श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 633, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय
ग्यारहवें अध्यायका कथासार—इस अध्यायमें
श्रीनित्यानन्द प्रभुके परिकरोंका वर्णन है। (अमृतप्रवाह
भाष्य)
श्रीनित्यानन्द प्रभुके गणोंके प्रति नमस्कार :-
नित्यानन्द-पदाम्भोज-भृङ्गान् प्रेममधून्मदान्।
नत्वाखिलान् तेषु मुख्या लिख्यन्ते
कतिचिन्मया ॥ 1 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 1 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—प्रेमरूप मधुपानमें उन्मत्त श्रीनित्यानन्द
प्रभुके चरणकमलोंके समस्त भ्रमरोंको नमस्कार करके
उनमेंसे कुछ मुख्य भक्तोंके नाम उल्लेख कर रहा
हूँ॥ 1 ॥
अनुभाष्य—प्रेममधून्मदान् (प्रेम एव मधु तेन उन्मदान्)
अखिलान् (सर्वान्) नित्यानन्दपदाम्भोजभृङ्गान् (प्रभुपदपद्मभ्रमवान्)
नत्वा (प्रणम्य) तेषु (भक्तेषु) कतिचित् मुख्याः [भक्ताः] मया
लिख्यन्ते।
श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 1 ॥
जय जय महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य।
ताँहार चरणाश्रित येइ, सेइ धन्य॥ 2 ॥
जय जय श्रीअद्वैत, जय नित्यानन्द।
जय जय महाप्रभुर सर्वभक्तवृन्द॥ 3 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो। जिन्होंने
उनके चरणोंका आश्रय ग्रहण किया है, वे धन्य हैं।
श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो।
महाप्रभुके सभी भक्तोंकी जय हो॥ 2-3 ॥
नित्यानन्द-स्कन्धकी शाखाका वर्णन :-
तस्य श्रीकृष्णचैतन्य-सत्प्रेमामरशाखिनः।
ऊर्ध्वस्कन्धावधूतेन्दोः शाखारूपान् गणान्नुमः ॥ 4 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 4 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णचैतन्यरूप प्रेम कल्पवृक्षके
ऊपरी स्कन्धरूप श्रीअवधूत नित्यानन्दचन्द्रकी शाखारूप
सभी भक्तोंको मैं नमस्कार करता हूँ॥ 4 ॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णचैतन्यसत्प्रेमामरशाखिनः (श्रीकृष्णचैतन्य
एव सतः नित्यस्थितस्य प्रेमामरवृक्षस्य गौरनामधेयस्य
अविनाशिनस्तरोः तस्य) ऊर्ध्वस्कन्धावधूतोन्दोः (उर्ध्वस्कन्धरूपः
नित्यानन्दप्रभु एव इन्दु चन्द्र तस्य) शाखारूपान् गणान्
(शाखारूपगणान्) नुमः (नमस्कुर्मः)।
श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 4 ॥
श्रीनित्यानन्द-वृक्षेरे स्कन्ध-गुरुतर।
ताहाते जन्मिल शाखा-प्रशाखा विस्तर॥ 5 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु भक्तिवृक्षके दो स्कन्धों
(श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैताचार्य) में प्रधान स्कन्ध हैं।
उनसे बहुतसी शाखाएँ और उपशाखाएँ निकलीं॥ 5 ॥
महाप्रभुकी इच्छासे नित्यानन्द-शाखाकी
वृद्धि और प्रधानता :-
मालाकारेर इच्छा-जले बाड़े शाखागण।
प्रेम-फूल-फले भरि' छाइल भुवन॥ 6 ॥
अनुवाद—माली (श्रीचैतन्य महाप्रभु) के इच्छारूपी
जलसे ये शाखाएँ-उपशाखाएँ बढ़कर असीम हो गयीं
और इन्होंने प्रेमरूपी फलों-फूलोंसे सारे जगत्को ढक
लिया॥ 6 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'मालाकारेर'—श्रीमहाप्रभुकी॥ 6 ॥
असंख्य अनन्त गण के करु गणन।
आपना शोधिते कहि मुख्य मुख्य जन॥ 7 ॥
अनुवाद—शाखा-उपशाखारूपी भक्त असंख्य हैं,