाएँ, डालें और उपडालें प्रेमरूप फूल और
फलोंसे लदी हैं, जिन्होंने त्रिभुवनको कृष्णप्रेमके जलमें
डुबो दिया है। एक-एक शाखाकी शक्तिकी महिमा
अनन्त है, सैकड़ों मुखोंसे भी जिनका गान नहीं किया
जा सकता है। संक्षेपमें मैंने महाप्रभुके भक्तोंका वर्णन
किया है, सम्पूर्ण वर्णन तो (अनन्त शेष) अपने सैकड़ों
मुखोंसे भी नहीं कर सकते ॥ 159-163 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 164 ॥
इति श्रीश्रीचैतन्यचरितामृते आदिलीलायां
मूलस्कन्ध-शाखावर्णनं नाम दशम परिच्छेदः।
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है ॥ 164 ॥
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृतमें आदिलीलाका 'मूलस्कन्धकी
शाखाका वर्णन' नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

ग्यारहवाँ अध्याय

चित्र 4

ग्यारहवाँ अध्याय
ग्यारहवें अध्यायका कथासार—इस अध्यायमें
श्रीनित्यानन्द प्रभुके परिकरोंका वर्णन है। (अमृतप्रवाह
भाष्य)
श्रीनित्यानन्द प्रभुके गणोंके प्रति नमस्कार :-
नित्यानन्द-पदाम्भोज-भृङ्गान् प्रेममधून्मदान्।
नत्वाखिलान् तेषु मुख्या लिख्यन्ते
कतिचिन्मया ॥ 1 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 1 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—प्रेमरूप मधुपानमें उन्मत्त श्रीनित्यानन्द
प्रभुके चरणकमलोंके समस्त भ्रमरोंको नमस्कार करके
उनमेंसे कुछ मुख्य भक्तोंके नाम उल्लेख कर रहा
हूँ॥ 1 ॥
अनुभाष्य—प्रेममधून्मदान् (प्रेम एव मधु तेन उन्मदान्)
अखिलान् (सर्वान्) नित्यानन्दपदाम्भोजभृङ्गान् (प्रभुपदपद्मभ्रमवान्)
नत्वा (प्रणम्य) तेषु (भक्तेषु) कतिचित् मुख्याः [भक्ताः] मया
लिख्यन्ते।
श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 1 ॥
जय जय महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य।
ताँहार चरणाश्रित येइ, सेइ धन्य॥ 2 ॥
जय जय श्रीअद्वैत, जय नित्यानन्द।
जय जय महाप्रभुर सर्वभक्तवृन्द॥ 3 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो। जिन्होंने
उनके चरणोंका आश्रय ग्रहण किया है, वे धन्य हैं।
श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो।
महाप्रभुके सभी भक्तोंकी जय हो॥ 2-3 ॥
नित्यानन्द-स्कन्धकी शाखाका वर्णन :-
तस्य श्रीकृष्णचैतन्य-सत्प्रेमामरशाखिनः।
ऊर्ध्वस्कन्धावधूतेन्दोः शाखारूपान् गणान्नुमः ॥ 4 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 4 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णचैतन्यरूप प्रेम कल्पवृक्षके
ऊपरी स्कन्धरूप श्रीअवधूत नित्यानन्दचन्द्रकी शाखारूप
सभी भक्तोंको मैं नमस्कार करता हूँ॥ 4 ॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णचैतन्यसत्प्रेमामरशाखिनः (श्रीकृष्णचैतन्य
एव सतः नित्यस्थितस्य प्रेमामरवृक्षस्य गौरनामधेयस्य
अविनाशिनस्तरोः तस्य) ऊर्ध्वस्कन्धावधूतोन्दोः (उर्ध्वस्कन्धरूपः
नित्यानन्दप्रभु एव इन्दु चन्द्र तस्य) शाखारूपान् गणान्
(शाखारूपगणान्) नुमः (नमस्कुर्मः)।
श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 4 ॥
श्रीनित्यानन्द-वृक्षेरे स्कन्ध-गुरुतर।
ताहाते जन्मिल शाखा-प्रशाखा विस्तर॥ 5 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु भक्तिवृक्षके दो स्कन्धों
(श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैताचार्य) में प्रधान स्कन्ध हैं।
उनसे बहुतसी शाखाएँ और उपशाखाएँ निकलीं॥ 5 ॥
महाप्रभुकी इच्छासे नित्यानन्द-शाखाकी
वृद्धि और प्रधानता :-
मालाकारेर इच्छा-जले बाड़े शाखागण।
प्रेम-फूल-फले भरि' छाइल भुवन॥ 6 ॥
अनुवाद—माली (श्रीचैतन्य महाप्रभु) के इच्छारूपी
जलसे ये शाखाएँ-उपशाखाएँ बढ़कर असीम हो गयीं
और इन्होंने प्रेमरूपी फलों-फूलोंसे सारे जगत्को ढक
लिया॥ 6 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'मालाकारेर'—श्रीमहाप्रभुकी॥ 6 ॥
असंख्य अनन्त गण के करु गणन।
आपना शोधिते कहि मुख्य मुख्य जन॥ 7 ॥
अनुवाद—शाखा-उपशाखारूपी भक्त असंख्य हैं,

[ 11/7-12
जिनकी गणना कौन कर सकता है? अपना शोधन
करनेके लिये उनमेंसे मुख्य-मुख्य भक्तोंके विषयमें कह
रहा हूँ॥ ७॥
(1) श्रीवीरचन्द्र गोसाईं-शाखा :-
श्रीवीरभद्र गोसाञि—स्कन्ध-महाशाखा।
ताँर उपशाखा यत, असंख्य तार लेखा॥ ८॥
अनुवाद—नित्यानन्दप्रभु रूपी स्कन्धकी महाशाखा
श्रीवीरभद्र गोसाईं हैं, जिनकी असंख्य उपशाखाएँ हैं, उन
सबका वर्णन करना सम्भव नहीं है॥ ८॥
अनुभाष्य—'श्रीवीरभद्र गोसाञि'—ये श्रीनित्यानन्द प्रभुके
पुत्र थे, जिन्होंने वसुधाके गर्भसे जन्म ग्रहण किया और
जाह्नवा-माताके शिष्य थे। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 67वाँ
श्लोक)—
“सङ्कर्षणस्य यो व्यूहः पयोब्धिशायिनामकः।
स एव वीरचन्द्रोऽभूच्चैतन्याभिन्नविग्रहः॥ 67॥”
“श्रीसङ्कर्षणके अंशरूप जो क्षीरोदशायी विष्णु हैं, वे
ही अब श्रीचैतन्य-अभिन्न विग्रह श्रीवीरचन्द्र हैं।”
श्रीवीरभद्रने हुगली जिलाके अन्तर्गत झामटपुर
ग्रामके निवासी अपने शिष्य यदुनाथाचार्यकी पत्नी
विद्युन्माला (लक्ष्मी) के गर्भसे जन्मीं श्रीमतीसे और
उनकी पालित कन्या नारायणीसे विवाह किया
(भक्तिरत्नाकरकी 13वीं तरङ्ग द्रष्टव्य है)। इनके तीन
शिष्य—गोपीजनवल्लभ, रामकृष्ण और रामचन्द्र इनके
पुत्र कहे जाते हैं, ऐसी प्रसिद्धि है। सबसे छोटे रामचन्द्र
खड़दहमें वास करते थे। वे शाण्डिल्य-गोत्रिय शुद्धश्रोत्रिय
'वटव्याल' थे। सबसे बड़े गोपीजनवल्लभ वर्धमान
जिलामें मानकरके पास 'लता' ग्राममें और मझले
रामकृष्ण मालदहके पास गयेधपुरमें वास करते थे।
यदि इन तीनोंका गोत्र और ग्राम एक ही होता, तो इन्हें
वीरभद्रके निज पुत्र माननेमें कोई भी सन्देह नहीं
करता। रामचन्द्रके चार पुत्र थे; ज्येष्ठ पुत्र राधामाधवके
तीसरे पुत्र यादवेन्द्र थे और उनके पुत्र नन्दकिशोर,
उनके पुत्र निधिकृष्ण, उनके पुत्र चैतन्यचाँद, उनके पुत्र
कृष्णमोहन, उनके पुत्र जगन्मोहन, उनके पुत्र व्रजनाथ
और उनके पुत्र परलोकगत श्यामलाल गोस्वामी थे॥ ८॥
उनकी महिमा—स्वयं विष्णु होते हुए भी
वैष्णवके समान चेष्टा :-
ईश्वर हइया कहाय महाभागवत।
वेदधर्मातीत हञा वेदधर्मे रत॥ ९॥
अनुवाद—यद्यपि श्रीवीरभद्र स्वयं ईश्वर हैं, तथापि
वे स्वयंको महाभागवत कहते थे। ईश्वर वेदोंके
नियमोंसे अतीत हैं, तो भी वे वेदधर्मका दृढ़तासे पालन
करते थे॥ ९॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'वीरचन्द्र प्रभु'—श्रीसङ्कर्षणके जो
पयोब्धिशायी व्यूह हैं, उसीके ही स्वरूप साक्षात् ईश्वर
होकर भी अपनेमें वैष्णव अभिमान रखते थे॥ ९॥
अन्तरे ईश्वर-चेष्टा, बाहिरे निर्दम्भ।
चैतन्यभक्ति-मण्डपे तेंहों मूलस्तम्भ॥ १०॥
अद्यापि याँहार कृपा-महिमा हइते।
चैतन्य-नित्यानन्द गाय सकल जगते॥ ११॥
सेइ वीरभद्र-गोसाञिर चरण-शरण।
याँहार प्रसादे इय अभीष्ट-पूरण॥ १२॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुके द्वारा स्थापित
भक्तिमण्डपके वे मुख्य स्तम्भ हैं। भीतर उन्हें ईश्वर
होनेका ज्ञान था और उसके अनुरूप उनकी चेष्टाएँ भी
थीं, परन्तु उनके बाह्य आचरणमें ऐसा कोई अभिमान
नहीं था। यह उनकी कृपाकी ही महिमा है, जिसके
कारण आज समस्त जगत् श्रीचैतन्य-नित्यानन्दके नामोंका
कीर्तन कर रहा है। मैं उन श्रीवीरभद्र गोसाईंके
चरणकमलोंकी शरण ग्रहण करता हूँ, जिनकी कृपासे
सभी मनोभीष्ट पूर्ण होते हैं। (इसलिये श्रीचैतन्यचरितामृतकी
रचनारूपी मनोभीष्ट भी अवश्य पूर्ण होगा)॥ १२॥
98 | श्रीचैतन्यचरितामृत

11/13 ]
(2) ठाकुर अभिराम (गोपाल-1), (3) दास गदाधर :-
श्रीरामदास आर, गदाधर दास।
चैतन्य-गोसाञिर भक्त रहे ताँर पाश ॥ 13 ॥
अनुवाद-श्रीरामदास और श्रीगदाधर दास, ये दोनों
ही चैतन्य महाप्रभुके भक्त थे और वे उनके पास
(नीलाचलमें) रहते थे ॥ 13 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'रामदास' - अभिराम दास ॥ 13 ॥
अनुभाष्य-'गदाधर दास'-चैःचः आदिलीला, 10/53
संख्या द्रष्टव्य है।
'श्रीरामदास (अभिराम)'-ठाकुर अभिराम, श्रीनित्यानन्द
प्रभु जिनके प्राण हैं, बारह गोपालोंमें अन्यतम व्रजके
'श्रीदाम' सखा हैं। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 126वाँ श्लोक)-
“पुरा श्रीदाम-नामासीदभिरामोऽधुना महान्।
द्वात्रिंशता जनैरैव वाह्यं काष्ठमुवाह यः ॥ 126 ॥"
“पूर्वकालमें जो महात्मा श्रीदाम थे, वे ही अब
अभिराम हुए हैं। ये बत्तीस लोगोंके द्वारा वहनयोग्य
लकड़ीको अकेले ही उठाकर (वंशीके जैसे) धारण
कर लेते थे।” चैःचः आदिलीला, 10/116-118 संख्या
द्रष्टव्य है।
भक्तिरत्नाकरकी चौथी तरङ्गमें श्रील अभिराम
ठाकुरकी कथाका वर्णन है। अभिराम ठाकुर पाखण्डियोंका
दलन करनेवाले श्रीनित्यानन्दके आदेशसे आचार्य और
भक्तिधर्म-प्रचारक बने।
“अभिराम गोस्वामीर प्रताप प्रचण्ड।
याँरे देखि' काँपे सदा दुर्जय पाषण्ड ॥
नित्यानन्द-आवेशे उन्मत्त निरन्तर।
जगते विदित याँर कृपा मनोहर ॥”
“अभिराम ठाकुरका ऐसा प्रचण्ड प्रताप था जिसके
कारण इन्हें देखते ही दुर्जय पाषण्डी भी थर-थर काँपते
थे। ये श्रीनित्यानन्दके आवेशमें सदा उन्मत्त रहते थे।
इनकी मनोहर कृपा समस्त जगत्में विदित है।” इनके
प्रणाम करने मात्रसे विष्णुशिला अथवा विष्णु-विग्रहके
अतिरिक्त अन्य सभी शिलाएँ अथवा मूर्तियाँ टुकड़े-टुकड़े
होकर चूर्ण-विचूर्ण हो जाती थीं, ऐसी मान्यता अभी भी
प्रचलित है।
खाना अथवा द्वारकेश्वर नदीके तटपर स्थित
कृष्णनगर जिसे 'खानाकुल कृष्णनगर' कहते हैं, वहाँ
अभिराम ठाकुरका श्रीपाट है। मन्दिरके बाहरी द्वारके
निकट एक बकुलका वृक्ष है, इसलिये इस स्थानको
'सिद्धबकुलकुञ्ज' कहते हैं। ऐसा सुना जाता है कि
अभिराम ठाकुर यहाँ आकर इस स्थानपर सबसे पहले
बैठे थे।
श्रीमन्दिरमें अर्चाविग्रहके रूपमें श्रीबलदेव, श्रीमदनमोहन
(अकेले श्रीकृष्ण) और एक सवा हाथ ऊँचा और एक
हाथ चौड़ा कसौटी पत्थर है, जिसपर वस्त्रहरणलीला,
कदम्ब वृक्ष, यमुना और बछड़ोंके साथ श्रीगोपीनाथका
विग्रह खुदा हुआ है। इसके अतिरिक्त नृत्यवेशमें
अभिराम ठाकुरकी एक मूर्ति और श्रीव्रजवल्लभ
(युगल)-मूर्ति सिंहासनपर विराजमान है। इसके अतिरिक्त
श्रीशालग्राम और श्रीगोपालमूर्ति भी है। यह किवदन्ती
प्रचलित है कि इस मन्दिरके सामने स्थित कुण्डको
खोदते समय इन श्रीगोपीनाथका विग्रह मिला था। तबसे
उस कुण्डका नाम 'अभिरामकुण्ड' है। मन्दिरमें जहाँ
श्रीविग्रह विराजमान हैं, उसके ठीक दक्षिणमें एक
पुरातन नवरत्न-मन्दिर है। मन्दिरके उच्च स्थानमें एक
पत्थरके पटलपर खुदा हुआ है कि इस मन्दिरका
निर्माण 1181 सालमें हुआ था। इसमें मन्दिर निर्माताके
नामका कोई उल्लेख नहीं है। सुना जाता है कि
निकटके गाँवके परलोकगत 'नछिरामसिंह गइला' नामक
एक व्यक्तिने इस मन्दिरका निर्माण कराया था। मन्दिर
निर्माणसे पूर्व श्रीविग्रह विराजमान थे और उनकी
सेवा-पूजा इस स्थानपर फूसके बने घरमें होती थी।
श्रीगोपीनाथजीके मन्दिरके उत्तरमें स्थानीय कायस्थ चौधुरी
लोगोंके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीराधावल्लभजीका प्राचीन मन्दिर
है।
ग्यारहवाँ अध्याय | 99

[ 11/13
वर्तमान मन्दिरके पत्थर-पटलपर खुदा है—
“श्रीश्रीगोपीनाथजीका सन 1219 वर्ष माघ मासमें मन्दिर
तैयार। सन 1308 वर्ष वैशाख मासमें मरम्मत।” सुना
जाता है, हुगली जिलाके आरामबाग थानाके माधवपुरवासी
परलोकगत पुण्डरीकाक्ष राय-नामक एक व्यक्तिने वह
निर्माण करवाया था। पुराने मन्दिरके सामने एक विशाल
पक्का नाट्य मन्दिर है। मेदिनीपुर जिलाके धीरव लोगोंने
1263 सालमें इस नाट्य मन्दिरका निर्माण करवाया,
समयसे उसके टूटनेपर 1320 सालमें पुनः उसका
संस्कार करवाया।
सेवाइतोंसे प्राप्त जानकारीके अनुसार श्रील अभिराम
ठाकुरके समयसे ही यहाँ पके चावलोंका भोग लगाया
जाता है, यहाँ तक कि मूड़ीका भी भोग लगाया जाता
है। और एक नयी प्रथा यह है कि ठाकुरको शयन
देते समय मन्दिरके पट खुले रहते हैं और सबके
सामने शयन दिया जाता है। आजकल प्रातःकालमें
ठाकुरकी मङ्गल-आरती करनेकी यहाँ प्रथा नहीं है।
यह भी कहा जाता है कि मन्दिरके भीतर एक
लोहेके सन्दूकमें श्रील अभिराम ठाकुरका प्रसिद्ध
‘श्रीजयमङ्गल’ चाबुक है। सभी सेवाइतोंने उस सन्दूकमें
अपना ताला लगा रखा है। वह चाबुक दो हाथ लम्बा
और जरीसे जड़ा हुआ है। सभी सेवाइतोंकी सहमतिसे
ही महोत्सवोंपर चाबुक बाहर निकाला जाता है।
‘श्रीजयमङ्गल’ चाबुकके विषयमें भक्तिरत्नाकर ग्रन्थकी
चौथी तरङ्गमें लिखा है कि अभिराम ठाकुर इस
चाबुकसे जिसे भी मारते थे, उसमें श्रीकृष्णप्रेम उदित
हो जाता था। एक बार श्रीनिवासाचार्य जब अभिराम-भवनमें
आये, तब अभिराम ठाकुरने उनके शरीरसे तीन बार
चाबुकका स्पर्श करवाया। उस समय अभिराम ठाकुरकी
पत्नी मालिनी देवीने हँसते हुए उनका हाथ पकड़कर
कहा— “ठाकुर ! धैर्य रखो। श्रीनिवास अभी बालक है,
आपके चाबुकके स्पर्शसे यह अधीर हो जायेगा।”
हुगली जिलाके अन्तर्गत कृष्णनगर, आमता और
बाँकुड़ा जिलाके अन्तर्गत विष्णुपुर, कोतलपुर आदि
ग्रामोंमें इनके वंशज (शौक्र या शिष्य-शाखागत ?)
विद्यमान हैं।
रत्नेश्वरके शिष्य 'अभिरामदास' नामक किसी एक
व्यक्तिने 'शाखा-निर्णय' ग्रन्थमें 'ठाकुर अभिराम' के
शिष्योंके नामों और स्थानोंका विवरण इस प्रकार दिया
है—(1) खानाकुलमें कृष्णदास ठाकुरका निवास; (वंश
लुप्त है)। (2) कैयड़ नामक ग्राममें (वर्धमानसे 10
मील दक्षिण-पश्चिमकी ओर) वेदगर्भ नामक भक्तका
वास; इनके वंशधर अभी विग्रह सेवा कर रहे हैं।
(3) बूडन ग्राममें हरिदासका वास; (अन्य कोई विशेष
जानकारी नहीं है)। (4) हेलाल (?) ग्राममें (खानाकुलसे
लगभग दो मील उत्तर दिशाकी ओर, खानानदीके
तटपर) पाखिया-गोपालदासका वास; अब वहाँ उनके
समाजके नामसे एक छोटा टूटा हुआ मन्दिर है, परन्तु
कोई विग्रह नहीं हैं। (5) मेदिनीपुर जिलाके रामजीवनपुरके
निकट पाइकमालिटा (?) ग्राममें 'गुम्फ-नारायण' का
वास; इनके वंशधर अभी विद्यमान हैं। (6) सीतानगरमें
दाड़िया मोहनका वास; (स्थान और पात्र, दोनोंके
विषयमें कोई जानकारी नहीं है)। (7) मयनामुड़िमें
(बाँकुड़ामें) सत्यराघवका वास; (इनके वंशधरोंकी भी
कोई जानकारी नहीं है)। (8) सालिखाय (हावड़ाके
निकट ?) रजनी पण्डितका वास; (इनके वंशधरोंकी भी
कोई जानकारी नहीं है)। (9) भाङ्गामोड़ामें (तारकेश्वरसे
लगभग चार मील उत्तर-पश्चिममें) सुन्दरानन्दका वास;
इनके वंशधर अभी भी हैं। (10) द्वीपग्राममें कृष्णानन्द
अवधूतका वास; इनका कोई वंश था अथवा नहीं,
इसमें सन्देह है। (11) सोनातला (ली) ग्राममें (हुगली
अथवा हावड़ा जिलामें ?) रङ्गण-कृष्णदासका वास (वंश
लुप्त है)। (12) मालदहमें मुरारि-दासका निवास;
(इनके वंशधरोंका निवास अज्ञात है)। (13) पाणिहाटीमें
मोहन ठाकुरका वास; (इनकी वंशावली अज्ञात है)।
(14) राधानगरमें (खानाकुल-कृष्णनगरके दक्षिणमें) यदु
हालदारका वास; इनका वंश लुप्त हो जानेके कारण
इनके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीबलरामकी सेवा अब श्रीगोपीनाथजीके
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